भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

आहार-विधान—बस्ति-प्रयोग के दिनों में आहारविधि का शास्त्रीय निर्देश—कफदोष में यूष (जूस) के साथ, पित्तदोष में दूध के साथ और वातदोष में मांसरस के साथ सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

वातन्मोषधनिष्प्रायत्रिवृतासैन्धवैयुतः ॥ ५६ ॥

बस्तिरेकोऽनिले स्निग्धः स्वाद्व्रन्मोष्णो रसान्वितः।

वातदोष में बस्ति-प्रयोग—वातनाशक (भद्रदारु अथवा दशमूल आदि) द्रव्यों का क्वाथ बनाकर उसमें निशोथ, संधानमक, मधुर तथा अम्लरस एवं उष्णवीर्य पदार्थों को मिलाकर एक बस्ति देनी चाहिए। ॥ ५६ ॥

न्यग्राधादिगणक्वाथपञ्चकादिसितायुतो ॥ ५७ ॥

पित्ते स्वादुहिमौ साज्यक्षीरेक्षुरसमाधिकौ।

पित्तदोष में बस्ति-प्रयोग—न्यग्राधादि गण के क्वाथ में पञ्चकादि गणोक्त द्रव्यों का कल्क, मिश्री, घी, दूध, ईख का रस तथा मधु आदि मधुर एवं शीतल द्रव्यों को मिलाकर एक बस्ति देनी चाहिए। ॥ ५७ ॥

आरग्वधादिनिष्प्रायवत्सकादियुतास्त्रयः ॥ ५८ ॥

रूक्षाः सक्षौद्रगोमूत्रास्तीक्ष्णोष्णकटुकाः कफे।

कफदोष में बस्ति-प्रयोग—आरग्वधादि गणोक्त द्रव्यों के क्वाथ में वत्सकादि गणोक्त द्रव्यों का कल्क, रूक्षाकारक मधु, गोमूत्र, तीक्ष्ण, उष्ण एवं कटु द्रव्यों को मिलाकर तीन बस्तियाँ देनी चाहिए। ॥ ५८ ॥

वत्सक्यु—ऊपर कथित गणों के नाम आये हैं, उन्हें अ.हृ.सू. १५ में इस प्रकार देखें—वातनाशक गण श्लोक ५, न्यग्राधादि गण श्लोक ४१-४२, पञ्चकादि गण श्लोक १२, आरग्वधादि गण श्लोक ७ तथा १७-१८ तथा वत्सकादि गण श्लोक ३३-३४।

वयस्ते सन्निपातेऽपि दोषान् ध्वन्ति यतः क्रमात् ॥ ५९ ॥

सन्निपात में बस्ति-प्रयोग—सन्निपात में भी ऊपर कही गयी तीनों वात, पित्त तथा कफ नाशक बस्तियाँ क्रमानुसार दी जाती हैं। इस क्रम को कुशल चिकित्सक जानते हैं, अतएव ये तीनों दोषों का शोधन करती हैं। ॥ ५९ ॥

त्रिष्यः परं बस्तिमतो नेच्छन्त्यन्ये चिकित्सकाः। न हि दोषश्चतुर्थोऽस्ति पुनर्दीयते यं प्रति ॥ ६० ॥

तीन ही बस्तियाँ—इस दृष्टिकोण से कुछ चिकित्सक केवल तीन ही बस्तियाँ होती हैं, ऐसा कहते हैं; क्योंकि दोष भी तीन ही होते हैं, चौथा दोष भी नहीं होता, जिसके लिए अन्य बस्ति की कल्पना की जाय। ॥ ६० ॥

उत्कलेशनं शुद्धिकरं दोषाणां शमनं क्रमात्। त्रिधेव कल्पयेद्वस्तिमित्यन्येऽपि प्रचक्षते ॥ ६१ ॥

बस्तिनाम-भेद—दूसरे आचार्यों का कथन है कि विधिभेद से बस्तियाँ तीन प्रकार की होती हैं—१. उत्कलेशन, जो भीतर जाकर जमे हुए दोषों को उभार देती है। २. शुद्धिकर, विरेचन द्वारा बाहर निकाल देने वाली तथा ३. शमन, उपस्थित दोषों का शमन करने वाली। ॥ ६१ ॥

दोषौषधादिवलतः सर्वभेदेत् प्रमाणयेत्।

उक्त मतों की प्रामाणिकता—उक्त सभी मत प्रामाणिक हैं, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि वात आदि दोषों का, विविध गुणवाले औषध-द्रव्यों का तथा देश-काल आदि के बल का विचार करने से इनकी प्रामाणिकता स्वयं सिद्ध है। वास्तव में जो भेद दृष्टिगोचर होता है, वह केवल विधिभेद ही है।

सम्यङ्निरूढलिङ्गं तु नासम्भ्राव्य निवर्तयेत् ॥ ६२ ॥

बस्तिकर्म की अवधि—जब तक इसी अध्याय में कथित सम्यक् निरूहण के लक्षण दिखलायी न दें तब तक बस्तिकर्म के प्रयोगक्रम को रोकना नहीं चाहिए। ॥ ६२ ॥