भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

एकविंशोऽध्यायः

अथातो धूमपानविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम यहाँ से धूमपानविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —ऊर्ध्वजनुविकारों के प्रशमन ( चिकित्सा ) के लिए २०वें अध्याय में नस्य के भेद-उपभेदों का वर्णन, उनकी सेवन-विधि तथा उससे होने वाले लाभ-हानियों का वर्णन किया गया है। उसके बाद वर्णन किया जाने वाला यह धूमपान भी उक्त विकारों में हितकर होता है, इसका वर्णन इस अध्याय में किया जायेगा। यह धूमपान बीड़ी, सिगरेट, सिगार तथा चरस आदि विकारकारक धूमपानों से सर्वथा भिन्न एवं उपयोगी है। इसके पर्याय हैं—धूम्र, धूमल।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ५; सु.चि. ४० तथा अ.सं.सू. ३०। सभी संहिताकारों ने अपनी-अपनी संहिताओं में कुछ-कुछ विशेषताओं का वर्णन किया है, अतः उक्त स्थलों का आप अवश्य अवलोकन करें।

जत्रुर्ध्वकफवातोत्यविकाराणामजन्मने। उच्छेदाय च जातानां पिबेद्भूमं सदाऽऽत्मवान् ॥ १ ॥

धूमपान-विधि का वर्णन —आत्मवान् ( मानसिक बल से परिपूर्ण ) मानव को जनुअस्थि के ऊपरी भाग में होने वाले कफज तथा वातज रोगों की उत्पत्ति ही न हो इसलिए और यदि उक्त प्रकार के रोग हो गये हों तो उन्हें उखाड़ कर फैकने के लिए सदा धूमपान करना चाहिए ॥ १ ॥

बक्तव्य —महर्षि बागभट ने नस्य, गण्डूष के साथ-साथ धूमपान आदि का वर्णन अ. ह. सु. २।६ में किया है, यहाँ उसी धूम का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है। धूमपान स्वयं में एक दुर्ब्यसन है, किन्तु दुर्ब्यसनों का प्रभाव आत्मवान् पुरुषों पर नहीं पड़ता, अस्तु। अष्टांगसंग्रह सू. ३०।३ में इस बात का स्पष्ट निर्देश दिया है कि इसका सेवन कब, किन्हें करना चाहिए और कब, किन्हें नहीं करना चाहिए।

स्निग्धो मध्यः स तीक्ष्णश्च, वाते वातकफे कफे। योज्यः—

धूम के भेद तथा प्रयोग—धूमपान विधिभेद से तीन प्रकार का होता है—१. स्निग्ध, २. मध्य तथा ३. तीक्ष्ण। दोषभेद से इनका प्रयोग—स्निग्ध धूम वातविकारों में, मध्य धूम वातकफज विकारों में तथा केवल कफज विकारों में तीक्ष्ण धूम का प्रयोग विहित है।

बक्तव्य —बुद्धबागभट ने अ. सं. सू. ३०।४ में धूमभेदों का वर्णन इस प्रकार किया है—१. शमन, २. बृंहण, ३. शोधन। पुनः इनके पर्याय—१. शमन, प्रायोगिक, मध्यम। २. बृंहण, स्नेहन, मृदु। ३. शोधन, विरेचन, तीक्ष्ण। तीन अन्य भेदों की चर्चा—१. कासघ्न, २. वामक, ३. ब्रणधूमन। इसी विषय को सुश्रुत ने चि. ४०।१४ में इस प्रकार कहा है—धूमपान पाँच प्रकार का होता है—१. प्रायोगिक, २. स्नेहिक, ३. वैरेचनिक, ४. कासघ्न तथा ५. वामनीय।

—न रक्तपित्तातिविरिक्तोदरमेहिषु ॥ २ ॥

तिमिरोर्ध्वानिल्लाध्यानरोहिणीदत्तबस्तिषु । मत्स्यमध्यदधिश्चौरक्षौद्रस्नेहविषाशिषु ॥ ३ ॥

शिरस्यभिहते पाण्डुरोगे जागरिते निशि।

२५२

अष्टाङ्गहृदये

धूमपान का निषेध—रक्तपित्तज रोगों में, विरेचन कराने के बाद होने वाले उदररोगों में, प्रमेहरोग में, तिमिर नामक नेत्ररोग में, ऊर्ध्वग वात ( उदावर्त ) में, आध्मन होने पर, रोहिणी नामक कण्ठरोग में, बस्ति-प्रयोग कराने पर, मछली खाने पर, दही, दूध, मधु तथा स्नेहपान करने पर, विष खाने या पीने पर, सिर पर चोट आ जाने पर, पाण्डुरोग में तथा रात्रि में जागने पर धूमपान का प्रयोग न करें। इन स्थितियों पर न केवल शास्त्रीय धूमपान का ही नहीं अपितु बीड़ी, तमाखु आदि का भी सेवन न करें ॥ २-३ ॥

रक्तपित्तस्थबाधिर्यतृणमूर्च्छासदमोहकृत् ॥ ४ ॥

धूमोऽकालेऽतिपीतो वा—

धूमपान से हानि—अकाल ( असमय ) में अथवा अधिक धूमपान कर लेने पर रक्तपित्तजनित विकार, अन्धापन, बहरापन, बार-बार प्यास का लगना, मूर्च्छा, मद तथा मोह ( बेहोशी )—ये विकार हो जाते हैं ॥ ४ ॥

—तत्र शीतो विधिहितः।

धूमपानजनित रोगों की चिकित्सा—इस प्रकार के विकारों की शान्ति के लिए सभी प्रकार की शीत चिकित्सा करनी चाहिए।

वक्तव्य—महर्षि सुश्रुत ने इस प्रकार की धूमविकृतियों को धूमोपहत संज्ञा दी है। देखें—सू.सू. ११।२९-३७। वृद्धवाग्भट का दृष्टिकोण इस सम्बन्ध में देखें—अ.सं.सू. ३०।७।

शुतजुस्मिंतविष्णूस्त्रीसेवाशस्त्रकर्मणम् ॥ ५ ॥

हासस्य दन्तकाष्ठस्य धूममन्ते पिबेन्मृदुम्। कालेष्चेषु निशाहारतावनान्ते च मध्यमम् ॥ ६ ॥

निद्रान्तस्याज्ञनस्नानच्छादितान्ते विरेचनम्।

त्रिविध धूम के सेवन का काल—१. छींक होने, जैमाई लेने, मल-मूत्र त्याग करने, स्त्रीमहवास, शस्त्रकर्म, हैसने तथा दातृत्व करने के अन्त में मुदु धूमपान करें। २. उक्त समयों में, रात में भोजन करने के बाद तथा नस्य-प्रयोग करने के अन्त में मध्य धूमपान करें। ३. निद्रा, स्नेहन-नस्य, अञ्जन, स्नान तथा वमन करने के अन्त में विरेचक धूमपान करें। कारण यह है कि इन समयों में धूमपान करने से कफ अपने स्थान को छोड़ देता है, अतः उसका निर्हरण हो सकता है ॥ ५-६ ॥

बस्तिनेत्रसमद्रव्यं त्रिकोशं कारयेदृजु ॥ ७ ॥

मूलाग्रेऽङ्गुष्ठकोलास्थिप्रवेशं धूमनेत्रकम्।

धूमनेत्रक—इसका निर्माण भी बस्तिनेत्र की भांति स्वर्ण आदि धातुओं से कराना चाहिए। ( इसका वर्णन १९वें अध्याय श्लोक ९ में देखें। ) इस नेत्रक में तीन कोश ( मोड़ ) हों, यह नेत्र सीधा हो, इसके मूलभाग ( जहाँ धूमोपयोगी द्रव्य रखे जाते हैं ) में अँगूठा के बराबर छिद्र हो और जहाँ से धूमपान किया जाता है, वहाँ जंगली बेर की गुठली के प्रवेश योग्य छेद हो ॥ ७ ॥

तीक्ष्णस्नेहनमध्येषु त्रीणि चत्वारि पञ्च च ॥ ८ ॥

अङ्गुलानां क्रमात्पातुः प्रमाणेनाष्टकानि तत्।

धूमनेत्र की लम्बाई—तीक्ष्ण धूमपान करने के लिए तीन अष्टक अर्थात् २४ अंगुल, स्नेह धूमपान करने के लिए चार अष्टक अर्थात् ३२ अंगुल और मध्यम धूमपान करने के लिए पाँच अष्टक अर्थात् ४० अंगुल लम्बाई धूमपान करने वाले व्यक्ति की अंगुलियों के प्रमाण से होनी चाहिए ॥ ८ ॥

वक्तव्य—यह धूमनेत्रक हुक्का की नली का नाम है। राजा, रईस, साहूकारों के घरों में, बड़ी-बड़ी महफिलों में इसके दर्शन होते हैं। च.चि. १७।७९ में इसे 'मल्लकसम्पुट' और च.चि. १८।६९ में 'शरावसम्पुट' कहा गया है।

धूमपानविधिरध्यायः २१ ]

सूत्रस्थानम्

२५३

ऋजूपविष्टस्तन्चेता विवृतास्यस्त्रिपर्ययम् ॥१॥ पिधाय छिद्रमेकेकं धूमं नासिकया पिबेत्।

नासिका से धूमपान की विधि—सीधा बैठकर धूमपान की और मन लगाकर नासिका के एक छिद्र को अंगुली से दबाकर दूसरे छिद्र पर नेत्र को लगाकर मुख खोलकर तीन बार नासिका द्वारा धूमपान करे अर्थात् उसी विधि से फिर दूसरे छिद्र द्वारा धूमपान करे, फिर पहले वाले छिद्र से। इस प्रकार त्रिपर्यय हो जाता है ॥१॥

वक्तव्य—उक्त श्लोक में दिया गया 'विवृतास्यः' पाठ विचारणीय है। इसका अर्थ है—जिस पुरुष का मुख खुला हो। आप प्रयोग करके देखें—मुख के खुले रहने पर नासिकाछिद्र से धूमपान नहीं हो पायेगा। अतः उक्त प्रयोग की चरितार्थता इस रूप में की जा सकती है कि नासिका से किये गये धूम को मुख से निकालें। देखें—श्रीअरुणदत्त तथा श्रीहेमद्रि ने इस पर टीका ही नहीं लिखी। इस दृष्टि से अ.सं.सू. ३०।१२ का पाठ अधिक स्पष्ट है।

पर्यय—धूमपान करना और धूम को निकालना एक पर्यय है, इसी को आगे चलकर आक्षेप तथा मोक्ष की संज्ञा दी गयी है।

प्राक् पिबेत्नासयोत्किलष्टे दोषे प्राणशिरोगते ॥१०॥ उत्कलेशनार्थं वक्त्रेण, विपरीतं तु कण्ठेन।

नासा एवं मुख से धूमपान—नासिका तथा शिरःप्रदेश में दोषों के उभड़े हुए होने पर सबसे पहले नासिका के छिद्रों द्वारा धूमपान करना चाहिए और यदि दोष उभड़ा हुआ न हो तो उसे उभाड़ने के लिए पहले मुख द्वारा धूमपान करके फिर नासिका से धूमपान करे। यदि कण्ठप्रदेश में स्थित दोष को उभाड़ना हो तो पहले नासिका से और फिर मुख से धूमपान करे ॥१०॥

मुखेनैवोद्गमेद्वम—

धूम का निर्हरण—धूमपान नासिका के छिद्र से और मुख से करने का ऊपर विधान किया गया है, किन्तु इन दोनों धूमों को मुख से ही निकालना चाहिए।

—नासया दृण्विघातकृत् ॥११॥

नासिका से धूम न निकालें—नासिका के छिद्रों से धूम निकालने से नेत्रों को हानि हो सकती है ॥११॥

वक्तव्य—भगवान् धन्वन्तरि के शब्दों में इसका वर्णन सु. चि. ४०।७-८ में देखें।

आक्षेपमोक्षः पातव्यो धूमस्तु त्रिस्त्रिभिस्त्रिभिः।

तीन बार धूमपान करें—आक्षेप ( धूमपान करना ) और मोक्ष ( धुआँ को बाहर निकालना ) यह एक पर्यय है। इसी प्रकार दो बार और अर्थात् एक बार के धूमपान काल में कुल मिलाकर तीन बार धूमपान करना चाहिए।

अहः पिबेत्सकृत् स्निग्धं, द्विमध्यं, शोधनं परम् ॥१२॥

त्रिश्रतुर्वा—

धूमपान की संख्या—दिनभर में स्निग्ध धूमपान एक बार, मध्यम धूमपान दो बार तथा शोधन ( तीक्ष्ण ) धूमपान तीन अथवा चार बार करना चाहिए ॥१२॥

—मृदौ तत्र द्रव्याण्यगुरुगगुलु। मुस्तस्थोण्येशैलेयलदोशीरवालकम् ॥१३॥ वराङ्गकौन्तीमधुकबिल्वमज्जैलवालुकम् । श्रीवेष्टकं सर्जरसे ध्यामकं मदनं स्त्वम् ॥१४॥ शल्लकी कुड्कुमं माषा यवाः कुन्दुरुकस्तिलाः । स्नेहः फलानां साराणां मेदो मज्जा वसा घृतम् ॥

२५४

अष्टाङ्गहृदय

मुदु धूम के द्रव्य—अगुरु, गुगुलु, मोथा, धुनेर, शैलेय ( छरीला ), जटामांसी, खस, नेत्रबाला, दालचीनी, रणुका, मुलेठी, बेल् की गिरी, एलबालुक, श्रीवेष्टक ( चीड़ की गोद = विरोजा या लीसा ), सर्जरस ( राउ ), ध्यामक ( कतुण ), मदन ( मोम ), नागरमोथा, शल्लकी ( सलाई = चीड़ की लकड़ी ), कुंकुम, उड़द, जी, कुन्दुक गोद, तिल, बादाम आदि फलों के तेल, चन्दन आदि सार वाले काष्ठों के स्नेह ( तेल ), मेदस, मज्जा, वसा और घृत इन द्रव्यों से मुदु धूम का निर्माण किया जाता है ॥ १३-१५ ॥

शमने शल्लकी लाक्षा पृथ्वीका कमलोत्पलम् । न्यग्रीधोदुम्बराश्वत्यलक्षरोघत्वचः सित्ता ॥ १६ ॥

यष्टीमधु सुवर्णत्वक् पद्यकं रक्त्यष्टिका । गन्धाश्चाकृष्टतगराः—

मध्य धूम के द्रव्य—इसी को शमन धूम भी कहते हैं। शल्लकी ( सलाई ), लाख, पृथ्वीका, कमल, नीलकमल, बरगद, गूलर, पीपल, पाकर, लोघ ( इन वृक्षों ) की छालें, मिश्री, मुलेठी तथा अमलतास की छाल, पद्मकाष्ठ, मजीठ, कूठ तथा तगर अथवा कूठ एवं तगर को छोड़कर एलादि गण में कहे गये सभी सुगन्धद्रव्यों का ग्रहण किया जाता है ॥ १६ ॥

—तीक्ष्णे ज्योतिष्मती निशा ॥ १७ ॥

दशमूलमनोह्वालं लाक्षा श्वेता फलत्रयम् । गन्धद्रव्याणि तीक्ष्णानि गणो मूर्द्धविरेचनः ॥ १८ ॥

तीक्ष्ण धूम के द्रव्य—मालकौगुनी, हल्दी, दशमूल, मैनमिल, हरिताल, लाख, अपामार्ग ( चिरन्दि ), त्रिफला, तीक्ष्ण गन्धद्रव्य तथा शिरोविरेचन गण के द्रव्यों का प्रयोग ( देखें—अ.हृ.सू. १५।४ ) इस योग में किया जाता है ॥ १७-१८ ॥

जले स्थितामहोरात्रमिपीकां द्वादशाङ्गुलाम् । पिष्टैर्धूमोपधैरेवं पञ्चकृत्वः प्रलेपयेत् ॥ १९ ॥

वर्तिरङ्गुण्डकस्थूला यवमध्या यथा भवेत् । छायाशुष्कां विगर्भा तां स्नेहाभ्यक्तां यथायथम् ॥

धूमनेत्रार्पितां पातुमग्निरुष्ट्यां प्रयोजयेत् ।

धूमवर्ति-तिर्माणविधि—सरपत की १२ अंगुल लम्बी नली को १ दिन-रात पानी में डाल दें। जब वह भीगने से फूल जाय तब उसके ऊपर उक्त धूमद्रव्यों को पीसकर ५ बार लेप करें। प्रत्येक बार का लेप सूख जाने पर तब दूसरा लेप करें। जब यह लेप अंगूठाभर मोटा हो जाय और उसका आकार जी के सदृश ( आगे-पीछे पतला बीच में मोटा ) हो तब इसे छाया में सूखा लें। जब वह भलीभाँति सूख जाय तो उसके बीच में से सरपत की नली निकाल लें। उस धूमवर्ति को घी आदि से चुपड़ कर धूमनेत्र में लगाकर बीड़ी-सिगरेट की भाँति उसे जलाकर धूमपान करें ॥ १९-२० ॥

वक्तव्य—बीड़ी, सिगरेट, चुफ्ट, सिगार आदि इसी धूमवर्ति के अद्यतन प्रतिनिधि द्रव्य हैं। अन्तर इतना ही है कि इनमें मादक द्रव्य होते हैं और धूमवर्ति में रोगनाशक औषध-द्रव्य हैं।

शरावसम्पुटच्छिद्रे नाडीं न्यस्थ दशाङ्गुलाम् ॥ २१ ॥

अष्टाङ्गुलां वा वक्त्रेण कासवान् धूममापिबेत् ।

कासघ्न धूमपान-विधि—शरावसम्पुट के छिद्र में १० अंगुल अथवा ८ अंगुल लम्बी नली लगाकर कासरोगी धूमपान करें। इस यन्त्र से मुदु, मध्य तथा तीक्ष्ण सभी प्रकार का धूमपान किया जा सकता है ॥

वक्तव्य—शरावसम्पुट का वर्णन अ.सं.सू. २०।१४ में देखें।

कासः श्वासः पीनसो विस्वरत्वं पूर्तिर्गन्धः पाण्डुता केशदोषः ।

कर्णास्याक्षिद्रावकण्ड्वर्तिजाड्यं तन्ना हिम्भा धूमपं न स्मृशन्ति ॥ २२ ॥

इति श्रीवेद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने धूमपानविधिर्नैकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥

— ३३ —

धूमपानविधिरध्यायः २१ ]

सूत्रस्थानम्

२५५

धूमपान के लाभ—कास, श्वास, पीनस ( प्रतिशयय ), स्वरभेद, मुख एवं नासिका की दुर्गन्ध, मुख का पीला पड़ जाना, केशदोष ( बालों का झड़ना, टूटना, अकाल में सफेद हो जाना आदि ), कान, मुख, आँख में से द्राव का निकलना, खुजली होना, पीड़ा होना, जड़ता, उँघाई का आना और हिकका या हिचकी—ये विकार धूमपान करने वाले व्यक्ति को छूते भी नहीं, ये रोग हुए हो तो दूर हो जाते हैं ॥ २२ ॥

वक्तव्य—धर्मशास्त्र में जो धूमपान का निषेध है, सम्भवतः तमाखु, बीड़ी, सिगरेट, गाँजा आदि का ही है। ये तो वैसे भी हानिकारक ही होते हैं। अतएव ऐसा कहा गया है—‘धूमपानरता विप्रा भवन्ति ग्रामसूकराः’। आयुर्वेद चिकित्साशास्त्र है, इसमें तो—‘औषधार्थं सुरां पिबेत्’ ऐसी व्यवस्था है, क्योंकि ‘जीवन्नरो भद्रशतानि पश्येत्’, अस्तु। चरक में धूमपान के कालों का इस प्रकार वर्णन किया गया है— १. स्नान, २. भोजन, ३. वमन, ४. छाँक, ५. दत्तवन, ६. नस्य, ७. अंजन तथा ८. नींद से जगने के बाद धूमपान करना चाहिए।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

धूमपानविधि नामक इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २१ ॥


द्वारविंशोऽध्यायः

अथातो गण्डूषादिविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से गण्डूष, कवल आदि की विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—पञ्चकर्म की परिधि में आने के कारण घुमपान का वर्णन करने के अनन्तर अब इस बाईसवें अध्याय में गण्डूष ( कुल्ला करना ), कवलग्रह ( मुख के भीतर ग्रास या कौर की भाँति औषध-द्रव्य को रखना ), प्रतिसारण, मुखालेपन, मूर्धतैल तथा कर्णपूरण विषयों का वर्णन किया जायेगा।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. ५; सु.चि. ४०; सु.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३१ में देखें।

चतुष्प्रकारो गण्डूषः स्निग्धः शमनशोधनौ । रोपणश्च—

गण्डूष के भेद—यह चार प्रकार का होता है—१. स्निग्ध ( जो मुख के भीतरी अवयवों को चिकना कर देता है ), २. शमन ( द्रोषशामक ), ३. शोधन तथा ४. रोपण ( मुख के भीतर उत्पन्न घावों तथा छालों को भर देने वाला )।

—त्रयस्तत्र त्रिषु योज्याश्चलादिषु ॥ १ ॥

अन्यो ब्रणजः—

गण्डूषों के प्रयोग—प्रथम तीन गण्डूष वात आदि दोषों में इस प्रकार प्रयुक्त होते हैं—स्निग्ध गण्डूष वातदोष में, शमन गण्डूष पित्तदोष में, शोधन गण्डूष कफदोष में और अन्तिम रोपण गण्डूष मसूड़ा, जीभ एवं तालुप्रदेश में उत्पन्न ब्रणों ( घावों ) को भरने के लिए होता है ॥ १ ॥

—स्निग्धोऽत्र स्वाद्वस्त्वपदुसाधितैः ।

स्नेहैः—

स्निग्ध गण्डूष—यह मधुररस तथा अम्लरस प्रधान द्रव्यों एवं विविध प्रकार के लवणों के संयोग से पकाये गये तैल, घृत, वसा आदि स्नेहों से तैयार किया जाता है।

—संशमनस्तित्तकपायमधुरीषधैः ॥ २ ॥

शमन गण्डूष—यह तित्तक, कपाय तथा मधुररस-प्रधान औषध-द्रव्यों के क्वाथों से तैयार कराकर प्रयोग किया जाता है। इनमें औषधद्रव्य का चुनाव चिकित्सक पर निर्भर होता है ॥ २ ॥

शोधनस्तित्तकद्रव्यपटूष्णैः—

शोधन गण्डूष—इसका निर्माण तित्तक ( नीम आदि ), कटु ( सोठ, मरिच, पिप्ली आदि ), अम्ल, लवण तथा उष्णवीर्य द्रव्यों के संयोग से किया जाता है।

—रोपणः पुनः ।

कपायतित्तकैः—

रोपण गण्डूष—इसका निर्माण कसैले तथा तित्तकस-प्रधान द्रव्यों के संयोग से किया जाता है।

गण्डूषादिविधिरध्यायः २२ ]

सूत्रस्थानम्

२५७

—तत्र स्नेहः क्षीरं मधुदकम् ॥ ३ ॥

शुक्तं मद्यं रसो मूत्रं धान्याम्लं च यथायथम् । कल्केयुक्तं विपक्वं वा यथास्पर्शं प्रयोजयेत् ॥ ४ ॥

गण्डूषों में द्रव्य-योग—उक्त चार प्रकार के गण्डूषों में घी-तेल आदि स्नेह, गाय का दूध, मधु और जल का घोल, विभिन्न प्रकार के सिरके, मद्य, मांसरस अथवा औषधद्रव्यों के स्वरस, विभिन्न मूत्र और धान्याम्ल ( काँजी )—इनका रोग के अनुसार विविध प्रकार के कल्कों से युक्त या क्वाथों से युक्त उष्णस्पर्श अथवा शीतस्पर्श युक्त द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३-४ ॥

दन्तहर्षं दन्तचाले मुखरोगे च वातिके । सुखोष्णमथवा शीतं तिलकलकोदकं हितम् ॥ ५ ॥

गण्डूषधारणे—

रोगानुसारं गण्डूष-प्रयोग—दन्तहर्ष ( दाँतों में पानी लगने ) में, दाँतों के हिलने में तथा वातज मुखरोगों में गुनगुना अथवा शीतल तिलकलक से युक्त जल का गण्डूष ( कुल्ली या कुल्ला ) करना लाभदायक होता है ॥ ५ ॥

—नित्यं तैलं मांसरसोऽथवा ।

स्वस्थ के लिए गण्डूष—स्वस्थ व्यक्ति के लिए प्रतिदिन कड़ुना तैल का अथवा मांसरस का गण्डूष करना हितकर होता है ।

ऊषादाहान्विते पाके क्षते चागन्तुसम्भवे ॥ ६ ॥

त्रिषे क्षाराग्निदग्धे च सपिधार्थं पयोऽथवा ।

घी या दूध का गण्डूष—मिर्च या मिर्चा की जलन में, दाह युक्त मुखपाक में, आगन्तुज क्षत में, विषप्रयोग के कारण होने वाले दाह में, क्षार से अथवा आग से जल जाने पर मुख के भीतर घी अथवा शीतल दूध का गण्डूष धारण करना चाहिए ॥ ६ ॥

वैशद्यं जनयत्याशु सन्दधाति मुखे व्रणान् ॥ ७ ॥

दाहतुष्णाप्रशमनं मधुगण्डूषधारणम् ।

मधु का गण्डूष-प्रयोग—मधु अथवा मधु युक्त जल का गण्डूष धारण करने से मुख में स्वच्छता आ जाती है । मुख के भीतर उत्पन्न घावों को यह भर देता है और यह दाह एवं प्यास को शान्त कर देता है ॥ ७ ॥

धान्याम्लमास्यवैरस्यमलदौर्गन्ध्यानाशनम् ॥ ८ ॥

लवण युक्त काञ्जी के गण्डूष—लवण युक्त काँजी के गण्डूष मुख के फीकेपन को, मुख के भीतर की गन्धगी तथा दुर्गन्धि को नष्ट करते हैं ॥ ८ ॥

तदेवालवणं शीतं मुखशोषहरं परम् ।

लवण रहित काञ्जी के गण्डूष—लवण रहित काँजी के गण्डूष शीतल होने के कारण मुख की जलन को तथा मुखशोष ( मुख का बार-बार सूखना ) का नाश करते हैं ।

आशु क्षाराम्बुगण्डूषो भित्ति स्लेष्मणश्चयम् ॥ ९ ॥

क्षाराम्बु गण्डूष—चूना आदि क्षार मिले हुए जल के गण्डूष मुख के भीतर संचित कफ को निकाल देते हैं ॥ ९ ॥

१७ अ० हू०

२५८

अष्टाङ्गहृदये

सुखोणोदकगण्डूषैर्जायते वक्त्रलाघवम्।

सुखोणोदक गण्डूष—गुनगुने जल के गण्डूष करने से मुख के भीतर हलकापन आ जाता है।

निवाते सातपे स्वित्तमुदितस्कन्धकन्धरः ॥१०॥

गण्डूषमपिबन् किञ्चिदुन्नतास्यो विधारयेत्।

गण्डूष करने की विधि—हवा रहित स्थान में तथा जहाँ धूप लग रही हो ऐसे स्थान में बैठकर कन्धों तथा गरदन पर स्वेदन कराने के बाद मर्दन कराकर गण्डूषद्रव को बिना पिये मुख को उठाकर धारण करें। ऐसा करने से उस गण्डूषद्रव का प्रभाव गले के छिद्र से लेकर सम्पूर्ण मुखगुहा पर पड़ता रहेगा ॥१०॥

कफपूर्यास्त्या यावत्स्रवद्राणाक्षताऽथवा ॥११॥

गण्डूष-धारण की अवधि—जब तक मुख के भीतर पूरा कफ न भर जाय और जब तक नासिका तथा आँखों से प्राव न होने लग जाय, तब तक उस गण्डूष को मुख में रखें, फिर थूक दें। ऐसा ५ अथवा ७ बार करें ॥११॥

असन्नायौ मुखे पूर्णे गण्डूषः, कवलोऽन्यथा।

गण्डूष एवं कवल परिभाषा—गण्डूष में औषधद्रव से पूरा मुख इतना भर लिया जाता है कि वह फिर मुख के भीतर हिलाया नहीं जा सकता, इसे 'गण्डूष' कहते हैं और 'कवल' उसे कहते हैं जो द्रव मुख में भर लेने पर इधर-उधर हिलाया जा सके। यही दोनों में भेद है।

वक्तव्य—शाङ्कधराचार्य का कथन है कि द्रव द्रव्य से 'गण्डूष' और कल्क द्रव्य से 'कवल' प्रयोग किया जाता है। पान को मुख में लेकर बहुत समय तक रखना या घुलाना यह 'कवल' का ही एक भेद है। 'कवल' का एक पर्याय 'ग्रास' (कौर) भी है।

मन्याशिरःकर्णमुखाक्षिरोगाः प्रसेककण्ठामयवक्त्रशोषाः ॥१२॥

हल्लासतन्द्राचिपीनसाश्च साध्या विशेषात्कवलग्रहेण।

कवल-धारण के लाभ—मन्यास्तम्भ, शिरोरोग, कर्णरोग, मुखरोग, नेत्ररोग, लालाप्राव, कण्ठरोग, मुखशोष, हल्लास (जी मिचलाना), तन्द्रा (डेंड्राई), भोजन के प्रति अरुचि एवं प्रतिशयाम नामक रोग कवलधारण करने पर मुखसाध्य होते हैं ॥१२॥

कल्को रसक्रिया चूर्णस्त्रिविधं प्रतिसारणम् ॥१३॥

प्रतिसारण के भेद—प्रतिसारण (मंजन) तीन प्रकार का होता है—१. कल्क, २. रसक्रिया तथा ३. चूर्ण ॥१३॥

वक्तव्य—प्रतिसारण शब्द की निष्पत्ति इस प्रकार है—'प्रति + सु + णिच् + ल्युट्। इसका अर्थ है—मंजन, मलहम लगाना आदि। इसका उल्लेख सु. चि. २२ (मुखरोग-चिकित्सा) में अनेक स्थलों में आया है। देखें—श्लोक ५, १३, १४, २० आदि। कल्क = चटनी। रसक्रिया—'क्वाथादीनां पुनः क्वाथाद् घनत्वं सा रसक्रिया'। अर्थात् क्वाथ किये गये रस को पकाते-पकाते गाढ़ा (अबलेह जैसा) करना। चूर्ण—सूखे द्रव्यों को कूट-छानकर तैयार किये गये द्रव्य को चूर्ण कहते हैं। जैसे—विफल के क्वाथ से गण्डूष, कल्क से कवल, चूर्ण से प्रतिसारण और रसक्रिया का मलहम की भाँति प्रयोग।

युज्यतात् कफरोगेषु गण्डूषविहितोषधैः।

प्रतिसारण का प्रयोग—गण्डूष के लिए निर्दिष्ट औषधद्रव्यों द्वारा निर्मित प्रतिसारणों का प्रयोग कफजनित मुखरोगों में करना चाहिए।

गण्डूषादिविधिरध्यायः २२ ]

सूत्रस्थानम्

२५९

मुखालेपस्त्रिधा दोषविषह्वा वर्णकृच्च—

मुखालेप के तीन भेद—मुखमण्डल पर लगाने योग्य लेप तीन प्रकार का होता है—१. दोषह्वा—वात आदि दोषों का नाशक, २. विषह्वा—विषविकारनाशक तथा ३. वर्णकृत्—मुखमण्डल की सुन्दरता को बढ़ाने वाला।

—सः ॥ १४ ॥

उष्णो वातकफे शस्तः, शेषेष्वत्यर्थशीतलः।

मुखालेप का उपयोग—वह ( मुखालेप ) वातज तथा कफज विकारों में उष्णवीर्य औषधद्रव्यों द्वारा बनाकर गरम करके लगाया जाता है। शेष ( विषनाशक तथा वर्णकारक ) स्थितियों में शीतवीर्य द्रव्यों से तैयार करके शीतल ही लगाया जाता है ॥ १४ ॥

त्रिप्रमाणश्चतुर्भागत्रिभागार्द्धाङ्गुलोन्नतिः ॥ १५ ॥

मुखालेप का प्रमाण—उस मुखालेप की मोटाई के तीन प्रमाण हैं—१. चौथाई अंगुल मोटा, २. तिहाई अंगुल मोटा तथा ३. आधा अंगुल मोटा ॥ १५ ॥

अशुष्कस्य स्थितितस्य, शुष्को दूषयतिच्छविम्। तमार्द्रयित्वाऽपनयेतवन्तेऽभ्यङ्गमाचरेत् ॥

लेप सम्बन्धी निर्देश—जब तक वह लेप गीला हो तब तक उसे लगा रहने दें, सूखने पर उसे उतार दें। क्योंकि सूख जाने पर लेप को उतारने से मुख की छवि मलिन पड़ जाती है। यदि लेप सूख जाय तो उसे गीला करके हटाना चाहिए और उसे हटाकर लेप लगे स्थान पर अभ्यंग लगाना चाहिए ॥ १६ ॥

विवर्जयेद्विवास्वप्नभाष्याग्न्यातपशुक्रुधः ।

मुखालेप में अपथ्य—जब तक मुख में लेप लगा रहे तब तक दिन में सोना, अधिक बोलना, आग संकना, धूप संकना, शोक करना तथा क्रोध करना अपथ्य है। अतः इन्हें छोड़ देना चाहिए।

न योज्यः पीनसेऽर्जीर्णे दत्तनस्ये हनुग्रहे ॥ १७ ॥

अरोचके जागरिते—

मुखालेप का निषेध—पीनसरोग में, अर्जीर्ण में, नस्य का प्रयोग करने पर, हनुग्रहरोग में, अरोचक में तथा रात को अधिक जामने पर मुखालेप का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ १७ ॥

—स तु हन्ति सुयोजितः। अकालपलितव्यङ्गवलीतिमिरनीलिकाः ॥ १८ ॥

मुखालेप का सम्यग्योग—इससे अकालपलित ( असमय में बालों का पक जाना ), व्यंग, वली ( मुखमण्डल पर झुर्रियों का दिखलायी पड़ना ), तिमिररोग एवं नीलिकारोग ( मुख या गालों पर झोंई का दिखलायी पड़ना ) ये रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ १८ ॥

कोलमज्जा वृषामूलं शाबरं गौरसर्पपाः। सिंहमूलं तिलाः कुष्णा दावीत्वंइन्तुषा यवाः ॥

दर्भमूलहिमोशीरशिरोपमिशितपङ्कुलाः । कुमुदोत्यलकह्मरद्वीमधुकचन्दनम् ॥ २० ॥

कालीयकतिलोशीरमांसीतगरपञ्चकम् । तालीसगुन्दापुण्ड्राह्वयष्ठीकाशनतागुरु ॥ २१ ॥

इत्यर्द्धार्द्धादित्वा लेपा हेमन्तादिषु षट् स्मृताः।

मुखालेप के ६ योग—( १ ) हेमन्त ऋतु में—बेर की मज्जा ( गिरी ), अहूसा की जड़, पठानालोध तथा पीली सरसों का लेप। ( २ ) शिशिर ऋतु में—सिंहमूल ( वनभण्टा की जड़ ), काले तिल, दारुहल्दी

२६०

अष्टाङ्गहृदये

(किरमोड़ा) की छाल तथा भूसी निकाले हुए जो के आटा का लेप। (३) बसन्त ऋतु में—दर्भ (डाम) की जड़, कपूर, खस, शिरीष के बीज, सौफ के बीज और चावल के आटा का लेप। (४) ग्रीष्म ऋतु में—कुमुद (कुई), उत्पल (नीलकमल), लालकमल, दूब, मुलेठी तथा चन्दन का लेप। (५) वर्षा ऋतु में—काला अगुरु, तिल, खस, जटामांसी, तगर तथा पद्मकाष्ठ का लेप। (६) शरद ऋतु में—तालीसपत्र, गुन्डरपटेर, पुण्डेरिया, मुलेठी, कास (कुशभेद) की जड़, तगर तथा अगुरु का लेप। इस प्रकार आधे-आधे श्लोकों द्वारा कहे गये इन छः लेपों का प्रयोग क्रमशः हेमन्त आदि छः ऋतुओं में करना चाहिए॥ १९-२१॥

मुखालेपनशीलानां वृद्धं भवति दर्शनम्॥ २२॥

वदनं चापरिस्नानं श्लक्षणं तामरसोपमम्।

मुखालेप से लाभ—जो प्रतिदिन मुखमण्डल के ऊपर उक्त लेपों का प्रयोग करते रहते हैं, उनकी दृष्टि (दर्शनशक्ति) मजबूत बनी रहती है, मुखमण्डल कभी मुरझाता नहीं, चिकना तथा कमल के सदृश सदा खिला (प्रसन्न) रहता है॥ २२॥

वक्तव्य—नर-नारी की प्रवृत्ति सौन्दर्योपासन के प्रति देखी जाती है। आयुर्वेदशास्त्र इसमें भी उपकारक है। इसी दृष्टिकोण को अपनाकर आज व्यवसायियों ने अनेक प्रकार के सौन्दर्य-प्रसाधन प्रस्तुत किये हैं। उनके प्रयोग करने पर कुछ हानियाँ भी होती हैं, किन्तु ये आयुर्वेदीय योग सर्वथा निर्दोष सिद्ध होते हैं।

अभ्यङ्गसेकपिचवो बस्तिश्चेति चतुर्विधम्॥ २३॥

मूर्धतैलम्—

मूर्धतैल के ४ भेद—मूर्धतैल ४ प्रकार का होता है—१. अभ्यंग (सिर पर तेल मलना), २. सेक (सिर को तेल से सींचना), ३. पिचु (रुई के फाहा को तेल में भिगाकर माथे पर रखना) तथा ४. शिरोबस्ति का प्रयोग॥ २३॥

—बहुगुणं तद्विद्यावुत्तरोत्तरम्।

उत्तरोत्तर गुणवत्ता—उक्त चार प्रकार के जो मूर्धतैलों का ऊपर वर्णन किया है, ये उत्तरोत्तर अधिक गुणवाले होते हैं।

तत्राभ्यङ्गः प्रयोक्तव्यो रौक्ष्यकण्डूमलादिषु॥ २४॥

अभ्यंग का प्रयोग—उन चारों में से अभ्यंग के प्रयोगस्थल—शिरःप्रदेश की रूक्षता, खजली तथा मलिनता आदि में अभ्यंग का प्रयोग करना चाहिए॥ २४॥

अरूषिकाशिरस्तोददाहपाकव्रणेषु तु। परिषेकः—

परिषेक का प्रयोग—सेक या परिषेक के प्रयोगस्थल—अरूषिका (सिर में उत्पन्न छोटी-छोटी फुसलियाँ) में, सिर की पीड़ा में, दाह में, पाक में तथा ब्रणों में तेल का परिषेक करना चाहिए।

—पिचुः केशशातस्फुटनधूपने॥ २५॥

नेत्रस्तम्भे च—

पिचु के प्रयोगस्थल—बालों के झड़ने तथा टूटने पर, सिर की त्वचा के फटने पर, धुआँ-सा निकलने का अनुभव होने पर एवं नेत्रगोलकों की जड़ता होने पर पिचु का प्रयोग करना चाहिए॥ २५॥

—बस्तिस्तु प्रसुर्यवर्दितजागरे। नासास्यशोथे तिमिरे शिरोरोगे च दारुणे॥ २६॥

गण्डूपादिविधिरध्यायः २२ ]

सूत्रस्थानम्

२६१

बस्ति के प्रयोगस्थल—सिर की शून्यता, मुखप्रदेश के लकवा, निद्रानाश, नासिका तथा मुख के सूखने पर, तिमिररोग, शिरोरोग एवं दारुण नामक रोग में इसका प्रयोग करें ॥ २६ ॥

वक्तव्य—श्रीहेमाद्रि ने 'दारुण' शब्द का अर्थ 'तीव्र' करके इसे 'शिरोरोग' का विशेषण माना है। पाठक ध्यान दें—वाग्भट ने इसका वर्णन शिरोरोगों में किया है। सुश्रुत ने निदानस्थान के १३वें अध्याय में और माधवकर ने शुद्धरोगनिदान श्लोक ३० में किया है। प्रसंगोचित होने से हमने यहाँ इसका स्पष्टीकरण उपस्थित किया है। इसे बोलचाल की भाषा में 'रूसी' (Dandrufe) कहते हैं।

विधितस्तस्य निषण्णस्य पीठे जानुसमे मूदौ। शुद्धाक्तस्विन्नदेहस्य विनान्ते गव्यमाहिषम् ॥ २७ ॥

द्रावशाङ्गुलविस्तीर्णं चर्मपटुं शिरःसमम्। आकर्णबन्धनस्थानं ललाटे वस्त्रवेष्टिते ॥ २८ ॥

चैलवेणिकया बद्ध्वा माषकल्केन लेपयेत्। ततो यथाव्याधि श्रुतं स्नेहं कोष्णं निषेचयेत् ॥ २९ ॥

ऊर्ध्वं केशभुवो यावदङ्गुलं—

शिरोबस्ति-सेवनविधि—जिस व्यक्ति को इसका प्रयोग कराना हो, सबसे पहले उसका वमन-विरंचन आदि से शोधन कराकर स्नेहन एवं स्वेदन करे। उसके बाद सायंकाल उसे घुटनेभर ऊँचे तथा कोमल आसन (कुर्सी) पर बैठाकर बारह अंगुल चौड़ी तथा सिर की गोलाई के समान लम्बी गाय या भैंस के बमड़े की पट्टी के दोनों छोरों को कान के पास ले जाकर बाँध दें; बाँधने के पहले सिर के चारों ओर कपड़ा लपेटकर बाँधा हो। फिर उसकी दरारों अर्थात् छिद्रों को उद्गद के सने हुए आटे से लीप दें। तदनन्तर रोग के अनुसार औषधकल्क को डालकर पकाये गये स्नेह को गुनगुना करके सिर के ऊपर उस शिरोबस्ति में उतना भर दें जिससे वह स्नेह केशभूमि से एक अंगुल ऊपर तक भर जाय ॥ २७-२९ ॥

—धारयेच्च तम्। आवक्त्रनासिकोक्लेदाद्वाष्टौ पट् चलादिषु ॥ ३० ॥

मात्रासहस्रगुण्यरुजे त्वेकं—

शिरोबस्ति-धारणकाल—उस स्नेह को तब तक धारण करे जब तक मुख एवं नासिका से जल का स्राव न होने लग जाय और वातरोग में दस हजार मात्रा, पित्तविकार में आठ हजार मात्रा, कफरोग में छः हजार मात्रा और स्वस्थ पुरुष में एक हजार मात्रा काल तक इसे धारण करना चाहिए ॥ ३० ॥

—स्कन्धादि मर्दयेत्। मूक्तस्नेहस्य—

पश्चात्कर्म—इतनी देर धारण कर लेने के बाद उस तेल को निकाल लें और सिर में बाँधी गयी बस्ति को खोल लें। तदनन्तर उसके कन्धे आदि अवयवों पर मालिश करें।

—परमं सप्ताहं तस्य सेवनम् ॥ ३१ ॥

शिरोबस्ति-सेवन की अबधि—इस प्रकार शिरोबस्ति का प्रयोग (स्नेहपान की भाँति) अधिक-से-अधिक एक सप्ताह तक करना चाहिए ॥ ३१ ॥

धारयेत्पूरणं कर्णे कर्णमूलं विमर्दयन्। रुजः स्यान्मार्दवं यावन्मात्राशतमवेदने ॥ ३२ ॥

कर्णपूरण का काल—रोगी को किसी एक करवट लेटाकर कान के छिद्र में तेल डालना या भरना चाहिए और साथ ही वह कान की जड़ में अंगुली से मसलता रहे। जब तक कान में उत्पन्न पीड़ा शान्त न हो तब तक लेटे रहना चाहिए। स्वस्थ पुरुष के कान में यदि तेल डाला गया हो तो एक मात्रा परिमित काल तक लेटे रहना चाहिए ॥ ३२ ॥

यावत्यर्थिति हस्ताग्रं दक्षिणं जानुमण्डलम्। निसेपोन्मेषकालेन समं मात्रा तु सा स्मृता ॥ ३३ ॥

२६२

अष्टाङ्गहृदये

मात्राकाल की परिभाषा—जितना समय घुटना के ऊपर हाथ घुमाने में लगता है अथवा आँख की पलक उठाने तथा गिराने में लगता है, उतने समय का नाम एक मात्रा है। यह समय प्रायः ३ मिलिट का होता है॥ ३३ ॥

कचसदनसितत्वपिअरत्वं परिफुटनं शिरसः समीररोगान् ।

जयति, जनयतीन्द्रियप्रसादं स्वरहनुमूर्द्धबलं च मूर्द्धतैलम् ॥ ३४ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने गण्डूपादिविधितार्म द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥


मूर्धतैल का फल—सिर के ऊपर निरन्तर तैल के प्रयोग से बालों का टूटना, झड़ना, सफेद अथवा पीला पड़ना, सिर की त्वचा का फटना तथा सिर सम्बन्धी वातरोगों का विनाश हो जाता है। यह इन्द्रियों की अपने-अपने विषय की ग्रहणशक्ति को बढ़ाता है और इन्द्रियों को प्रसन्न रखता है। स्वर, हनु, सिर को बलवान् बनाता है॥ ३४ ॥

वक्तव्य—अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान अध्याय २१ में इसका संकेत पहले किया जा चुका है, वहाँ देखें।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में गण्डूपादि विधि नामक बार्हसर्वा अध्याय समाप्त ॥ २२ ॥


त्रयोविंशोऽध्यायः

अथात आश्रोतनाञ्जनविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से आश्रोतनाञ्जनविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—पिछले अध्यायों में ऊर्ध्वजगुप्त रोगों तथा उनके प्रतीकारों का निर्देश किया गया है, अतएव गण्डूषादिविधि के बाद अब यहाँ नेत्ररोगों के प्रतिषेध के लिए आश्रोतन तथा अञ्जन विधानों को प्रस्तुत किया जा रहा है। महर्षि सुश्रुत तथा चरक ने 'आश्च्योतन' शब्द का और श्रीवामभट ने 'आश्रोतन' शब्द का प्रयोग किया है। इसे व्याकरण की दृष्टि से देखें—'इरितो बा' (३।१।५७)——'यकारहितोऽप्ययम्'। अर्थात् उक्त शब्द 'य' सहित एवं 'य' रहित दोनों ही प्रकार से शुद्ध है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—ज.चि. २६; सु.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३२ में देखें।

सर्वेषामक्षिरोगाणामादावाश्रोतनं हितम् । एकोदकगङ्गुधर्पाश्रुदाहरागनिर्बर्हणम् ॥ १ ॥

आश्रोतन का वर्णन—सभी प्रकार के नेत्ररोगों में सबसे पहले आश्रोतनविधि हितकारक होती है। इसके प्रयोग से नेत्रों में होने वाली पीड़ा, गड़ने या सूई चुभने की-सी पीड़ा, खुजली, घर्ष (रगड़—मानो आँख के भीतर बालू के कण घुस गये हों, उस प्रकार का कष्ट), आसुओं का बहना, दाह तथा लालिमा हट जाती है ॥ १ ॥

उष्णं वाते, कफे कोष्णं, तच्छीतं रक्तपित्तयोः ।

दोषानुसार आश्रोतन—वातज नेत्ररोगों में उष्णवीर्य तथा उष्णस्पर्श युक्त, कफूज विकारों में गुनगुना और रक्तज तथा पित्तज विकारों में शीतवीर्य तथा शीतस्पर्श द्रव का आश्रोतन कराना चाहिए।

निवातस्थस्य वामेन पाणिनोस्मौल्य लोचनम् ॥ २ ॥

शुक्ती प्रलम्ब्याऽन्येन पिचुवर्त्या कनीनिके । दश द्वादश वा बिन्दून् द्रघङ्गुलादवसेचयेत् ॥ ३ ॥

ततः प्रमूष्य मुदुना चैलेन, कफवातयोः । अन्येन कोष्णपानीयप्लुतेन स्वेदयेन्मृदु ॥ ४ ॥

आश्रोतन-विधि—नेत्ररोगी को निवातस्थान (जहाँ सीधा हवा का प्रकोप न हो) में लिटाकर चिकित्सक अपने बाँये हाथ से उसकी आँख को खोलकर दाहिने हाथ से लम्बी सीप में रखी हुई औषधि को अथवा दूसरी पिचु (रई के फाहा) की बत्ती से दोनों नेत्रों की कनीनिकाओं (नासिका के समीप के नेत्रसन्धियों) को दो अंगुल ऊपर से १० या १२ बूँदों से सींचे। तदनन्तर मुलायम तथा साफ वस्त्र से उसे साफ कर दें। यदि कफज अथवा वातज विकार हो तो गुनगुने जल में भिगाये हुए दूसरे फाहा से हल्का-सा नेत्रों के ऊपर स्वेदन करना चाहिए ॥ २-४ ॥

वक्तव्य—'श्च्युतिरु सरणे' धातु का अर्थ बूँद-बूँद गिरना, टपकना, बहना तथा रिसना आदि होता है, किन्तु सेचन-क्रिया भी इसी से सम्बन्धित है। जैसे—नेत्रों पर पोटली रखना, धारा गिराना आदि ये सब उसी के अर्थ हैं। ऊपर महर्षि वामभट ने 'शुक्तौ प्रलम्ब्या' पाठ स्वीकार कर द्रविड प्राणायाम किया है और श्रीहेमाद्रि ने उसका 'शुक्तिस्थद्रवनिमग्नार्द्रया' यह अर्थ किया है। यदि यहाँ 'शुक्त्या' पाठ स्वीकार कर लिया जाय तो 'प्रलम्ब्या' इसका विशेषण हो जायेगा। 'अन्येन' पद का अर्थ है—'दक्षिणकरण'।

२६४

अष्टाङ्गहृदये

रक्तज-पित्तज विकारों में स्वेदन कर्म का निषेध है, अतः नेत्रों का प्रशालन गुनगुना जल में भिगाये हुए रुई के फाहा या सुकोमल वस्त्र से करना चाहिए।

अत्युष्णतीक्ष्णं रुग्मगदूहृन्नाशायाम्निसेचनम्। अतिशीतं तु कुरुते निस्तोदस्तम्भवेदनाः ॥५॥ कषायवर्त्मतां घर्षं कुच्छादुन्मेषणं बहु। विकारवृद्धिमत्यल्पं संरम्भमपरिसृतम् ॥६॥

आश्वोतन का निषेध—अधिक गरम अथवा अधिक तीक्ष्ण द्रव्यों से निर्मित अक्षिसेचन (आश्वोतन) के प्रयोग से आँखों में पीड़ा, लालिमा की उत्पत्ति तथा दृष्टिनाश का कारण हो जाता है। इसके विपरीत अत्यन्त शीतवीर्य वाले द्रव्यों से निर्मित या स्पर्श में अत्यन्त शीतल आश्वोतन के प्रयोग से आँखों में चुभन, जकड़न, विविध प्रकार की वेदनाएँ होना, वर्त्मा में ह्मत्ता, पलकों का आपस में सट जाना तथा अत्यन्त कठिनाई से पलकों का खूलना—अधिक आश्वोतन करने के कारण ये लक्षण हो जाते हैं और बहुत कम मात्रा में किया गया आश्वोतन नेत्रविकारों को बढ़ाता है। आश्वोतन करने के बाद आँखों में से द्रव का न निकालना आँखों में शोथ को उत्पन्न करता है ॥५-६॥

वक्तव्य—अन्य संहिताओं में नेत्ररोगनाशक उपचारों में सेचन, आश्वोतन, पिण्डिका-विधान, बिडालक-विधि, तर्पण, अंजन, बर्ति आदि का विधान दिया गया है। प्रस्तुत संहिता में बिडालक-विधि का उल्लेख नहीं हुआ है। बिडालक-परिचय—बरीनियों को छोड़कर आँख की पलकों में जो लेप किया जाता है, उसे बिडालक कहते हैं। इसकी मोटाई तथा धारणकाल मुखलेप के समान होता है। इसका प्रयोग केवल दिन में, वह भी प्रातःकाल करें।

गत्वा सन्धिशिरोप्राणमुखघ्रोतांसि भेषजम्। ऊर्ध्वगात्रयने न्यस्तमपवर्त्यते मलान् ॥७॥

आश्वोतन के लाभ—आश्वोतन किया द्वारा नेत्रों में डाला गया औषधद्रव नेत्रसन्धियों, सिर, नासिका तथा मुख से सम्बन्धित घ्रोतों में पहुँचकर जत्रु से ऊपरी भागों के मलों को बाहर की ओर निकाल देता है ॥७॥

अथाञ्जनं शुद्धतनोर्नैत्रमात्राथये मले। पक्वलिङ्गैऽल्पशोफातिकण्डूपैच्छित्यल्लक्षिते ॥८॥ मन्दघर्षाश्वुरागेऽक्षिण प्रयोज्यं घनदूषिके। आर्तं पित्तकफासुन्निर्भारितेन विशेषतः ॥९॥

अञ्जन-प्रयोग के लाभ—अब यहाँ से अञ्जन का वर्णन प्रारम्भ किया जाता है। अञ्जन-प्रयोग का काल—वमन-विरंचन द्वारा शिरःप्रदेश के शुद्ध हो जाने के बाद जब मल (दोष-विशेष) केवल नेत्र में स्थित हो और जब उसके परिपक्व होने के लक्षण दिखलायी दें, तब अञ्जन का प्रयोग करें। दोष या दोषों के परिपक्व हो जाने के लक्षण—पहले की अपेक्षा शोथ (सूजन) में कमी का दिखलायी देना, खुजली की अधिकता, चिपचिपापन का होना, घर्ष (आँख का गड़ना या बालू की जैसी करकराहट) में कमी का होना तथा आँखों में लालिमा का कम होना और आँख के मैल का गाढ़ा होकर निकलना। इनके अतिरिक्त पित्त, कफ तथा रक्त दोष से पीड़ित नेत्रों में, विशेष रूप से वातदोष से पीड़ित नेत्रों में अञ्जन का प्रयोग करना चाहिए ॥८-९॥

वक्तव्य—ऊपर के श्लोकों में कहे गये लक्षण सामदोष तथा निरामदोष दोनों के हैं। दूसरे आचार्यों ने अपनी समिति इस प्रकार प्रकट की है कि साम-नेत्ररोगों में अञ्जन का प्रयोग न करें और निराम-नेत्ररोगों में अञ्जन का प्रयोग करें, इस प्रकार का वचन युक्तिसंगत है। इसके लिए आप देखें—साम-नेत्ररोग के लक्षण—अधिक वेदना, लालिमा, शोथ, घर्ष, चुभन, शूल तथा अश्रुप्रवाह। निराम-नेत्ररोग के लक्षण—वेदना में कमी, मन्द कण्डू, आँसुओं का कम गिरना तथा आँखों का साफ दिखलायी देना।

लेखनं रोपणं दृष्टिप्रसादनमिति त्रिधा। अञ्जनं—

अंजन के तीन भेद—कार्यभेद से अंजन तीन प्रकार का होता है—१. लेखन, २. रोपण और ३. दृष्टिप्रसादन।

आश्रितनाअनविधिरध्यायः २३ ]

सूत्रस्थानम्

२६५

—लेखनं तत्र कथायास्त्वपूषणीः ॥ १० ॥

लेखन अंजन—यह क.सैले, खट्टे, नमकीन तथा कटुरस-प्रधान द्रव्यों द्वारा बनाया जाता है ॥ १० ॥

रोपणं तित्तकैद्रव्यैः—

रोपण अंजन—तित्तरस-प्रधान द्रव्यों द्वारा रोपण अंजन का निर्माण किया जाता है।

—स्वादुशीतैः प्रसादनम् । तीक्ष्णाञ्जनभिसन्तप्ते नयेन तत्प्रसावनम् ॥ ११ ॥ प्रयुज्यमानं लभते प्रत्यञ्जनसमाह्वयम् ।

प्रसादन अंजन—मधुररस-प्रधान तथा शीतवीर्य द्रव्यों से निर्मित अंजन को प्रसादन अंजन कहते हैं।

प्रत्यञ्जन—तीक्ष्ण ( लेखन ) अंजन का प्रयोग करने से सन्तप्त ( जिसमें जलन हो रही हो ) नेत्र में जलन की शान्ति के लिए चूर्ण रूप जिस अंजन का प्रयोग किया जाता है, उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं ॥ ११ ॥

बक्तव्य—‘प्रसादन अंजन’ को ‘स्नेहन अंजन’ भी कहा गया है। अंजन के अन्य तीन भेद इस प्रकार हैं—१. गुटिका, जैसे—चन्द्रोदयावर्ति आदि। २. रस, जैसे—नेत्रबिन्दु आदि और ३. चूर्ण, सुरमा आदि। प्रत्यञ्जन का प्रयोग स्वस्थ नेत्रों में प्रतिदिन किया जा सकता है। इसे देखें—अ.सं.सू. ३२१८।

दशाङ्गुला तनुर्मध्ये शलाका मुकुलानना ॥ १२ ॥

प्रशस्ता, लेखने ताब्री, रोपने काल्लोहजा । अङ्गुली च, सुवर्णाया रूप्यजा च प्रसादने ॥ १३ ॥

अञ्जन-शलाका—इसकी लम्बाई १० अंगुल, मध्य भाग कुछ मोटाई युक्त तथा अगला भाग गोल होना चाहिए। लेखन अंजन लगाने के लिए तांबा की, रोपण अंजन लगाने के लिए काल्लोह ( इसपाती लोह ) की शलाका अथवा अंगुली और प्रसाद अंजन लगाने के लिए सोने अथवा चाँदी की शलाका ( सलाई ) होनी चाहिए। शलाका के अभाव में सभी अंजन अंगुली से लगाये जा सकते हैं ॥ १२-१३ ॥

बक्तव्य—बरेली के बाजार में अथवा सर्वत्र शृंगार-साधन की दूकानों में विभिन्न धातुओं की सलाई सहित सुरमादानियों मिलती हैं। प्रायः मटर या राजमाष की गोलाई के समान मोटी सलाई सुरमा लगाने के लिए उत्तम मानी जाती है। सलाई का चिकना होना अति आवश्यक होता है। सुरमादानी तथा सलाई सोना, चाँदी, पीतल, कांसा, जस्ता ( यशद ), शीशा तथा काँच की बनायी जाती हैं। सुरमा के साथ उक्त धातुओं का भी उपयोग नेत्रों को लाभ पहुँचाता है। इसके लिए धातुओं के गुण-धर्मों पर विचार करें।

पिण्डो रसक्रिया चूर्णस्त्रिघैवाञ्जनकल्पना । गुरो मध्ये लघो दोषे तां क्रमेण प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥

अञ्जनो की त्रिबिध कल्पना—अंजनों के निर्माण तीन प्रकार से किये जाते हैं—१. पिण्ड ( गोली या बत्ती के रूप में ), २. रसक्रिया ( मधु या काजल के रूप में ) तथा ३. चूर्ण ( नयनामृत, ममीरा का सुरमा आदि )। इनके प्रयोग—दोषों के बह जाने पर पिण्ड अंजनों का, मध्यम दोष होने पर रसक्रिया का तथा लघु दोष में चूर्ण रूप में प्रयुक्त होने वाले अंजनों का प्रयोग करना चाहिए ॥ १४ ॥

हरेणुमात्रा पिण्डस्य वेल्तमात्रा रसक्रिया । तीक्ष्णस्य, द्विगुणं तस्य मृदुनः—

अञ्जनो की मात्रा—तीक्ष्ण पिण्ड ( वर्ति ) रूप अंजन की मात्रा हरेणु ( बड़े चने ) के बराबर, रसक्रिया नामक अंजन की मात्रा वेल्त ( वायविङग ) के बराबर होती है। मृदु पिण्ड अंजन की मात्रा दो हरेणु के बराबर और मृदु रसक्रिया नामक अंजन की मात्रा दो वेल्त के बराबर होती है।

—चूर्णितस्य च ॥ १५ ॥

हे शलाके तु तीक्ष्णस्य, तिस्रस्तदितरस्य च ।

तीक्ष्ण अञ्जनो की मात्रा—तीक्ष्ण चूर्ण अंजन की मात्रा दो सलाई में जितना चूर्ण ( सुरमा या अंजन ) उठ जाय उतनी मात्रा होती है तथा मृदु चूर्णाञ्जन की मात्रा तीन सलाईभर होती है ॥ १५ ॥

२६६

अष्टाङ्गहृदये

वक्तव्य—कुछ संस्करणों में इसका पाठभेद मिलता है, किन्तु अर्थ की दृष्टि से दोनों पाठ समान नहीं हैं।

निशि स्वप्ने न मध्याह्ने स्नाने नोष्णगभस्तिभिः ॥ १६ ॥

अभिरोगाय दोषाः सूर्यर्धितोत्पीडितद्रुताः । प्रातः सायं च तच्छान्त्ये व्यध्रेऽर्कैस्तोऽज्येत्सदा ॥

अज्ञनप्रयोग-निर्देश—रात में, सोते समय, दोपहर में, सूर्य की तेज किरणों से आँखों के मलिन होने पर अंजन का प्रयोग न करें; क्योंकि उक्त अवसरों तथा स्थितियों में दोष बढ़े रहते हैं, उत्पीड़ित तथा पिघले हुए रहते हैं। अतः इन समयों में अंजन का प्रयोग करने से अंजन नेत्ररोगों को पैदा करने में कारण हो सकते हैं। अतएव नेत्ररोगों की शान्ति के लिए प्रतिदिन प्रातःकाल, सायंकाल तथा जब आकाश में बादल छाये न हों तब अंजन-प्रयोग करना चाहिए ॥ १६-१७ ॥

वदन्यन्त्ये तु न दिवा प्रयोज्यं तीक्ष्णमअंजन्म् । विरेकदुर्बलं चक्षुरादित्यं प्राप्य सीदति ॥ १८ ॥

अन्य आचार्यों का मत—अंजन-प्रयोग के सन्दर्भ में आचार्यों का मतभेद—कुछ आचार्यों का कथन है कि तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग दिन में करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि तीक्ष्ण अंजन को दिन में लगाने से आँखों से आँसूओं का अधिक स्राव हो जाने पर आँखें दुर्बल पड़ जाती हैं। इस स्थिति में वे सूर्य के प्रकाश को पाकर पीड़ित हो जाती हैं ॥ १८ ॥

स्वप्नेन राज्ञो कालस्य सोम्यत्वेन च तर्पिता । शीतसात्म्या दृग्ग्रायेन्यौ स्थिरतां लभते पुनः ॥ १९ ॥

तीक्ष्णांजन का रात्रि-प्रयोग—रात्रि में सोने से तथा काल के सोमगुणसम्पन्न होने से तृप्त हुई आग्नेय गुण-प्रधान होने पर भी शीतसात्म्य गुणवाली आँखें तीक्ष्ण अंजन द्वारा विरक्त होने पर भी पुनः स्थिरता को प्राप्त कर लेती हैं ॥ १९ ॥

अत्युद्विक्ते बलासे तु लेखनीयेऽथवा गदे । काममहद्यपि नात्युष्णे तीक्ष्णमक्षिण प्रयोजयेत् ॥ २० ॥

उष्णकाल में तीक्ष्णांजन-निषेध—कफदोष की अधिक वृद्धि होने पर अथवा लेखनीय नेत्ररोग होने पर दिन में तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग समशीतोष्ण ऋतुओं में भले ही कर लें, परन्तु अत्यन्त उष्णकाल में कभी भी दिन में तीक्ष्णांजन का प्रयोग न करें ॥ २० ॥

अशमनो जन्म लोहस्य तत् एव च तीक्ष्णता । उपघातोऽपि तेनैव तथा नेत्रस्य तेजसः ॥ २१ ॥

लौह एवं नेत्र की समानता—जिस प्रकार लौहधातु की उत्पत्ति पत्थर से होती है, उस पत्थर से ही उस लौह में तीक्ष्णता भी आती है और वह लौहधातु पत्थर के उपघात (चोट) से टूट भी जाता है; ठीक यही स्थिति नेत्र की उत्पत्ति आदि की है। यथा—नेत्र की उत्पत्ति तेजस् तत्त्व से होती है, उसमें जो तेजोमयता अर्थात् तीक्ष्णता होती है, वह भी तेजस् तत्त्व से ही होती है और वह नेत्र का उपघात (विनाश) भी तेजस् तत्त्व से ही होता है ॥ २१ ॥

वक्तव्य—नेत्र का यह आलंकारिक परिचय हमें यह समझा रहा है कि तेजोगुण-प्रधान नेत्र में कभी भी दिन में उसमें भी उष्णकाल में तीक्ष्णांजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसी से मिलता-जुलता एक उदाहरण ज्योतिषशास्त्र में है—'त्रिज्येच्छं नैव युक्तं कदापि'। अर्थात् क्र-वधू अपने-अपने घर में सबमें बड़े हों तो उनका विवाह ज्येष्ठ में न करें। यहाँ भी 'तेजसः' से सम्बन्ध है, अस्तु।

न रात्रावपि शीतेऽति नेत्रे तीक्ष्णांजनं हितम् । दोषमग्नावयेत्तत्संधं कण्डूजाड्यादिकारि तत् ॥

तीक्ष्ण अंजन का निषेध—अधिक शीतकाल में रात के समय में भी तीक्ष्ण अंजन हितकारक नहीं होता, क्योंकि शीतकाल में कालप्रभाव से जमे हुए दोष को वह अंजन निकाल तो पाता नहीं, इसके विपरीत वह नेत्र में स्तम्भता, खजली तथा जड़ता आदि विकारों को पैदा कर देता है ॥ २२ ॥

आश्वीतनाअनविधिरध्यायः २३ ]

सूत्रस्थानम्

२६७

नाअयेद्वीतवमितविरिक्ताशितवेगिते । क्रुद्धज्वरितान्ताक्षिशिरोरुक्शोकजागरे ॥ २३ ॥

अवृष्टेऽर्क शिरःस्नाते पीतयोर्धूमसद्योः । अजीर्णोऽन्यकसन्तप्ते दिवासुप्ते पिपासिते ॥ २४ ॥

अंजन के अयोय्य व्यक्ति—भयभीत पुरुष, जिसने अभी वमन किया हो, जिसने अभी विरिजन किया हो, जिसने तत्काल भोजन किया हो, मल-मूत्र आदि के बेग के समय, क्रोध की स्थिति में, ज्वर होने पर, तान्त ( सूक्ष्मदर्शन, तेजोमय पदार्थों को देखने के बाद अथवा अभिघात ) होने पर, नेत्ररोग में, शिरोरोग में, शोक की स्थिति में, अधिक जागरण होने पर, सूर्य के ढके होने पर, शिरःस्नान करने के बाद, धूम्रपान तथा मद्यपान करने पर, अजीर्ण की स्थिति में, आग या सूर्य से आँखों के सन्ताप्त होने पर, दिन में सोने के बाद तथा प्यास लगी हो उस समय भी अंजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ २३-२४ ॥

वक्तव्य—उक्त व्यक्तियों को अंजन का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए, यदि कर दिया जाता है तो उसका क्या प्रतिफल होता है, इसका विवेचन सु.उ. १८६८ से ७४ तक दिया गया है, देखें।

अतितीक्ष्णमृदुस्तोकबहृच्छघनकर्कशम् । अत्यर्थशीतलं तप्तमअनं नावचारयेत् ॥ २५ ॥

निषिद्ध अंजन का वर्णन—अतितीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, बहुत कम, बहुत अधिक, अत्यन्त द्रव, बहुत गाढ़ा, कर्कश ( खुरदरा ), अत्यन्त शीतल तथा अत्यन्त तपा हुआ ( गरम ) इस प्रकार के अंजन प्रयोग करने योग्य नहीं होते, अतएव इन्हें निषिद्ध कहा गया है ॥ २५ ॥

अथानुन्मीलयन् दुष्टिमन्तः सञ्चारयेच्छतैः । अञ्जिते वर्त्तनीं किञ्चिञ्चालयेच्छैवमअनम् ॥ २६ ॥

तीक्ष्णं व्याप्नोति सहसा, न चोन्मेषनिमेषणम् । निष्पीडनं च वर्त्तभ्यां खालनं वा समाचरेत् ॥

अंजन-प्रयोगविधि—अंजन लगाने के बाद पलकों को बिना खोले हुए नेत्रगोलक को धीरे-धीरे भीतर-ही-भीतर नीचे, ऊपर, दाहिने तथा बायें घुमाता रहे और थोड़ा-थोड़ा पलकों को भी कुछ-कुछ टपटपाता रहे। इस प्रकार करने से आँख में लगाया हुआ अंजन आँख के चारों ओर फैल जाता है। विशेष करके यह विधि तीक्ष्ण अंजन के प्रयोग की है। अंजन लगाने के तत्काल बाद सहसा उन्मेष ( पलक को उठाना ) तथा निमेष ( पलक को गिराना ) क्रिया नहीं करनी चाहिए। आँख की पलकों द्वारा अक्षिगोलक को दबाना अथवा आँख को घोंना नहीं चाहिए ॥ २६-२७ ॥

वक्तव्य—अंजन लगाने की सुश्रुतसम्मत विधि को देखें—सु.उ. १८६४-६५।

अपेतौषधसंरम्भं निर्वृत्तं नयनं यदा । व्याधिदोषर्तुयोग्याभिरिद्धिः प्रक्षालयेत्तदा ॥ २८ ॥

नेत्र-प्रक्षालनविधि—अंजन लगाने के बाद जब औषध का लगाना एवं गड़ना बन्द हो जाय तब रोग, दोष, ऋतु ( काल ) के अनुकूल अर्थात् शीतकाल में गुनगुने जल से तथा गर्मी में शीतल जल से नेत्र को धो देना चाहिए ॥ २८ ॥

दक्षिणाङ्गुष्ठकेनाक्षि ततो वामं सवाससा । ऊर्ध्ववर्त्तनीं सङ्गृह्य शोध्यं वामेन चेतर्त्तु ॥ २९ ॥

नेत्र-शोधनविधि—उसके बाद दाहिने अँगूठा पर कोमल एवं साफ वस्त्र लपेट कर उससे बायें नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर उसे साफ कर देना चाहिए और वस्त्र लपेटे हुए बायें अँगूठा से उसके दाहिने नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर दाहिने नेत्र को साफ कर देना चाहिए ॥ २९ ॥

वर्त्तमप्राप्तोऽअनाद्वोषो रोगान् कुर्यादतोऽन्यथा ।

नेत्र-शोधन में हेतु—अंजन का प्रयोग करने के पश्चात् उक्त विधि से प्रक्षालन ( घोना ) तथा शोधन न करने से पलकों के भीतर बचे हुए अंजन से कुपित हुए दोष रोगों को उत्पन्न कर देते हैं।

वक्तव्य—इसका स्पष्टीकरण देखें—‘अति विरकात्’...‘दीर्घव्यानि’ । ( अ.सं.सू. ३२।१९ )

कण्डूजाडयेऽअनं तीक्ष्णं धूम्रं वा योजयेत् पुनः ॥ ३० ॥

२६८

अष्टाङ्गहृदये

तीक्ष्णाञ्जन या धूमपान—यदि नेत्रमण्डल में खुजली अथवा जड़ता का अनुभव हो रहा हो तो तीक्ष्ण अंजन का अथवा तीक्ष्ण धूमपान का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ३० ॥

तीक्ष्णाञ्जनाभितप्ते तु चूर्णं प्रत्यञ्जनं हिमम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थान आश्वोतनाञ्जनविधिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥


प्रत्यञ्जन का वर्णन—तीक्ष्ण अञ्जन का प्रयोग करने पर यदि आँख में जलन प्रतीत हो रही हो तो चूर्ण ( सुरमा ) का प्रत्यञ्जन करना चाहिए ॥ ३१ ॥

वक्तव्य—प्रतिदिन आँख में जो सुरमा लगाया जाता है, इसी को प्रत्यञ्जन कहते हैं। देखें—अ.ह.सू. २।५। नेत्र से खूब आँसू गिरे इसके लिए रसाञ्जन का प्रयोग एक-एक सप्ताह में करना चाहिए। सुश्रुत में भी देखें—सु.उ. १८।६८।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में आश्वोतनाञ्जनविधि नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २३ ॥


चतुर्विंशोऽध्यायः

अथातस्तर्पणपूटपाकविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से तर्पण एवं पूटपाक विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —तेईसवें अध्याय में नेत्ररोगों की शान्ति के लिए जिन आश्रोतन तथा अज्ञान विधियों का वर्णन किया था, उनसे प्रायः नेत्रों में दुर्बलता आ जाती है। अतएव उसके बाद इस अध्याय में नेत्रतर्पण आदि विधियों का वर्णन किया जा रहा है। तर्पण का अर्थ है—नेत्रों को द्रव औषधों के सेचन से तृप्त करना। इस कार्य में पूटपाक-विधि उपकारक होती है। गीले या सूखे औषध-द्रव्यों से विधिभेद से स्वरस निकाला जाता है और केवल सूखे द्रव्यों का पूटपाक-विधि से स्वरस निकाला जाता है। इसका ज्ञान महाकवि भवभूति को भी था। देखें—‘पूटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः’। इन दोनों विधियों से प्राप्त रस का सेचन आँखों में किया जाता है और इससे नेत्र तृप्त होते हैं।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —सू.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३३ में देखें। चरक ने इस शालाक्यतन्त्र को पराधिकार समझकर इसका वर्णन अपनी संहिता में नहीं किया है।

नयने ताभ्यति स्तब्धे शुष्के रूक्षेऽभिघातिते। वातपित्तातुरे जिह्वे शीर्णपक्ष्माविलेक्षणे ॥ १ ॥

कृच्छ्रोन्मोलिशिराहर्षशिरोत्पाततमोऽर्जुनैः । स्यन्दमन्यान्यतोवातवातपर्यायशुक्रकैः ॥ २ ॥

आतुरे शान्तरागाश्रुशूलसंरम्बद्वयिके । निवाते तर्पणं योज्यं शुद्धयोर्यूर्द्धकाययोः ॥ ३ ॥

काले साधारणे प्रातः सायं वोतानशायिनः ।

तर्पणविधि-वर्णन —जब आँखों के सामने अन्धेरा प्रतीत हो, जब आँखें स्तब्ध हों, सूखी हों, रूखी हों, उन पर किसी प्रकार का आघात लगा हो, नेत्र पर वात या पित्त दोष की विकृति हो, नेत्रगोलक टेढ़े हो गये हों (जिसे ऐंचा-ताना कहते हैं), पक्षम (बरैनियों) के बाल उखड़ गये हों, दृष्टि मलिन हो गयी हो, नेत्रों को खोलने में कष्ट होता हो; जब नेत्र सिराहर्ष, सिरोत्पात, तिमिररोग, अर्जुनरोग, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, अन्यतोवात, वातपर्यय अथवा शुक्ररोग से पीड़ित हों तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए। जब आँखों की लालिमा, आँसू बहना, शूल, संरम्ब (शोथ) तथा दृषिका (नेत्रमल) ये शान्त हो जायें तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए। नस्य से सिर का तथा वमन-विरचन आदि द्वारा शरीर का शोधन कराकर निवातस्थान में, समशीतोष्ण काल में प्रातःकाल अथवा सायंकाल में रोगी को चित लिटाकर तर्पण का प्रयोग करना चाहिए ॥ १-३ ॥

यवमाषमयीं पालीं नेत्रकोशाद्भिः समाम् ॥ ४ ॥

द्वयङ्गुलोच्चां दृढां कृत्वा यथास्वं सिद्धभावेत्। सर्पिनिर्मिलिते नेत्रे तप्ताम्बुप्रबिलायितम् ॥ ५ ॥

नक्तान्थवाततिमिरकृच्छ्रोबोधदिके वसाम्। आपक्षमाग्रात्—

तर्पण की दूसरी विधि —इस विधि में भी रोगी को चित लिटाकर उसके नेत्रकोश से बाहर जो या उड़द के आटे के समान आकार की एक पाली बनवाये, जो दो अंगुल ऊँची हो और दृढ़ हो, जो तर्पण

२७०

अष्टाङ्गहृदये

द्रव डालने पर टूट न जाय। उसमें दोष तथा रोग के अनुसार सिद्ध किये हुए स्नेह को भर दें। इस सिद्ध स्नेह को भरते समय नेत्रों को बन्द कर लें। यदि स्नेह में घृत है तो उसे गरम पानी में पात्र सहित रखकर पिघला लें। यदि रतीघी, वातदोष-प्रधान तिमिररोग हो तथा कठिनायी से नींद खुलती हो तो इन रोगों में वसा का प्रयोग करना चाहिए। यह वसा उस पाली में उतनी भरनी चाहिए, जिससे बरीनी के बाल उसमें डूब जायें ॥ ४-५ ॥

—अथोन्मेषं शनकैस्तस्य कुर्वतः ॥ ६ ॥

मात्रा विगणयेत्त्र वत्ससन्धिस्तित्तसिते। दृष्टौ च क्रमशो व्याघौ शतं त्रीणि च पञ्च च ॥ ७ ॥

शतानि सप्त चाष्टौ च, दश मन्ये, दशानिले। पिते षट्, स्वस्थवृत्ते च बलासे पञ्च धारयेत् ॥ ८ ॥

स्नेह-धारणकाल—स्नेह के भर जाने के बाद वह रोगी धीरे-धीरे आँख या आँखों को खोलने का प्रयत्न करे। तदनन्तर चिकित्सक रोगी के समीप बैठकर मात्रा की गणना इस प्रकार करे—वत्सगत रोग में १००, सन्धिगत रोगों में २००, सफेदमण्डल के रोगों में ५००, कृष्णमण्डल के रोगों में ७००, दृष्टिमण्डल के रोगों में ८००, अधिमन्त्ररोग में १०००, वातज नेत्ररोगों (वातपर्यय आदि) में १०००, पित्तज नेत्ररोगों में ६००, स्वस्थवृत्त अर्थात् स्वस्थ पुरुष के प्रति प्रयोग किये जाने पर भी ६०० तथा कफज रोगों में ५०० मात्रा तक का समय स्नेह धारण करने के लिए पर्याप्त है ॥ ६-८ ॥

बत्क्य—जिस कालप्रमाण को महर्षि वाग्भट ने 'मात्रा' कहा है, उसे श्रीसुश्रुत ने (सु.उ. १८८ में) 'वाक्' कहा है। ये शब्द प्राचीन काल में काल को नापने के लिए प्रयुक्त किये जाते थे। यहाँ मात्रा शब्द से लघुमात्रा उच्चारण के बराबर काल का ही ग्रहण करना चाहिए। १०० मात्रा के उच्चारण में प्रायः ३ मिनट लग जाते हैं, यही स्थिति वाक् की भी है।

कृत्वाऽपाङ्के ततो द्वारं स्नेहं पात्रं निगालयेत्। पिबेच्च धूम्रं, नक्षेत व्योम रूपं च भास्वरम् ॥ ९ ॥

तर्पण का पश्चात् कर्म—अपांग (आँख का बाहरी कोर) की ओर द्वार करके अर्थात् उस ओर सिर सहित आँख को झुकाकर नेत्र-तर्पण के लिये डाले गये स्नेह को किसी पात्र में निकाल लें (सुश्रुत के अनुसार—'स्विक्नेन यवपिष्टेन शोधयेत्' (सु.उ. १८।१०) अर्थात् जो के सने हुए आटा को उबाल कर उससे नेत्र के अवयवों का उबटन करके उसे शुद्ध करें।), तदनन्तर उसे धूम्रपान करायें। यह व्यक्ति आकाश की ओर अर्थात् दूरी में स्थित वस्तुओं को देखने का प्रयत्न न करे और सूर्य आदि चमकीली वस्तुओं को न देखें ॥ ९ ॥

इत्थं प्रतिदिनं वायौ, पिते त्वेकान्तरं, कफे। स्वस्ये च द्रघन्तरं दद्यादातुरेतैरिति योजयेत् ॥ १० ॥

दोषानुसारं तर्पण—इस प्रकार वातदोष में प्रतिदिन, पित्तदोष में एक दिन छोड़कर अर्थात् प्रति तीसरे दिन और कफदोष में तथा स्वस्थ पुरुष के नेत्रों में दो-दो दिन का अन्तर देकर तर्पण का प्रयोग तब तक करता रहे जब तक सम्यक् तर्पण के लक्षण उत्पन्न न हो जायें ॥ १० ॥

बत्क्य—वृद्धवाग्भट ने कुछ अधिक स्पष्ट निर्देश दिये हैं—नेत्रतर्पण के लिए जो आधार (चहार-दिवारी) बनाया था उसे हटाकर कल्क से आँख के अवयवों को पोछ कर उसे धूम्रपान करायें और गुनगुने जले से उसका मुख धुलवा कर रोगानुसार उसे समुचित भोजन करायें। देखें—अ.सं.सू. ३३।५।

प्रकाशक्षमता स्वास्थ्यं विशदं लघु लोचनम्। तृप्ते, विपर्ययोऽतृप्तेऽतितृप्ते श्लेष्मजा रुजः ॥

तर्पण का समयोग—इसमें रोगी के नेत्रों में प्रकाश की ओर देखने की शक्ति हो जाती है, नेत्र की स्वस्थता का अनुभव, नेत्र में स्वच्छता तथा आँखों में हल्कापन प्रतीत होता है। तर्पण का हीनयोग—इसमें