भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

(किरमोड़ा) की छाल तथा भूसी निकाले हुए जो के आटा का लेप। (३) बसन्त ऋतु में—दर्भ (डाम) की जड़, कपूर, खस, शिरीष के बीज, सौफ के बीज और चावल के आटा का लेप। (४) ग्रीष्म ऋतु में—कुमुद (कुई), उत्पल (नीलकमल), लालकमल, दूब, मुलेठी तथा चन्दन का लेप। (५) वर्षा ऋतु में—काला अगुरु, तिल, खस, जटामांसी, तगर तथा पद्मकाष्ठ का लेप। (६) शरद ऋतु में—तालीसपत्र, गुन्डरपटेर, पुण्डेरिया, मुलेठी, कास (कुशभेद) की जड़, तगर तथा अगुरु का लेप। इस प्रकार आधे-आधे श्लोकों द्वारा कहे गये इन छः लेपों का प्रयोग क्रमशः हेमन्त आदि छः ऋतुओं में करना चाहिए॥ १९-२१॥

मुखालेपनशीलानां वृद्धं भवति दर्शनम्॥ २२॥

वदनं चापरिस्नानं श्लक्षणं तामरसोपमम्।

मुखालेप से लाभ—जो प्रतिदिन मुखमण्डल के ऊपर उक्त लेपों का प्रयोग करते रहते हैं, उनकी दृष्टि (दर्शनशक्ति) मजबूत बनी रहती है, मुखमण्डल कभी मुरझाता नहीं, चिकना तथा कमल के सदृश सदा खिला (प्रसन्न) रहता है॥ २२॥

वक्तव्य—नर-नारी की प्रवृत्ति सौन्दर्योपासन के प्रति देखी जाती है। आयुर्वेदशास्त्र इसमें भी उपकारक है। इसी दृष्टिकोण को अपनाकर आज व्यवसायियों ने अनेक प्रकार के सौन्दर्य-प्रसाधन प्रस्तुत किये हैं। उनके प्रयोग करने पर कुछ हानियाँ भी होती हैं, किन्तु ये आयुर्वेदीय योग सर्वथा निर्दोष सिद्ध होते हैं।

अभ्यङ्गसेकपिचवो बस्तिश्चेति चतुर्विधम्॥ २३॥

मूर्धतैलम्—

मूर्धतैल के ४ भेद—मूर्धतैल ४ प्रकार का होता है—१. अभ्यंग (सिर पर तेल मलना), २. सेक (सिर को तेल से सींचना), ३. पिचु (रुई के फाहा को तेल में भिगाकर माथे पर रखना) तथा ४. शिरोबस्ति का प्रयोग॥ २३॥

—बहुगुणं तद्विद्यावुत्तरोत्तरम्।

उत्तरोत्तर गुणवत्ता—उक्त चार प्रकार के जो मूर्धतैलों का ऊपर वर्णन किया है, ये उत्तरोत्तर अधिक गुणवाले होते हैं।

तत्राभ्यङ्गः प्रयोक्तव्यो रौक्ष्यकण्डूमलादिषु॥ २४॥

अभ्यंग का प्रयोग—उन चारों में से अभ्यंग के प्रयोगस्थल—शिरःप्रदेश की रूक्षता, खजली तथा मलिनता आदि में अभ्यंग का प्रयोग करना चाहिए॥ २४॥

अरूषिकाशिरस्तोददाहपाकव्रणेषु तु। परिषेकः—

परिषेक का प्रयोग—सेक या परिषेक के प्रयोगस्थल—अरूषिका (सिर में उत्पन्न छोटी-छोटी फुसलियाँ) में, सिर की पीड़ा में, दाह में, पाक में तथा ब्रणों में तेल का परिषेक करना चाहिए।

—पिचुः केशशातस्फुटनधूपने॥ २५॥

नेत्रस्तम्भे च—

पिचु के प्रयोगस्थल—बालों के झड़ने तथा टूटने पर, सिर की त्वचा के फटने पर, धुआँ-सा निकलने का अनुभव होने पर एवं नेत्रगोलकों की जड़ता होने पर पिचु का प्रयोग करना चाहिए॥ २५॥

—बस्तिस्तु प्रसुर्यवर्दितजागरे। नासास्यशोथे तिमिरे शिरोरोगे च दारुणे॥ २६॥