भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 286

२५०

अष्टाङ्गहृदय

रहता है। इसी प्रकार स्नेहपान के अच्छपान तथा विचारणा में, रसायन-विधान के कुटीप्रावेशिक तथा वातातपिक के प्रयोगों में और बस्ति-विधान के अनुवासनबस्ति एवं मात्राबस्ति के प्रयोगों में परस्पर भेद का कारण तथा उनके लाभों पर ध्यान देना चाहिए। शास्त्रकारों ने जो प्रत्येक विधि के भेदों का वर्णन किया है वे सब सहेतुक हैं, लाभदायक हैं, भले ही उनमें पथ्य-परहेज अनिवार्य होता है ॥ ३४-३६ ॥

जीवन्तीजलदेवदारुजलदत्वकसेव्योगपीहिमं

दार्वीत्वइमधुकफलागुस्वरीपुण्ड्राहबिल्वोत्पलम् ।

धावन्वी सुरभिं स्थिरे कुमिहरं पत्रं वृष्टि रेणुकां

किञ्जल्कं कमलाद्वलां शतगुणे विव्येऽम्मसि क्वाथयेत् ॥ ३७ ॥

तैलाद्वसं दशगुणं परिशेष्य तेन तैलं पत्रेन सलिलेन दशैव वारान् ।

पाके क्षिपेच्च दशमे सममाजदुग्धं नस्यं महागुणमुशन्त्यणुतैलमेतत् ॥ ३८ ॥

अणुतैल-निर्माणविधि—जीवन्ती, नेत्रबाला, देवदारु, केवटीमोथा, दालचीनी, खस, सारिवा, चन्दन, दाहहल्दी, मुलेठी, नागरमोथा, अगह, त्रिफला, पुण्डेरिया, बेलगिरी, कमल, कण्टकारी, वनभण्टा, रासना, शालपर्णी, पुष्पपर्णी, वायविडंग, तेजपत्ता, छोटी इलायची, रेणुका, कमल का केसर तथा बला—उक्त सभी द्रव्यों को समान भाग लेकर जौकट कर लें। द्रव्यों के परिमाण से सौ गुना वर्षा के जल में क्वाथ करें। जब पकते-पकते दसवाँ हिस्सा जल शेष रह जाय तो इसे छान लें। तदनन्तर क्वाथ से दशमांश तेल लें और बराबर का क्वाथजल उस तैल में डालकर पाक करें। इसी प्रकार और आठ बार समान भाग क्वाथ जल डाल-डालकर कुल मिलाकर नौ बार उस तैल का पाक करें। दसवाँ बार पाक करते समय क्वाथ के साथ समान भाग बकरी का दूध भी उसमें डाल कर पाक करें। यह 'अणुतैल' है। इसका नस्य अत्यन्त गुणकारी होता है ॥ ३७-३८ ॥

वक्तव्य—अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान २९।९ तथा १० में दो अणुतैलों का वर्णन है। उक्त योग दूसरे योग से मिलता-जुलता है। यही पाठ चरक के अनुकूल भी है। देखें—च. सू. ५।६३-७०। चरकोक्त योग तथा दोनों वाग्भटों के योग नस्य के प्रयोग में आते हैं। ऊपर दिये गये 'बला' शब्द से 'बरियारा' का ग्रहण करना चाहिए।

घनोन्नतप्रसन्नत्वकस्कन्धग्रीवास्यवक्षसः । दृढेन्द्रियास्तपलिता भवेयुर्नस्यशीलिनः ॥ ३९ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने नस्यविधिर्नाम विशोऽध्यायः ॥ २० ॥


स्नेहन-नस्य से लाभ—जो प्रतिदिन स्नेहन-नस्य का प्रयोग करते हैं, उनकी त्वचा, कन्धे, गरदन, मुखमण्डल तथा वक्षस ( छाती ) घन ( ठोस ), उन्नत ( ऊँचे ), प्रसन्न ( प्रसादगुणयुक्त ) हो जाते हैं। इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ हो जाती हैं और उनके बाल समय से पहले सफेद नहीं होते हैं ॥ ३९ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

नस्यविधि नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २० ॥