अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः
अथातो धूमपानविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब हम यहाँ से धूमपानविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —ऊर्ध्वजनुविकारों के प्रशमन ( चिकित्सा ) के लिए २०वें अध्याय में नस्य के भेद-उपभेदों का वर्णन, उनकी सेवन-विधि तथा उससे होने वाले लाभ-हानियों का वर्णन किया गया है। उसके बाद वर्णन किया जाने वाला यह धूमपान भी उक्त विकारों में हितकर होता है, इसका वर्णन इस अध्याय में किया जायेगा। यह धूमपान बीड़ी, सिगरेट, सिगार तथा चरस आदि विकारकारक धूमपानों से सर्वथा भिन्न एवं उपयोगी है। इसके पर्याय हैं—धूम्र, धूमल।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ५; सु.चि. ४० तथा अ.सं.सू. ३०। सभी संहिताकारों ने अपनी-अपनी संहिताओं में कुछ-कुछ विशेषताओं का वर्णन किया है, अतः उक्त स्थलों का आप अवश्य अवलोकन करें।
जत्रुर्ध्वकफवातोत्यविकाराणामजन्मने। उच्छेदाय च जातानां पिबेद्भूमं सदाऽऽत्मवान् ॥ १ ॥
धूमपान-विधि का वर्णन —आत्मवान् ( मानसिक बल से परिपूर्ण ) मानव को जनुअस्थि के ऊपरी भाग में होने वाले कफज तथा वातज रोगों की उत्पत्ति ही न हो इसलिए और यदि उक्त प्रकार के रोग हो गये हों तो उन्हें उखाड़ कर फैकने के लिए सदा धूमपान करना चाहिए ॥ १ ॥
बक्तव्य —महर्षि बागभट ने नस्य, गण्डूष के साथ-साथ धूमपान आदि का वर्णन अ. ह. सु. २।६ में किया है, यहाँ उसी धूम का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है। धूमपान स्वयं में एक दुर्ब्यसन है, किन्तु दुर्ब्यसनों का प्रभाव आत्मवान् पुरुषों पर नहीं पड़ता, अस्तु। अष्टांगसंग्रह सू. ३०।३ में इस बात का स्पष्ट निर्देश दिया है कि इसका सेवन कब, किन्हें करना चाहिए और कब, किन्हें नहीं करना चाहिए।
स्निग्धो मध्यः स तीक्ष्णश्च, वाते वातकफे कफे। योज्यः—
धूम के भेद तथा प्रयोग—धूमपान विधिभेद से तीन प्रकार का होता है—१. स्निग्ध, २. मध्य तथा ३. तीक्ष्ण। दोषभेद से इनका प्रयोग—स्निग्ध धूम वातविकारों में, मध्य धूम वातकफज विकारों में तथा केवल कफज विकारों में तीक्ष्ण धूम का प्रयोग विहित है।
बक्तव्य —बुद्धबागभट ने अ. सं. सू. ३०।४ में धूमभेदों का वर्णन इस प्रकार किया है—१. शमन, २. बृंहण, ३. शोधन। पुनः इनके पर्याय—१. शमन, प्रायोगिक, मध्यम। २. बृंहण, स्नेहन, मृदु। ३. शोधन, विरेचन, तीक्ष्ण। तीन अन्य भेदों की चर्चा—१. कासघ्न, २. वामक, ३. ब्रणधूमन। इसी विषय को सुश्रुत ने चि. ४०।१४ में इस प्रकार कहा है—धूमपान पाँच प्रकार का होता है—१. प्रायोगिक, २. स्नेहिक, ३. वैरेचनिक, ४. कासघ्न तथा ५. वामनीय।
—न रक्तपित्तातिविरिक्तोदरमेहिषु ॥ २ ॥
तिमिरोर्ध्वानिल्लाध्यानरोहिणीदत्तबस्तिषु । मत्स्यमध्यदधिश्चौरक्षौद्रस्नेहविषाशिषु ॥ ३ ॥
शिरस्यभिहते पाण्डुरोगे जागरिते निशि।