अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
यन्त्रविधिग्रन्थायः २५ ]
सूत्रस्थानम्
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घ्राण एवं कर्ण यन्त्र—घ्राणयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. समीप के लिए ६ अंगुल लम्बा तथा २. दूर के लिए ७ अंगुल लम्बा। कर्णयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. समीप के लिए ८ अंगुल लम्बा तथा २. दूर के लिए ९ अंगुल लम्बा।
कर्णशोधनमश्वत्पत्रप्रान्तं सुवाननम् ॥ ३५ ॥
कर्णशोधन यन्त्र—इसका आकार पीपल के पत्र के अग्रभाग की भाँति नुकीला किन्तु उसका मुख मुव ( चमची ) के सदृश कुछ गहरा होना चाहिए। इससे कान की मैल निकाली जाती है ॥ ३५ ॥
शलाकाजाम्बवौष्टानां क्षारैऽग्नीं च पुष्कं त्रयम्।
युज्यतात् स्थूलाणुदीर्घाणां—
विविध शलाकायन्त्र—क्षार तथा अग्नि कर्मों के लिए तीन शलाकायन्त्र तथा तीन जाम्बवौष्ट ( जामुन के फल के सदृश मुख वाले ) यन्त्र होते हैं। ये यन्त्र कोई मोटे, कोई पतले तथा कोई दीर्घ ( लम्बे ) आकार के होते हैं। इस प्रकार इन शलाकायन्त्रों की संख्या १२ होती है।
—शलाकामन्त्रवर्धनी ॥ ३६ ॥
मध्योर्ध्ववृत्तदण्डां च मूले चार्धैस्तुसन्निभाम्।
उक्त शलाकायन्त्रों में से एक का प्रयोग अन्तर्वृद्धिरोग में प्रयुक्त होता है। उसका स्वरूप इस प्रकार होता है—मध्यभाग में ऊपर की ओर ढण्डे के आकार वाला और मूल भाग में अर्धचन्द्राकार होता है ॥ ३६ ॥
कोलास्थिदलतुल्यास्या नासाशोर्बुददाहकृत् ॥ ३७ ॥
एक शलाकायन्त्र का प्रयोग नासिका के भीतर उत्पन्न अर्श तथा अबुद पर दाहकर्म करने के लिए होता है। इस शलाका का मुखभाग बेर की गुठली के आधे भाग के सदृश होता है ॥ ३७ ॥
अष्टाङ्गुला निम्नमुखास्तिष्ठः क्षारीषधक्रमे। कनीनीमध्यमानामीनखमानसमेर्मुखैः ॥ ३८ ॥
तीन अन्य शलाकायन्त्रों का प्रयोग क्षारीषध का प्रयोग करने के लिए होता है। इनकी लम्बाई आठ अंगुल होती है। इनके मुखभाग में मुव ( चमच ) के जैसा गढ़ा होता है। इनके मुख कनीनिका ( कनिष्ठिका ), मध्यमा ( बीच की अँगुली ) और अनामिका ( अँगूठे से चौथी ) अँगुलियों के नखों के सदृश होते हैं ॥ ३८ ॥
स्वं स्वमुक्तानि यन्त्राणि मेदृशुद्धचञ्चनादिषु।
मूत्रमार्ग की शुद्धि के लिए तथा अंजन लगाने के लिए अनेक शलाकायन्त्रों का वर्णन यथास्थान इस ग्रन्थ में किया गया है।
वक्तव्य—मूत्रमार्ग की शुद्धि के लिए देखें—अ.हृ.सू. १९।७०,७३-८२। अंजन-प्रयोग के लिए देखें—अ.हृ.उ. १० सम्पूर्ण। शलाकायन्त्र की सहायता से जिन रोगों की चिकित्सा की जाती है, वे सभी शलाकयन्त्र के अन्तर्गत परिगणित किये जाते हैं।
अनुयन्त्राण्ययस्कात्तरज्जुवस्त्राश्रमभुद्राः ॥ ३९ ॥
वधान्त्रजिह्वाबालाश्च शाखानखमुखद्विजाः। कालः पाकः करः पादो भयं हर्षश्च, तत्क्रियाः ॥
उपायविविधविभजेदालोच्य निपुणं धिया।
अनुयन्त्रों का वर्णन—अनु(णु)यन्त्रों ( उपयन्त्रों ) का परिगणन—अयस्कात्त ( चुम्बक लौह ), रस्सी ( डोरा या धागा ), वस्त्र, पत्थर, मुद्रगर, वघ्र ( लकड़ी या बाँस की पट्टियाँ ), आँत की रस्सी, जीभ ( यह दंतों के बीच में फँसे हुए अन्नकणों या बाल आदि को निकालने में सहायता करती है ), बाल ( लम्बे बाल स्थियों अथवा घोड़े की पूँछ आदि के ), वृक्षशाखा, नख, मुख ( ओष्ठ-आचूषणार्थ ), दाँत, कालपाक ( पकने पर पूयशल्य स्वयं निकल जाता है, यही इसके निकलने का काल होता है ), हाथ, पैर, भय
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अष्टाङ्गहृदये
(इससे क्रोधशत्य निकल जाता है) और हर्ष (इससे शोकशत्य निकल जाता है)—ये १९ अनुयन्त्र हैं। शल्यों को निकालने के उपायों को जानने वाले चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह समय पर अपनी बुद्धि से विचार करके भी अनुयन्त्रों का विभाजन करे; यही उनका उपयोग है॥ ३९-४० ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने इन्हें उपयन्त्र कहा है। देखें—सू. सू. ८।१५।
निर्घातितोन्मथनपूरणमार्गशुद्धिसंयूहनाहरणबन्धनपीडनानि ।
आचूषणोन्नमननामनचालभङ्गव्यावर्तनर्जुकरणानि च यन्त्रकर्म॥ ४१ ॥
यन्त्रों के विविध कर्म—निर्घातन, उन्मथन, पूरण (बस्ति में द्रव का), मार्गशुद्धि, संयूहन (इकट्ठा करना), आहरण, बन्धन, पीडन (दबाना), आचूषण, उन्मन (उठाना), नामन (झुकाना), चालन, भंग (तोड़ना), व्यावर्तन (घुमाना) तथा ऋजुकरण (सीधा करना)—ये सभी कर्म यन्त्रसाध्य होते हैं॥ ४१ ॥
वक्तव्य—वृद्धवाग्भट ने इनके अतिरिक्त ९ यन्त्रकर्मों का परिगणन इस प्रकार किया है—१. विवरण, २. एषण, ३. प्रमार्जन, ४. प्रक्षालन, ५. प्रघमन, ६. विकर्षण, ७. ब्यंजन (व्यक्त करना), ८. अज्जन और ९. दारण—इस प्रकार ये कुल मिलाकर १५ + ९ = २४ यन्त्र हो जाते हैं। देखें—अ.सं.सू. ३४।२०। सुश्रुत ने १२ यन्त्रदोषों का भी उल्लेख किया है। इस प्रसंग में इनका भी अवलोकन कर लेना चाहिए। देखें—सू. सू. ८।१९। वृद्धवाग्भट ने ८ यन्त्रदोषों का वर्णन किया है। देखें—अ.सं.सू. ३४।३३।
विवर्तते साध्वबगाहते च ग्राह्यं गृहीत्वोदरते च यस्मात्।
यन्त्रेष््वतः कङ्कमुखं प्रधानं स्थानेषु सर्वेष्वधिकारि यच्च॥ ४२ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने यन्त्रविधिर्नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
कंकमुखयन्त्र—कंकमुख नामक यन्त्र उक्त सभी यन्त्रों में प्रधान माना जाता है, क्योंकि यह आवश्यकतानुसार घुमाया जा सकता है, झोलों में इसका सरलता से प्रवेश हो जाता है, ग्रहण करने योग्य शल्य को पकड़कर यह निकाल देता है और सभी अवयवों में प्रविष्ट होकर साधिकार अपना कर्म करता है॥ ४२ ॥
वक्तव्य—उक्त पद्य अविकल रूप से अष्टांगसंग्रह (सू. ३४।२१) में भी सुलभ है। सभी यन्त्र अपने-अपने कार्यक्षेत्र में प्रशंसा पाते ही हैं। कंकमुख यन्त्र पर वाग्भटद्वय की विशेष अनुकम्पा है, अतएव उसकी प्रशंसा यहाँ की गयी है। इस अध्याय में उक्त यन्त्रों के कर्मों का संक्षेप में वर्णन कर दिया है। वास्तव में जहाँ-जहाँ इनके प्रयोगस्थल हैं, वहाँ-वहाँ इनके प्रयोगों का विस्तारपूर्वक वर्णन है।
इस प्रकार वैद्यरत्न परिणित तारावत् त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान में
यन्त्रविधि-वर्णन नामक पचीसवें अध्याय समाप्त॥ २५ ॥
षड्विंशोऽध्यायः
अथातः शस्त्रविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से शस्त्रविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—इसके पहले अध्याय में यन्त्रों का वर्णन किया जा चुका है, तदनन्तर अब इस अध्याय में शस्त्रों का भेद-उपभेद सहित वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सू.सू. ८ तथा १३ में और अ.सं.सू. ३४ एवं ३५ में देखें। चरकसंहिता में शस्त्रों का वर्णन नहीं किया गया है, तथापि च.वि. २५ में षड्विधि शस्त्रकर्म का उल्लेख श्लोक ५५ से ६० तक किया गया है।
षड्विंशतिः सुकर्मा रैधटितानि यथाविधि। शस्त्राणि रोमबाहीनि ब्राहुत्येनाङ्गुलानि षट् ॥ १ ॥
सुरूपाणि सुधाराणि सुग्रहाणि च कारयेत्। अकरालानि सुधमातसुतीष्णावर्तितेऽयसि ॥ २ ॥
समाहितमुखाग्राणि नीलाम्भोजच्छवीनि च। नामानुगतरूपाणि सदा सन्निहितानि च ॥ ३ ॥
स्वोन्मानाद्यचतुर्थशफलात्येकैकशोऽपि च। प्रायो द्विग्राणि, युञ्जीत तानि स्थानविशेषतः ॥ ४ ॥
( मण्डलाग्रं वृद्धिपत्रमुत्पलाध्यर्द्धधारके। सर्पैषण्यो वेतसाख्यं शरायस्यत्रिकूर्चके ॥ १ ॥
कुशास्यं साटवदनमन्तर्वक्रार्धचन्द्रके ( कम् )। ब्रीहिमुखं कुठारी च शलाकाङ्गुलिशस्त्रके ॥ २ ॥
बडिशं करपत्राख्यं कर्तरी नखशस्त्रकम्। दन्तलेखनकं सूच्यः कूर्चो नाम खजाह्वयम् ॥ ३ ॥
आरा चतुर्विधाकारा तथा स्यात्कर्णवेधनी ( नम् ) ।।
शस्त्रों का वर्णन—सामान्यतः शस्त्रों की संख्या २६ है, जिनका आगे परिगणन किया गया है। इन शस्त्रों का निर्माण कुशल कर्मरों ( कारीगरों ) द्वारा विधिपूर्वक करवाना चाहिए। ये शस्त्र इतने तेज धार वाले हैं जिससे वे रोमों को भी काट सकें, इनकी लम्बाई छः अंगुल होती चाहिए, शस्त्र देखने में सुन्दर ( सुझील ), सुन्दर धार वाले हैं और इनकी मूठ भी अच्छी बनी हो, जिससे वे अच्छी तरह पकड़े जा सकें। इनकी आकृति डरावनी न हो, जिस लोहे से बनाये जायें वह लोहा आग में खूब घमाया ( तपाया ) गया हो और तीक्ष्णायस ( फौलाद ) से बनाये जायें। इन शस्त्रों के मुखाग्र ( फल ) मजबूत हों, इनका वर्ण नीलकमल की आकृति का हो। इन शस्त्रों के आकार आगे वर्णित शस्त्रों के नामों के अनुरूप हों, ये शस्त्र सदा ( चिकित्सकाल में ) चिकित्सक के पास हों। आधे में उसका फल हो और आधे में उसकी मूठ हो। यह दृष्टिकोण प्रत्येक शस्त्र के निर्माण में होना चाहिए। प्रायः स्थान-विशेष के प्रयोग में एक ही प्रकार के दो-तीन शस्त्रों की आवश्यकता पड़ सकती है ॥ १-४ ॥
( छब्बीस शस्त्रों के नाम— १. मण्डलाग्र, २. वृद्धिपत्र, ३. उत्पल, ४. अध्यर्धधारक, ५. सर्प, ६. एषणी, ७. वेतस या वेतसाग्र, ८. शरायस्य, ९. त्रिकूर्चक, १०. कुशास्य, ११. साटवदन, १२. अन्तर्वक्रार्धचन्द्रक, १३. ब्रीहिमुख, १४. कुठारी, १५. शलाका, १६. अंगुलिशस्त्र, १७. बडिश, १८. करपत्र, १९. कर्तरी, २०. नखशस्त्र, २१. दन्तलेखनक, २२. मुर्ध्या, २३. कूर्च, २४. खज ( मथानी ), २५. आरा ( ये चार प्रकार के होते हैं ) तथा २६. कर्णवेधन ॥ १-३ ॥ )
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—कुछ संस्करणों में आरम्भ से ४ श्लोकों के आगे कहे गये ३ श्लोक नहीं मिलते। प्रसंगोचित होने के कारण यहाँ इनका समावेश क्षेपक के रूप में कर लिया गया है। सुश्रुत ने इन शस्त्रों की संख्या २० दी है। देखें—सू.सू. ८।३। सुश्रुतोक्त शस्त्रों के नाम इस प्रकार हैं—१. मण्डलाग्र (Circular knife या Roundhead knife), २. करपत्र (Saw), ३. वृद्धिपत्र (Scalpel), ४. प्रयताग्र (Abscess knife), ५. नखशस्त्र (Nail pairs), ६. मुद्रिका (Finger-knife), ७. उत्पलपत्र (Lancel), ८. अर्धधार (Single edged knife), ९. सूची (Needle), १०. कुशपत्र (Bistoury), ११. आटीमुख (Tardus ginginiamos), १२. शरीरीमुख (Pair of scissors), १३. अन्तर्मुख (Curved bistoury), १४. त्रिकूर्चक (Brush), १५. कुठारिका (Ave shaped), १६. त्रीहिमुख (Trocar), १७. आरा (Owl like knife), १८. बडिश (Hooks), १९. दन्तशंकु (Tooth pick) तथा २०. एषणी (Sharp proves)।
वाग्भट ने सुश्रुत से अधिक जिन शस्त्रों का वर्णन किया है, वे इस प्रकार हैं—सर्पवक्त्र, शलाका, कर्तरी, सूचीकूर्च, खज एवं कर्णव्यघन। विशेष अष्टाङ्गसंग्रह-सू.अ. ३४ में देखें।
मण्डलाग्रं फले तेषां तर्जन्यन्तर्नखाकृति। लेखने छेदने योज्यं पोथकीशुण्डिकादिषु ॥५॥
मण्डलाग्र शस्त्र —ऊपर कहे गये शस्त्रों में से सर्वप्रथम यहाँ मण्डलाग्र शस्त्र का वर्णन किया जा रहा है। इसके फल (अग्रभाग) का स्वरूप तर्जनी (अँगूठा के बगल वाली) अँगुली के नख के भीतरी भाग के सदृश होता है। इसका उपयोग पोथकी (रोहा) तथा गल्फशुण्डि आदि रोगों के लेखन (छीलना, खुरचना) तथा छेदन (काटना) में होता है ॥५॥
वृद्धिपत्रं झुराकारं छेदभेदनपाटने। ऋज्वग्रमुन्नते शोफे गम्भीरे च तदन्त्यथा ॥६॥ तत्राग्नं पुच्छतो दीर्घहृस्वक्त्रं यथाश्रयम्।
वृद्धिपत्र शस्त्र —वृद्धिपत्र शस्त्र छुरा (उस्तरा) के आकार का होता है, इसका अगला भाग ऋजु (सीधा) होता है। इसका प्रयोग ऊँचे (उभार युक्त) ब्रणशोथ को छेदने, भेदने तथा पाटन (चौरने) कर्म के लिए होता है। इससे विपरीत गम्भीर ब्रणशोथ के छेदने आदि कर्मों के लिए प्रयुक्त होता है। उस वृद्धिपत्र शस्त्र का आकार पीछे की ओर को झुका हुआ तथा ब्रणशोथ की स्थिति के अनुसार लम्बे अथवा छोटे मुखवाला होता है ॥६॥
उत्पलाध्धर्धधाराख्ये भेदने तथा ॥७॥
उत्पल एवं अध्धर्धधारक शस्त्र —उत्पलपत्रक एवं अध्धर्धधारक ये दो शस्त्र भी भेदन, छेदन तथा पाटन कर्म में प्रयुक्त होते हैं ॥७॥
सर्पास्यं घ्राणकर्णार्शश्चछेदनेऽर्धङ्गुलं फले।
सर्पवक्त्र शस्त्र —सर्पास्य (सर्पमुख) नामक शस्त्र के फलभाग की लम्बाई आधा अंगुल होती है। इसका प्रयोग नासिकाछिद्रों तथा कानों के भीतर उत्पन्न अशार्कुरों को काटने के लिए होता है।
गतेरन्वेषणे श्लक्ष्णा गण्डूपदमुखेषणी ॥८॥
१. एषणी शस्त्र —एषणी नामक शस्त्र नाडीब्रण (नामूर) का घाव कहाँ तक हुआ है, इसको ढूँढने के लिए होता है। इसका मुख केंचुए के मुख जैसा होता है, वह एषणी स्पर्श में कोमल होती है ॥८॥
भेदनार्थेऽपरा सूचीमुखा मूलनिविष्ट्वा।
२. एषणी शस्त्र —एषणी नामक दूसरा शस्त्र भेदन कर्म के लिए प्रयुक्त होता है। इसका मुख सूर्य के जैसा तीखा होता है। सूर्य की भाँति उसकी जड़ में भी छिद्र होता है। इसके द्वारा क्षारभावित सूत्र का भगन्दर में प्रवेश किया जाता है।
शस्त्रविधिग्रन्थः २६ ]
सूत्रस्थानम्
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वक्तव्य—यहाँ दो एषणी शस्त्रों का वर्णन किया गया है। इसमें प्रथम एषणी यन्त्र है और दूसरा एषणी शस्त्र है।
वेतसं व्यधने—
वेतस शस्त्र—वेतसपत्रक नामक शस्त्र वेधन (बींधना, टुकरे करना, प्रहार करना) कर्म में प्रयुक्त होता है।
—स्राव्ये शरायास्यत्रिकूर्चके ॥ ११ ॥
शरारिमुख एवं त्रिकूर्चक शस्त्र—शरारि नामक एक लम्बी चाँच वाला पक्षी होता है, उसी की चाँच के आकार का यह शस्त्र होता है तथा त्रिकूर्चक (पहले इस शस्त्र से टीके लगाये जाते थे, इसको गोदने की कूची भी कह सकते हैं।)—ये दोनों शस्त्र स्रावण कर्म में प्रयुक्त होते हैं ॥ ११ ॥
कुशाटावदने स्राव्ये द्रुचङ्गुलं स्यात्तयोः फलम्।
कुशपत्रक एवं आटामुख शस्त्र—कुशपत्रक तथा आटामुख या आटीमुख शस्त्रों का फलभाग दो अंगुल लम्बाई युक्त होता है। उक्त दोनों शस्त्रों का प्रयोग स्रावण कर्म में किया जाता है।
तद्वदन्तर्मुखं तस्य फलमध्यर्धमङ्गुलम् ॥ १० ॥
अर्धचन्द्राननं चैतत्—
अन्तर्मुख शस्त्र—अन्तर्मुख नामक शस्त्र का फल आधे चन्द्रमा के आकार का होता है और उसकी धार का मुख भीतर की ओर होता है। इस शस्त्र के मुख की लम्बाई डेढ़ अंगुल होती है ॥ १० ॥
—तथाऽध्यर्धाङ्गुलं फले।
ब्रीहिक्वन् प्रयोज्यं च तच्छिरोदरयोर्ध्वे ॥ ११ ॥
ब्रीहिमुख शस्त्र—ब्रीहिमुख नामक शस्त्र का फल (धार) डेढ़ अंगुल लम्बा होता है। इसका प्रयोग सिरावेध तथा जलोदर के वेधन में किया जाता है ॥ ११ ॥
वक्तव्य—सिरावेध की विधि देखें—ज.ह.सू. २७।२३ से ३४ तक। अं सं.सू. ३४।२८ में ब्रीहिमुख शस्त्र का अन्यत्र प्रयोग भी देखें।
पृथुः कुठारी गोदन्तसदृशार्धङ्गुलानना । तयोर्ध्वदण्ड्या विध्येदुपर्यस्त्वां स्थितां शिराम् ॥ १२ ॥
कुठारी शस्त्र—कुठारी नामक शस्त्र का आकार गाय के दाँत के समान आधा अंगुल चौड़ा होता है। इसके ऊपरी भाग में कुल्हाड़ी के जैसा बेंट लगा रहता है। इस प्रकार के कुठारी शस्त्र से अस्थि के ऊपर स्थित सिरा का वेध करना चाहिए ॥ १२ ॥
ताम्रौ शलाका द्विमुखी मुखे कुरुबकाकृतिः । लिङ्गनाशं तथा विध्येत्—
ताम्रशलाका शस्त्र—लिंगनाश को वेधने के लिए एक ताँबे की शलाका होती है। इसके दोनों ओर धार होनी चाहिए। इसके दोनों मुख कुरुबक (लाल कटसरेया) के फूल के सदृश होते हैं। इसके द्वारा कफज लिंगनाश (मोतियाबिन्द) का वेधन किया जाता है।
—कुर्यादङ्गुलिशस्त्रकम् ॥ १३ ॥
मुद्रिकानिर्गतमुखं फले त्वर्धाङ्गुलायतम् । योगतो वृद्धिपत्रेण मण्डलाग्रेण वा समम् ॥ १४ ॥
तत्प्रदेशस्थिग्राह्यप्रमाणार्पणमुद्रिकम् । सूत्रबद्धं गलघ्रोतोरोगच्छेदनभेदेन ॥ १५ ॥
अंगुली शस्त्र—अंगुलि नामक शस्त्र का आकार अँगूठी जैसा होता है। इसका मुख आगे की ओर निकला रहता है। इसका फल आधा अंगुल लम्बा होता है। आकार में यह वृद्धिपत्र अथवा मण्डलाग्र शस्त्र
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अष्टाङ्गहृदये
के जैसा होता है। इसकी मुद्रिका प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के अगले पोर में पहनने योग्य होती है। इसमें धागा बांधकर चिकित्सक इससे गले के भीतरी स्रोत में उत्पन्न गलशुण्डी आदि का छेदन तथा भेदन कर्म करता है॥ १३-१५॥
वक्तव्य—अंगुलि शस्त्र को सुश्रुत एवं वृद्धवाग्भट ने 'मुद्रिकाशस्त्र' की संज्ञा दी है।
ग्रहणे शुण्डिकार्मादेर्बिधिं सुनताननम्॥
बधिश्च शस्त्र—बधिश्च शस्त्र का स्वरूप मछली पकड़ने के काँटा के सदृश, उसका अगला भाग कुछ मुड़ा या झुका हुआ होता है। इससे गलशुण्डी ( गले का एक विशेष रोग ), अर्म ( नेत्ररोग-विशेष ) तथा आदि शब्द से प्रतिजिह्निका रोग का ग्रहण अर्थात् छेदन कर्म किया जाता है।
छेदेऽस्त्रं करपत्रं तु खरधारं दशाङ्गुलम्॥ १६॥
विस्तारे द्रघङ्गुलं सूक्ष्मदन्तं सुत्स्वरुबधनम्॥
करपत्र शस्त्र—करपत्र नामक शस्त्र की धार खुरदरी होती है। इसकी लम्बाई १० अंगुल और चौड़ाई २ अंगुल होती है। इसके दाँत बहुत छोटे होते हैं। इसके मूलभाग में पकड़ने के लिए लकड़ी की मूठ बंधी रहती है। इससे हड्डियों का छेदन किया जाता है। इसे लोकभाषा में 'छोटी आरी' कहते हैं॥ १६॥
स्नायुसूत्रकचछेदे कर्तरी कर्तरीनिभा॥ १७॥
कर्तरी ( कैची ) शस्त्र—यह शस्त्र कैची के सदृश होता है। इससे स्नायुतन्तु तथा केश ( बाल ) काटे जाते हैं॥ १७॥
वक्रजुधारं द्विमुखं नखशस्त्रं नवाङ्गुलम्॥ सूक्ष्मशल्योद्वृत्तिच्छेदभेदप्रच्छानलेखने॥ १८॥
नखशस्त्र ( नहरनी )—इसके दोनों ओर मुख होता है। इसमें एक मुख ( धार ) सीधा और दूसरा मुख ( धार ) टेढ़ा होता है। इसकी लम्बाई ९ अंगुल होती है, इसका मध्य भाग गोल होता है। इसका उपयोग—इससे सूक्ष्म शल्य निकाला जाता है तथा छेदन, भेदन, पच्छ लगाना एवं छीलना आदि कर्म किये जाते हैं॥ १८॥
एकधारं चतुष्कोणं प्रबद्धाकृतिं चैकतः। दन्तलेखनकं तेन शोधयेद् दन्तशर्कराम्॥ १९॥
दन्तलेखनक शस्त्र—यह एक धार वाला तथा चार कोनों वाला होता है। इसके एक भाग में मूठ होती है। यह भाग कुछ बड़ा होता है। इसका उपयोग दाँतों में जमी हुई शर्करा को खुरच कर निकालना है॥ १९॥
वृत्ता गूढदृढाः पाशे तिस्रः सूच्योऽत्र सीवने।
सूची शस्त्र—सीवन कर्म ( सिलाई ) के लिए तीन प्रकार के सूचीशस्त्रों ( सुइयों ) का प्रयोग होता है। ये आकार में गोल, गुप्त अर्थात् धागा डालने वाला भाग अधिक चौड़ा नहीं होता तथा मजबूत पाशों ( छेदों ) ( जिनमें धागा पिरौया जाता है ) वाले होते हैं।
मांसलानां प्रदेशानां त्र्यग्ना त्र्यङ्गुलमायता॥ २०॥
मांसल ( अधिक मांस वाले ) स्थानों ( शरीर के अवयवों ) को सीने के लिए जिस सूचीशस्त्र की आवश्यकता होती है, वह तीन किनारों वाली और तीन अंगुल लम्बी होती है॥ २०॥
अल्पमांसास्थिसन्धिस्थव्रणानां द्रघङ्गुलमायता।
थोड़े मांस वाले स्थानों, अस्थियों वाले तथा सन्धियों पर उत्पन्न व्रणों ( घावों ) को सीने के लिए दो अंगुल लम्बा सूचीशस्त्र होना चाहिए।
शस्त्रविधिध्यायः २६ ]
सूत्रस्थानम्
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ब्रीहिषक्त्रा धर्तुर्वक्त्रा पक्त्रामाशयमर्मसु ॥ २१ ॥ सा सार्धद्रुघङ्गुला—
पक्त्राशय, आमाशय तथा अन्य मर्मस्थलों को सीने के लिए जिस सूचीशस्त्र (सुई) का प्रयोग किया जाता है, वह अद्वाई अंगुल लम्बा, जो के सदृश मुखबाला और धनुष के सदृश मुड़ा हुआ होता है ॥ २१ ॥
—सर्ववृत्तास्ताश्चतुरङ्गुलाः ।
कूर्चो वृत्तैकपीठस्याः ससाष्टी वा सुबन्धनाः ॥ २२ ॥ स योज्यो नीलिकाव्यङ्गकेशशतेषु कुट्टने ।
कूर्च शस्त्र—इसमें सात अथवा आठ गोल एवं चार अंगुल लम्बी (बाहर की ओर को निकली) सुइयाँ एक सुडील लकड़ी की गोल पीठ में जड़ी हुई, मजबूत बन्धन से बँधी हुई होती हैं। इसी को कूर्च या कूर्चक शस्त्र कहते हैं। इसका प्रयोग नीलिका, व्यंग तथा इन्द्रलुस पर रक्त निकालने के उद्देश्य से कुट्टन (बार-बार कूटना) कर्म के लिए किया जाता है ॥ २२ ॥
बक्तुध्य—विशेष देखें—अ.हू.चि. ८।२९। इसी अध्याय के ९वें पद्य में 'त्रिकूर्चक' शस्त्र का वर्णन आया है। इसी शस्त्र से गोदना गोदा जाता है। कुट्टन का अर्थ है—बार-बार कूटना।
अर्धाङ्गुलमुखैर्वृत्तेरष्टाभिः कण्टकैः खजः ॥ २३ ॥ पाणिभ्यां मध्यमानेन घ्राणातेन हरेदसृक् ।
खज शस्त्र—खज शस्त्र में आधे-आधे अंगुल के गोल मुखों वाले आठ काँटे होते हैं। इस शस्त्र को नासिका के छिद्रों के भीतर डालकर उसे हाथों से मथनी की भाँति मथे, इससे नासिका से रक्त को निकाले ॥ २३ ॥
व्यधनं कर्णपालीनां यूथिकामकुलाननम् ॥ २४ ॥
यूथिका शस्त्र—यूथिका शस्त्र का मुख जूही की कली के सदृश होता है। उसके द्वारा कर्णपालियों का वेधन किया जाता है ॥ २४ ॥
आराऽर्धङ्गुलवृत्तास्या तत्प्रवेशा तथोर्ध्वतः । चतुरस्रा, तथा विध्येच्छोफं पक्त्रामसंशये ॥ २५ ॥ कर्णपालीं च बहूलो—
आरा शस्त्र—इसका मुख आधे अंगुल के घेरे में गोल होता है। इसका प्रवेश भी आधा अंगुल किया जाता है, यह मुख के ऊपरी भाग में चौकोर होता है। इससे व्रणशोथ का उस समय वेधन किया जाता है, जब कि व्रण के सम्बन्ध में यह सन्देह हो कि यह पक चुका है या अभी कच्चा ही है। मोटी कर्णपाली का वेधन भी इसी (आरा शस्त्र) से किया जाता है ॥ २५ ॥
—बहूलायाश्च शस्यते । सूची त्रिभागसुषिरा व्यङ्गुला कर्णवेधनी ॥ २६ ॥
कर्णवेधनी सूची—मोटी कर्णपाली को वेधने के लिए एक और कर्णवेधनी सूची का वर्णन यहाँ किया जा रहा है। यह तीन अंगुल लम्बी तथा इसका एक तिहाई भाग सुषिर (खोलला) होता है ॥ २६ ॥
जलीकःक्षारदहनकाचोपलनखादयः । अलौहान्यनुशस्त्राणि, तान्येवं च विकल्पयेत् ॥ २७ ॥ अपराण्यपि यन्त्रादीन्त्युपयोगं च यौगिकम् ।
अनुशस्त्रों का परिगणन—जीक, क्षार, अग्नि, नुकीले काँच एवं पत्थर तथा नख आदि 'अनुशस्त्र' कहे जाते हैं। इसी प्रकार के और भी अनेक अनुशस्त्र होते हैं, जिनका निर्माण लौहधातु से नहीं किया जाता। उनका प्रयोग भी लौहशस्त्रों की भाँति किया जाता है। इसी प्रकार के अन्य यन्त्रों तथा शस्त्रों का यथोचित उपयोग करना चाहिए ॥ २७ ॥
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—अन्य अनुशस्त्रों में इनका भी परिगणन किया जाता है—बांस की खपाची, बबूल के काँटे, गाजवाँ आदि की पत्तियाँ, समुद्रफेन और सूखा गोबर ( कनोपल ) ये सभी शस्त्रक्रिया में उपयोगी होते हैं। यहाँ 'यन्त्रादीनि' पद में आये हुए आदि शब्द से शस्त्रों का भी ग्रहण कर लिया गया है।
उत्साटघपाटघसीव्येष्ट्यलेष्वप्रच्छानकुट्टनम् ॥ २८ ॥
छेद्यं भेद्यं व्यधो मन्यो ग्रहो दाहश्च तत्क्रियाः ।
शस्त्रकर्मा का वर्णन—१. उत्साटघ ( शल्य को निकालना ), २. पाटघ ( चीरना ), ३. सीव्य ( सीना ), ४. एष्य ( घाव कहाँ तक हुआ है, उसे ढूँढना ), ५. लेष्य ( लेखन कर्म करना ), ६. प्रच्छान ( पच्छ लगाना ), ७. कुट्टन कर्म ( गोदना ), ८. छेद्य ( छेदन करना ), ९. भेद्य ( फोड़ना ), १०. व्यध ( वेधन कर्म ), ११. मन्य ( मथना ), १२. ग्रह ( ग्रहण या चूषण करना ) तथा १३. दाह ( स्नार अथवा अग्नि से जलाना )—ये शस्त्रों एवं अनुशस्त्रों के कर्म हैं। २८ ॥
बक्तव्य—सुश्रुत ने आठ प्रकार का शस्त्रकर्म कहा है—छेद्य, भेद्य, लेष्य, वेध्य, एष्य, आहार्य, विघ्नव्य तथा सीव्य। देखें—सु.सू. ५।५। इस दृष्टि से महर्षि वाग्भट ने उत्साटन, कुट्टन, मन्थन, ग्रहण और दाहन कर्म अधिक माने हैं। भगवान् आर्ये ने पाटन, व्यधन, छेदन, लेपन, प्रच्छन तथा सीवन ये छः शस्त्रकर्म कहे हैं। देखें—च.चि. २५।५५। वास्तव में यह आचार्यों का उत्कृष्टवैचित्र्य ही है।
कुण्डखण्डतनुस्थूलहृस्वदीर्घत्ववक्रताः ॥ २९ ॥
शस्त्राणां खरधारत्वमष्टौ दोषाः प्रकीर्तिताः ।
शस्त्रों के आठ दोष—शस्त्रों के ये आठ दोष हैं—१. कुण्डता ( तेज न होना ), २. खण्ड ( टूट जाना ), ३. तनु ( पतलापन ), ४. स्थूल ( आवश्यकता से अधिक मोटा होना ), ५. हृस्व ( प्रमाण से छोटा होना ), ६. दीर्घत्व ( प्रमाण से लम्बा होना ), ७. वक्रता ( टेढ़ापन ) तथा ८. खरधारत्व ( धार में खुरदरापन ) होना ॥ २९ ॥
बक्तव्य—शस्त्रों में 'करपत्र' का भी वर्णन है और इसका 'खरधारत्व' गुण है। अतएव भगवान् धन्वन्तरि की स्पष्टवादिता पर ध्यान दें—'अतो विपरीतगुणमादौत, अन्यत्र करपत्रात्' ( सु.सू. ८।९१ )
छेदभेदनलेष्यार्थं शस्त्रं वृत्तफलान्तरं ॥ ३० ॥
तर्जनीमध्यमाइगुष्टैर्गृहीत्यात्सुसमाहितः । विघ्नावणानि वृत्ताग्रे तर्जन्त्यइगुष्ठकेन च ॥ ३१ ॥
तलप्रच्छन्नवृत्ताग्रं प्राह्यं ब्रीहिमुखं मुखे । मूलेष्वाहरणार्थानि क्रियासौकर्यतोऽपरम् ॥ ३२ ॥
शस्त्रग्रहण-विधि—छेदन, भेदन तथा लेखन कर्म करते समय शस्त्र को फल के अन्त एवं वृत्त ( मूठ ) के मध्यभाग को तर्जनी-मध्यमा अँगुलियों तथा अँगूठा से सावधान होकर पकड़ना चाहिए। विघ्नावण कर्म करते समय शस्त्र को वृत्त ( मूठ ) के अगले भाग में तर्जनी एवं अँगूठे से पकड़ना चाहिए। ब्रीहिमुख शस्त्र को मुख पर तर्जनी अँगुली तथा अँगूठा से पकड़ कर उसके वृत्त ( बेंट या मूठ ) को हाथ के तलुवे से ढाककर शस्त्रकर्म करना चाहिए। आहरण कर्म के लिए शस्त्र को मूलभाग में ग्रहण करना चाहिए। शेष कर्मों में शस्त्र को जहाँ पकड़ने से शस्त्रकर्म करने में सरलता हो वहाँ पकड़कर शस्त्रकर्म करना चाहिए ॥ ३०-३२ ॥
बक्तव्य—शस्त्रों के दोषों को दूर करने के लिए सुश्रुत ने 'पायना' तथा 'निशाणन' कर्मों का वर्णन सु.सू. ८।१२-१३ में किया है। शस्त्रों में तीक्ष्णता आदि गुणों का आधान करने के लिए क्षारोदक, सामान्य जल तथा तेल में बुझाया जाता है। यदि इन शस्त्रों को विषैला बनाना हो तो इन्हें विष के घोल में भी बुझाया जाता है। इनके स्पर्श मात्र से घाव होकर पड़ने लग जाता है। लोहा द्वारा इस प्रकार तैयार किये गये शस्त्रों की धार को तेज करने के लिए काले चिकने पत्थर ( कसौटी ) का उपयोग किया जाता है;
शस्त्रविधिप्रध्यायः २६ ]
सूत्रस्थानम्
२८९
आप भी देखें। धार की सही पहचान है—जब वह रोमों को आसानी के काटने लगे तब समझे कि वह तेज हो गयी है। देखें—सु.सू. ८।१४। इसी प्रकार के दोष रहित शस्त्र का प्रयोग करना चाहिए।
स्यात्रवाङ्गुलविस्तारः सुघनो द्वादशाङ्गुलः। क्षौमपत्रोर्णकौशेयदुक्कूलमृदुचर्मजः ॥ ३३ ॥ विन्यस्तपाशः सुस्तृतः सान्तरोर्णास्थशस्त्रकः। शलाकापिहितस्यास्थ्य शस्त्रकोशः सुसन्ध्रयः ॥
शस्त्रकोष का विस्तार—शस्त्रों को रखने की पेट्टी की चौड़ाई ९ अंगुल और लम्बाई १२ अंगुल होनी चाहिए। उसे घना होना चाहिए, जिससे शस्त्र सुरक्षित रहें, एक-दूसरे से टकराये नहीं; घन का यहाँ तात्पर्य है। वह शस्त्रकोष क्षौम (अलसी के तारों का बना हुआ) का, पत्तों का, ऊनी कपड़े का, कौशेय (रेशमी वस्त्र) का, सामान्य वस्त्र का अथवा मुलायम चमड़े का बनाया जाना चाहिए। उसमें भीतर से पेट्टी लगी हुई हो, अच्छी प्रकार सिला गया हो, प्रत्येक शस्त्र दूर-दूर में ऊन के वस्त्र से लपेट कर रखा गया हो तथा शलाकाओं से इनका मुख ढका रहना चाहिए। यह शस्त्रकोष (पेट्टी) नाई की पेट्टी के समान इधर-उधर ले जाने योग्य हो ॥ ३३-३४ ॥
जलोत्कसस्तु सुखिनां रक्तप्रावाय योजयेत्।
जोंकों का प्रयोग—सुख से जीवन-यापन करने वालों (सुकुमारों) का रक्तप्रावण करने के लिए जोंकों का प्रयोग करना चाहिए।
दुष्टाम्बुमत्स्यभेकाहिशबकोधमलोद्भवः ॥ ३५ ॥
रक्ताः श्वेता भृशं कृष्णाश्चपलाः स्थूलपिच्छलाः। इन्द्रायुधविचित्रोर्वर्धराजयो रोमशाश्च ताः ॥ सविद्या वर्जयेत्—
त्याज्य जोंकों का वर्णन—जो जोंकें दूषित जल में अथवा मछली, मेंढक, सांप आदि प्राणियों के शवों की सड़न से अथवा उनके मल-मूत्रमिश्रित कीचड़ में से पैदा होती हैं, जो लाल, सफेद, अधिक काली, चंचल, मोटी अर्थात् आकार में बड़ी तथा चिपचिपी होती हैं, जिनकी पीठ पर इन्द्रधनुष के आकार की विचित्र ऊपर की ओर रेखाएँ होती हैं एवं जिनके शरीर के ऊपर रोएँ होते हैं वे जोंकें जहरीली होती हैं; उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३५-३६ ॥
—ताभिः कण्टूपाकज्वरप्रमाः। विषपिताम्रनुत्कार्य तत्र—
त्याज्य जोंकों का निषेध—उक्त प्रकार की जोंकों का यदि रक्तविप्रावण में उपयोग किया जाता है, तो खुजली, पाक (पकना), ज्वर, चक्करों का आना आदि उपद्रव हो जाते हैं। इस स्थिति में विषनाशक, पित्तशामक तथा रक्तशोधक चिकित्सा करनी चाहिए।
—शुद्धाम्बुजाः पुनः ॥ ३७ ॥
निर्विषाः शैवलक्षयावा वृत्ता नीलोर्व्वराजयः। कषायपृष्टास्तन्वङ्ग्यः किञ्चित्पीतोदराश्च याः ॥
ग्राह्य जोंकों का वर्णन—जो जोंकें साफ जल में पैदा होती हैं, वे निर्विष होती हैं। उनका वर्ण सिंवार के सदृश साँवला तथा शरीर लम्बा एवं गोल होता है। उसके ऊपर नीली रेखाएँ ऊपर की ओर की होती हैं। उनकी पीठ का रंग बरगद वृक्ष की छाल का जैसा होता है। ये पतले आकार की होती हैं और इनके पेट का वर्ण कुछ पीताभ होता है ॥ ३७-३८ ॥
ता अय्यसम्यक्वमनात् प्रततं च निपातनात्। सीदन्तीः सलिलं प्राप्य रक्तमत्ता इति त्यजेत् ॥ ३९ ॥
त्याज्य जोंकों के लक्षण—वे अच्छी अर्थात् उपयोग में लाने योग्य जोंकें भी यदि रक्तपान कराने के बाद उन्हें भलीभाँति वमन न कराया गया अथवा रक्तचूषण के लिए उन्हें बार-बार लगाने के बाद जब पानी में डाला जाता है और वे दुःखी जैसी प्रतीत होती हैं तो वे रक्तपान करने से मदमत्त हो गयी हैं, ऐसा समझकर उन्हें छोड़ दें ॥ ३९ ॥
१९ अ० हू०
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अष्टाङ्गहृदये
अथेतरा निशाकलकमुक्तेऽस्मसि परिप्लुताः । अवन्तिसोमे तत्रे वा पुनश्चाभ्रासिता जले ॥ ४० ॥ लागयेद्दत्तमुत्तन्तरक्तशस्त्रनिपातनैः । पिवन्तीरत्रतस्कन्धाश्चन्नादयेन्मुदुवाससा ॥ ४१ ॥
जोंक रखने एवं लगाने की विधि—तदनन्तर जो जोंक निर्विष हो उन्हें हल्दी के कल्क से मिले हुए जल से अथवा अवन्तिसोम (काँजी) से या मठा से नहलाकर उसे पानी में छोड़ दें, जिससे वे आश्चर्य हो जायें। यदि वे मनुष्य के शरीर को नहीं पकड़ रही हों तो उस स्थान पर घी, मिट्टी, स्त्री का दूध या रक्त लगा दें अथवा शस्त्र द्वारा पच्छ लगा दें तब वह पकड़ लेगी। जब वह अपने कन्धे को ऊपर की ओर को उठा ले, तो समझ लें वह रक्तपान कर रही है, इस स्थिति में उसे कोमल वस्त्र से ढक देना चाहिए ॥ ४०-४१ ॥
वक्तव्य—सुश्रुतसंहिता-सूत्रस्थान के सम्पूर्ण १३वें अध्याय का भलीभाँति अनुशीलन करें, इसका नाम 'जलीकावचारणीय' है। इसमें उक्त विषय का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
सम्भुक्तादुष्टशुद्धाघ्राज्जलीका दुष्टशोणितम् । आदत्ते प्रथमं हंसः क्षीरं क्षीरोदकादिष्व ॥ ४२ ॥ (गुल्माशौचित्विद्रधीन् कुष्ठवातरक्तगलामयान् । नेत्ररुचिष्ववीसर्पान् शमयन्ति जलीकसः ॥ १ ॥)
दुष्ट रक्तग्रहण-दृष्टान्त—मिले हुए दूषित तथा शुद्ध रक्त में से पहले जोंक दूषित रक्त को चूसती है। जैसे—मिले हुए दूध तथा जल में से हंस पक्षी पहले दूध को पीता है ॥ ४२ ॥ (जोंक लगाने पर जो वह रक्त का आचूषण करती है, उससे गुल्म, अर्ध, विद्रधि (बड़े फोड़े), कुष्ठ, वातरक्त, गल सम्बन्धी रक्त रोग, नेत्रपीड़ा, विषज विकार तथा विसर्पयोग शान्त हो जाते हैं ॥ १ ॥)
वक्तव्य—उक्त दृष्टान्त से यह ज्ञात होता है कि जैसे हंस केवल दूध पी लेता है और जल छोड़ देता है, वैसे ही जोंक भी दुष्ट रक्त का पान कर शुद्ध रक्त को छोड़ देती है। परन्तु यहाँ ऐसी बात नहीं है। आप देखें—'दंशे'...'वकिरेत्' ॥ (सू.सू. १३।२१) अर्थात् विशुद्ध रक्त के पीने पर दंशस्थान पर पीड़ा, खजली आदि लक्षणों को देखकर समझ लेना चाहिए कि यह शुद्ध रक्त का पान कर रही है। इस स्थिति में इसे हटा देना चाहिए। हंस भी तो पानी पीता ही है।
कभी-कभी जोंक के काट लेने पर बहुत रक्तप्राव होने लगता है। इसका कारण है—जोंक के सिर में कई छोटी-छोटी गठि होती हैं, जिनका रस उसके दंशस्थान में पहुँच जाता है। इस रस में हीरुडीन (Hirudin) नामक द्रव्य होता है। जब इसका रक्त में मिश्रण हो जाता है तो रक्त जल्दी जमता नहीं, अतः वह बहता रहता है।
दंशस्थ तोये कण्डुवां वा मोक्षयेत्—
जोंक छुड़ाने की स्थिति—जहाँ जोंक लगी हो अर्थात् रक्त चूस रही हो, वहाँ यदि सूरि चुभाने की-सी पीड़ा हो अथवा खजली हो रही हो तो उसे छुड़ा दें—
—वामयेच्च ताम् । पटुतैलात्कवदानां श्लक्षणकण्डनरुपिताम् ॥ ४३ ॥
जोंक का उपचार—तोद एवं कण्डु लक्षणों से यह समझना चाहिए कि वह शुद्ध रक्त पी रही है। अतः उसे हटा दें, यदि वह न छोड़े तो दंशस्थान पर नमक का चूर्ण बुरक दें और उसके मुख पर तेल लगा दें, इससे वह छोड़ देती है। उसके बाद उसके शरीर पर चावल का चूर्ण डाल कर उसे भलीभाँति व्रमन कराना चाहिए ॥ ४३ ॥
रक्षन् रक्तमदाद्रूपः ससाहं ता न पातयेत् ।
रक्तमद से रक्षा—समुचित व्रमन न कराने पर जोंकों को 'रक्तमद' नामक विकार हो जाता है, इससे जोंकों की रक्षा करनी चाहिए। इस प्रकार एक बार लगाने के बाद फिर उस जोंक को एक सप्ताह तक नहीं लगाना चाहिए।
शस्त्रविधिरध्यायः २६ ]
सूत्रस्थानम्
२९१
पूर्ववत् पटुता दादर्घ सम्यग्वान्ते जलौकसाम् ॥ ४४ ॥
रक्तवमन का सम्यग्योग—वमन का सम्यक् योग हो जाने पर जोंकों में पहले की भाँति कुशलता तथा दृढ़ता ( सबलता ) प्राप्त हो जाती है ॥ ४४ ॥
कलमोऽतियोगान्मृत्युर्वा—
रक्तवमन का अतियोग—वमन का अतियोग हो जाने पर जोंकों में कलम ( मुस्ती या हर्षक्षय ) हो जाता है अथवा वे मर जाती हैं।
—दुर्वान्ते स्तन्धता मदः ।
रक्तवमन का मिथ्यायोग—वमन का मिथ्यायोग हो जाने पर जोंकों में स्तन्धता ( इधर-उधर घूमने-फिरने में रुकावट ) तथा उन्हें 'रक्तमद' नामक असाध्य रोग हो जाता है, जिससे प्रायः उनकी मृत्यु भी हो जाती है।
अन्यत्रान्यत्र ताः स्थाप्या घटे मृत्तान्मृगभिर्णि ॥ ४५ ॥
लालादिकोयनाशार्थ, सविषाः स्युस्तदन्वयात् ।
जलौकापालन-विधि—जोंकों को उनके स्थानों से लाकर शुद्ध जल में या तालाब के जल में मिट्टी मिलाकर अलग-अलग मिट्टी के घड़ों में रख दें। इनके खाने के लिए सिवार, जलचर प्राणियों के सूखे मांस और कन्दों के चूर्ण दें, सोने के लिए कमलपत्र आदि उसमें डाल दें। तीसरे-तीसरे दिन इस पानी को बदल दें और भोजन-पदार्थ उस जल में डाल दें। सब को अलग रखने का प्रयोजन—इससे जोंकों के परस्पर लालाभाव की सङ्गन नहीं हो पायेगी, क्योंकि लालाभाव के संयोग से ये विषैली हो जाती हैं ॥ ४५ ॥
अशुद्धौ स्रावयेदंशान् हरिद्रागुडमाक्षिकैः ॥ ४६ ॥
जलौकावचारण-पश्चात्कर्म—जोंक को हटा लेने पर भी दंशस्थान से यदि रक्तस्राव हो रहा हो तो रक्त के शुद्ध-अशुद्ध का विचार कर लें। यदि वह दूषित रक्त हो तो उसे बहने दें और उसे बहने देने में हल्दी, गुड़ तथा मधु लगाकर सहायता करें, जिससे वह दूषित रक्त पूर्ण रूप से निकल जाय ॥ ४६ ॥
शतधौताज्यपिचवस्ततो लेपाश्च शीतलाः ।
रक्तावरोधक उपचार—यदि शुद्ध रक्त दंशस्थान से बह रहा हो ( जैसा हमने श्लोक ४९ के वक्तव्य में कहा है ) तो शतधौत घृत के पिचुओं को उन दंशस्थानों में रखें और शीतवीर्यरोपण पदार्थों से निर्मित लेपों को उन स्थानों पर लगायें। इनके प्रयोगों से रक्तस्राव रुक जाता है।
दुष्टरक्तापगमनात् सद्यो रागरुजां शमः ॥ ४७ ॥
रक्तस्रावण का फल—दूषित रक्त के निकल जाने से रोगी की पीड़ाओं तथा उस स्थान पर दिखलायी पड़ने वाली लालिमा का तत्काल शमन हो जाता है ॥ ४७ ॥
अशुद्धं चलितं स्थानात्स्थितं रक्तं ब्रणाशये । व्यस्तीभवत्पर्युषितं तस्मात्तस्त्रावयेत्युनः ॥ ४८ ॥
पुनः रक्तस्रावण—यदि अशुद्ध ( दूषित ) रक्त रणस्थान से विचलित होकर जोंक द्वारा किये गये वाव पर आकर रुक गया हो तो वहाँ आया हुआ वह रक्त बासी होकर खट्टा हो जाता है, अतः उसे पुनः तीसरे दिन जोंक लगाकर निकलवा देना चाहिए ॥ ४८ ॥
युज्यान्नालालाबुघटिका रक्ते पिसेन दूषिते । तासामनलसंयोगात्—
अलालाबुघटिप्रयोग-निषिद्ध—पित्तदोष द्वारा दूषित हुए रक्त का स्रावण करने के लिए अलालाबुघटिका ( तुम्बी ) यन्त्र का प्रयोग न करें, क्योंकि उसके प्रयोग में अग्निसंयोग किया जाता है।
२१२
अष्टाङ्गहृदये
—युज्यात् कर्कवायुना ॥ ४९ ॥
अलाबूयन्त्र-प्रयोग विहित—यदि कफ एवं वात दोष से दूषित रक्तधातु को निकालना हो तो उसमें अलाबूयन्त्र का प्रयोग करें ॥ ४९ ॥
कफेन दुष्टं रुधिरं न शृङ्गेण विनिर्हरेत्। स्कन्धत्वात्—
शृंगयन्त्रप्रयोग-निषेध—कफदोष से दूषित रक्तधातु जम जाता है, अतएव इसका निर्हरण भी शृंगयन्त्र से नहीं करना चाहिए। क्योंकि इसमें अग्निसंयोग का अभाव रहता है, अतः कफ पिघल नहीं सकता।
वक्तव्य—विशेष परिस्थिति के लिए देखें—अ.हृ.सू. २५।२७।
—वातपिताभ्यां दुष्टं शृङ्गेण निर्हरेत् ॥ ५० ॥
शृंगयन्त्रप्रयोग-निर्देश—वातदोष तथा पित्तदोष से दूषित रक्त का निर्हरण शृंगयन्त्र द्वारा करना चाहिए ॥ ५० ॥
गात्रं बद्धवोपरि वृद्धं रज्जा पट्टेन वा समम्। स्नायुसन्ध्यस्थिमर्माणि त्यजन् प्रच्छानमाचरेत् ॥
अधोदेशप्रविसृतेः पदरूपरिगामिभिः। न गाढघनतिर्यभिर्न पदे पदमाचरन् ॥ ५२ ॥
प्रच्छाननैकदेशस्थं ग्रथितं जलजन्मभिः। हरेच्छृङ्गादिभिः सुसप्तसृग्यापि शिराव्यष्टिः ॥ ५३ ॥
प्रच्छानकर्म-निर्देश—प्रच्छान कर्म अर्थात् पच्छ लगाने की विधि—यदि शाखाओं ( हाथ-पैरों ) से पच्छ लगाकर रक्त निकालना हो तो उस स्थान से ५-७ अंगुल ऊपर के अवयव को रस्सी या पट्टी से कसकर बाँधकर तब पच्छ लगाना चाहिए। ध्यान रहे, यह प्रच्छानकर्म स्नायु, सन्धि तथा अस्थि मर्मों के स्थानों को छोड़कर ही लगाना चाहिए। पच्छ लगाते समय नीचे भाग से ऊपर की ओर को पद करने चाहिए। वे ( पद ) न बहुत गहरे हों, न पास-पास में हों, न तिरछे हों और न पद के ऊपर दूसरा पद ( शस्त्र द्वारा घाव ) बनाना चाहिए। एक स्थान स्थित रक्त को पच्छ लगाकर, ग्रन्थि तथा अर्बुद आदि के गठीले रक्त को जोक लगाकर, जहाँ का रक्त सुन्न पड़ गया हो, उसे शृंगयन्त्र द्वारा और सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए दूषित रक्त को सिरावेध द्वारा निकालना चाहिए ॥ ५१-५३ ॥
प्रच्छानं पिण्डिते वा स्यात्—
प्रच्छान आदि का विकल्प—पिण्डित ( गाढ़े ) रक्त में प्रच्छान क्रिया अर्थात् पच्छ लगाना चाहिए।
—अवगाढे जलोक्तसः ।
जलोक्ता-प्रयोग—अवगाढ अर्थात् गम्भीर रक्त में जोक को लगाकर रक्त-निर्हरण करना चाहिए।
त्वकस्येऽलाबुघटीशृङ्गम्—
तुम्बी एवं शृंगी यन्त्र—त्वचागत रक्त को निकालने में पच्छ लगाकर तुम्बीयन्त्र और शृंगीयन्त्र का प्रयोग करना चाहिए।
वक्तव्य—प्रच्छान कर्म सामान्य-विशेष भेद से दो प्रकार का होता है—१. सामान्य खुरचना और २. विशेष छुरा ( उत्तरा ) आदि से गहरा घाव बनाना।
—शिरैव व्यापकेऽसुजि ॥ ५४ ॥
सिरावेध-प्रयोग—सम्पूर्ण शरीर में दूषित रक्त के फैल जाने पर सिरामोक्षण अर्थात् सिरावेध का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५४ ॥
शस्त्रविधिर्ध्यायः २६ ]
सूत्रस्थानम्
२९३
वातादिधाम वा भृङ्गजलीकोलावृषिः क्रमात् ।
रक्तप्रावणविधि-विकल्प—वातदूषित रक्त का शृंगीयन्त्र द्वारा, पित्तदूषित रक्त का जोंक द्वारा तथा कफदूषित रक्त का अलाबु ( तुम्बी ) यन्त्र द्वारा रक्तप्रावण करना चाहिए।
सुतासृजः प्रदेहाद्यैः शीतैः स्याद्वायुकोपतः ॥ ५५ ॥
सतोदकण्डूः शोफस्तं सर्पिषोष्णेन सेचयेत् ।
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुतुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने शस्त्रविधिर्नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
रक्तप्रावण में उपद्रव एवं शान्ति—रक्तप्रावण कर्म करने के बाद भी जब रक्त निकलता रहता है तो उसे रोकने के लिए शीतल लेप आदि का प्रयोग करने से कभी वात प्रकुपित हो जाता है, तब उस स्थान पर तोद, कण्डू, सूजन आदि उपद्रव हो जाते हैं। उनकी शान्ति के लिए उस स्थान पर गुनगुने घी का सेचन करना चाहिए ॥ ५५ ॥
वक्तव्य—इस प्रकार की वेदनाओं की शान्ति का उपाय भगवान् धन्वन्तरि ने सु.सू. ५।४१ में दिया है, देखें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में शस्त्रविधि नामक छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २६ ॥
सप्तविंशोऽध्यायः
अथातः सिराव्यधविधिमध्येयां व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से सिराव्यध (सिरावेध) विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —इसके पहले अध्याय में अलानु (तुम्बी), भुंगी, जलौका (जोंक) तथा पच्छ लगाना आदि विधियों द्वारा रक्तावसेचन (रक्तनिर्हरण अथवा रक्ताहरण) के उपायों का वर्णन किया था, उसी क्रम में आने वाले सिरावेध-विधि का स्वतन्त्र वर्णन प्रस्तुत अध्याय में किया जा रहा है, क्योंकि इसका विषय अधिक विस्तृत है।
वात आदि दोषों द्वारा दूषित रक्तधातु जब कभी रोगोत्पत्ति का प्रधान कारण हो जाता है, तब रक्तघाव किया एवं कराया जाता है और सिरावेध रक्तस्त्रावण की प्रमुख विधि है। पञ्जाब आदि देशों में जहाँ रक्तसार मनुष्य होते हैं, वहाँ वमन-विरेचन की भाँति सिरावेध भी कराया जाता है। ऋतुचर्या के क्रम में जहाँ सिरावेध कराया जाता है उसका उत्तम काल है—शरद ऋतु। ध्यान रहे, जहाँ रक्तविकार में सिरावेध कराने में किसी प्रकार की बाधा प्रतीत होती है, वहाँ विरेचन कराने से भी लाभ होता है, फिर भी रक्तजनित विकारों की सिरावेध उत्तम चिकित्सा कही गयी है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सु.सू. १४; सु.शा.८; च.सू. २४ तथा अ.सं.सू. ३६ में देखें।
मधुर लवणं किञ्चिदशीतोष्णमसंहृतम्। पञ्चन्द्रगोपहेमाविशशलोहितलोहितम् ॥ १ ॥ लोहितं प्रभवः शुद्धं, तनोस्तेनैव च स्थितिः।
शुद्ध रक्त का वर्णन —शुद्ध रक्त का परिचय—यह मधुररस युक्त, हल्का नमकीन, समशीतोष्ण, असंहत अर्थात् गाँठरहित (द्रवरूप), कमल की पंखुड़ी, इन्द्रगोप (बीरबहटी), तपाये गये सोने तथा अवि, शश (भेड़ एवं खरगोश) के रक्त के सद्गुण लाल वर्ण वाले रक्त को शुद्धरक्त कहते हैं। (हम शब्द से कुछ आचार्य 'मजीठ' का ग्रहण करते हैं।) इसी रक्त से शरीर स्थित (स्वस्थ) रहता है ॥ १ ॥
वक्तव्य —रक्त के पर्याय—लाल वर्ण वाला होने से इसे 'रक्त', इसमें लोहधातु के पाये जाने से इसे 'लोहित', गतिशील होने से इसे 'शोणित' तथा शरीर में घाव लगने पर दिखलायी देने के कारण इसे 'क्षतज' कहा जाता है। ऊपर इसे सोने के समान वर्ण वाला कहा गया है, यद्यपि सामान्य सोना पीला दिखता है किन्तु जब इसे तपाया जाता है, तब इसका वर्ण हल्का लाल हो जाता है। अतएव सुवर्ण का एक नाम 'तपनीय' भी है। जैसा कि भगवान् आत्रेय ने च.सू. २४२२ में कहा है। ऊपर शुद्ध रक्त को मधुर कहा है, यही कारण है कि उसे कुत्ता भी चाटता है, अशुद्ध को नहीं। भगवान् धन्वन्तरि ने इस शरीर का मूल आधार रक्त को ही माना है, अतएव इसकी रक्षा करनी चाहिए। इस बात को कहने के लिए उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि—'रक्त ही जीव है'। देखें—सु.सू. १४४४।
तत्तिस्त्वलेष्मलैः प्रायो दूष्यते—
रक्तदूषक तत्त्व —वह शुद्ध रक्त प्रायः पित्तदोष तथा कफदोष को बढ़ाने वाले आहार-विहारों के सेवन से दूषित हो जाता है।
सिराव्यवधिरेखायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
२९५
—कुर्वते ततः ॥ २ ॥
विसर्पविद्रधिष्ठीहगुल्माग्रिसदनज्वरान् । मुवनेत्रशिरोरोगमदतुङ्गलवणास्पत्याः ॥ ३ ॥ कुष्ठवातास्रपित्तास्रकन्दम्लोद्विरणघ्रमान् । शीतोष्णस्निग्धरूक्षार्चरूपक्रान्ताश्च ये गदाः ॥ ४ ॥ सम्यक्साध्या न सिध्यन्ति ते च रक्तप्रकोपजाः ।
रक्तज रोग—इस प्रकार दूषित हुआ वह रक्तधातु विसर्प, विद्रधि, प्लीहाविकार, गुल्मरोग, अग्रिमान्द्य, ज्वर, मुखरोग, नेत्ररोग, शिरोरोग, मद, तुषा, मुख का नमकीन बना रहना, कुष्ठरोग, वातरक्त, पित्तरक्त या रक्तपित्त, कडुवें एवं खट्टे इकारों का आना, वमन तथा चक्करों का आना—इन रोगों को उत्पन्न कर देता है। और जो सम्यक्साध्य रोग शीत, उष्ण, स्निग्ध तथा रूक्ष उपचारों के करने पर भी शान्त नहीं हो पाते वे रोग भी रक्तदोष के प्रकोप से उत्पन्न हुए हैं, ऐसा समझ लेना चाहिए ॥ २-४ ॥
बक्तव्य—उक्त रक्तज रोगों की चिकित्सा रक्तशोधक औषध-द्रव्यों के प्रयोग से करें। यदि इनसे भी लाभ न हो तो सिरावेध द्वारा रक्तस्रावण कराना चाहिए।
तेषु स्रावयितुं रक्तमुद्रिक्तं व्यधयेत्सिराम् ॥ ५ ॥
सिरावेध का निर्देश—उक्त रक्तज रोगों में विकारयुक्त अतएव उभड़े हुए रक्त को निकालने के लिए निम्नलिखित विधि से सिरावेध कराना चाहिए ॥ ५ ॥
न तूनपोडशातीतससत्यब्धुतासृजाम् । अस्निग्धास्वेदितारत्यर्थस्वेदितानिलरोगिणाम् ॥ ६ ॥ गर्भिणीसूतिकार्जोणपित्तास्रभासकासिनाम् । अतीसारोदरच्छर्दिपाण्डुसर्वाङ्गशोफिनाम् ॥ ७ ॥ स्नेहपीते प्रयुक्तेषु तथा पञ्चसु कर्मसु । नायन्त्रितां सिरां विध्वेन्न तिर्यङ्नायन्युत्थिताम् ॥ ८ ॥ नातिशीतोष्णवाताम्ब्रेष्वन्यत्रात्ययिकाद्वादात् ।
सिरावेध-विधि—सिरावेध में आयुसीमा—१६ वर्ष की अवस्था से पहले और ७० वर्ष की अवस्था के बाद सिरावेध नहीं कराना चाहिए। जिनका अन्य कारणों से रक्त निकल चुका हो, जिनका स्नेहन तथा स्वेदन न किया गया हो अथवा जिनका अधिक स्वेदन हो गया हो, जो वातरोगी हों, गर्भिणी, सूतिका, अजीर्णरोगी, रक्तपित्त के रोगी, श्वास, कास, अतिसार, उदररोगी, छर्दि ( वमन ) रोगी, पाण्डुरोगी, जिनके सम्पूर्ण शरीर में शोथ हो गया हो, जिसने अभी-अभी स्नेहपान किया हो तथा पंचकर्म कराने के तत्काल बाद सिरावेधन नहीं कराना चाहिए। सिरावेध करने के पहले उसे भलीभाँति बाँध देना चाहिए तभी सिरावेध करें अर्थात् बिना बाँधे सिरावेध न करें। टेढ़ी तथा बिना उभरी सिरा का भी वेधन न करें। अधिक शीत तथा अधिक उष्ण कालों में, जब तेज हवा चल रही हो, बादल छाये हों इन स्थितियों में भी सिरावेध न करें। यदि अत्यन्त आवश्यकता हो तो सावधानीपूर्वक सिरावेध कर डालना चाहिए। यहाँ आत्ययिक रोग से तात्पर्य है—जब अन्य विधियों से लाभ न हो रहा हो तो ऐसी स्थिति को आत्ययिक कहते हैं, ऐसे में सिरावेध कर लेना चाहिए ॥ ६-८ ॥
बक्तव्य—सिराव्यन्त्रण की विधि आगे इसी अध्याय के १८ से २२ तक के पद्यों में दी गयी है।
शिरोनेत्रविकारेषु ललाटघां मोक्षयेत्सिराम् ॥ ९ ॥
अपाङ्गद्यामुपनास्यां वा—
रोग-विशेष में सिरावेध—शिरोरोग तथा नेत्ररोगों में माथा पर की सिरा का अथवा अपांगों ( नेत्र के बाहर के कोण की ) अथवा नासिका के समीप की सिरा का वेधन करे ॥ ९ ॥
—कर्णरोगेषु कर्णजाम् ।
कर्णरोग में सिरावेध—कान के रोगों में कान के समीप वाली सिरा का वेधन करना चाहिए।
२९६
अष्टाङ्गहृदये
नासारोगेषु नासाग्रे स्थितां—
नासारोग में सिराबेध—नासारोगों में नासिका के अग्रभाग की सिरा का वेधन करना चाहिए।
—नासाललाटयोः ॥ १० ॥
पीनसे—
पीनसरोग में सिराबेध—पीनस (प्रतिश्याय) रोग में नासिका के अग्रभाग की तथा ललाट (माथा) की सिरा का वेधन करें ॥ १० ॥
—मुखरोगेषु जिह्वाछहनुतालुगाः ।
मुखरोग में सिराबेध—मुख सम्बन्धी रोगों में जीभ, ओष्ठ (होंठ), हनु (ठुंडी) अथवा तालु की सिरा का वेधन करें।
जत्रुर्ध्वग्रन्थिषु ग्रीवाकर्णशङ्खशिरःभ्रिताः ॥ ११ ॥
ऊर्ध्वजत्रु के रोगों में—जत्रुअस्थि के ऊपर की ग्रन्थियों में होने वाले रोगों में ग्रीवा (गरदन), कर्ण, शंख (कनपटी) तथा सिर की सिराओं का वेधन करना चाहिए ॥ ११ ॥
उरोपाङ्गललाटस्था उन्मादे—
उन्मादरोग में—उन्मादरोग में उरसु (छाती), अपांग (आँख का कोण) तथा ललाट की सिरा का वेधन करें।
—ऽपस्मृतौ पुनः ।
हनुसन्धी समस्ते वा शिरां भ्रूमध्यगामिनीम् ॥ १२ ॥
अपस्माररोग में—अपस्माररोग में हनुसन्धि में अथवा सम्पूर्ण हनुप्रदेश की सिराओं में अथवा दोनों भाँहों के बीच में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए ॥ १२ ॥
विद्रघौ पार्श्वशूलं च पार्श्वकक्षास्तनान्तरे ।
विद्रधि तथा पार्श्वशूल में—विद्रधि तथा पार्श्वशूल में पसलियों में, कक्षाओं में तथा स्तनों के बीच में स्थित सिराओं का वेधन करना चाहिए।
तृतीयकेंऽस्योर्मध्ये—
तृतीयकज्वर में—तृतीयकज्वर में दोनों असफलकों के बीच में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
—स्कन्धस्याधश्चतुर्थके ॥ १३ ॥
चतुर्थकज्वर में—चतुर्थकज्वर में दोनों स्कन्धसन्धियों के निचले भाग में सिरावेधन करना चाहिए।
प्रवाहिकायां शूलिन्यां श्रोणितो द्रघङ्गुले स्थिताम् ।
प्रवाहिकारोग में—शूल युक्त प्रवाहिकारोग में किसी एक श्रोणि (नितम्ब या चूतड़) में कमर के नीचे दो अंगुल दूरी पर स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
शुक्रमेद्दामये मेद्रे—
शुक्र एवं शिशन रोगों में—शुक्र सम्बन्धी रोगों में तथा शिशन (पुरुष-मूत्रेन्द्रिय) सम्बन्धी (शूकदोष, उपदंश एवं परिवर्तिका आदि) रोगों में शिशन (लिंग) की सिरा का वेधन करना चाहिए।
—ऊर्गां गलगण्डयोः ॥ १४ ॥
सिराव्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
२९७
गलगण्डरोगं—गलगण्ड (घेघा) तथा गण्डमाला रोगों में ऊष्ममूलगत सिरा का वेधन करना चाहिए ॥ १४ ॥
गृधस्यां जानुनोऽधस्तादूर्ध्वं वा चतुरङ्गुले ।
गृधसीरोगं—गृधसीरोग में जानुसन्धि के चार अंगुल नीचे अथवा चार अंगुल ऊपर में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए ।
इन्द्रबस्तेरधोऽपच्यां द्रघङ्गुले—
अपचीरोगं—अपचीरोग में इन्द्रबस्ति नामक मर्म के दो अंगुल नीचे सिरावेधन करना चाहिए ।
वक्तव्य—इन्द्रबस्ति-मांसमर्म तथा कालान्तर प्राणहरमर्म है, 'पार्णि प्रति जह्नामध्ये इन्द्रबस्तिः' अर्थात् पार्णि (एडी) के ऊपर जंघा के बीच में 'इन्द्रबस्ति' नामक मर्म है। इसी से दूसरी टाँग और बाँह के मर्मों को भी समझ लेना चाहिए। देखें—सु. शा. ६।२४। इसका वर्णन सु.चि. १।८२५ में भी किया है। और देखें—अ.हू.शा. ४।५। गण्डमाला और अपची में भेद है। देखें—सु.नि. १।१११।
—चतुरङ्गुले ॥ १५ ॥
ऊर्ध्वं गुल्फस्य सव्यथर्तौ, तथा क्रोष्टुकशीर्षके ।
प्रमुख वातरोगों में—सविगगत वातज रोगों (खंजता, पंगुता आदि) में और क्रोष्टुशीर्षक रोग में गुल्फ (एडी के ऊपर की गाँठ, टखना या घुट्टी की) सन्धि के चार अंगुल ऊपर सिरावेध करना चाहिए ॥ १५ ॥
पादवाहे खुडे हर्षे विपाद्यां वातकण्टके ॥ १६ ॥
चिप्पे च द्रघङ्गुले विध्येदुपरि क्षिप्रमर्मणः ।
पादवाह आदि में—पादवाह, खुड (वातरक्त) रोग, पादहर्ष, विपादिका, वातकण्टक तथा विष्प नामक नखरोग में क्षिप्र नामक मर्म (अंगुष्ठ एवं अंगुलि के बीच में स्थित) के दो अंगुल ऊपर सिरावेध करना चाहिए ॥ १६ ॥
गृधस्यामिव विश्वाच्यां—
विश्वाचीरोगं—विश्वाचीरोग में गृधसीरोग के समान कूर्पर सन्धि के नीचे या ऊपर चार अंगुल पर सिरावेध करना चाहिए ।
—यथोक्तानामदर्शने ॥ १७ ॥
मर्महीने यथासन्ने देशेऽन्यां व्यधयेत् सिराम् ।
अन्यत्र सिरावेध-निर्देश—ऊपर कहे गये रोगों में निर्दिष्ट सिराएँ उभार युक्त न दिखलायी दें, तो समीप में स्थित एवं मर्मरहित किसी अन्य सिरा का वेधन सावधानी से कर लेना चाहिए ॥ १७ ॥
अथ स्निग्धतनुः सज्जसर्वोपकरणो बली ॥ १८ ॥
कृतस्वस्थयनः स्निग्धरसात्प्रतिभोजितः । अग्रितापातपस्विन्नो जानुच्चासनसंस्थितः ॥ १९ ॥
मृदुपट्टातकेशान्तो जानुस्थापितकूर्परः । मुष्टिभ्यां वस्त्रगर्भाभ्यां मन्ये गाढं तिपीडयेत् ॥ २० ॥
दन्तप्रपीडनोत्कासगण्डाध्माननि चाचरेत् । पृष्ठतो यन्त्रयेच्चैवं वस्त्रमावेष्टयन्नरः ॥ २१ ॥
कन्धरायां परिक्षिप्य न्यस्यान्तर्वाभतर्जनीम् । एषोऽन्तर्मुखवर्ज्यानां सिराणां यन्त्रणे विधिः ॥
सिरायन्त्रण-विधि—सिरावेधन करने के पहले स्वस्तिवाचन आदि मांगलिक कार्य करकर जब उन व्यक्ति (रोगी) का भलीभाँति स्नेहन करना चाहिए और सिरावेधन के उपयोग में आने वाले सभी यन्त्रों (रस्सी, पट्टी, कुठारिका आदि शस्त्र, रक्तप्रावक तथा रोधक औषध-द्रव्य) तैयार रखे जायें हो किन्तु
२९८
अष्टाङ्गहृदये
सिरावेधन करना है, वह बलवान् हो। उसे स्निग्ध रस (मांसरस) युक्त भोजन करा दिया हो, अग्निताप से अथवा आतप (धूप) से उसका स्वेदन कराकर जानुभर ऊँचे आसन (कुर्सी) पर उसे बैठाये। उसके बालों को कोमल वस्त्र से बाँध दें, उसकी दोनों कोहनियों को दोनों घुटनों पर रख दें और दोनों हाथों में कपड़े के टुकड़े देकर मुद्रियाँ बाँधकर उनसे दोनों मन्चाओं (गरदन की दोनों ओर की धमनियों) को जोर से दबाये। इस समय रोगी दाँतों को कसकर दबाये, खाँसने का प्रयत्न न करे और अपने गालों को फुलाये। इसी समय परिच्चारक (कम्माउण्डर) पीठ की ओर खड़ा होकर कपड़े से इसके गला को लपेटता हुआ अपने बायें हाथ की तर्जनी अँगुली को कपड़ा के दोनों भागों के मध्य में रखकर उसके गले को कसकर बाँधे। यह मुख के भीतरी सिराओं के अतिरिक्त शिरःप्रदेश में स्थित सभी शिराओं को उभाड़ने के लिए यन्त्रणविधि कही गयी है। १८-२९॥
बक्तव्य —इस सिरायन्त्रण कार्य में यह सावधानी रखनी चाहिए कि कहीं अधिक रोगी के श्वास-प्रश्वास न रुके। इस प्रकार यन्त्रित कर देने पर रोगी का मुखमण्डल लाल होकर सभी सिराएँ उभरी हुई दिखलायी देती हैं, इसके बाद ही सिरावेध किया जाता है।
ततो मध्यमयाऽङ्गुल्या वैद्योऽङ्गुष्ठविमुक्त्या। ताडयेत्—
सिरावेधन-विधि—समुचित विधि से सिरायन्त्रण कर देने के बाद चिकित्सक अँगूठा द्वारा छटकायी हुई मध्यम अँगुली से निर्दिष्ट सिरा का ताडन करें।
—उत्थितां ज्ञात्वा स्पर्शाद्वाऽङ्गुष्ठपीडनैः ॥ २३ ॥
कुठार्या लक्षयेन्मध्ये वामहस्तगृहीतया। फलोद्देशे सुनिष्कम्पं सिरां, तद्रुच्च मोक्षयेत् ॥ २४ ॥
ताडयन् पीडयंश्चैनां—
कुठारिका-प्रयोग—जब सिरा उभर आये तब उसे मसल कर अथवा अँगूठा से दबाकर उसे और भी उभार लें, उसके बाद बायें हाथ से मूठ पर पकड़ी गयी कुठारिका को उस उठी हुई सिरा के ऊपर रखकर अँगूठा द्वारा छटकायी गयी मध्यम अँगुली से उस कुठारिका पर आघात करें (चोट मारे), जिससे सिरावेध हो जाता है, फिर रक्तध्राव होने दें। २३-२४॥
—विध्येद्व्रीहिमुखेन तु। अङ्गुष्ठेनोन्नमम्याग्रे नासिकामुपनासिकाम् ॥ २५ ॥
उपनासिका-सिरावेध—नासिका के अगले भाग को अँगूठा से ऊपर की ओर उठाकर उपनासिका सिरा का वेधन ब्रीहिमुख नामक शस्त्र से करना चाहिए। २५॥
अभ्युन्नतविदष्टाग्रजिह्वस्याधस्तदाश्रयाम्।
जिह्वा-सिरावेध—जीभ को तालु की ओर ले जाकर उसे दाँतों से दबाकर जीभ के निचले भाग में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
यन्त्रयेत्तनयोर्हर्षं ग्रीवाश्रितसिराव्यधे ॥ २६ ॥ ॥
ग्रीवा-सिरावेध—ग्रीवाप्रदेश में आश्रित सिरा का वेधन करने के लिए दोनों स्तनों के ऊपर की ओर यन्त्रण करें। २६॥
पाषाणगर्भहस्तस्य जानुस्थे प्रसूते भुजे। कुशेराश्व्य मृदिते विध्येद्दोर्ध्वपट्टके ॥ २७ ॥
फिर रोगी दोनों हाथों में पत्थर के टुकड़ों को पकड़कर दोनों भुजाओं को घुटनों के ऊपर रख कर और उन्हें फैलाकर बैठ जाय तथा उसके पेट से लेकर गरदन तक के अंगों को मसला जाय और उसके ऊपर पट्टी बाँध दी जाय, तदनन्तर ग्रीवा में सिरावेध करें। २७॥
बक्तव्य —पेट तथा छाती की सिराओं के वेधन के लिए देखें—‘उदरो’...‘देहस्य’। (सु.शा. ८।८)
सिराव्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
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विध्यैद्वस्तशिरां बाहवाक्वाकुञ्चितकूपैर । बद्ध्वा सुलोपविष्यस्य मुष्टिमङ्गुष्ठगर्भिणम् ॥ २८ ॥ ऊर्ध्वं वेध्यप्रदेशान्च पट्टिकां चतुरङ्गुले ।
बाहु-सिरावेध—बाँह को फैलाकर तथा अँगूठा को बीच में रखकर मुट्ठी बाँधकर सुख (आराम) से बैठे हुए रोगी के बाँह पर वेधन योग्य स्थान से चार अंगुल ऊपर पट्टी बाँधकर सिरावेध करें ॥ २८ ॥
विध्यैदालम्बमानस्य बाहुभ्यां पार्श्वयोः सिराम् ॥ २९ ॥
पार्श्वस्य सिरावेध—बाहुओं के बल से लटकते हुए दाहिने तथा बायें पार्श्व की किसी एक सिरा का वेधन करें ॥ २९ ॥
प्रहृष्टे मेहने—
लिंग का सिरावेध—मेहन (पुरुष-मूत्रेन्द्रिय) के उत्तेजित होने पर इसकी सिरा का वेधन करें।
—जङ्गासिरां जानुन्यकुञ्चिते ।
जंघा-सिरावेध—प्राँनों को फैलाकर जंघा की सिरा का वेधन करना चाहिए।
पादे तु सुस्थितेऽधस्ताज्जानुसन्धेर्निपीडिते ॥ ३० ॥
गाढ़ं कराभ्यामागुल्फं चरणे तस्य चोपरि । द्वितीये कुञ्चिते किञ्चिदारूढे हस्तवत्ततः ॥ ३१ ॥
बद्ध्वा विध्यैस्तिराम्—
पाद-सिरावेध—पैरों को समतल भूमि पर रखकर जानुसन्धि के नीचे से लेकर गुल्फसन्धि तक हाथों से दबाकर उस पैर के ऊपर दूसरे पैर को कुछ मोड़कर रखें और उसे कुछ ऊँचा करके बाँह के सिरावेध की भाँति जहाँ सिरावेध करना है उससे चार अंगुल ऊपर पट्टी बाँधकर सिरावेधन करें। यह पादसिराओं के यन्त्रण-विधि से लेकर सिरावेध तक का वर्णन कर दिया है ॥ ३०-३१ ॥
—इत्यमनुक्तेष्वपि कल्पयेत् । तेषु तेषु प्रदेशेषु तत्तद्यन्त्रमुपायवित् ॥ ३२ ॥
सिरावेध-निर्देश—उक्त निर्देशों के अनुसार उपाय को जानने वाला चिकित्सक शरीर के उन-उन अनुक्त अंगों का बन्धन कर सिरा को उभाड़ कर उसका वेधन करें ॥ ३२ ॥
मांसले निक्षिपेदेशे ब्रीह्यास्य ब्रीहिमात्रकम् । यवार्धमस्मान्मुपरि सिरां विध्यन् कुठारिकाम् ॥
वेध का परिमाण—मांसल शरीर के अवयवों में ब्रीहिमुख नामक शस्त्र से जी के बराबर गहरा घाव बनाना चाहिए। अस्थियों के ऊपर से गई हुई सिरा का वेधन करना हो तो कुठारिका नामक शस्त्र से आधा जी के बराबर गहरा घाव करना चाहिए ॥ ३३ ॥
सम्यविद्वा स्रवेद्वारां यन्त्रे मृक्ते तु न स्रवेत् ।
सम्यक् वेध का वर्णन—सिरावेध समुचित रूप से हो जाने पर उसमें से रक्त की तेज धारा निकलती है और ज्यों ही यन्त्रण (बन्धन) खोल दिया जाता है, फिर रक्त नहीं निकलता या थोड़ा निकलता है।
अल्पकालं वहत्यल्पं, दुर्विद्वा तैलचूर्णनैः ॥ ३४ ॥
सशब्दमतिविद्वा तु स्रवेद् दुःखेन धार्यते ।
दुर्बेध आदि का वर्णन—सिरा का मिथ्यावेध होने पर थोड़ा-सा रक्त थोड़े समय तक बहता है अथवा तैलमिश्रित चूर्णों के प्रयोग करने पर थोड़ा निकलता है। अतिवेध होने पर अत्यन्त शब्द के साथ रक्त बहने लगता है और रोकने का प्रयास करने पर वह (रक्त) रुक पाता है ॥ ३४ ॥
भीमूर्च्छायन्त्रशैथिल्यकुण्ठशस्त्रातितुतयः ॥ ३५ ॥
क्षामत्त्ववैगितास्वेदा रक्तस्यास्रुतिहेतवः ।
३००
अष्टाङ्गहृदये
रक्त न बहने के कारण—भय, मूर्च्छा, यन्त्रण कर्म का ढीलापन, यन्त्र के कुण्ठित होने से सिरा का समुचित वेध न हो पाना, अधिक भोजन करने के बाद सिरावेध करना, शरीर की क्षीणता, मल-मूत्र आदि के वेग की तीव्र प्रवृत्ति तथा सिरावेध के पहले समुचित स्वेदन कर्म का अभाव—ये सभी सिरावेध में से रक्त न निकल पाने में प्रमुख कारण माने गये हैं ॥ ३५ ॥
असम्यगस्ते स्रवति वेत्तव्योषनिशानतैः ॥ ३६ ॥
सागरधूमलवणतैलैर्दिग्वाच्छिरामुखम् ।
रक्तप्रावण के उपाय—यदि सिरावेध करने पर उचित रूप से रक्त न निकल रहा हो तो जिस स्थान पर सिरावेध किया गया है उसके मुखमार्ग पर वायविंडा, साँठ, मरिच, पीपल, हल्दी, तगर, गृहधूम तथा नमक के चूर्ण को तेल में मिलाकर लेप लगा दें ॥ ३६ ॥
सम्यक्प्रवृत्ते कोण्णेन तैलेन लवणेन च ॥ ३७ ॥
जब समुचित ढंग से रक्त निकल रहा हो तो भी सिरामुख में गुनगुना तेल में नमक मिलाकर लेप कर दें। इस उपाय से रक्त के निकलने में कोई बाधा ( हकावट ) नहीं होती ॥ ३७ ॥
अग्रे स्रवति दुष्टाद्यं कुसुम्भादिव पीतिका।
रक्तप्राव का वर्णन—सिरावेध करते ही सबसे पहले दोषदूषित रक्त उस प्रकार निकलता है, जैसे कुसुम्ब के फूलों में से पीला रंग।
सम्यक्प्रवृत्वा स्वयं तिष्ठेच्छुद्धं तदिति नाहरेत् ॥ ३८ ॥
प्रावण-उपायों का निषेध—यदि सिरावेध करने पर उचित मात्रा में दूषित रक्त निकल कर स्वयं रुक जाय तो फिर ऊपर श्लोक ३६-३७ में कहे गये रक्तप्रावण के उपायों का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्वयं रक्तप्राव के रुक जाने के बाद उक्त प्रयत्न करने पर जो रक्त निकलेगा वह शुद्ध रक्त होगा, उसकी रक्षा करें ॥ ३८ ॥
यन्त्रं विमुच्य मूर्च्छायां वीजिते व्यजनैः पुनः । प्रावयेन्मूर्च्छति पुनस्त्वपरेद्युस्थ्यहेऽपि वा ॥ ३९ ॥
मूर्च्छा में कर्तव्य—यदि सिरावेध करते समय रोगी को रक्तदर्शन से मूर्च्छा ( बेहोशी ) आ जाय तो शीघ्र ही बन्धन को खोलकर उसे पंखे से हवा करनी चाहिए, इससे उसकी मूर्च्छा शान्त हो जाती है। इतने पर भी शान्त न हो तो मूर्च्छानाशक अन्य उपाय करें। स्वास्थ्य-लाभ हो जाने पर पुनः सिरावेध करें, यदि फिर मूर्च्छित हो जाय तो दूसरे अथवा तीसरे दिन फिर सिरावेध करें ॥ ३९ ॥
वक्तव्य—रक्तदर्शन का प्रभाव ऐसा होता है कि इससे डरपोक तथा साहसी दोनों भी मूर्च्छित होते देखे जाते हैं। देखें—'वातादिभिः शोणितेन' ( सु.उ. ४६।८ ) अर्थात् छः प्रकार से होने वाली मूर्च्छा में शोणित ( रक्त ) भी अन्यतम कारण होता है। सिरावेध द्वारा साध्य रोगों में इसे कराना आवश्यक होता है। रक्त को देखकर आने वाली मूर्च्छा बार-बार नहीं आती। इससे सम्बन्धित सु.शा. ८।१३-१५ के इन पद्यों का भी परिशीलन अवश्य कर लेना चाहिए।
वाताच्छचावारुणं रुक्षं वेगप्राग्व्यच्छफेनितम् ।
वातदूषित रक्त के लक्षण—वातदोष से दूषित रक्त का वर्ण श्याव तथा अरुण ( ईट के वर्ण का ), रुक्ष, वेग से निकलने वाला, पतला तथा झागदार होता है।
पित्तात् पीतासितं विघ्नमस्कन्दौष्यात्सचन्द्रिकम् ॥ ४० ॥
पित्तदूषित रक्त के लक्षण—पित्तदोष से दूषित रक्त का वर्ण कुछ पीला, कुछ काला, विघ्न ( आमगन्ध वाला ), शीघ्र न जमने वाला, उष्ण होने के कारण चन्द्रिकाओं ( चमकीली रेखाओं ) से युक्त देखा जाता है ॥ ४० ॥