अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबस्तिविधिरध्यायः १९ ]
सूत्रस्थानम्
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विरिक्तवन्व योगादीन्विद्यात्—
सम्यग्योग आदि का संकेत—निरुहणबस्ति के सम्यग्योग, हीनयोग, अतियोग के लक्षणों को विरेचन के समान ही समझें। इनके लक्षण अ.हू.सू. १८।३८-४१ में कहे गये हैं।
—योगे तु भोजयेत् ॥५०॥
कोष्णेन वारिणा स्नातं तनुधन्वरसीदनम्।
सम्यग्योग में पश्चात् कर्म—निरुहणबस्ति का सम्यग्योग हो जाने के बाद उस व्यक्ति को गुनगुने जल से स्नान कराकर धन्व ( जांगल ) देश में उत्पन्न पशु-पक्षियों के मांसरस के साथ भात खिलाना चाहिए ॥५०॥
विकारा ये निरुद्धस्य भवन्ति प्रचलैर्मलेः ॥५१॥
ते सुखोष्णाम्बुसिक्तस्य यास्ति भुक्तवतः शमसु।
विकारों का शमन—निरुहणबस्ति का प्रयोग कराने से मलों के अपने स्थान से इधर-उधर हो जाने के कारण जो तात्कालिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं, वे सब गुनगुने जल द्वारा स्नान करने तथा मांसरस के साथ भोजन कर लेने पर शांत हो जाते हैं ॥५१॥
अथ वातादिर्दितं भूयः सद्य एवानुवासयेत् ॥५२॥
पुनः अनुवासन-प्रयोग—वातरोग से पीड़ित व्यक्ति को निरुहणबस्ति देने के बाद तत्काल ही अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए ॥५२॥
वक्तव्य—‘सद्य एवानुवासयेत्’—यहाँ ‘सद्यः’ शब्द का अर्थ ‘तत्क्षण = तत्काल’ ही है, न कि ‘सद्योमरणीयमिन्द्रिय’ अध्याय में कहे गये ‘सद्यः’ के समान समझें। वहाँ तो श्रीचक्रपाणि के अनुसार सात रात या तीन रात तक का समय स्वीकार किया गया है। देखें—च.इ. १०।१-२। यहाँ भी सामान्य रूप से विरेचन के सात दिन बाद अनुवासनबस्ति देने की अनुमति चरक तथा सुश्रुत ने दी है। देखें—सु.चि. ३७।३ तथा च.सू. १५।१६। आवश्यक विधियों में सामान्य वचनों का उपयोग कहीं भी नहीं होता है।
सम्यग्धीनातियोगाश्च तस्य स्युः स्नेहपीतवत्।
अनुवासन के विविध योग—अनुवासनबस्ति के सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग स्नेहपान के सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग के समान होते हैं। देखें—अ.हू.सू. १६।३०-३१।
किञ्चित्कालं स्थितो यश्च सपुरीषो निवर्तते ॥५३॥
सानुलोमानिलः स्नेहस्तस्मिद्वमनुवासनम्।
सम्यग्योग का वर्णन—अनुवासनबस्ति द्वारा दिया गया जो स्नेह कुछ समय तक मलाशय में एककर पुरीष ( मल ) के साथ लौट आता है और जो वायु का अनुलोमन कर देता है, उसे अनुवासनबस्ति का सम्यग्योग कहा जाता है ॥५३॥
एकं त्रीन् वा बलासे तु स्नेहबस्तीन् प्रकल्पयेत् ॥५४॥
पञ्च वा सप्त वा पित्तै, नवैकादश वाऽनिलै। पुनस्ततोऽप्ययुग्मास्तु पुनरास्थापनं ततः ॥५५॥
दोषानुसार बस्तिसंख्या—कफदोष में १ अथवा ३, पित्तदोष में ५ या ७ तथा वातदोष में ९ या ११ स्नेहबस्तियाँ देनी चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो इसके आगे भी अयुग्म ( विषम ) संख्या में ( पहले कहीं हुई संख्याओं से बढ़ाकर बस्तियाँ देनी चाहिए। उसके बाद फिर आस्थापन ( निरुहण ) बस्तियों का प्रयोग कराना चाहिए। यह आस्थापनबस्ति स्नेहबस्तियों के साथ-साथ भी दी जाती है ॥५४-५५॥
कफपित्तानिलेच्छव्रं यूषधीररसैः क्रमात्।