भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

शङ्खवः षट्—

छः शंकुयन्त्र—ये शंकु नामक शलाकार्पे संख्या में छः होती हैं।

—उभौ तेषां षोडशद्रादशाङ्गुली ॥ ३० ॥

व्यूहनेऽहिफणावक्त्रौ—

व्यूहन शंकुयन्त्र—उनमें से एक १६ अंगुल लम्बा और दूसरा १२ अंगुल लम्बा होता है। इन दोनों यन्त्रों के मुख साँप के फण के सदृश टेढ़े होते हैं। इनका उपयोग व्यूहन-कर्म (इधर-उधर फैले हुए मांस आदि को यथास्थान रखने) के लिए होता है ॥ ३० ॥

—द्वौ दशद्रादशाङ्गुली ।

चालने शरपुङ्गुगस्यौ—

चालन शंकुयन्त्र—उनमें से एक १० अंगुल लम्बा और दूसरा १२ अंगुल लम्बा होता है। इन दोनों यन्त्रों के मुख शरपुंख (बाण के फर) के सदृश होते हैं। इनका उपयोग चालन-कर्म (शल्य को हिलाने-डुलाने) में किया जाता है।

—आहार्यं बडिशकृती ॥ ३१ ॥

आहार्य शंकुयन्त्र—दो शंकुयन्त्र बडिश (मछली पकड़ने के कटि) जैसे होते हैं। इनका उपयोग शल्य का आहरण करने (खींचने) के लिए किया जाता है ॥ ३१ ॥

नतोऽग्रे शङ्कुना तुल्यो गर्भशङ्कुरिति स्मृतः । अष्टाङ्गुलायतस्तेन मूद्रगर्भ हरेत् स्त्रियाः ॥

गर्भशंकुयन्त्र—एक गर्भशंकुयन्त्र होता है। जिसका अगला भाग शंकु (काँटा) के सदृश झुका रहता है। यह ८ अंगुल लम्बा होता है। उससे नारी का मूद्रगर्भ (जो सही मार्ग की ओर प्रवृत्त न हुआ हो, उसे) निकाला जाता है ॥ ३२ ॥

वक्तव्य—देखें—अ.हृ.शा. २।२९-३०। यहाँ गर्भशंकुयन्त्र की प्रयोग-विधि दिखलायी गयी है।

अश्मर्याहरणं

सर्पफणावद्वक्रमग्रतः ।

अश्मरीहरण यन्त्र—अश्मरी (पथरी) को निकालने के लिए जिस यन्त्र का प्रयोग किया जाता है, उसका अगला भाग साँप के फण के सदृश आगे की ओर झुका अतएव टेढ़ा होता है।

शरपुङ्गुमुखं

दन्तपातनं

चतुरङ्गुलम् ॥ ३३ ॥

दन्तपातनयन्त्र—शरपुंख (बाण के फर) के सदृश मुखभाग वाला तथा ४ अंगुल लम्बा एक यन्त्र होता है। इसका प्रयोग दाँतों को निकालने (उखाड़ने) के लिए किया जाता है ॥ ३३ ॥

कार्पासविहितोष्णीषाः शलाकाः षट् प्रमाजने ।

प्रमाजनी शलाकायन्त्र—व्रण आदि को साफ करने के लिए जिन शलाकायन्त्रों का प्रयोग किया जाता है, उनकी संख्या ६ है। प्रमाजन करते समय इनके अगले भाग पर रई लपेट दी जाती है, जिसे वाग्भट ने 'विहितोष्णीष' कहा है। 'उष्णीष' का अर्थ है—पगड़ी।

पायावासन्नदूरयं

हे

दशद्रादशङ्गुले ॥ ३४ ॥

पायुयन्त्र—पायु (गुद) यन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. जो यन्त्र बाहरी गुद के समीप के व्रण को साफ करने के लिए होता है, उसकी लम्बाई १० अंगुल होती है। २. जो यन्त्र दूर के (भीतरी) गुदव्रण को साफ करने के लिए प्रयुक्त होता है, उसकी लम्बाई १२ अंगुल होती है ॥ ३४ ॥

हे षट्सप्ताङ्गुले घ्राणे, हे कर्णेऽष्टनवाङ्गुले ।