अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
के जैसा होता है। इसकी मुद्रिका प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के अगले पोर में पहनने योग्य होती है। इसमें धागा बांधकर चिकित्सक इससे गले के भीतरी स्रोत में उत्पन्न गलशुण्डी आदि का छेदन तथा भेदन कर्म करता है॥ १३-१५॥
वक्तव्य—अंगुलि शस्त्र को सुश्रुत एवं वृद्धवाग्भट ने 'मुद्रिकाशस्त्र' की संज्ञा दी है।
ग्रहणे शुण्डिकार्मादेर्बिधिं सुनताननम्॥
बधिश्च शस्त्र—बधिश्च शस्त्र का स्वरूप मछली पकड़ने के काँटा के सदृश, उसका अगला भाग कुछ मुड़ा या झुका हुआ होता है। इससे गलशुण्डी ( गले का एक विशेष रोग ), अर्म ( नेत्ररोग-विशेष ) तथा आदि शब्द से प्रतिजिह्निका रोग का ग्रहण अर्थात् छेदन कर्म किया जाता है।
छेदेऽस्त्रं करपत्रं तु खरधारं दशाङ्गुलम्॥ १६॥
विस्तारे द्रघङ्गुलं सूक्ष्मदन्तं सुत्स्वरुबधनम्॥
करपत्र शस्त्र—करपत्र नामक शस्त्र की धार खुरदरी होती है। इसकी लम्बाई १० अंगुल और चौड़ाई २ अंगुल होती है। इसके दाँत बहुत छोटे होते हैं। इसके मूलभाग में पकड़ने के लिए लकड़ी की मूठ बंधी रहती है। इससे हड्डियों का छेदन किया जाता है। इसे लोकभाषा में 'छोटी आरी' कहते हैं॥ १६॥
स्नायुसूत्रकचछेदे कर्तरी कर्तरीनिभा॥ १७॥
कर्तरी ( कैची ) शस्त्र—यह शस्त्र कैची के सदृश होता है। इससे स्नायुतन्तु तथा केश ( बाल ) काटे जाते हैं॥ १७॥
वक्रजुधारं द्विमुखं नखशस्त्रं नवाङ्गुलम्॥ सूक्ष्मशल्योद्वृत्तिच्छेदभेदप्रच्छानलेखने॥ १८॥
नखशस्त्र ( नहरनी )—इसके दोनों ओर मुख होता है। इसमें एक मुख ( धार ) सीधा और दूसरा मुख ( धार ) टेढ़ा होता है। इसकी लम्बाई ९ अंगुल होती है, इसका मध्य भाग गोल होता है। इसका उपयोग—इससे सूक्ष्म शल्य निकाला जाता है तथा छेदन, भेदन, पच्छ लगाना एवं छीलना आदि कर्म किये जाते हैं॥ १८॥
एकधारं चतुष्कोणं प्रबद्धाकृतिं चैकतः। दन्तलेखनकं तेन शोधयेद् दन्तशर्कराम्॥ १९॥
दन्तलेखनक शस्त्र—यह एक धार वाला तथा चार कोनों वाला होता है। इसके एक भाग में मूठ होती है। यह भाग कुछ बड़ा होता है। इसका उपयोग दाँतों में जमी हुई शर्करा को खुरच कर निकालना है॥ १९॥
वृत्ता गूढदृढाः पाशे तिस्रः सूच्योऽत्र सीवने।
सूची शस्त्र—सीवन कर्म ( सिलाई ) के लिए तीन प्रकार के सूचीशस्त्रों ( सुइयों ) का प्रयोग होता है। ये आकार में गोल, गुप्त अर्थात् धागा डालने वाला भाग अधिक चौड़ा नहीं होता तथा मजबूत पाशों ( छेदों ) ( जिनमें धागा पिरौया जाता है ) वाले होते हैं।
मांसलानां प्रदेशानां त्र्यग्ना त्र्यङ्गुलमायता॥ २०॥
मांसल ( अधिक मांस वाले ) स्थानों ( शरीर के अवयवों ) को सीने के लिए जिस सूचीशस्त्र की आवश्यकता होती है, वह तीन किनारों वाली और तीन अंगुल लम्बी होती है॥ २०॥
अल्पमांसास्थिसन्धिस्थव्रणानां द्रघङ्गुलमायता।
थोड़े मांस वाले स्थानों, अस्थियों वाले तथा सन्धियों पर उत्पन्न व्रणों ( घावों ) को सीने के लिए दो अंगुल लम्बा सूचीशस्त्र होना चाहिए।