अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगण्डूषादिविधिरध्यायः २२ ]
सूत्रस्थानम्
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मुखालेपस्त्रिधा दोषविषह्वा वर्णकृच्च—
मुखालेप के तीन भेद—मुखमण्डल पर लगाने योग्य लेप तीन प्रकार का होता है—१. दोषह्वा—वात आदि दोषों का नाशक, २. विषह्वा—विषविकारनाशक तथा ३. वर्णकृत्—मुखमण्डल की सुन्दरता को बढ़ाने वाला।
—सः ॥ १४ ॥
उष्णो वातकफे शस्तः, शेषेष्वत्यर्थशीतलः।
मुखालेप का उपयोग—वह ( मुखालेप ) वातज तथा कफज विकारों में उष्णवीर्य औषधद्रव्यों द्वारा बनाकर गरम करके लगाया जाता है। शेष ( विषनाशक तथा वर्णकारक ) स्थितियों में शीतवीर्य द्रव्यों से तैयार करके शीतल ही लगाया जाता है ॥ १४ ॥
त्रिप्रमाणश्चतुर्भागत्रिभागार्द्धाङ्गुलोन्नतिः ॥ १५ ॥
मुखालेप का प्रमाण—उस मुखालेप की मोटाई के तीन प्रमाण हैं—१. चौथाई अंगुल मोटा, २. तिहाई अंगुल मोटा तथा ३. आधा अंगुल मोटा ॥ १५ ॥
अशुष्कस्य स्थितितस्य, शुष्को दूषयतिच्छविम्। तमार्द्रयित्वाऽपनयेतवन्तेऽभ्यङ्गमाचरेत् ॥
लेप सम्बन्धी निर्देश—जब तक वह लेप गीला हो तब तक उसे लगा रहने दें, सूखने पर उसे उतार दें। क्योंकि सूख जाने पर लेप को उतारने से मुख की छवि मलिन पड़ जाती है। यदि लेप सूख जाय तो उसे गीला करके हटाना चाहिए और उसे हटाकर लेप लगे स्थान पर अभ्यंग लगाना चाहिए ॥ १६ ॥
विवर्जयेद्विवास्वप्नभाष्याग्न्यातपशुक्रुधः ।
मुखालेप में अपथ्य—जब तक मुख में लेप लगा रहे तब तक दिन में सोना, अधिक बोलना, आग संकना, धूप संकना, शोक करना तथा क्रोध करना अपथ्य है। अतः इन्हें छोड़ देना चाहिए।
न योज्यः पीनसेऽर्जीर्णे दत्तनस्ये हनुग्रहे ॥ १७ ॥
अरोचके जागरिते—
मुखालेप का निषेध—पीनसरोग में, अर्जीर्ण में, नस्य का प्रयोग करने पर, हनुग्रहरोग में, अरोचक में तथा रात को अधिक जामने पर मुखालेप का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ १७ ॥
—स तु हन्ति सुयोजितः। अकालपलितव्यङ्गवलीतिमिरनीलिकाः ॥ १८ ॥
मुखालेप का सम्यग्योग—इससे अकालपलित ( असमय में बालों का पक जाना ), व्यंग, वली ( मुखमण्डल पर झुर्रियों का दिखलायी पड़ना ), तिमिररोग एवं नीलिकारोग ( मुख या गालों पर झोंई का दिखलायी पड़ना ) ये रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ १८ ॥
कोलमज्जा वृषामूलं शाबरं गौरसर्पपाः। सिंहमूलं तिलाः कुष्णा दावीत्वंइन्तुषा यवाः ॥
दर्भमूलहिमोशीरशिरोपमिशितपङ्कुलाः । कुमुदोत्यलकह्मरद्वीमधुकचन्दनम् ॥ २० ॥
कालीयकतिलोशीरमांसीतगरपञ्चकम् । तालीसगुन्दापुण्ड्राह्वयष्ठीकाशनतागुरु ॥ २१ ॥
इत्यर्द्धार्द्धादित्वा लेपा हेमन्तादिषु षट् स्मृताः।
मुखालेप के ६ योग—( १ ) हेमन्त ऋतु में—बेर की मज्जा ( गिरी ), अहूसा की जड़, पठानालोध तथा पीली सरसों का लेप। ( २ ) शिशिर ऋतु में—सिंहमूल ( वनभण्टा की जड़ ), काले तिल, दारुहल्दी