अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयन्त्रविधिग्रन्थायः २५ ]
सूत्रस्थानम्
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घ्राण एवं कर्ण यन्त्र—घ्राणयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. समीप के लिए ६ अंगुल लम्बा तथा २. दूर के लिए ७ अंगुल लम्बा। कर्णयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. समीप के लिए ८ अंगुल लम्बा तथा २. दूर के लिए ९ अंगुल लम्बा।
कर्णशोधनमश्वत्पत्रप्रान्तं सुवाननम् ॥ ३५ ॥
कर्णशोधन यन्त्र—इसका आकार पीपल के पत्र के अग्रभाग की भाँति नुकीला किन्तु उसका मुख मुव ( चमची ) के सदृश कुछ गहरा होना चाहिए। इससे कान की मैल निकाली जाती है ॥ ३५ ॥
शलाकाजाम्बवौष्टानां क्षारैऽग्नीं च पुष्कं त्रयम्।
युज्यतात् स्थूलाणुदीर्घाणां—
विविध शलाकायन्त्र—क्षार तथा अग्नि कर्मों के लिए तीन शलाकायन्त्र तथा तीन जाम्बवौष्ट ( जामुन के फल के सदृश मुख वाले ) यन्त्र होते हैं। ये यन्त्र कोई मोटे, कोई पतले तथा कोई दीर्घ ( लम्बे ) आकार के होते हैं। इस प्रकार इन शलाकायन्त्रों की संख्या १२ होती है।
—शलाकामन्त्रवर्धनी ॥ ३६ ॥
मध्योर्ध्ववृत्तदण्डां च मूले चार्धैस्तुसन्निभाम्।
उक्त शलाकायन्त्रों में से एक का प्रयोग अन्तर्वृद्धिरोग में प्रयुक्त होता है। उसका स्वरूप इस प्रकार होता है—मध्यभाग में ऊपर की ओर ढण्डे के आकार वाला और मूल भाग में अर्धचन्द्राकार होता है ॥ ३६ ॥
कोलास्थिदलतुल्यास्या नासाशोर्बुददाहकृत् ॥ ३७ ॥
एक शलाकायन्त्र का प्रयोग नासिका के भीतर उत्पन्न अर्श तथा अबुद पर दाहकर्म करने के लिए होता है। इस शलाका का मुखभाग बेर की गुठली के आधे भाग के सदृश होता है ॥ ३७ ॥
अष्टाङ्गुला निम्नमुखास्तिष्ठः क्षारीषधक्रमे। कनीनीमध्यमानामीनखमानसमेर्मुखैः ॥ ३८ ॥
तीन अन्य शलाकायन्त्रों का प्रयोग क्षारीषध का प्रयोग करने के लिए होता है। इनकी लम्बाई आठ अंगुल होती है। इनके मुखभाग में मुव ( चमच ) के जैसा गढ़ा होता है। इनके मुख कनीनिका ( कनिष्ठिका ), मध्यमा ( बीच की अँगुली ) और अनामिका ( अँगूठे से चौथी ) अँगुलियों के नखों के सदृश होते हैं ॥ ३८ ॥
स्वं स्वमुक्तानि यन्त्राणि मेदृशुद्धचञ्चनादिषु।
मूत्रमार्ग की शुद्धि के लिए तथा अंजन लगाने के लिए अनेक शलाकायन्त्रों का वर्णन यथास्थान इस ग्रन्थ में किया गया है।
वक्तव्य—मूत्रमार्ग की शुद्धि के लिए देखें—अ.हृ.सू. १९।७०,७३-८२। अंजन-प्रयोग के लिए देखें—अ.हृ.उ. १० सम्पूर्ण। शलाकायन्त्र की सहायता से जिन रोगों की चिकित्सा की जाती है, वे सभी शलाकयन्त्र के अन्तर्गत परिगणित किये जाते हैं।
अनुयन्त्राण्ययस्कात्तरज्जुवस्त्राश्रमभुद्राः ॥ ३९ ॥
वधान्त्रजिह्वाबालाश्च शाखानखमुखद्विजाः। कालः पाकः करः पादो भयं हर्षश्च, तत्क्रियाः ॥
उपायविविधविभजेदालोच्य निपुणं धिया।
अनुयन्त्रों का वर्णन—अनु(णु)यन्त्रों ( उपयन्त्रों ) का परिगणन—अयस्कात्त ( चुम्बक लौह ), रस्सी ( डोरा या धागा ), वस्त्र, पत्थर, मुद्रगर, वघ्र ( लकड़ी या बाँस की पट्टियाँ ), आँत की रस्सी, जीभ ( यह दंतों के बीच में फँसे हुए अन्नकणों या बाल आदि को निकालने में सहायता करती है ), बाल ( लम्बे बाल स्थियों अथवा घोड़े की पूँछ आदि के ), वृक्षशाखा, नख, मुख ( ओष्ठ-आचूषणार्थ ), दाँत, कालपाक ( पकने पर पूयशल्य स्वयं निकल जाता है, यही इसके निकलने का काल होता है ), हाथ, पैर, भय