भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

बक्तव्य—अन्य अनुशस्त्रों में इनका भी परिगणन किया जाता है—बांस की खपाची, बबूल के काँटे, गाजवाँ आदि की पत्तियाँ, समुद्रफेन और सूखा गोबर ( कनोपल ) ये सभी शस्त्रक्रिया में उपयोगी होते हैं। यहाँ 'यन्त्रादीनि' पद में आये हुए आदि शब्द से शस्त्रों का भी ग्रहण कर लिया गया है।

उत्साटघपाटघसीव्येष्ट्यलेष्वप्रच्छानकुट्टनम् ॥ २८ ॥

छेद्यं भेद्यं व्यधो मन्यो ग्रहो दाहश्च तत्क्रियाः ।

शस्त्रकर्मा का वर्णन—१. उत्साटघ ( शल्य को निकालना ), २. पाटघ ( चीरना ), ३. सीव्य ( सीना ), ४. एष्य ( घाव कहाँ तक हुआ है, उसे ढूँढना ), ५. लेष्य ( लेखन कर्म करना ), ६. प्रच्छान ( पच्छ लगाना ), ७. कुट्टन कर्म ( गोदना ), ८. छेद्य ( छेदन करना ), ९. भेद्य ( फोड़ना ), १०. व्यध ( वेधन कर्म ), ११. मन्य ( मथना ), १२. ग्रह ( ग्रहण या चूषण करना ) तथा १३. दाह ( स्नार अथवा अग्नि से जलाना )—ये शस्त्रों एवं अनुशस्त्रों के कर्म हैं। २८ ॥

बक्तव्य—सुश्रुत ने आठ प्रकार का शस्त्रकर्म कहा है—छेद्य, भेद्य, लेष्य, वेध्य, एष्य, आहार्य, विघ्नव्य तथा सीव्य। देखें—सु.सू. ५।५। इस दृष्टि से महर्षि वाग्भट ने उत्साटन, कुट्टन, मन्थन, ग्रहण और दाहन कर्म अधिक माने हैं। भगवान् आर्ये ने पाटन, व्यधन, छेदन, लेपन, प्रच्छन तथा सीवन ये छः शस्त्रकर्म कहे हैं। देखें—च.चि. २५।५५। वास्तव में यह आचार्यों का उत्कृष्टवैचित्र्य ही है।

कुण्डखण्डतनुस्थूलहृस्वदीर्घत्ववक्रताः ॥ २९ ॥

शस्त्राणां खरधारत्वमष्टौ दोषाः प्रकीर्तिताः ।

शस्त्रों के आठ दोष—शस्त्रों के ये आठ दोष हैं—१. कुण्डता ( तेज न होना ), २. खण्ड ( टूट जाना ), ३. तनु ( पतलापन ), ४. स्थूल ( आवश्यकता से अधिक मोटा होना ), ५. हृस्व ( प्रमाण से छोटा होना ), ६. दीर्घत्व ( प्रमाण से लम्बा होना ), ७. वक्रता ( टेढ़ापन ) तथा ८. खरधारत्व ( धार में खुरदरापन ) होना ॥ २९ ॥

बक्तव्य—शस्त्रों में 'करपत्र' का भी वर्णन है और इसका 'खरधारत्व' गुण है। अतएव भगवान् धन्वन्तरि की स्पष्टवादिता पर ध्यान दें—'अतो विपरीतगुणमादौत, अन्यत्र करपत्रात्' ( सु.सू. ८।९१ )

छेदभेदनलेष्यार्थं शस्त्रं वृत्तफलान्तरं ॥ ३० ॥

तर्जनीमध्यमाइगुष्टैर्गृहीत्यात्सुसमाहितः । विघ्नावणानि वृत्ताग्रे तर्जन्त्यइगुष्ठकेन च ॥ ३१ ॥

तलप्रच्छन्नवृत्ताग्रं प्राह्यं ब्रीहिमुखं मुखे । मूलेष्वाहरणार्थानि क्रियासौकर्यतोऽपरम् ॥ ३२ ॥

शस्त्रग्रहण-विधि—छेदन, भेदन तथा लेखन कर्म करते समय शस्त्र को फल के अन्त एवं वृत्त ( मूठ ) के मध्यभाग को तर्जनी-मध्यमा अँगुलियों तथा अँगूठा से सावधान होकर पकड़ना चाहिए। विघ्नावण कर्म करते समय शस्त्र को वृत्त ( मूठ ) के अगले भाग में तर्जनी एवं अँगूठे से पकड़ना चाहिए। ब्रीहिमुख शस्त्र को मुख पर तर्जनी अँगुली तथा अँगूठा से पकड़ कर उसके वृत्त ( बेंट या मूठ ) को हाथ के तलुवे से ढाककर शस्त्रकर्म करना चाहिए। आहरण कर्म के लिए शस्त्र को मूलभाग में ग्रहण करना चाहिए। शेष कर्मों में शस्त्र को जहाँ पकड़ने से शस्त्रकर्म करने में सरलता हो वहाँ पकड़कर शस्त्रकर्म करना चाहिए ॥ ३०-३२ ॥

बक्तव्य—शस्त्रों के दोषों को दूर करने के लिए सुश्रुत ने 'पायना' तथा 'निशाणन' कर्मों का वर्णन सु.सू. ८।१२-१३ में किया है। शस्त्रों में तीक्ष्णता आदि गुणों का आधान करने के लिए क्षारोदक, सामान्य जल तथा तेल में बुझाया जाता है। यदि इन शस्त्रों को विषैला बनाना हो तो इन्हें विष के घोल में भी बुझाया जाता है। इनके स्पर्श मात्र से घाव होकर पड़ने लग जाता है। लोहा द्वारा इस प्रकार तैयार किये गये शस्त्रों की धार को तेज करने के लिए काले चिकने पत्थर ( कसौटी ) का उपयोग किया जाता है;