अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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में, १०. कवलधारण के अन्त में, ११. प्रसाव ( पेशाब करने ) के अन्त में, १२. अंजन लगाने के बाद, १३. मलत्याग करने के बाद, १४. दातीन करने के बाद तथा १५. हँसी-मजाक करने के बाद २ बूँद की मात्रा में प्रतिमर्श की एक नस्य लें ॥ २८ ॥
पञ्चसु स्रोतसां शुद्धिः, कलमानशस्त्रिषु क्रमात् ॥ २९ ॥
दूषलं पञ्चसु, ततो दन्तदाढर्यं मरुच्छमः ।
प्रतिमर्श-नस्य के लाभ—ऊपर कहे गये प्रथम पाँच कालों में नस्य लेने से स्रोतों की शुद्धि होती है। क्रमशः अगले तीन कालों में नस्य का प्रयोग करने से कम्म ( थकावट ) का नाश, उसके आगे पुनः पाँच कालों में नस्य का सेवन करने से दृष्टि की शक्ति बढ़ती है, इसके आगे शेष दो ( १४ तथा १५ ) कालों में नस्य लेने से क्रमशः दांतों में स्थिरता एवं वातदोष की शान्ति होती है। वृद्धवाम्भट ने इसकी मात्रा १ या २ बूँद स्वीकार की है ॥ २९ ॥
न नस्यमूनसप्ताब्दे नातीताशीतिवत्सरे ॥ ३० ॥
न चोनाष्टादशे धूमः, कबलो नोतपञ्चमे । न शुद्धिरूनदशमे न चातिक्रान्तसप्ततौ ॥ ३१ ॥
अवस्था का विचार—प्रायः सात वर्ष की अवस्था के पहले तथा अस्सी वर्ष की अवस्था के बाद मर्श नस्य का प्रयोग नहीं करना चाहिए। १८ वर्ष की अवस्था के पहले धूमपान का प्रयोग, ५ वर्ष की अवस्था के पहले कवल का प्रयोग न करे। १० वर्ष की अवस्था के पहले तथा ७० वर्ष की अवस्था के बाद शोधन ( वमन, विरेचन तथा सिरावेध ) का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३०-३१ ॥
बक्तव्य—उक्त अवस्था की सीमा स्वस्थ पुरुष को चिर-स्वस्थ रखने के दृष्टिकोण से कही गयी है। रुग्णावस्था में इन नियमों का पालन हो पाना सम्भव नहीं होता, अपितु आवश्यकता पड़ने पर उक्त सभी कर्म करने ही पड़ते हैं।
आजन्ममरणं शस्तः प्रतिमर्शस्तु बस्तिवत् । मर्शवच्च गुणान् कुर्यात्स हि नित्योपसेवनात् ॥ ३२ ॥
न चात्र यन्त्रणा नापि व्यापद्भ्यो मर्शवद्भ्यम् ।
प्रतिमर्श-नस्य का प्रयोग जन्म से लेकर मरण के पूर्व तक किया जाना श्रेयस्कर होता है। इसी प्रकार मात्राबस्ति का प्रयोग भी जीवनभर किया जाता है। प्रतिमर्श-नस्य का यदि प्रतिदिन सेवन किया जाता है, तो वह मर्श नस्य के समान ही गुणदायक होती है। इसमें किसी प्रकार की यन्त्रणा ( आहार-विहार आदि का बन्धन ) नहीं है और इससे मर्श नस्य के समान रोगों की उत्पत्ति होने का भय भी नहीं है ॥ ३२ ॥
तैलमेव च नस्यार्थे नित्याभ्यासेन शस्यते ॥ ३३ ॥
शिरसः श्लेष्मधामत्वात्तन्नेहाः स्वस्यस्य नेतरे ।
नस्य में तेल का प्रयोग—स्वस्थ पुरुष को प्रतिदिन नस्य ( प्रतिमर्श ) करने के लिए तेल ( सरसों का तेल ) की ही प्रशंसा की गयी है, क्योंकि सिर कफ का घर है। अतः दूसरे स्नेह कफकारक होते हैं, अतएव उनका प्रयोग उचित नहीं माना गया ॥ ३३ ॥
आशुक्कुचिरकारित्वं गुणोत्कर्षापकृष्टता ॥ ३४ ॥
मर्शे च प्रतिमर्शे च विशेषो न भवेद्यदि । को मर्श सपरीहारं सापदं च भजेत्ततः ॥ ३५ ॥
अच्छपानविचाराख्यां कुटीवातातपस्थितौ । अन्वासमात्राबस्ती च तद्वदेव विनिर्दिशेत् ॥ ३६ ॥
मर्श-प्रतिमर्श में फलभेद—मर्श नस्य शीघ्र अपना फल देती है, अधिक काल तक गुणकारक होती है और प्रतिमर्श नस्य विलम्ब से फल देती है तथा उससे कम गुणकारक होती है। यदि मर्श तथा प्रतिमर्श नस्य में इस प्रकार का परस्पर फलभेद न होता, तो कौन आहार-विहार के परिहार ( नियन्त्रण ) वाले मर्श नस्य का सेवन करता। क्योंकि मर्श नस्य के प्रयोग में हीनयोग तथा अतियोग होने का भय बना