अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—भगवान् धन्वन्तरि ने विशेष करके नस्य शब्द का प्रयोग कहीं किया है, इसके लिए देखें—सू. चि. ४०।२१। वृद्धवाग्भट ने नस्य-प्रयोगकाल में क्रोध, हँसना, बोलना, शरीर के अवयवों को हिलाना आदि न करे, ऐसा निर्देश दिया है। देखें—अ. सं. सू. २९।१६।
सम्यक्स्निग्धे सुखोच्छ्वासस्वप्नबोधाक्षपाटवम् ॥ २३ ॥
स्नेहन-नस्य का समयोग—स्नेहन-नस्य का सम्यग्योग होने पर ये लक्षण होते हैं—श्वास-प्रश्वास की गति का सुखपूर्वक होना, निद्रा का भलीभाँति आना, सुख से जागना और श्रोत्र आदि सभी ज्ञानेन्द्रियों में अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने की शक्ति का होना ॥ २३ ॥
रुक्षेऽक्षितस्थता शोषो नासास्ये मूर्द्धशून्यता।
रुक्ष-नस्य का हीनयोग—रुक्ष-नस्य के हीनयोग होने पर ये लक्षण होते हैं—आँखों में जकड़न, नासिका के छिद्रों तथा मुखप्रदेश में सूखापन तथा शिरःप्रदेश में सुनपन का अनुभव होना।
स्निग्धेऽति कण्ठगुह्यताप्रसेकाहृषीनीसाः ॥ २४ ॥
स्नेहन-नस्य का अतियोग—स्नेहन-नस्य के अतियोग होने पर ये लक्षण होते हैं—नासिका में खुजली का होना, भारीपन, नासिका से तथा नेत्रों से लगातार स्नाव का निकलना, भोजन के प्रति अहर्नि तथा पीनस (प्रतिशय) का होना ॥ २४ ॥
सुविरिक्तेऽक्षिलघुतावक्त्रस्वरविशुद्धयः ।
विरेचन-नस्य का सम्यग्योग—विरेचन-नस्य के सम्यग्योग होने पर ये लक्षण होते हैं—आँखों में हल्कापन, मुख की शुद्धि तथा स्वर में स्पष्टता की प्रतीति होना।
दुर्विरिक्ते गदोद्रेकः, क्षामताऽतिविरेचिते ॥ २५ ॥
मिथ्यायोग, हीनयोग के लक्षण—विरेचन-नस्य के मिथ्यायोग होने पर रोगों की वृद्धि तथा विरेचन के हीनयोग होने पर शरीर में कृशता तथा दुर्बलता ये लक्षण होते हैं ॥ २५ ॥
बक्तव्य—वृद्धवाग्भट ने कहा है कि स्नेहविधि का सभी कार्य पूरा हो जाने पर उस व्यक्ति को स्नेहोक्त आचार के पालन का आदेश दें। देखें—अ. सं. सू. २९।१७। इसका विस्तार से वर्णन अ. सं. सू. २५।४१ से ४४ तक के श्लोकों में दिया गया है।
प्रतिमर्शः क्षतक्षामबालवृद्धसुखात्मसु । प्रयोज्योऽकालवर्षेऽपि—
प्रतिमर्शनस्य-प्रयोग—उरःक्षत, कृशता, बालक, वृद्ध तथा सुकुमार व्यक्तियों में अकाल में अर्थात् निर्दिष्ट समय के आगे-पीछे भी और वर्षाकाल में भी कराया जा सकता है।
—न त्विष्टो दुष्प्रपीनसे ॥ २६ ॥
मद्यपीतेऽबलश्रोत्रे कृमिदूषितमूर्द्धनि । उत्कृष्टोत्तिलिष्टदोषे च, हीनमात्रतया हि सः ॥ २७ ॥
प्रतिमर्श-नस्य का निषेध—दुष्ट पीनस (प्रतिशय) में, मद्यपान करने के बाद या मदात्यरोग में, कर्णविकारों में, शिरःप्रदेश में क्रमियों के उत्पन्न हो जाने पर, बड़े हुए दोषों में तथा उभड़े हुए दोषों में इस प्रतिमर्श-नस्य का प्रयोग न करे। क्योंकि इसकी मात्रा कम होती है, अतः वह रोगों को दूर नहीं कर सकती ॥ २६-२७ ॥
निशाहर्भुक्तवाताहःस्वप्नाव्ध्रमरेतसाम् । शिरोऽभ्यअनगण्डूषप्रप्तावाजनवर्चसाम् ॥ २८ ॥
दन्तकाष्ठस्य हासस्य योज्योऽन्तेऽसौ द्विबिन्दुकः ।
प्रतिमर्श-नस्य के पन्द्रह काल—१. रात्रि के अन्त में (प्रातः उठते ही), २. दिन के अन्त में, ३. भोजन करने के अन्त में, ४. वमन करने के अन्त में, ५. दिन में सोकर उठने के बाद, ६. मार्ग चलने के अन्त में, ७. परिश्रम करने के अन्त में, ८. स्त्री-सहवास के अन्त में, ९. सिर में अभ्यंग कराने के अन्त