भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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शस्त्रविधिध्यायः २६ ]

सूत्रस्थानम्

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ब्रीहिषक्त्रा धर्तुर्वक्त्रा पक्त्रामाशयमर्मसु ॥ २१ ॥ सा सार्धद्रुघङ्गुला—

पक्त्राशय, आमाशय तथा अन्य मर्मस्थलों को सीने के लिए जिस सूचीशस्त्र (सुई) का प्रयोग किया जाता है, वह अद्वाई अंगुल लम्बा, जो के सदृश मुखबाला और धनुष के सदृश मुड़ा हुआ होता है ॥ २१ ॥

—सर्ववृत्तास्ताश्चतुरङ्गुलाः ।

कूर्चो वृत्तैकपीठस्याः ससाष्टी वा सुबन्धनाः ॥ २२ ॥ स योज्यो नीलिकाव्यङ्गकेशशतेषु कुट्टने ।

कूर्च शस्त्र—इसमें सात अथवा आठ गोल एवं चार अंगुल लम्बी (बाहर की ओर को निकली) सुइयाँ एक सुडील लकड़ी की गोल पीठ में जड़ी हुई, मजबूत बन्धन से बँधी हुई होती हैं। इसी को कूर्च या कूर्चक शस्त्र कहते हैं। इसका प्रयोग नीलिका, व्यंग तथा इन्द्रलुस पर रक्त निकालने के उद्देश्य से कुट्टन (बार-बार कूटना) कर्म के लिए किया जाता है ॥ २२ ॥

बक्तुध्य—विशेष देखें—अ.हू.चि. ८।२९। इसी अध्याय के ९वें पद्य में 'त्रिकूर्चक' शस्त्र का वर्णन आया है। इसी शस्त्र से गोदना गोदा जाता है। कुट्टन का अर्थ है—बार-बार कूटना।

अर्धाङ्गुलमुखैर्वृत्तेरष्टाभिः कण्टकैः खजः ॥ २३ ॥ पाणिभ्यां मध्यमानेन घ्राणातेन हरेदसृक् ।

खज शस्त्र—खज शस्त्र में आधे-आधे अंगुल के गोल मुखों वाले आठ काँटे होते हैं। इस शस्त्र को नासिका के छिद्रों के भीतर डालकर उसे हाथों से मथनी की भाँति मथे, इससे नासिका से रक्त को निकाले ॥ २३ ॥

व्यधनं कर्णपालीनां यूथिकामकुलाननम् ॥ २४ ॥

यूथिका शस्त्र—यूथिका शस्त्र का मुख जूही की कली के सदृश होता है। उसके द्वारा कर्णपालियों का वेधन किया जाता है ॥ २४ ॥

आराऽर्धङ्गुलवृत्तास्या तत्प्रवेशा तथोर्ध्वतः । चतुरस्रा, तथा विध्येच्छोफं पक्त्रामसंशये ॥ २५ ॥ कर्णपालीं च बहूलो—

आरा शस्त्र—इसका मुख आधे अंगुल के घेरे में गोल होता है। इसका प्रवेश भी आधा अंगुल किया जाता है, यह मुख के ऊपरी भाग में चौकोर होता है। इससे व्रणशोथ का उस समय वेधन किया जाता है, जब कि व्रण के सम्बन्ध में यह सन्देह हो कि यह पक चुका है या अभी कच्चा ही है। मोटी कर्णपाली का वेधन भी इसी (आरा शस्त्र) से किया जाता है ॥ २५ ॥

—बहूलायाश्च शस्यते । सूची त्रिभागसुषिरा व्यङ्गुला कर्णवेधनी ॥ २६ ॥

कर्णवेधनी सूची—मोटी कर्णपाली को वेधने के लिए एक और कर्णवेधनी सूची का वर्णन यहाँ किया जा रहा है। यह तीन अंगुल लम्बी तथा इसका एक तिहाई भाग सुषिर (खोलला) होता है ॥ २६ ॥

जलीकःक्षारदहनकाचोपलनखादयः । अलौहान्यनुशस्त्राणि, तान्येवं च विकल्पयेत् ॥ २७ ॥ अपराण्यपि यन्त्रादीन्त्युपयोगं च यौगिकम् ।

अनुशस्त्रों का परिगणन—जीक, क्षार, अग्नि, नुकीले काँच एवं पत्थर तथा नख आदि 'अनुशस्त्र' कहे जाते हैं। इसी प्रकार के और भी अनेक अनुशस्त्र होते हैं, जिनका निर्माण लौहधातु से नहीं किया जाता। उनका प्रयोग भी लौहशस्त्रों की भाँति किया जाता है। इसी प्रकार के अन्य यन्त्रों तथा शस्त्रों का यथोचित उपयोग करना चाहिए ॥ २७ ॥

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