भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 315

यन्त्रविधिध्यायः २५ ]

सूत्रस्थानम्

२७९

पक्की सिंगी से दूषित रक्त को निकाला जाता है। पीड़ित स्थान पर उत्तरा से पच्छ ल्याकर (छोलकर) उसके ऊपर सिंगी रखकर उक्त प्रकार से सिंगी का चौड़ा भाग रखकर दूसरी ओर मुख से चूसें। इस विधि से उस स्थान का दूषित रक्त निकल जाता है, फलतः वेदना शान्त हो जाती है। इस विषय पर सुश्रुत के विचार—‘गाय के साँग से निर्मित सिंगी उष्णवीर्य, मधुर, स्निग्ध गुणवाली होती है। अतः इससे वातदूषित रक्त निकाला जाता है। जाँक लगाकर पित्तदूषित रक्त निकलवाना चाहिए। अलाबु (तुम्बी) द्वारा कफदूषित रक्त को निकलवाना चाहिए। देखें—सु.सू. १३।५-७। इसी का समर्थन चरक ने भी किया है। देखें—च.वि. २।१६९।

स्यादद्वादशाङ्गुलोऽलाबुर्नाहे त्वष्टादशाङ्गुलः।

चतुस्यङ्गुलवृत्तास्यो दीप्तोऽन्तः श्लेष्मरक्तहृत॥ २७॥

तुम्बीयन्त्र-परिचय—अलाबु (तुम्बी) १२ अंगुल लम्बी, १८ अंगुल मोटी तथा ३ या ४ अंगुल चौड़े मुख वाली होनी चाहिए। उसके भीतर दीपक जलाकर उसके गरम हो जाने पर प्रयोग करने से कफदूषित रक्तविकार समाप्त हो जाते हैं॥ २७॥

बक्तव्य—सुश्रुतसम्मत उक्त विचार को महर्षि वाग्भट ने प्रस्तुत किया है। देखें—‘सान्तर्दीप्याऽलाब्वा’ (सु.सू. १३।८) इस अलाबु में छिद्र नहीं किया जाता। प्रयोग-विधि—जहाँ तुम्बी का प्रयोग करना हो वहाँ गौली मिट्टी या सने हुए आटा का दीपक बनाकर उसमें कपूर या घी की बत्ती जलाकर रख देते हैं। उस बत्ती के ऊपर उस छेदरहित तुम्बी को रखकर दबा दें, तत्काल दीपक बुझ जायेगा और तुम्बी में खिंचाव प्रतीत होने लगेगा। घड़ी-दो-घड़ी के बाद तुम्बी को निकाल कर उस स्थान को मसल देना चाहिए, स्थानीय वातजनित वेदना शान्त हो जाती है।

तद्वद्वती हिता गुल्मविलयोन्नमने च सा।

घटीयन्त्र-परिचय—इसी के आकार वाला घटीयन्त्र भी होता है। इससे गुल्म का विलयन तथा उन्नमन भी किया जाता है।

बक्तव्य—श्रीहेमाद्रि ने ‘चकारात् श्लेष्मरक्तावच्छृपणे च’ कहा है। यह घटीयन्त्र तुम्बीयन्त्र के समान छिद्ररहित होता है, तब बिना छिद्र के आच्छृपण क्रिया नहीं हो सकती। पाठक इस पर विचार करें।

शलाकाख्यानि यन्त्राणि नानाकर्मकृतीनि च॥ २८॥

यथायोगप्रमाणानि—

शलाकायन्त्र—शलाका नामक यन्त्रों का प्रयोग अनेक चिकित्सा-कर्मों के रूप में होता है। इनके आकार अनेक प्रकार के होते हैं। इनका जिस कर्म के लिए उपयोग होता है तदनुसार इनकी लम्बाई-मोटाई होती है॥ २८॥

—तेषामेषणकर्मणि।

उभे गण्डूपदमुखे—

एषणी शलाका—इनमें दो एषणी नामक शलाकायन्त्र होते हैं। इनसे व्रणवास्तु का अन्वेषण किया जाता है। इन दोनों यन्त्रों का मुख गण्डूपद (केंचुर) के सदृश होता है।

—स्रोतोभ्यः शल्यहारिणी॥ २९॥

मसूरदलवक्त्रे द्वे स्यातामष्टनवाङ्गुले।

स्रोतःशल्यहारिणी शलाका—स्रोतों से शल्य का आहरण करने वाले दो शलाकायन्त्र होते हैं। इनके मुख (अग्रभाग) मसूर की दाल के समान गोल तथा चपटे होते हैं। इन दोनों की लम्बाई ८ तथा ९ अंगुल होती है॥ २९॥