भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

के स्तन के जैसी होती है। इसका उपयोग मुख को खोलने के लिए होता है। इसे अंगुलिब्राणक इसलिए कहा जाता है कि दूसरे रोगी के मुख के खोलने पर उसके दांतों से चिकित्सक की अंगुलियों की रक्षा हो जाती है ॥ २१ ॥

योनिब्रणेश्वरं मध्ये सुधिरं षोडशाङ्गुलम्। मुद्राबद्धं चतुर्भिस्तमभोजमुकूलानम् ॥ २२ ॥

चतुःशलाकमाक्रान्तं मूले तद्विकसेन्मुखे।

योनिब्रणेश्वरं यन्त्र—योनि (भग तथा गर्भाशय) के भीतर उत्पन्न हुए ब्रण आदि को देखने के लिए इस यन्त्र का प्रयोग होता है। यन्त्र-परिचय—यह बीज में खाली (खोखला) होता है। इसकी लम्बाई सोलह अंगुल होती है। यह चार भित्तियों (पत्तियों या पाटियों) से बना हुआ बाहर से मुद्रा (कँगनी) द्वारा बँधा हुआ, मुकुलित कमल के सदृश मुख वाला तथा भित्तियों के मूल भाग में चार शलाकाओं से घिरा हुआ होता है। इन शलाकाओं पर दबाव पड़ने पर उसका मुखभाग खुल जाता है, जिसके कारण योनि का मुख खुलकर उसके भीतरी अवयव स्पष्ट देखे जा सकते हैं ॥ २२ ॥

यन्त्रे नाडीब्रणाभ्यङ्गशालनाय षडङ्गुले ॥ २३ ॥

बस्तियन्त्राकृती मूले मुखेऽङ्गुष्ठकलायखे। अग्रतोऽकर्णिके मूले निबद्धमुदुचर्मणी ॥ २४ ॥

नाडीब्रण के यन्त्र—नाडीब्रण का अभ्यञ्जन (नाडीब्रण के भीतर स्नेह (घृत, तैल, वसा, मज्जा) पहुँचाने) करने के लिए तथा नाडीब्रण को घोने के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले ये दो यन्त्र हैं। इनकी लम्बाई छः अंगुल होती है। ये यन्त्र आकार में बस्तियन्त्र के सदृश होते हैं। इनके मूल में अँगूठा के बराबर और मुख (अगले भाग) में मटर के दाने के बराबर छेद होना चाहिए। इसके मुख की ओर कर्णिका नहीं होती किन्तु मूलभाग में दो कर्णिकाएँ होती हैं और उन पर कोमल चमड़े की बस्ति बाँधी जाती है। इसे व्रणबस्ति भी कहते हैं ॥ २३-२४ ॥

द्विद्वारा नलिका पिच्छनलिका बोदकोदरे।

नाडीयन्त्र—यह नाडीयन्त्र पिच्छनलिका अर्थात् मोर या गीध के पंख की नली के खोखले भाग से बनाया जाता है। इसके दोनों ओर छेद होते हैं। इसका प्रयोग जलोदर के जल को निकालने के लिए किया जाता है। देखें—अ.हृ.चि. १५।१४।

धूमबस्त्यादियन्त्राणि निर्दिष्टानि यथायथम् ॥ २५ ॥

अन्य यन्त्र—धूमयन्त्र, बस्तियन्त्र आदि अन्य अनेक यन्त्रों का वर्णन यथास्थान कर दिया गया है ॥ २५ ॥

वक्तव्य—बस्तियन्त्र का वर्णन अ.हृ.सू.अ. १९ में, प्रधाननस्य यन्त्र का अ. २० में, धूमयन्त्र का अ. २१ में और आश्वोतन के लिए नाडीयन्त्र का अ. २३ में वर्णन क्रमशः किया गया है।

व्यङ्गुलास्यं भवेच्छङ्गं चूषणेऽष्टादशाङ्गुलम्। अग्रे सिद्धार्थकच्छिद्रं सुनद्धं चूचुकाकृति ॥ २६ ॥

शृंगनाडीयन्त्र—शृंगनाडी (सिंगी) यन्त्र का मुखभाग तीन अंगुल चौड़ा और इसकी लम्बाई अठारह अंगुल होती है। इसके अगले भाग में सरसों के बीज के आने-जाने लायक छेद होता है। यह भाग स्वी के स्तन के चूचुक के सदृश होता है। यह यन्त्र भलीभाँति बँधा हुआ होता है, जिसमें कहीं से हवा न निकल सके। इसका प्रयोग दूषित रक्त तथा वायु को चूसने के लिए किया जाता है ॥ २६ ॥

वक्तव्य—प्राचीन काल में सिंगी का प्रयोग करने वाले 'जर्राह' लोग इधर-उधर घूमा करते थे और उनके निश्चित स्थान भी होते थे। वे सिंगी लगाने में कुशल होते थे। इस सिंगीयन्त्र के दोनों ओर छिद्र होते हैं। चौड़े छिद्र को वेदनास्थान पर लगाकर एक हाथ से उस यन्त्र को दबाकर मुख द्वारा जोर से वहाँ की हवा खींच ली जाती है और उस मुख वाले छिद्र को बन्द कर दिया जाता है। थोड़ी देर में वहाँ की हवा उस यन्त्र में भर जाती है तब उस यन्त्र को खींचकर निकाल लिया जाता है, इससे उस स्थान की पीड़ा शांत हो जाती है। इसे कच्ची सिंगी कहते हैं।