भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

गण्डूषादिविधिरध्यायः २२ ]

सूत्रस्थानम्

२५९

मुखालेपस्त्रिधा दोषविषह्वा वर्णकृच्च—

मुखालेप के तीन भेद—मुखमण्डल पर लगाने योग्य लेप तीन प्रकार का होता है—१. दोषह्वा—वात आदि दोषों का नाशक, २. विषह्वा—विषविकारनाशक तथा ३. वर्णकृत्—मुखमण्डल की सुन्दरता को बढ़ाने वाला।

—सः ॥ १४ ॥

उष्णो वातकफे शस्तः, शेषेष्वत्यर्थशीतलः।

मुखालेप का उपयोग—वह ( मुखालेप ) वातज तथा कफज विकारों में उष्णवीर्य औषधद्रव्यों द्वारा बनाकर गरम करके लगाया जाता है। शेष ( विषनाशक तथा वर्णकारक ) स्थितियों में शीतवीर्य द्रव्यों से तैयार करके शीतल ही लगाया जाता है ॥ १४ ॥

त्रिप्रमाणश्चतुर्भागत्रिभागार्द्धाङ्गुलोन्नतिः ॥ १५ ॥

मुखालेप का प्रमाण—उस मुखालेप की मोटाई के तीन प्रमाण हैं—१. चौथाई अंगुल मोटा, २. तिहाई अंगुल मोटा तथा ३. आधा अंगुल मोटा ॥ १५ ॥

अशुष्कस्य स्थितितस्य, शुष्को दूषयतिच्छविम्। तमार्द्रयित्वाऽपनयेतवन्तेऽभ्यङ्गमाचरेत् ॥

लेप सम्बन्धी निर्देश—जब तक वह लेप गीला हो तब तक उसे लगा रहने दें, सूखने पर उसे उतार दें। क्योंकि सूख जाने पर लेप को उतारने से मुख की छवि मलिन पड़ जाती है। यदि लेप सूख जाय तो उसे गीला करके हटाना चाहिए और उसे हटाकर लेप लगे स्थान पर अभ्यंग लगाना चाहिए ॥ १६ ॥

विवर्जयेद्विवास्वप्नभाष्याग्न्यातपशुक्रुधः ।

मुखालेप में अपथ्य—जब तक मुख में लेप लगा रहे तब तक दिन में सोना, अधिक बोलना, आग संकना, धूप संकना, शोक करना तथा क्रोध करना अपथ्य है। अतः इन्हें छोड़ देना चाहिए।

न योज्यः पीनसेऽर्जीर्णे दत्तनस्ये हनुग्रहे ॥ १७ ॥

अरोचके जागरिते—

मुखालेप का निषेध—पीनसरोग में, अर्जीर्ण में, नस्य का प्रयोग करने पर, हनुग्रहरोग में, अरोचक में तथा रात को अधिक जामने पर मुखालेप का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ १७ ॥

—स तु हन्ति सुयोजितः। अकालपलितव्यङ्गवलीतिमिरनीलिकाः ॥ १८ ॥

मुखालेप का सम्यग्योग—इससे अकालपलित ( असमय में बालों का पक जाना ), व्यंग, वली ( मुखमण्डल पर झुर्रियों का दिखलायी पड़ना ), तिमिररोग एवं नीलिकारोग ( मुख या गालों पर झोंई का दिखलायी पड़ना ) ये रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ १८ ॥

कोलमज्जा वृषामूलं शाबरं गौरसर्पपाः। सिंहमूलं तिलाः कुष्णा दावीत्वंइन्तुषा यवाः ॥

दर्भमूलहिमोशीरशिरोपमिशितपङ्कुलाः । कुमुदोत्यलकह्मरद्वीमधुकचन्दनम् ॥ २० ॥

कालीयकतिलोशीरमांसीतगरपञ्चकम् । तालीसगुन्दापुण्ड्राह्वयष्ठीकाशनतागुरु ॥ २१ ॥

इत्यर्द्धार्द्धादित्वा लेपा हेमन्तादिषु षट् स्मृताः।

मुखालेप के ६ योग—( १ ) हेमन्त ऋतु में—बेर की मज्जा ( गिरी ), अहूसा की जड़, पठानालोध तथा पीली सरसों का लेप। ( २ ) शिशिर ऋतु में—सिंहमूल ( वनभण्टा की जड़ ), काले तिल, दारुहल्दी

२६०

अष्टाङ्गहृदये

(किरमोड़ा) की छाल तथा भूसी निकाले हुए जो के आटा का लेप। (३) बसन्त ऋतु में—दर्भ (डाम) की जड़, कपूर, खस, शिरीष के बीज, सौफ के बीज और चावल के आटा का लेप। (४) ग्रीष्म ऋतु में—कुमुद (कुई), उत्पल (नीलकमल), लालकमल, दूब, मुलेठी तथा चन्दन का लेप। (५) वर्षा ऋतु में—काला अगुरु, तिल, खस, जटामांसी, तगर तथा पद्मकाष्ठ का लेप। (६) शरद ऋतु में—तालीसपत्र, गुन्डरपटेर, पुण्डेरिया, मुलेठी, कास (कुशभेद) की जड़, तगर तथा अगुरु का लेप। इस प्रकार आधे-आधे श्लोकों द्वारा कहे गये इन छः लेपों का प्रयोग क्रमशः हेमन्त आदि छः ऋतुओं में करना चाहिए॥ १९-२१॥

मुखालेपनशीलानां वृद्धं भवति दर्शनम्॥ २२॥

वदनं चापरिस्नानं श्लक्षणं तामरसोपमम्।

मुखालेप से लाभ—जो प्रतिदिन मुखमण्डल के ऊपर उक्त लेपों का प्रयोग करते रहते हैं, उनकी दृष्टि (दर्शनशक्ति) मजबूत बनी रहती है, मुखमण्डल कभी मुरझाता नहीं, चिकना तथा कमल के सदृश सदा खिला (प्रसन्न) रहता है॥ २२॥

वक्तव्य—नर-नारी की प्रवृत्ति सौन्दर्योपासन के प्रति देखी जाती है। आयुर्वेदशास्त्र इसमें भी उपकारक है। इसी दृष्टिकोण को अपनाकर आज व्यवसायियों ने अनेक प्रकार के सौन्दर्य-प्रसाधन प्रस्तुत किये हैं। उनके प्रयोग करने पर कुछ हानियाँ भी होती हैं, किन्तु ये आयुर्वेदीय योग सर्वथा निर्दोष सिद्ध होते हैं।

अभ्यङ्गसेकपिचवो बस्तिश्चेति चतुर्विधम्॥ २३॥

मूर्धतैलम्—

मूर्धतैल के ४ भेद—मूर्धतैल ४ प्रकार का होता है—१. अभ्यंग (सिर पर तेल मलना), २. सेक (सिर को तेल से सींचना), ३. पिचु (रुई के फाहा को तेल में भिगाकर माथे पर रखना) तथा ४. शिरोबस्ति का प्रयोग॥ २३॥

—बहुगुणं तद्विद्यावुत्तरोत्तरम्।

उत्तरोत्तर गुणवत्ता—उक्त चार प्रकार के जो मूर्धतैलों का ऊपर वर्णन किया है, ये उत्तरोत्तर अधिक गुणवाले होते हैं।

तत्राभ्यङ्गः प्रयोक्तव्यो रौक्ष्यकण्डूमलादिषु॥ २४॥

अभ्यंग का प्रयोग—उन चारों में से अभ्यंग के प्रयोगस्थल—शिरःप्रदेश की रूक्षता, खजली तथा मलिनता आदि में अभ्यंग का प्रयोग करना चाहिए॥ २४॥

अरूषिकाशिरस्तोददाहपाकव्रणेषु तु। परिषेकः—

परिषेक का प्रयोग—सेक या परिषेक के प्रयोगस्थल—अरूषिका (सिर में उत्पन्न छोटी-छोटी फुसलियाँ) में, सिर की पीड़ा में, दाह में, पाक में तथा ब्रणों में तेल का परिषेक करना चाहिए।

—पिचुः केशशातस्फुटनधूपने॥ २५॥

नेत्रस्तम्भे च—

पिचु के प्रयोगस्थल—बालों के झड़ने तथा टूटने पर, सिर की त्वचा के फटने पर, धुआँ-सा निकलने का अनुभव होने पर एवं नेत्रगोलकों की जड़ता होने पर पिचु का प्रयोग करना चाहिए॥ २५॥

—बस्तिस्तु प्रसुर्यवर्दितजागरे। नासास्यशोथे तिमिरे शिरोरोगे च दारुणे॥ २६॥

गण्डूपादिविधिरध्यायः २२ ]

सूत्रस्थानम्

२६१

बस्ति के प्रयोगस्थल—सिर की शून्यता, मुखप्रदेश के लकवा, निद्रानाश, नासिका तथा मुख के सूखने पर, तिमिररोग, शिरोरोग एवं दारुण नामक रोग में इसका प्रयोग करें ॥ २६ ॥

वक्तव्य—श्रीहेमाद्रि ने 'दारुण' शब्द का अर्थ 'तीव्र' करके इसे 'शिरोरोग' का विशेषण माना है। पाठक ध्यान दें—वाग्भट ने इसका वर्णन शिरोरोगों में किया है। सुश्रुत ने निदानस्थान के १३वें अध्याय में और माधवकर ने शुद्धरोगनिदान श्लोक ३० में किया है। प्रसंगोचित होने से हमने यहाँ इसका स्पष्टीकरण उपस्थित किया है। इसे बोलचाल की भाषा में 'रूसी' (Dandrufe) कहते हैं।

विधितस्तस्य निषण्णस्य पीठे जानुसमे मूदौ। शुद्धाक्तस्विन्नदेहस्य विनान्ते गव्यमाहिषम् ॥ २७ ॥

द्रावशाङ्गुलविस्तीर्णं चर्मपटुं शिरःसमम्। आकर्णबन्धनस्थानं ललाटे वस्त्रवेष्टिते ॥ २८ ॥

चैलवेणिकया बद्ध्वा माषकल्केन लेपयेत्। ततो यथाव्याधि श्रुतं स्नेहं कोष्णं निषेचयेत् ॥ २९ ॥

ऊर्ध्वं केशभुवो यावदङ्गुलं—

शिरोबस्ति-सेवनविधि—जिस व्यक्ति को इसका प्रयोग कराना हो, सबसे पहले उसका वमन-विरंचन आदि से शोधन कराकर स्नेहन एवं स्वेदन करे। उसके बाद सायंकाल उसे घुटनेभर ऊँचे तथा कोमल आसन (कुर्सी) पर बैठाकर बारह अंगुल चौड़ी तथा सिर की गोलाई के समान लम्बी गाय या भैंस के बमड़े की पट्टी के दोनों छोरों को कान के पास ले जाकर बाँध दें; बाँधने के पहले सिर के चारों ओर कपड़ा लपेटकर बाँधा हो। फिर उसकी दरारों अर्थात् छिद्रों को उद्गद के सने हुए आटे से लीप दें। तदनन्तर रोग के अनुसार औषधकल्क को डालकर पकाये गये स्नेह को गुनगुना करके सिर के ऊपर उस शिरोबस्ति में उतना भर दें जिससे वह स्नेह केशभूमि से एक अंगुल ऊपर तक भर जाय ॥ २७-२९ ॥

—धारयेच्च तम्। आवक्त्रनासिकोक्लेदाद्वाष्टौ पट् चलादिषु ॥ ३० ॥

मात्रासहस्रगुण्यरुजे त्वेकं—

शिरोबस्ति-धारणकाल—उस स्नेह को तब तक धारण करे जब तक मुख एवं नासिका से जल का स्राव न होने लग जाय और वातरोग में दस हजार मात्रा, पित्तविकार में आठ हजार मात्रा, कफरोग में छः हजार मात्रा और स्वस्थ पुरुष में एक हजार मात्रा काल तक इसे धारण करना चाहिए ॥ ३० ॥

—स्कन्धादि मर्दयेत्। मूक्तस्नेहस्य—

पश्चात्कर्म—इतनी देर धारण कर लेने के बाद उस तेल को निकाल लें और सिर में बाँधी गयी बस्ति को खोल लें। तदनन्तर उसके कन्धे आदि अवयवों पर मालिश करें।

—परमं सप्ताहं तस्य सेवनम् ॥ ३१ ॥

शिरोबस्ति-सेवन की अबधि—इस प्रकार शिरोबस्ति का प्रयोग (स्नेहपान की भाँति) अधिक-से-अधिक एक सप्ताह तक करना चाहिए ॥ ३१ ॥

धारयेत्पूरणं कर्णे कर्णमूलं विमर्दयन्। रुजः स्यान्मार्दवं यावन्मात्राशतमवेदने ॥ ३२ ॥

कर्णपूरण का काल—रोगी को किसी एक करवट लेटाकर कान के छिद्र में तेल डालना या भरना चाहिए और साथ ही वह कान की जड़ में अंगुली से मसलता रहे। जब तक कान में उत्पन्न पीड़ा शान्त न हो तब तक लेटे रहना चाहिए। स्वस्थ पुरुष के कान में यदि तेल डाला गया हो तो एक मात्रा परिमित काल तक लेटे रहना चाहिए ॥ ३२ ॥

यावत्यर्थिति हस्ताग्रं दक्षिणं जानुमण्डलम्। निसेपोन्मेषकालेन समं मात्रा तु सा स्मृता ॥ ३३ ॥

२६२

अष्टाङ्गहृदये

मात्राकाल की परिभाषा—जितना समय घुटना के ऊपर हाथ घुमाने में लगता है अथवा आँख की पलक उठाने तथा गिराने में लगता है, उतने समय का नाम एक मात्रा है। यह समय प्रायः ३ मिलिट का होता है॥ ३३ ॥

कचसदनसितत्वपिअरत्वं परिफुटनं शिरसः समीररोगान् ।

जयति, जनयतीन्द्रियप्रसादं स्वरहनुमूर्द्धबलं च मूर्द्धतैलम् ॥ ३४ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने गण्डूपादिविधितार्म द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥


मूर्धतैल का फल—सिर के ऊपर निरन्तर तैल के प्रयोग से बालों का टूटना, झड़ना, सफेद अथवा पीला पड़ना, सिर की त्वचा का फटना तथा सिर सम्बन्धी वातरोगों का विनाश हो जाता है। यह इन्द्रियों की अपने-अपने विषय की ग्रहणशक्ति को बढ़ाता है और इन्द्रियों को प्रसन्न रखता है। स्वर, हनु, सिर को बलवान् बनाता है॥ ३४ ॥

वक्तव्य—अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान अध्याय २१ में इसका संकेत पहले किया जा चुका है, वहाँ देखें।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में गण्डूपादि विधि नामक बार्हसर्वा अध्याय समाप्त ॥ २२ ॥


त्रयोविंशोऽध्यायः

अथात आश्रोतनाञ्जनविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से आश्रोतनाञ्जनविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—पिछले अध्यायों में ऊर्ध्वजगुप्त रोगों तथा उनके प्रतीकारों का निर्देश किया गया है, अतएव गण्डूषादिविधि के बाद अब यहाँ नेत्ररोगों के प्रतिषेध के लिए आश्रोतन तथा अञ्जन विधानों को प्रस्तुत किया जा रहा है। महर्षि सुश्रुत तथा चरक ने 'आश्च्योतन' शब्द का और श्रीवामभट ने 'आश्रोतन' शब्द का प्रयोग किया है। इसे व्याकरण की दृष्टि से देखें—'इरितो बा' (३।१।५७)——'यकारहितोऽप्ययम्'। अर्थात् उक्त शब्द 'य' सहित एवं 'य' रहित दोनों ही प्रकार से शुद्ध है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—ज.चि. २६; सु.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३२ में देखें।

सर्वेषामक्षिरोगाणामादावाश्रोतनं हितम् । एकोदकगङ्गुधर्पाश्रुदाहरागनिर्बर्हणम् ॥ १ ॥

आश्रोतन का वर्णन—सभी प्रकार के नेत्ररोगों में सबसे पहले आश्रोतनविधि हितकारक होती है। इसके प्रयोग से नेत्रों में होने वाली पीड़ा, गड़ने या सूई चुभने की-सी पीड़ा, खुजली, घर्ष (रगड़—मानो आँख के भीतर बालू के कण घुस गये हों, उस प्रकार का कष्ट), आसुओं का बहना, दाह तथा लालिमा हट जाती है ॥ १ ॥

उष्णं वाते, कफे कोष्णं, तच्छीतं रक्तपित्तयोः ।

दोषानुसार आश्रोतन—वातज नेत्ररोगों में उष्णवीर्य तथा उष्णस्पर्श युक्त, कफूज विकारों में गुनगुना और रक्तज तथा पित्तज विकारों में शीतवीर्य तथा शीतस्पर्श द्रव का आश्रोतन कराना चाहिए।

निवातस्थस्य वामेन पाणिनोस्मौल्य लोचनम् ॥ २ ॥

शुक्ती प्रलम्ब्याऽन्येन पिचुवर्त्या कनीनिके । दश द्वादश वा बिन्दून् द्रघङ्गुलादवसेचयेत् ॥ ३ ॥

ततः प्रमूष्य मुदुना चैलेन, कफवातयोः । अन्येन कोष्णपानीयप्लुतेन स्वेदयेन्मृदु ॥ ४ ॥

आश्रोतन-विधि—नेत्ररोगी को निवातस्थान (जहाँ सीधा हवा का प्रकोप न हो) में लिटाकर चिकित्सक अपने बाँये हाथ से उसकी आँख को खोलकर दाहिने हाथ से लम्बी सीप में रखी हुई औषधि को अथवा दूसरी पिचु (रई के फाहा) की बत्ती से दोनों नेत्रों की कनीनिकाओं (नासिका के समीप के नेत्रसन्धियों) को दो अंगुल ऊपर से १० या १२ बूँदों से सींचे। तदनन्तर मुलायम तथा साफ वस्त्र से उसे साफ कर दें। यदि कफज अथवा वातज विकार हो तो गुनगुने जल में भिगाये हुए दूसरे फाहा से हल्का-सा नेत्रों के ऊपर स्वेदन करना चाहिए ॥ २-४ ॥

वक्तव्य—'श्च्युतिरु सरणे' धातु का अर्थ बूँद-बूँद गिरना, टपकना, बहना तथा रिसना आदि होता है, किन्तु सेचन-क्रिया भी इसी से सम्बन्धित है। जैसे—नेत्रों पर पोटली रखना, धारा गिराना आदि ये सब उसी के अर्थ हैं। ऊपर महर्षि वामभट ने 'शुक्तौ प्रलम्ब्या' पाठ स्वीकार कर द्रविड प्राणायाम किया है और श्रीहेमाद्रि ने उसका 'शुक्तिस्थद्रवनिमग्नार्द्रया' यह अर्थ किया है। यदि यहाँ 'शुक्त्या' पाठ स्वीकार कर लिया जाय तो 'प्रलम्ब्या' इसका विशेषण हो जायेगा। 'अन्येन' पद का अर्थ है—'दक्षिणकरण'।

२६४

अष्टाङ्गहृदये

रक्तज-पित्तज विकारों में स्वेदन कर्म का निषेध है, अतः नेत्रों का प्रशालन गुनगुना जल में भिगाये हुए रुई के फाहा या सुकोमल वस्त्र से करना चाहिए।

अत्युष्णतीक्ष्णं रुग्मगदूहृन्नाशायाम्निसेचनम्। अतिशीतं तु कुरुते निस्तोदस्तम्भवेदनाः ॥५॥ कषायवर्त्मतां घर्षं कुच्छादुन्मेषणं बहु। विकारवृद्धिमत्यल्पं संरम्भमपरिसृतम् ॥६॥

आश्वोतन का निषेध—अधिक गरम अथवा अधिक तीक्ष्ण द्रव्यों से निर्मित अक्षिसेचन (आश्वोतन) के प्रयोग से आँखों में पीड़ा, लालिमा की उत्पत्ति तथा दृष्टिनाश का कारण हो जाता है। इसके विपरीत अत्यन्त शीतवीर्य वाले द्रव्यों से निर्मित या स्पर्श में अत्यन्त शीतल आश्वोतन के प्रयोग से आँखों में चुभन, जकड़न, विविध प्रकार की वेदनाएँ होना, वर्त्मा में ह्मत्ता, पलकों का आपस में सट जाना तथा अत्यन्त कठिनाई से पलकों का खूलना—अधिक आश्वोतन करने के कारण ये लक्षण हो जाते हैं और बहुत कम मात्रा में किया गया आश्वोतन नेत्रविकारों को बढ़ाता है। आश्वोतन करने के बाद आँखों में से द्रव का न निकालना आँखों में शोथ को उत्पन्न करता है ॥५-६॥

वक्तव्य—अन्य संहिताओं में नेत्ररोगनाशक उपचारों में सेचन, आश्वोतन, पिण्डिका-विधान, बिडालक-विधि, तर्पण, अंजन, बर्ति आदि का विधान दिया गया है। प्रस्तुत संहिता में बिडालक-विधि का उल्लेख नहीं हुआ है। बिडालक-परिचय—बरीनियों को छोड़कर आँख की पलकों में जो लेप किया जाता है, उसे बिडालक कहते हैं। इसकी मोटाई तथा धारणकाल मुखलेप के समान होता है। इसका प्रयोग केवल दिन में, वह भी प्रातःकाल करें।

गत्वा सन्धिशिरोप्राणमुखघ्रोतांसि भेषजम्। ऊर्ध्वगात्रयने न्यस्तमपवर्त्यते मलान् ॥७॥

आश्वोतन के लाभ—आश्वोतन किया द्वारा नेत्रों में डाला गया औषधद्रव नेत्रसन्धियों, सिर, नासिका तथा मुख से सम्बन्धित घ्रोतों में पहुँचकर जत्रु से ऊपरी भागों के मलों को बाहर की ओर निकाल देता है ॥७॥

अथाञ्जनं शुद्धतनोर्नैत्रमात्राथये मले। पक्वलिङ्गैऽल्पशोफातिकण्डूपैच्छित्यल्लक्षिते ॥८॥ मन्दघर्षाश्वुरागेऽक्षिण प्रयोज्यं घनदूषिके। आर्तं पित्तकफासुन्निर्भारितेन विशेषतः ॥९॥

अञ्जन-प्रयोग के लाभ—अब यहाँ से अञ्जन का वर्णन प्रारम्भ किया जाता है। अञ्जन-प्रयोग का काल—वमन-विरंचन द्वारा शिरःप्रदेश के शुद्ध हो जाने के बाद जब मल (दोष-विशेष) केवल नेत्र में स्थित हो और जब उसके परिपक्व होने के लक्षण दिखलायी दें, तब अञ्जन का प्रयोग करें। दोष या दोषों के परिपक्व हो जाने के लक्षण—पहले की अपेक्षा शोथ (सूजन) में कमी का दिखलायी देना, खुजली की अधिकता, चिपचिपापन का होना, घर्ष (आँख का गड़ना या बालू की जैसी करकराहट) में कमी का होना तथा आँखों में लालिमा का कम होना और आँख के मैल का गाढ़ा होकर निकलना। इनके अतिरिक्त पित्त, कफ तथा रक्त दोष से पीड़ित नेत्रों में, विशेष रूप से वातदोष से पीड़ित नेत्रों में अञ्जन का प्रयोग करना चाहिए ॥८-९॥

वक्तव्य—ऊपर के श्लोकों में कहे गये लक्षण सामदोष तथा निरामदोष दोनों के हैं। दूसरे आचार्यों ने अपनी समिति इस प्रकार प्रकट की है कि साम-नेत्ररोगों में अञ्जन का प्रयोग न करें और निराम-नेत्ररोगों में अञ्जन का प्रयोग करें, इस प्रकार का वचन युक्तिसंगत है। इसके लिए आप देखें—साम-नेत्ररोग के लक्षण—अधिक वेदना, लालिमा, शोथ, घर्ष, चुभन, शूल तथा अश्रुप्रवाह। निराम-नेत्ररोग के लक्षण—वेदना में कमी, मन्द कण्डू, आँसुओं का कम गिरना तथा आँखों का साफ दिखलायी देना।

लेखनं रोपणं दृष्टिप्रसादनमिति त्रिधा। अञ्जनं—

अंजन के तीन भेद—कार्यभेद से अंजन तीन प्रकार का होता है—१. लेखन, २. रोपण और ३. दृष्टिप्रसादन।

आश्रितनाअनविधिरध्यायः २३ ]

सूत्रस्थानम्

२६५

—लेखनं तत्र कथायास्त्वपूषणीः ॥ १० ॥

लेखन अंजन—यह क.सैले, खट्टे, नमकीन तथा कटुरस-प्रधान द्रव्यों द्वारा बनाया जाता है ॥ १० ॥

रोपणं तित्तकैद्रव्यैः—

रोपण अंजन—तित्तरस-प्रधान द्रव्यों द्वारा रोपण अंजन का निर्माण किया जाता है।

—स्वादुशीतैः प्रसादनम् । तीक्ष्णाञ्जनभिसन्तप्ते नयेन तत्प्रसावनम् ॥ ११ ॥ प्रयुज्यमानं लभते प्रत्यञ्जनसमाह्वयम् ।

प्रसादन अंजन—मधुररस-प्रधान तथा शीतवीर्य द्रव्यों से निर्मित अंजन को प्रसादन अंजन कहते हैं।

प्रत्यञ्जन—तीक्ष्ण ( लेखन ) अंजन का प्रयोग करने से सन्तप्त ( जिसमें जलन हो रही हो ) नेत्र में जलन की शान्ति के लिए चूर्ण रूप जिस अंजन का प्रयोग किया जाता है, उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं ॥ ११ ॥

बक्तव्य—‘प्रसादन अंजन’ को ‘स्नेहन अंजन’ भी कहा गया है। अंजन के अन्य तीन भेद इस प्रकार हैं—१. गुटिका, जैसे—चन्द्रोदयावर्ति आदि। २. रस, जैसे—नेत्रबिन्दु आदि और ३. चूर्ण, सुरमा आदि। प्रत्यञ्जन का प्रयोग स्वस्थ नेत्रों में प्रतिदिन किया जा सकता है। इसे देखें—अ.सं.सू. ३२१८।

दशाङ्गुला तनुर्मध्ये शलाका मुकुलानना ॥ १२ ॥

प्रशस्ता, लेखने ताब्री, रोपने काल्लोहजा । अङ्गुली च, सुवर्णाया रूप्यजा च प्रसादने ॥ १३ ॥

अञ्जन-शलाका—इसकी लम्बाई १० अंगुल, मध्य भाग कुछ मोटाई युक्त तथा अगला भाग गोल होना चाहिए। लेखन अंजन लगाने के लिए तांबा की, रोपण अंजन लगाने के लिए काल्लोह ( इसपाती लोह ) की शलाका अथवा अंगुली और प्रसाद अंजन लगाने के लिए सोने अथवा चाँदी की शलाका ( सलाई ) होनी चाहिए। शलाका के अभाव में सभी अंजन अंगुली से लगाये जा सकते हैं ॥ १२-१३ ॥

बक्तव्य—बरेली के बाजार में अथवा सर्वत्र शृंगार-साधन की दूकानों में विभिन्न धातुओं की सलाई सहित सुरमादानियों मिलती हैं। प्रायः मटर या राजमाष की गोलाई के समान मोटी सलाई सुरमा लगाने के लिए उत्तम मानी जाती है। सलाई का चिकना होना अति आवश्यक होता है। सुरमादानी तथा सलाई सोना, चाँदी, पीतल, कांसा, जस्ता ( यशद ), शीशा तथा काँच की बनायी जाती हैं। सुरमा के साथ उक्त धातुओं का भी उपयोग नेत्रों को लाभ पहुँचाता है। इसके लिए धातुओं के गुण-धर्मों पर विचार करें।

पिण्डो रसक्रिया चूर्णस्त्रिघैवाञ्जनकल्पना । गुरो मध्ये लघो दोषे तां क्रमेण प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥

अञ्जनो की त्रिबिध कल्पना—अंजनों के निर्माण तीन प्रकार से किये जाते हैं—१. पिण्ड ( गोली या बत्ती के रूप में ), २. रसक्रिया ( मधु या काजल के रूप में ) तथा ३. चूर्ण ( नयनामृत, ममीरा का सुरमा आदि )। इनके प्रयोग—दोषों के बह जाने पर पिण्ड अंजनों का, मध्यम दोष होने पर रसक्रिया का तथा लघु दोष में चूर्ण रूप में प्रयुक्त होने वाले अंजनों का प्रयोग करना चाहिए ॥ १४ ॥

हरेणुमात्रा पिण्डस्य वेल्तमात्रा रसक्रिया । तीक्ष्णस्य, द्विगुणं तस्य मृदुनः—

अञ्जनो की मात्रा—तीक्ष्ण पिण्ड ( वर्ति ) रूप अंजन की मात्रा हरेणु ( बड़े चने ) के बराबर, रसक्रिया नामक अंजन की मात्रा वेल्त ( वायविङग ) के बराबर होती है। मृदु पिण्ड अंजन की मात्रा दो हरेणु के बराबर और मृदु रसक्रिया नामक अंजन की मात्रा दो वेल्त के बराबर होती है।

—चूर्णितस्य च ॥ १५ ॥

हे शलाके तु तीक्ष्णस्य, तिस्रस्तदितरस्य च ।

तीक्ष्ण अञ्जनो की मात्रा—तीक्ष्ण चूर्ण अंजन की मात्रा दो सलाई में जितना चूर्ण ( सुरमा या अंजन ) उठ जाय उतनी मात्रा होती है तथा मृदु चूर्णाञ्जन की मात्रा तीन सलाईभर होती है ॥ १५ ॥

२६६

अष्टाङ्गहृदये

वक्तव्य—कुछ संस्करणों में इसका पाठभेद मिलता है, किन्तु अर्थ की दृष्टि से दोनों पाठ समान नहीं हैं।

निशि स्वप्ने न मध्याह्ने स्नाने नोष्णगभस्तिभिः ॥ १६ ॥

अभिरोगाय दोषाः सूर्यर्धितोत्पीडितद्रुताः । प्रातः सायं च तच्छान्त्ये व्यध्रेऽर्कैस्तोऽज्येत्सदा ॥

अज्ञनप्रयोग-निर्देश—रात में, सोते समय, दोपहर में, सूर्य की तेज किरणों से आँखों के मलिन होने पर अंजन का प्रयोग न करें; क्योंकि उक्त अवसरों तथा स्थितियों में दोष बढ़े रहते हैं, उत्पीड़ित तथा पिघले हुए रहते हैं। अतः इन समयों में अंजन का प्रयोग करने से अंजन नेत्ररोगों को पैदा करने में कारण हो सकते हैं। अतएव नेत्ररोगों की शान्ति के लिए प्रतिदिन प्रातःकाल, सायंकाल तथा जब आकाश में बादल छाये न हों तब अंजन-प्रयोग करना चाहिए ॥ १६-१७ ॥

वदन्यन्त्ये तु न दिवा प्रयोज्यं तीक्ष्णमअंजन्म् । विरेकदुर्बलं चक्षुरादित्यं प्राप्य सीदति ॥ १८ ॥

अन्य आचार्यों का मत—अंजन-प्रयोग के सन्दर्भ में आचार्यों का मतभेद—कुछ आचार्यों का कथन है कि तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग दिन में करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि तीक्ष्ण अंजन को दिन में लगाने से आँखों से आँसूओं का अधिक स्राव हो जाने पर आँखें दुर्बल पड़ जाती हैं। इस स्थिति में वे सूर्य के प्रकाश को पाकर पीड़ित हो जाती हैं ॥ १८ ॥

स्वप्नेन राज्ञो कालस्य सोम्यत्वेन च तर्पिता । शीतसात्म्या दृग्ग्रायेन्यौ स्थिरतां लभते पुनः ॥ १९ ॥

तीक्ष्णांजन का रात्रि-प्रयोग—रात्रि में सोने से तथा काल के सोमगुणसम्पन्न होने से तृप्त हुई आग्नेय गुण-प्रधान होने पर भी शीतसात्म्य गुणवाली आँखें तीक्ष्ण अंजन द्वारा विरक्त होने पर भी पुनः स्थिरता को प्राप्त कर लेती हैं ॥ १९ ॥

अत्युद्विक्ते बलासे तु लेखनीयेऽथवा गदे । काममहद्यपि नात्युष्णे तीक्ष्णमक्षिण प्रयोजयेत् ॥ २० ॥

उष्णकाल में तीक्ष्णांजन-निषेध—कफदोष की अधिक वृद्धि होने पर अथवा लेखनीय नेत्ररोग होने पर दिन में तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग समशीतोष्ण ऋतुओं में भले ही कर लें, परन्तु अत्यन्त उष्णकाल में कभी भी दिन में तीक्ष्णांजन का प्रयोग न करें ॥ २० ॥

अशमनो जन्म लोहस्य तत् एव च तीक्ष्णता । उपघातोऽपि तेनैव तथा नेत्रस्य तेजसः ॥ २१ ॥

लौह एवं नेत्र की समानता—जिस प्रकार लौहधातु की उत्पत्ति पत्थर से होती है, उस पत्थर से ही उस लौह में तीक्ष्णता भी आती है और वह लौहधातु पत्थर के उपघात (चोट) से टूट भी जाता है; ठीक यही स्थिति नेत्र की उत्पत्ति आदि की है। यथा—नेत्र की उत्पत्ति तेजस् तत्त्व से होती है, उसमें जो तेजोमयता अर्थात् तीक्ष्णता होती है, वह भी तेजस् तत्त्व से ही होती है और वह नेत्र का उपघात (विनाश) भी तेजस् तत्त्व से ही होता है ॥ २१ ॥

वक्तव्य—नेत्र का यह आलंकारिक परिचय हमें यह समझा रहा है कि तेजोगुण-प्रधान नेत्र में कभी भी दिन में उसमें भी उष्णकाल में तीक्ष्णांजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसी से मिलता-जुलता एक उदाहरण ज्योतिषशास्त्र में है—'त्रिज्येच्छं नैव युक्तं कदापि'। अर्थात् क्र-वधू अपने-अपने घर में सबमें बड़े हों तो उनका विवाह ज्येष्ठ में न करें। यहाँ भी 'तेजसः' से सम्बन्ध है, अस्तु।

न रात्रावपि शीतेऽति नेत्रे तीक्ष्णांजनं हितम् । दोषमग्नावयेत्तत्संधं कण्डूजाड्यादिकारि तत् ॥

तीक्ष्ण अंजन का निषेध—अधिक शीतकाल में रात के समय में भी तीक्ष्ण अंजन हितकारक नहीं होता, क्योंकि शीतकाल में कालप्रभाव से जमे हुए दोष को वह अंजन निकाल तो पाता नहीं, इसके विपरीत वह नेत्र में स्तम्भता, खजली तथा जड़ता आदि विकारों को पैदा कर देता है ॥ २२ ॥

आश्वीतनाअनविधिरध्यायः २३ ]

सूत्रस्थानम्

२६७

नाअयेद्वीतवमितविरिक्ताशितवेगिते । क्रुद्धज्वरितान्ताक्षिशिरोरुक्शोकजागरे ॥ २३ ॥

अवृष्टेऽर्क शिरःस्नाते पीतयोर्धूमसद्योः । अजीर्णोऽन्यकसन्तप्ते दिवासुप्ते पिपासिते ॥ २४ ॥

अंजन के अयोय्य व्यक्ति—भयभीत पुरुष, जिसने अभी वमन किया हो, जिसने अभी विरिजन किया हो, जिसने तत्काल भोजन किया हो, मल-मूत्र आदि के बेग के समय, क्रोध की स्थिति में, ज्वर होने पर, तान्त ( सूक्ष्मदर्शन, तेजोमय पदार्थों को देखने के बाद अथवा अभिघात ) होने पर, नेत्ररोग में, शिरोरोग में, शोक की स्थिति में, अधिक जागरण होने पर, सूर्य के ढके होने पर, शिरःस्नान करने के बाद, धूम्रपान तथा मद्यपान करने पर, अजीर्ण की स्थिति में, आग या सूर्य से आँखों के सन्ताप्त होने पर, दिन में सोने के बाद तथा प्यास लगी हो उस समय भी अंजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ २३-२४ ॥

वक्तव्य—उक्त व्यक्तियों को अंजन का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए, यदि कर दिया जाता है तो उसका क्या प्रतिफल होता है, इसका विवेचन सु.उ. १८६८ से ७४ तक दिया गया है, देखें।

अतितीक्ष्णमृदुस्तोकबहृच्छघनकर्कशम् । अत्यर्थशीतलं तप्तमअनं नावचारयेत् ॥ २५ ॥

निषिद्ध अंजन का वर्णन—अतितीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, बहुत कम, बहुत अधिक, अत्यन्त द्रव, बहुत गाढ़ा, कर्कश ( खुरदरा ), अत्यन्त शीतल तथा अत्यन्त तपा हुआ ( गरम ) इस प्रकार के अंजन प्रयोग करने योग्य नहीं होते, अतएव इन्हें निषिद्ध कहा गया है ॥ २५ ॥

अथानुन्मीलयन् दुष्टिमन्तः सञ्चारयेच्छतैः । अञ्जिते वर्त्तनीं किञ्चिञ्चालयेच्छैवमअनम् ॥ २६ ॥

तीक्ष्णं व्याप्नोति सहसा, न चोन्मेषनिमेषणम् । निष्पीडनं च वर्त्तभ्यां खालनं वा समाचरेत् ॥

अंजन-प्रयोगविधि—अंजन लगाने के बाद पलकों को बिना खोले हुए नेत्रगोलक को धीरे-धीरे भीतर-ही-भीतर नीचे, ऊपर, दाहिने तथा बायें घुमाता रहे और थोड़ा-थोड़ा पलकों को भी कुछ-कुछ टपटपाता रहे। इस प्रकार करने से आँख में लगाया हुआ अंजन आँख के चारों ओर फैल जाता है। विशेष करके यह विधि तीक्ष्ण अंजन के प्रयोग की है। अंजन लगाने के तत्काल बाद सहसा उन्मेष ( पलक को उठाना ) तथा निमेष ( पलक को गिराना ) क्रिया नहीं करनी चाहिए। आँख की पलकों द्वारा अक्षिगोलक को दबाना अथवा आँख को घोंना नहीं चाहिए ॥ २६-२७ ॥

वक्तव्य—अंजन लगाने की सुश्रुतसम्मत विधि को देखें—सु.उ. १८६४-६५।

अपेतौषधसंरम्भं निर्वृत्तं नयनं यदा । व्याधिदोषर्तुयोग्याभिरिद्धिः प्रक्षालयेत्तदा ॥ २८ ॥

नेत्र-प्रक्षालनविधि—अंजन लगाने के बाद जब औषध का लगाना एवं गड़ना बन्द हो जाय तब रोग, दोष, ऋतु ( काल ) के अनुकूल अर्थात् शीतकाल में गुनगुने जल से तथा गर्मी में शीतल जल से नेत्र को धो देना चाहिए ॥ २८ ॥

दक्षिणाङ्गुष्ठकेनाक्षि ततो वामं सवाससा । ऊर्ध्ववर्त्तनीं सङ्गृह्य शोध्यं वामेन चेतर्त्तु ॥ २९ ॥

नेत्र-शोधनविधि—उसके बाद दाहिने अँगूठा पर कोमल एवं साफ वस्त्र लपेट कर उससे बायें नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर उसे साफ कर देना चाहिए और वस्त्र लपेटे हुए बायें अँगूठा से उसके दाहिने नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर दाहिने नेत्र को साफ कर देना चाहिए ॥ २९ ॥

वर्त्तमप्राप्तोऽअनाद्वोषो रोगान् कुर्यादतोऽन्यथा ।

नेत्र-शोधन में हेतु—अंजन का प्रयोग करने के पश्चात् उक्त विधि से प्रक्षालन ( घोना ) तथा शोधन न करने से पलकों के भीतर बचे हुए अंजन से कुपित हुए दोष रोगों को उत्पन्न कर देते हैं।

वक्तव्य—इसका स्पष्टीकरण देखें—‘अति विरकात्’...‘दीर्घव्यानि’ । ( अ.सं.सू. ३२।१९ )

कण्डूजाडयेऽअनं तीक्ष्णं धूम्रं वा योजयेत् पुनः ॥ ३० ॥

२६८

अष्टाङ्गहृदये

तीक्ष्णाञ्जन या धूमपान—यदि नेत्रमण्डल में खुजली अथवा जड़ता का अनुभव हो रहा हो तो तीक्ष्ण अंजन का अथवा तीक्ष्ण धूमपान का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ३० ॥

तीक्ष्णाञ्जनाभितप्ते तु चूर्णं प्रत्यञ्जनं हिमम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थान आश्वोतनाञ्जनविधिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥


प्रत्यञ्जन का वर्णन—तीक्ष्ण अञ्जन का प्रयोग करने पर यदि आँख में जलन प्रतीत हो रही हो तो चूर्ण ( सुरमा ) का प्रत्यञ्जन करना चाहिए ॥ ३१ ॥

वक्तव्य—प्रतिदिन आँख में जो सुरमा लगाया जाता है, इसी को प्रत्यञ्जन कहते हैं। देखें—अ.ह.सू. २।५। नेत्र से खूब आँसू गिरे इसके लिए रसाञ्जन का प्रयोग एक-एक सप्ताह में करना चाहिए। सुश्रुत में भी देखें—सु.उ. १८।६८।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में आश्वोतनाञ्जनविधि नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २३ ॥


चतुर्विंशोऽध्यायः

अथातस्तर्पणपूटपाकविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से तर्पण एवं पूटपाक विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —तेईसवें अध्याय में नेत्ररोगों की शान्ति के लिए जिन आश्रोतन तथा अज्ञान विधियों का वर्णन किया था, उनसे प्रायः नेत्रों में दुर्बलता आ जाती है। अतएव उसके बाद इस अध्याय में नेत्रतर्पण आदि विधियों का वर्णन किया जा रहा है। तर्पण का अर्थ है—नेत्रों को द्रव औषधों के सेचन से तृप्त करना। इस कार्य में पूटपाक-विधि उपकारक होती है। गीले या सूखे औषध-द्रव्यों से विधिभेद से स्वरस निकाला जाता है और केवल सूखे द्रव्यों का पूटपाक-विधि से स्वरस निकाला जाता है। इसका ज्ञान महाकवि भवभूति को भी था। देखें—‘पूटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः’। इन दोनों विधियों से प्राप्त रस का सेचन आँखों में किया जाता है और इससे नेत्र तृप्त होते हैं।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —सू.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३३ में देखें। चरक ने इस शालाक्यतन्त्र को पराधिकार समझकर इसका वर्णन अपनी संहिता में नहीं किया है।

नयने ताभ्यति स्तब्धे शुष्के रूक्षेऽभिघातिते। वातपित्तातुरे जिह्वे शीर्णपक्ष्माविलेक्षणे ॥ १ ॥

कृच्छ्रोन्मोलिशिराहर्षशिरोत्पाततमोऽर्जुनैः । स्यन्दमन्यान्यतोवातवातपर्यायशुक्रकैः ॥ २ ॥

आतुरे शान्तरागाश्रुशूलसंरम्बद्वयिके । निवाते तर्पणं योज्यं शुद्धयोर्यूर्द्धकाययोः ॥ ३ ॥

काले साधारणे प्रातः सायं वोतानशायिनः ।

तर्पणविधि-वर्णन —जब आँखों के सामने अन्धेरा प्रतीत हो, जब आँखें स्तब्ध हों, सूखी हों, रूखी हों, उन पर किसी प्रकार का आघात लगा हो, नेत्र पर वात या पित्त दोष की विकृति हो, नेत्रगोलक टेढ़े हो गये हों (जिसे ऐंचा-ताना कहते हैं), पक्षम (बरैनियों) के बाल उखड़ गये हों, दृष्टि मलिन हो गयी हो, नेत्रों को खोलने में कष्ट होता हो; जब नेत्र सिराहर्ष, सिरोत्पात, तिमिररोग, अर्जुनरोग, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, अन्यतोवात, वातपर्यय अथवा शुक्ररोग से पीड़ित हों तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए। जब आँखों की लालिमा, आँसू बहना, शूल, संरम्ब (शोथ) तथा दृषिका (नेत्रमल) ये शान्त हो जायें तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए। नस्य से सिर का तथा वमन-विरचन आदि द्वारा शरीर का शोधन कराकर निवातस्थान में, समशीतोष्ण काल में प्रातःकाल अथवा सायंकाल में रोगी को चित लिटाकर तर्पण का प्रयोग करना चाहिए ॥ १-३ ॥

यवमाषमयीं पालीं नेत्रकोशाद्भिः समाम् ॥ ४ ॥

द्वयङ्गुलोच्चां दृढां कृत्वा यथास्वं सिद्धभावेत्। सर्पिनिर्मिलिते नेत्रे तप्ताम्बुप्रबिलायितम् ॥ ५ ॥

नक्तान्थवाततिमिरकृच्छ्रोबोधदिके वसाम्। आपक्षमाग्रात्—

तर्पण की दूसरी विधि —इस विधि में भी रोगी को चित लिटाकर उसके नेत्रकोश से बाहर जो या उड़द के आटे के समान आकार की एक पाली बनवाये, जो दो अंगुल ऊँची हो और दृढ़ हो, जो तर्पण

२७०

अष्टाङ्गहृदये

द्रव डालने पर टूट न जाय। उसमें दोष तथा रोग के अनुसार सिद्ध किये हुए स्नेह को भर दें। इस सिद्ध स्नेह को भरते समय नेत्रों को बन्द कर लें। यदि स्नेह में घृत है तो उसे गरम पानी में पात्र सहित रखकर पिघला लें। यदि रतीघी, वातदोष-प्रधान तिमिररोग हो तथा कठिनायी से नींद खुलती हो तो इन रोगों में वसा का प्रयोग करना चाहिए। यह वसा उस पाली में उतनी भरनी चाहिए, जिससे बरीनी के बाल उसमें डूब जायें ॥ ४-५ ॥

—अथोन्मेषं शनकैस्तस्य कुर्वतः ॥ ६ ॥

मात्रा विगणयेत्त्र वत्ससन्धिस्तित्तसिते। दृष्टौ च क्रमशो व्याघौ शतं त्रीणि च पञ्च च ॥ ७ ॥

शतानि सप्त चाष्टौ च, दश मन्ये, दशानिले। पिते षट्, स्वस्थवृत्ते च बलासे पञ्च धारयेत् ॥ ८ ॥

स्नेह-धारणकाल—स्नेह के भर जाने के बाद वह रोगी धीरे-धीरे आँख या आँखों को खोलने का प्रयत्न करे। तदनन्तर चिकित्सक रोगी के समीप बैठकर मात्रा की गणना इस प्रकार करे—वत्सगत रोग में १००, सन्धिगत रोगों में २००, सफेदमण्डल के रोगों में ५००, कृष्णमण्डल के रोगों में ७००, दृष्टिमण्डल के रोगों में ८००, अधिमन्त्ररोग में १०००, वातज नेत्ररोगों (वातपर्यय आदि) में १०००, पित्तज नेत्ररोगों में ६००, स्वस्थवृत्त अर्थात् स्वस्थ पुरुष के प्रति प्रयोग किये जाने पर भी ६०० तथा कफज रोगों में ५०० मात्रा तक का समय स्नेह धारण करने के लिए पर्याप्त है ॥ ६-८ ॥

बत्क्य—जिस कालप्रमाण को महर्षि वाग्भट ने 'मात्रा' कहा है, उसे श्रीसुश्रुत ने (सु.उ. १८८ में) 'वाक्' कहा है। ये शब्द प्राचीन काल में काल को नापने के लिए प्रयुक्त किये जाते थे। यहाँ मात्रा शब्द से लघुमात्रा उच्चारण के बराबर काल का ही ग्रहण करना चाहिए। १०० मात्रा के उच्चारण में प्रायः ३ मिनट लग जाते हैं, यही स्थिति वाक् की भी है।

कृत्वाऽपाङ्के ततो द्वारं स्नेहं पात्रं निगालयेत्। पिबेच्च धूम्रं, नक्षेत व्योम रूपं च भास्वरम् ॥ ९ ॥

तर्पण का पश्चात् कर्म—अपांग (आँख का बाहरी कोर) की ओर द्वार करके अर्थात् उस ओर सिर सहित आँख को झुकाकर नेत्र-तर्पण के लिये डाले गये स्नेह को किसी पात्र में निकाल लें (सुश्रुत के अनुसार—'स्विक्नेन यवपिष्टेन शोधयेत्' (सु.उ. १८।१०) अर्थात् जो के सने हुए आटा को उबाल कर उससे नेत्र के अवयवों का उबटन करके उसे शुद्ध करें।), तदनन्तर उसे धूम्रपान करायें। यह व्यक्ति आकाश की ओर अर्थात् दूरी में स्थित वस्तुओं को देखने का प्रयत्न न करे और सूर्य आदि चमकीली वस्तुओं को न देखें ॥ ९ ॥

इत्थं प्रतिदिनं वायौ, पिते त्वेकान्तरं, कफे। स्वस्ये च द्रघन्तरं दद्यादातुरेतैरिति योजयेत् ॥ १० ॥

दोषानुसारं तर्पण—इस प्रकार वातदोष में प्रतिदिन, पित्तदोष में एक दिन छोड़कर अर्थात् प्रति तीसरे दिन और कफदोष में तथा स्वस्थ पुरुष के नेत्रों में दो-दो दिन का अन्तर देकर तर्पण का प्रयोग तब तक करता रहे जब तक सम्यक् तर्पण के लक्षण उत्पन्न न हो जायें ॥ १० ॥

बत्क्य—वृद्धवाग्भट ने कुछ अधिक स्पष्ट निर्देश दिये हैं—नेत्रतर्पण के लिए जो आधार (चहार-दिवारी) बनाया था उसे हटाकर कल्क से आँख के अवयवों को पोछ कर उसे धूम्रपान करायें और गुनगुने जले से उसका मुख धुलवा कर रोगानुसार उसे समुचित भोजन करायें। देखें—अ.सं.सू. ३३।५।

प्रकाशक्षमता स्वास्थ्यं विशदं लघु लोचनम्। तृप्ते, विपर्ययोऽतृप्तेऽतितृप्ते श्लेष्मजा रुजः ॥

तर्पण का समयोग—इसमें रोगी के नेत्रों में प्रकाश की ओर देखने की शक्ति हो जाती है, नेत्र की स्वस्थता का अनुभव, नेत्र में स्वच्छता तथा आँखों में हल्कापन प्रतीत होता है। तर्पण का हीनयोग—इसमें

तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः २४ ]

सूत्रस्थानम्

२७१

समयोग के लक्षणों के विपरीत लक्षण होते हैं। तर्पण का अतियोग—इसमें कफज रोगों की उत्पत्ति हो जाती है ॥ ११ ॥

वक्तव्य —तर्पण के हीनयोग में तब तक तर्पण कराना चाहिए जब तक समयोग के लक्षण दृष्टिगोचर न हों और तर्पण के अतियोग में कफनाशक विधियों ( नस्य, धूमपान, अञ्जन, सेक, गण्डूष, कवल आदि ) का प्रयोग कराना चाहिए। कफनाशक विधियों का वर्णन यहाँ भी किया गया है तथा सुश्रुत में भी। देखें—सू.उ. १८।१६।

स्नेहपीता तनुरिव क्लान्ता दृष्टिर्हि सौदति । तर्पणानन्तरं तस्मादुगुबलाधानकारिणम् ॥ १२ ॥ पुटपाकं प्रयुजीत पूर्वोत्तेज्येव यक्षमत् ।

पुटपाक का वर्णन —जिस प्रकार स्नेहपान कर लेने पर शरीर ढीला पड़ जाता है, वैसे ही स्नेह द्वारा तर्पण करने पर दृष्टि भी ढीली पड़ जाती है। अतएव तर्पण-प्रयोग के बाद दृष्टि को बलवती बनाने के लिए पुटपाक-विधि से निकाले गये रसों का यथोचित प्रयोग करना चाहिए। इसका प्रयोग पहले श्लोक २-३ में कहे गये वातज एवं कफज रोगों में करना चाहिए ॥ १२ ॥

स वाते स्नेहनः, श्लेष्मसहिते लेखनो हितः ॥ १३ ॥ दृग्दीर्बल्येऽनिले पिते रक्ते स्वस्थे प्रसादनः ।

दोषानुसार पुटपाक-प्रयोग —पुटपाक तीन प्रकार के होते हैं—१. स्नेहन, २. लेखन तथा ३. प्रसादन। इनका उपयोग—स्नेहन पुटपाक का प्रयोग वातज नेत्ररोगों में, लेखन पुटपाक का प्रयोग कफयुक्त वातज नेत्ररोगों में तथा प्रसादन पुटपाक का प्रयोग दृष्टि की दुर्बलता में, वातज, पित्तज तथा रक्तप्रकोपज नेत्र-रोगों में और स्वस्थ नेत्रों में इनको सदा स्वस्थ रखने की दृष्टि से किया जाता है ॥ १३ ॥

भूशयप्रसहानूपमेदोमज्जवसाभिषैः ॥ १४ ॥ स्नेहनं पयसा पिष्टैर्जीवनीयेश्च कल्पयेत् ।

स्नेहन पुटपाक के द्रव्य —भूशय ( लोमड़ी आदि प्राणी ), प्रसह ( अ.ह.सू. ६।४८ इसमें प्रसहवर्ग के प्राणियों की गणना की गयी है ) तथा अनूप ( 'बृहदकनगोऽनूपः'—शा.सं.पू.खं. १।६४ ) देश में रहने वाले मृग एवं पक्षियों की मेदा, मज्जा, मांस तथा जीवनीय गण के द्रव्यों को दूध में पीसकर स्नेहन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १४ ॥

मृगपक्षियकुन्मांसमुक्तायस्ताप्रतैन्धवेः ॥ १५ ॥ स्रोतोजशङ्खफेनालेलेखनं मस्तुकल्कितैः ।

लेखन पुटपाक के द्रव्य —जांगलदेशीय मृग एवं पक्षियों के यकृत, मांस, मोती, लौहभस्म, ताम्रभस्म, संधानमक, काला तथा सेफेद मुरमा, शंख, समुद्रफेन और हरिताल—इन द्रव्यों को मस्तु ( दही के पानी ) में पीसकर लेखन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १५ ॥

मृगपक्षियकुन्मज्जवसान्त्रहृदयामिषैः ॥ १६ ॥ मधुरैः सघृतैः स्तन्यक्षीरपिष्टैः प्रसादनम् ।

प्रसादन पुटपाक के द्रव्य —साधारणदेशीय मृग एवं पक्षियों के यकृत, मज्जा, वसा, अन्त्र ( आंत ), हृदय, मांस तथा मधुरवर्ग में परिगणित द्रव्य एवं घी—इन सबको स्त्री के दूध में पीसकर प्रसादन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १६ ॥

२७२

अष्टाङ्गहृदये

बिल्वमात्रं पृथक् पिण्डं मांसभेषजकल्कयोः ॥ १७ ॥

उरूकवटाम्भोजपत्रैः स्नेहादिषु क्रमात्। वेष्टयित्वा मुदा लिप्तं धवधन्वनगोमयैः ॥ १८ ॥ पचेत्यदीनैरन्यामं पक्वं निष्पीड्य तदस्मत्। नेत्रे तर्पणवद्युज्यात्—

पुटपाक-रचनाविधि—ऊपर तीन प्रकार के पुटपाकों के निमित्त कहे गये मांस आदि द्रव्यों तथा औषधद्रव्यों का बिल्वभर ( १-१ पल = ४ तोला ) कल्क ( चटनी ) लेकर गोला जैसा बनायें। फिर क्रमशः स्नेहन पुटपाक के लिए एण्ड के पत्तों से, लेखन पुटपाक के लिए बरगद के पत्तों से तथा प्रसादन पुटपाक के लिए कमल के पत्तों से लपेट कर उन सबके ऊपर दो अंगुल मोटा मिट्टी का लेप करके उसी क्रम से स्नेहन को धव की लकड़ियों में, लेखन को धामिन की लकड़ियों में तथा प्रसादन को उपलौ ( गोहरी ) की आग में पकायें। जब मिट्टी ऊपर से लाल हो जाय तो पका हुआ समझें। शीतल हो जाने पर मिट्टी को धीरे से हटाकर उसका रस निचोड़ कर तर्पण-विधि की भाँति इस रस का भी प्रयोग करना चाहिए ॥ १७-१८ ॥

—शतं द्वे त्रीणि धारयेत् ॥ १९ ॥

लेखनस्नेहनाल्येषु—

धारणकाल-अवधि—पुटपाक से प्राप्त रस को नेत्रों में डालने के बाद लेखन पुटपाक के रस को १०० मात्रा तक रखें। स्नेहन पुटपाक के रस को २०० मात्रा तक रखें और अन्तिम प्रसादन पुटपाक के रस को ३०० मात्रा तक रखें ॥ १९ ॥

—कोष्णौ पूर्वौ, हिमोऽपरः।

उष्ण-शीतप्रयोग भेद—इन पुटपाक के रसों में पहले के दो ( स्नेहन तथा लेखन ) पुटपाकों का रस गुनगुना करके प्रयोग करना चाहिए और बाद वाला अर्थात् प्रसादन पुटपाक का रस शीतल ही प्रयोग करना चाहिए।

धूमपोऽन्ते तयोरिव—

पश्चात् कर्म—स्नेहन तथा लेखन पुटपाक से निकले हुए रसों के प्रयोग करने के बाद रोगी को धूमपान कराना चाहिए। इससे स्नेह द्वारा उभड़े हुए कफ की शान्ति हो जाती है। 'एव' शब्द प्रसादन पुटपाक के अन्त में धूमपान-सेवन का निषेध करता है।

—योगास्तत्र च तुत्पित्वत् ॥ २० ॥

योगों का निर्देश—इस पुटपाक के प्रयोग में योग ( समयोग, हिनयोग तथा अतियोग ) तर्पण के समान ही होते हैं ( देखें—अ.हृ.सू. २४११ ) ॥ २० ॥

तर्पणं पुटपाकं च नस्यानहं न योजयेत्।

तर्पण एवं पुटपाक का निषेध—जिनको अ.हृ.सू. २०११-१३ में नस्य-सेवन के अयोग्य कहा गया है, उन्हें तर्पण एवं पुटपाक का प्रयोग भी नहीं कराना चाहिए।

यावन्त्यहानि युञ्जीत द्विस्ततो हितभागभवेत् ॥ २१ ॥

मालतीमलिकापुष्पैर्बद्धाक्षो निवसेन्निशाम्।

तर्पण एवं पुटपाक की अवधि—जितने दिनों तक तर्पण अथवा पुटपाक का प्रयोग कराया गया हो उससे दुगुने दिनों तक पथ्य का सेवन कराना चाहिए और इन दिनों रात्रि में मालती ( चमेली ) तथा मलिका के फूलों को आँखों पर बाँधकर सोना चाहिए ॥ २१ ॥

तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः २४ ]

सूत्रस्थानम्

२७३

वक्तव्य —तर्पण तथा पुटपाक के अनुचित प्रयोग से जो रोग पैदा हो जाता है, उसकी चिकित्सा अंजन, आश्रोतन तथा स्वेदन आदि द्वारा तत्काल करें। देखें—सू.उ. १८।३०।

सर्वार्त्तमना नेत्रबलाय यत्नं कुर्वीत तस्याञ्जनतर्पणाद्यैः ॥ २२ ॥

दृष्टिश्च नष्टा विविधं जगच्च तमोमयं जायत एकरूपम् ॥ २३ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भानभटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने तर्पणपुटपाकविधिर्नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


नेत्ररक्षा की आवश्यकता —नेत्ररक्षा के उपाय—नस्य, अंजन, तर्पण आदि ( इस अध्याय में कहे गये ) उपचारों द्वारा सभी प्रकार से नेत्रों की शक्ति को बलवान् बनाये रखने के लिए सर्वदा प्रयत्न करते रहना चाहिए। यदि किसी प्रकार की असावधानी से नेत्रों में विकार उत्पन्न हो जाता है और उससे नेत्र की दर्शनशक्ति नष्ट हो जाती है तो यह विश्व रूप संसार उस नेत्रहीन के लिए अन्धकारमय एकरूप का होकर रह जाता है ॥ २२-२३ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारावत् त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

तर्पणपुटपाकविधि नामक चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २४ ॥


१८ अ० ह०

पञ्चविंशोऽध्यायः

अथातो यन्त्रविधिमध्येयार्थं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से यन्त्रविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

वक्तव्य —प्रस्तुत अध्याय से पहले अध्यायों में बस्ति, नस्य, अञ्जन, क्षार आदि के प्रयोग भी यन्त्रों की अपेक्षा रखते हैं, अतः उनका वर्णन करने के बाद अब यहाँ यन्त्रविधि नामक अध्याय का वर्णन किया जा रहा है। इस २५वें अध्याय में ४८ यन्त्रों का वर्णन किया गया है, इनका प्रयोग विविध प्रकार के रोगों की चिकित्साओं के लिए किया जाता है। वृद्धबागभट ने अ.सं.सू. ३४।३ में ये यन्त्र असंख्य होते हैं, इस प्रकार 'अतः कर्मवशात् तेषामियत्ताऽवधारणमशक्यम्' कहा है। वृद्धबागभट ने एक ही अध्याय में यन्त्र तथा शस्त्रों का वर्णन किया है, जिसे अष्टाङ्गहृदय में २५वें तथा २६वें अध्यायों में अलग कहा है। यन्त्र उन उपकरणों को कहते हैं, जिनसे चुभा हुआ काँटा, उखाड़ने योग्य दाँत, निकालने योग्य मृतगर्भ आदि को पकड़ कर निकाला जाता है। इनके अतिरिक्त गुद, भग, मुख आदि को चौड़ा करके भीतर देखने, औषध प्रयोग करने आदि का कार्य भी लिया जाता है, जिनका वर्णन आगे यथास्थान किया जायेगा। सुश्रुत ने 'मन तथा शरीर को पीड़ित करने वाले शल्य होते हैं, इनको निकालने के उपाय यन्त्र होते हैं', ऐसा कहा है। देखें—सू.सू. ७।४।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सू. सू. ७ तथा अ. सं. सू. ३४ में देखें।

विशेष —चरक ने यन्त्र तथा शस्त्रों का वर्णन यह कहकर कि 'तत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविद्यौ'। (च.चि. ५।४४) अर्थात् चरककायचिकित्सा-प्रधान संहिता है और यन्त्र-शस्त्र के प्रयोग में धन्वन्तरि के अनुयायी चिकित्सकों का अधिकार है। फिर भी च.चि. २५।५५ से ६० तक छः प्रकार के शस्त्रकर्मों का वर्णन करते हुए कहा है—'इति षड्विधमृद्विष्टं शस्त्रकर्म मनोविभिः'। यहाँ यह मनोपि शब्द सुश्रुत आदि शल्यशास्त्रज्ञों की ओर संकेत करता है।

नानाविधानां शल्यानां नानादेशप्रबाधिनाम्। आहर्तुमस्युपायो यस्तद्यन्त्रं यच्च दशने ॥ १ ॥

अशोभगन्दरादीनां शस्त्रक्षाराशियोजने। शेपाङ्गपरिरक्षायां तथा बस्त्यादिकर्मणि ॥ २ ॥

घटिकालाबुभृङ्गं च जाम्बवौष्ठादिकानि च।

यन्त्रों का वर्णन —शरीर के विभिन्न देशों (अवयवों) में गढ़े हुए या चुभे हुए शल्यों, जो कष्ट पहुँचा रहे हों, को निकालने का जो उपाय है, उसे यन्त्र कहते हैं और जो अश्व, भगन्दर आदि को देखने में सहायक होते हैं उन्हें भी यन्त्र कहते हैं। शस्त्र, क्षार तथा अश्विकर्म का प्रयोग करते समय शेष अंगों की सुरक्षा के लिए भी इन यन्त्रों की आवश्यकता पड़ती है। बस्ति (गुदबस्ति, उत्तरबस्ति) आदि कर्मों में भी इनका प्रयोग होता है। ये यन्त्र घटिका (घड़ा, लोटा), अलग्बु (तुम्बी), शृंगी (सिगी) इनका प्रयोग वातदोष तथा दूषित रक्त को चूसकर निकालने में होता है। जाम्बवौष्ठा यन्त्र का प्रयोग क्षार लगाने में और काँटा आदि निकालने में सन्दश (चिमटी) आदि का प्रयोग होता है ॥ १-२ ॥

अनेकरूपकार्याणि यन्त्राणि विविधात्यतः ॥ ३ ॥

विकल्प्य कल्पयेद्वृद्ध्या—

यन्त्रविधिरध्यायः २५ ]

सूत्रस्थानम्

२७५

यन्त्रों की विविधता—उक्त यन्त्रों के विविध आकार-प्रकार तथा अनेक कार्य होते हैं अर्थात् योग्य चिकित्सक इनसे अनेक कार्य ले सकते हैं। अतः अपनी विवेकबुद्धि से विचार करके इनका प्रयोग किया जा सकता है॥ ३॥

—यथास्थूलं तु वक्ष्यते।

सामान्य वर्णन—सामान्य दृष्टि से उक्त यन्त्रों का वर्णन आगे किया जायेगा।

वक्तव्य—महर्षि सुश्रुत ने १०१ यन्त्रों का होना स्वीकार कर उनका विभाजन इस प्रकार ६ भागों में किया है। यथा—(क) स्वस्तिकयन्त्र २४, (ख) सन्दशयन्त्र २, (ग) तालयन्त्र २, (घ) नाडीयन्त्र २०, (ङ) शलाकायन्त्र २८ तथा (च) उपयन्त्र २५; योग—१०१। देखें—सु.सू. ७।६। वाग्भट ने सुश्रुतोक्त उपयन्त्र को अनुयन्त्र संज्ञा दी है। देखें—अ.हृ.सू. २५।३२-४०। ये सभी यन्त्र लौहधातु से अथवा लौह जैसे दृढ़ पदार्थ से बनाये जाते हैं। देखें—सु.सू. ७।७। लौह शब्द से सभी धातुओं का ग्रहण किया जाता है। देखें—'सर्व स्यात्तैजसं लोहम्'। (अमरकोष २।९।९९)

तुल्यानि कङ्कसिंहर्क्षकाकादिमृगपक्षिणाम्॥ ४॥

मुखैर्मुखाणि यन्त्राणां कुर्यात्संज्ञकानि च। अष्टादशाङ्गुलायामान्यायसानि च भूरिशः॥ ५॥ मसुराकारपर्यन्तैः कण्ठे बद्धानि कीलकैः। विद्यात्स्वस्तिकयन्त्राणि मूलेऽङ्कुशतानि च॥ ६॥ तैर्दुंदेरस्यिसंलग्नशल्याहरणमिष्यते ।

स्वस्तिकयन्त्र-परिचय—स्वस्तिकयन्त्रों के मुख (अग्रभाग) कंकपक्षी, सिंह, ऋक्ष (भालू), कौआ आदि मृग, पक्षियों के मुखों की आकृति वाले होते हैं, अतएव इन यन्त्रों के नाम भी उन्हीं प्राणियों के नामों के अनुसार रखे गये हैं। यथा—कंकमुख, सिंहमुख आदि। अधिकांश इन यन्त्रों की लम्बाई १८ अंगुल होती चाहिए और इनका निर्माण लोहा धातु से होना चाहिए। इनके कण्ठ (मुख के निचले भाग) में मसुर की आकृति वाली कीलों से बँधे हों और इनका अन्तिम भाग (छोर) अंकुश की भाँति मुड़ा होना चाहिए। क्योंकि इसे पकड़े रहने से हाथ फिसलता नहीं। ये यन्त्र दृढ़ बने हों। इनसे अस्थियों में चुभे हुए शल्यों का आहरण करना चाहिए॥ ४-६॥

कीलबद्धविमुक्ताग्री सन्दंशो योदशाङ्गुलो॥ ७॥

त्वक्शिरास्नायुपिशितलग्नशल्यापकर्षणो ।

सन्दशयन्त्र-परिचय—सन्दशयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. कीलबद्ध (पेंच या कील से जुड़े हुए, जैसे—सँइसी), जिन्हें अन्यत्र सनिग्रह अथवा सनिबन्धन भी कहते हैं तथा २. विमुक्ताग्र (जैसे—चिमटा या चिमटी), जिन्हें अन्यत्र अनिग्रह या अनिबन्धन भी कहा जाता है। इन दोनों की लम्बाई सोलह अंगुल होती है। इनका उपयोग त्वचा, सिरा (धमनी), स्नायु तथा मांस में धँसे, गड़े शल्य (काँटा) आदि को निकालने में किया जाता है॥ ७॥

षडङ्गुलोऽन्त्यो हरणे सूक्ष्मशल्योपपक्षमणाम्॥ ८॥

सन्दशयन्त्र का भेद—ऊपर जो दो सोलह अंगुल वाले सन्दशयन्त्र कहे हैं, उनसे अतिरिक्त इसका एक भेद और होता है, जिसकी लम्बाई छः अंगुल होती है। इसका उपयोग सूक्ष्म शल्य तथा उपपक्षम अर्थात् परबालों को निकालने में किया जाता है॥ ८॥

मुचुण्डी सूक्ष्मदन्तर्जर्मूले रुचकभूषणा। गम्भीरव्रणमांसातानमर्मणः शेषितस्य च॥ ९॥

मुचुण्डी यन्त्र का वर्णन—उक्त षड्गुल सन्दश यन्त्र का नाम 'मुचुण्डी' है। इसके मुख के भीतरी भाग में छोटे-छोटे दाँत जैसे होते हैं, यह सीधी होती है। इसके अन्तिम छोर में रुचक (अँगूठी) का

१७६

अष्टाङ्गहृदय

आभूषण पहनाया जाता है। इसका कोई उपयोग न होने के कारण ही इसे भूषण कहा गया है। इसका उपयोग गहरे ब्रणों ( घावों ) के मांसों तथा शेष बचे हुए अर्म नामक नेत्ररोग-विशेष का आहरण के लिए किया जाता है ॥ ११ ॥

द्वे द्वादशाङ्गुले मत्स्यतालवत् द्वयेकतालके। नालयन्ते स्मृते कर्णनाडीशल्यापहारिणी ॥ १० ॥

तालयन्त्र-परिचय—तालयन्त्र दो होते हैं—१. एकतालक तथा २. द्वितालक। इनके ताल मछली के गले के ताल के सदृश होते हैं। इनकी दोनों लम्बाई १२-१२ अंगुल होती है। इनका उपयोग कान, नासिका तथा नाडीब्रण के भीतर का शल्य ( पूय = मवाद तथा गर्भ को भी शल्य कहा गया है ) को निकालने में होता है ॥ १० ॥

नाडीयन्त्राणि सुषिराण्येकानेकमुखानि च। स्रोतोगतानां शल्यानामामयानां च दर्शने ॥ ११ ॥

क्रियाणां सुकरत्वाय कुर्यादाचूषणाय च। तद्विस्तारपरीणाहृदैर्घ्यं स्रोतोऽनुरोधतः ॥ १२ ॥

नाडीयन्त्र-परिचय—नाडीयन्त्र सुषिर ( खोखले ) होते हैं। बाहर की ओर उनमें अनेक छिद्र बनाये जाते हैं। इनका उपयोग गुद तथा भग ( योनि तथा गर्भाशय ) आदि स्रोतों में गये हुए शल्यों को एवं उनके भीतर पैदा हुए अर्श के मस्यों को देखने के लिए किया जाता है। उक्त स्थानों में क्षारकर्म, अग्निदाह आदि चिकित्सा करने में उक्त यन्त्रों से सुविधा होती है। इनका प्रयोग रक्त-आचूषण आदि के लिए भी होता है। ( आचूषण क्रिया में प्रयुक्त नाडीयन्त्र अनेक छिद्रों वाला नहीं होता। आप ध्यान दें—छिद्रों के होने पर आचूषण क्रिया नहीं हो सकेगी। ) स्रोतों के आकार-प्रकार का विचार कर तदनुसार उन यन्त्रों के विस्तार, परिणाह ( मोटा या पतलापन ) तथा दीर्घता ( लम्बा-छोटापन ) का निर्धारण कर लेना चाहिए ॥ ११-१२ ॥

वक्तव्य—‘क्रियाणां सुकरत्वाय’ इस पद्यांश में महर्षि वामट का ‘सुकरत्वाय’ यह प्रयोग वैदिक प्रक्रिया के अनुसार ही ठीक माना जा सकता है। जैसे—‘क्त्वो यक्’ ( ७१।४७ ) पाणिनि के इस सूत्र का उदाहरण है—‘द्विं सुपुर्णो गत्वाय’। ( ऋग्वेद ) और अव्ययान्त शब्दों से ‘सु’ का लोप होकर वह शब्द सदा एक ही रूप में बना रहता है, क्योंकि ‘यत्रव्येति तदव्ययम्’ अर्थात् जिस शब्द के रूप विभक्तियों के अनुसार परिवर्तित नहीं होते उसे ‘अव्यय’ कहते हैं।

दशाङ्गुलाऽर्धनाहाऽन्तःकण्ठशल्यावलोकनी। नाडी—

कण्ठशल्यावलोकनी नाडी—कण्ठ के भीतर गये हुए शल्य को देखने के लिए जिस नाडीयन्त्र का निर्माण कराया जायेगा, वह १० अंगुल लम्बी और ५ अंगुल मोटी होनी चाहिए।

—पञ्चमुखच्छिद्रा चतुष्कर्णस्य सङ्ग्रहे ॥ १३ ॥

वारङ्गस्य, द्विकर्णस्य त्रिच्छिद्राः तत्प्रमाणतः ।

द्विकर्ण, चतुष्कर्ण नाडीयन्त्र—चार कर्ण वाले वारंग ( मूठ ) को पकड़ने के लिए पाँच मुखों वाली नाडी तथा दो कर्ण वाले वारंग को पकड़ने के लिए तीन छेदों ( मुखों ) वाली नाडी उसी प्रमाण से बनायी जाती है ॥ १३ ॥

वारङ्कर्णसंस्थानानाहृदैर्घ्यानुरोधतः ॥ १४ ॥

नाडीरेवविधाश्चात्या द्रष्टुं शल्यानि कारयेत् ।

विविध नाडीयन्त्र—शल्य के वारंग ( मूठ ), कर्ण ( फर ), संस्थान ( आकार, स्वरूप ), आनाह ( मोटाई ) तथा लम्बाई के अनुसार उसे ( शल्य को ) देखने के लिए विविध प्रकार के नाडीयन्त्र तैयार करवाने चाहिए ॥ १४ ॥

यन्त्रविधिरध्यायः २५ ]

सूत्रस्थानम्

२७७

पञ्चकर्णिकया मूर्ध्नि सन्दृशो द्वादशाङ्गुलम् ॥ १५ ॥ चतुर्थसुषिरा नाडी शल्यनिर्घातिनी मता ।

शल्यनिर्घातिनी नाडी—जिसका ऊपरी भाग कमल की कर्णिका के सदृश हो, लम्बाई १२ अंगुल हो और जिसका चौथाई भाग ( ३ अंगुल ) खोलला हो, उस नाडीयन्त्र को 'निर्घातिनी नाडी' कहते हैं ॥ १५ ॥

वक्तव्य—शल्य का जिस ओर से प्रवेश हुआ हो उसके प्रवेश के अनुरूप निकालने में इसका प्रयोग किया जाता है। इसका खोलला भाग शल्य में फँसाकर विपरीत दिशा से यन्त्र को ठोककर शल्य को सुगमता से निकाल लिया जाता है।

अर्शासां गोस्तनाकारं यन्त्रकं चतुरङ्गुलम् ॥ १६ ॥

नाहे पञ्चाङ्गुलं पुंसां प्रमदानां षडङ्गुलम् । द्विच्छिदं दशने व्याधेरकेच्छिदं तु कर्मणि ॥ १७ ॥ मध्येऽस्य त्र्यङ्गुलं छिदमङ्गुण्डोदरविस्तृतम् । अर्धाङ्गुलोन्च्छितोद्भूतकर्णिकं च तद्वर्धतः ॥

अर्शोयन्त्र-परिचय—अर्शों को देखने तथा उनमें औषध-प्रयोग करने की दृष्टि से यह यन्त्र दो प्रकार का होता है। इसका आकार गाय के स्तन के सदृश होता है, इसकी लम्बाई चार अंगुल, मोटाई पुरुषों के लिए पाँच अंगुल और स्त्रियों के लिए छः अंगुल होती है। जो यन्त्र अर्शों ( मस्यों ) को देखने के लिए प्रयुक्त होता है उसमें लम्बे आकार के दो छिद्र बनाये जाते हैं। जिस यन्त्र द्वारा मस्यों पर क्षार आदि औषध-द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है, उसमें एक छिद्र होता है। ये छिद्र यन्त्र के पार्श्व ( अगल-बगल ) में तीन अंगुल लम्बे अँगुठा के बराबर चौड़े होते हैं। इन यन्त्रों के मुखद्वार में आधा अंगुल ऊँची बाहर की ओर को मुड़ी हुई कर्णिका होती ॥ १६-१८ ॥

वक्तव्य—अर्शों ( मस्यों ) को देखने के लिए दो छिद्र किन्तु औषध-प्रयोग के लिए एक छिद्र वाला यन्त्र होता है। इसकी उपादेयता बतलाते हुए भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है—'एक छिद्र ( द्वार ) होने से शस्त्र, क्षार तथा अधिक्रम दूसरे स्थान पर न हो जाय, इसका भय नहीं रहता'। देखें—सु. जि. ६।११।

शम्यायं तादृगच्छिदं यन्त्रमर्शःप्रपीडनम् ।

शमोयन्त्र-परिचय—अर्शोयन्त्र की आकृति के सदृश ही एक शमोयन्त्र होता है, इसमें छेद नहीं होता। इसका प्रयोग अर्शों को प्रपीडन ( दबाना, मसलना ) के लिए किया जाता है।

सर्वथाऽपनयेदोष्ठं छिद्रादूर्ध्वं भगन्दरे ॥ १९ ॥

भगन्दरयन्त्र—इस यन्त्र का प्रयोग भगन्दर में क्षार या क्षारसूत्र आदि का प्रयोग करने के लिए किया जाता है। इसमें अर्शोयन्त्र की भाँति छिद्र तो होता है किन्तु ओष्ठ ( कर्णिका ) नहीं होता ॥ १९ ॥

प्राणार्बुदार्शसामेकच्छिद्रा नाड्यङ्गुलद्वया । प्रवेशिनीपरीणाहा स्याद्भगन्दरयन्त्रवत् ॥ २० ॥

प्राणयन्त्र-परिचय—प्राणयन्त्र के पार्श्व में एक छिद्र होता है, इस यन्त्र की नाडी ( नाली ) दो अंगुल लम्बी और इसकी मोटाई प्रवेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के बराबर होती है। इसका आकार भगन्दर यन्त्र के सदृश होता है, अतएव इसमें भी कर्णिका नहीं होती है। इसका प्रयोग नासिकाछिद्र के भीतर पैदा हुए अर्बुद तथा अर्श पर क्षार-प्रयोग के लिए होता है ॥ २० ॥

अङ्गुलित्राणकं दातं वार्शं वा चतुरङ्गुलम् । द्विच्छिदं गोस्तनाकारं तद्वत्तविवृतो मुखम् ॥ २१ ॥

अंगुलित्राणक यन्त्र—इस यन्त्र का निर्माण हाथीदाँत से अथवा सुदृढ़ शीशम आदि लकड़ी से कराया जाता है। इसकी लम्बाई चार अंगुल तथा इसके दोनों ओर छिद्र बनवाया जाता है। इसकी आकृति गाय

२७८

अष्टाङ्गहृदये

के स्तन के जैसी होती है। इसका उपयोग मुख को खोलने के लिए होता है। इसे अंगुलिब्राणक इसलिए कहा जाता है कि दूसरे रोगी के मुख के खोलने पर उसके दांतों से चिकित्सक की अंगुलियों की रक्षा हो जाती है ॥ २१ ॥

योनिब्रणेश्वरं मध्ये सुधिरं षोडशाङ्गुलम्। मुद्राबद्धं चतुर्भिस्तमभोजमुकूलानम् ॥ २२ ॥

चतुःशलाकमाक्रान्तं मूले तद्विकसेन्मुखे।

योनिब्रणेश्वरं यन्त्र—योनि (भग तथा गर्भाशय) के भीतर उत्पन्न हुए ब्रण आदि को देखने के लिए इस यन्त्र का प्रयोग होता है। यन्त्र-परिचय—यह बीज में खाली (खोखला) होता है। इसकी लम्बाई सोलह अंगुल होती है। यह चार भित्तियों (पत्तियों या पाटियों) से बना हुआ बाहर से मुद्रा (कँगनी) द्वारा बँधा हुआ, मुकुलित कमल के सदृश मुख वाला तथा भित्तियों के मूल भाग में चार शलाकाओं से घिरा हुआ होता है। इन शलाकाओं पर दबाव पड़ने पर उसका मुखभाग खुल जाता है, जिसके कारण योनि का मुख खुलकर उसके भीतरी अवयव स्पष्ट देखे जा सकते हैं ॥ २२ ॥

यन्त्रे नाडीब्रणाभ्यङ्गशालनाय षडङ्गुले ॥ २३ ॥

बस्तियन्त्राकृती मूले मुखेऽङ्गुष्ठकलायखे। अग्रतोऽकर्णिके मूले निबद्धमुदुचर्मणी ॥ २४ ॥

नाडीब्रण के यन्त्र—नाडीब्रण का अभ्यञ्जन (नाडीब्रण के भीतर स्नेह (घृत, तैल, वसा, मज्जा) पहुँचाने) करने के लिए तथा नाडीब्रण को घोने के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले ये दो यन्त्र हैं। इनकी लम्बाई छः अंगुल होती है। ये यन्त्र आकार में बस्तियन्त्र के सदृश होते हैं। इनके मूल में अँगूठा के बराबर और मुख (अगले भाग) में मटर के दाने के बराबर छेद होना चाहिए। इसके मुख की ओर कर्णिका नहीं होती किन्तु मूलभाग में दो कर्णिकाएँ होती हैं और उन पर कोमल चमड़े की बस्ति बाँधी जाती है। इसे व्रणबस्ति भी कहते हैं ॥ २३-२४ ॥

द्विद्वारा नलिका पिच्छनलिका बोदकोदरे।

नाडीयन्त्र—यह नाडीयन्त्र पिच्छनलिका अर्थात् मोर या गीध के पंख की नली के खोखले भाग से बनाया जाता है। इसके दोनों ओर छेद होते हैं। इसका प्रयोग जलोदर के जल को निकालने के लिए किया जाता है। देखें—अ.हृ.चि. १५।१४।

धूमबस्त्यादियन्त्राणि निर्दिष्टानि यथायथम् ॥ २५ ॥

अन्य यन्त्र—धूमयन्त्र, बस्तियन्त्र आदि अन्य अनेक यन्त्रों का वर्णन यथास्थान कर दिया गया है ॥ २५ ॥

वक्तव्य—बस्तियन्त्र का वर्णन अ.हृ.सू.अ. १९ में, प्रधाननस्य यन्त्र का अ. २० में, धूमयन्त्र का अ. २१ में और आश्वोतन के लिए नाडीयन्त्र का अ. २३ में वर्णन क्रमशः किया गया है।

व्यङ्गुलास्यं भवेच्छङ्गं चूषणेऽष्टादशाङ्गुलम्। अग्रे सिद्धार्थकच्छिद्रं सुनद्धं चूचुकाकृति ॥ २६ ॥

शृंगनाडीयन्त्र—शृंगनाडी (सिंगी) यन्त्र का मुखभाग तीन अंगुल चौड़ा और इसकी लम्बाई अठारह अंगुल होती है। इसके अगले भाग में सरसों के बीज के आने-जाने लायक छेद होता है। यह भाग स्वी के स्तन के चूचुक के सदृश होता है। यह यन्त्र भलीभाँति बँधा हुआ होता है, जिसमें कहीं से हवा न निकल सके। इसका प्रयोग दूषित रक्त तथा वायु को चूसने के लिए किया जाता है ॥ २६ ॥

वक्तव्य—प्राचीन काल में सिंगी का प्रयोग करने वाले 'जर्राह' लोग इधर-उधर घूमा करते थे और उनके निश्चित स्थान भी होते थे। वे सिंगी लगाने में कुशल होते थे। इस सिंगीयन्त्र के दोनों ओर छिद्र होते हैं। चौड़े छिद्र को वेदनास्थान पर लगाकर एक हाथ से उस यन्त्र को दबाकर मुख द्वारा जोर से वहाँ की हवा खींच ली जाती है और उस मुख वाले छिद्र को बन्द कर दिया जाता है। थोड़ी देर में वहाँ की हवा उस यन्त्र में भर जाती है तब उस यन्त्र को खींचकर निकाल लिया जाता है, इससे उस स्थान की पीड़ा शांत हो जाती है। इसे कच्ची सिंगी कहते हैं।