भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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शस्त्रविधिग्रन्थः २६ ]

सूत्रस्थानम्

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वक्तव्य—यहाँ दो एषणी शस्त्रों का वर्णन किया गया है। इसमें प्रथम एषणी यन्त्र है और दूसरा एषणी शस्त्र है।

वेतसं व्यधने—

वेतस शस्त्र—वेतसपत्रक नामक शस्त्र वेधन (बींधना, टुकरे करना, प्रहार करना) कर्म में प्रयुक्त होता है।

—स्राव्ये शरायास्यत्रिकूर्चके ॥ ११ ॥

शरारिमुख एवं त्रिकूर्चक शस्त्र—शरारि नामक एक लम्बी चाँच वाला पक्षी होता है, उसी की चाँच के आकार का यह शस्त्र होता है तथा त्रिकूर्चक (पहले इस शस्त्र से टीके लगाये जाते थे, इसको गोदने की कूची भी कह सकते हैं।)—ये दोनों शस्त्र स्रावण कर्म में प्रयुक्त होते हैं ॥ ११ ॥

कुशाटावदने स्राव्ये द्रुचङ्गुलं स्यात्तयोः फलम्।

कुशपत्रक एवं आटामुख शस्त्र—कुशपत्रक तथा आटामुख या आटीमुख शस्त्रों का फलभाग दो अंगुल लम्बाई युक्त होता है। उक्त दोनों शस्त्रों का प्रयोग स्रावण कर्म में किया जाता है।

तद्वदन्तर्मुखं तस्य फलमध्यर्धमङ्गुलम् ॥ १० ॥

अर्धचन्द्राननं चैतत्—

अन्तर्मुख शस्त्र—अन्तर्मुख नामक शस्त्र का फल आधे चन्द्रमा के आकार का होता है और उसकी धार का मुख भीतर की ओर होता है। इस शस्त्र के मुख की लम्बाई डेढ़ अंगुल होती है ॥ १० ॥

—तथाऽध्यर्धाङ्गुलं फले।

ब्रीहिक्वन् प्रयोज्यं च तच्छिरोदरयोर्ध्वे ॥ ११ ॥

ब्रीहिमुख शस्त्र—ब्रीहिमुख नामक शस्त्र का फल (धार) डेढ़ अंगुल लम्बा होता है। इसका प्रयोग सिरावेध तथा जलोदर के वेधन में किया जाता है ॥ ११ ॥

वक्तव्य—सिरावेध की विधि देखें—ज.ह.सू. २७।२३ से ३४ तक। अं सं.सू. ३४।२८ में ब्रीहिमुख शस्त्र का अन्यत्र प्रयोग भी देखें।

पृथुः कुठारी गोदन्तसदृशार्धङ्गुलानना । तयोर्ध्वदण्ड्या विध्येदुपर्यस्त्वां स्थितां शिराम् ॥ १२ ॥

कुठारी शस्त्र—कुठारी नामक शस्त्र का आकार गाय के दाँत के समान आधा अंगुल चौड़ा होता है। इसके ऊपरी भाग में कुल्हाड़ी के जैसा बेंट लगा रहता है। इस प्रकार के कुठारी शस्त्र से अस्थि के ऊपर स्थित सिरा का वेध करना चाहिए ॥ १२ ॥

ताम्रौ शलाका द्विमुखी मुखे कुरुबकाकृतिः । लिङ्गनाशं तथा विध्येत्—

ताम्रशलाका शस्त्र—लिंगनाश को वेधने के लिए एक ताँबे की शलाका होती है। इसके दोनों ओर धार होनी चाहिए। इसके दोनों मुख कुरुबक (लाल कटसरेया) के फूल के सदृश होते हैं। इसके द्वारा कफज लिंगनाश (मोतियाबिन्द) का वेधन किया जाता है।

—कुर्यादङ्गुलिशस्त्रकम् ॥ १३ ॥

मुद्रिकानिर्गतमुखं फले त्वर्धाङ्गुलायतम् । योगतो वृद्धिपत्रेण मण्डलाग्रेण वा समम् ॥ १४ ॥

तत्प्रदेशस्थिग्राह्यप्रमाणार्पणमुद्रिकम् । सूत्रबद्धं गलघ्रोतोरोगच्छेदनभेदेन ॥ १५ ॥

अंगुली शस्त्र—अंगुलि नामक शस्त्र का आकार अँगूठी जैसा होता है। इसका मुख आगे की ओर निकला रहता है। इसका फल आधा अंगुल लम्बा होता है। आकार में यह वृद्धिपत्र अथवा मण्डलाग्र शस्त्र