अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—कुछ संस्करणों में आरम्भ से ४ श्लोकों के आगे कहे गये ३ श्लोक नहीं मिलते। प्रसंगोचित होने के कारण यहाँ इनका समावेश क्षेपक के रूप में कर लिया गया है। सुश्रुत ने इन शस्त्रों की संख्या २० दी है। देखें—सू.सू. ८।३। सुश्रुतोक्त शस्त्रों के नाम इस प्रकार हैं—१. मण्डलाग्र (Circular knife या Roundhead knife), २. करपत्र (Saw), ३. वृद्धिपत्र (Scalpel), ४. प्रयताग्र (Abscess knife), ५. नखशस्त्र (Nail pairs), ६. मुद्रिका (Finger-knife), ७. उत्पलपत्र (Lancel), ८. अर्धधार (Single edged knife), ९. सूची (Needle), १०. कुशपत्र (Bistoury), ११. आटीमुख (Tardus ginginiamos), १२. शरीरीमुख (Pair of scissors), १३. अन्तर्मुख (Curved bistoury), १४. त्रिकूर्चक (Brush), १५. कुठारिका (Ave shaped), १६. त्रीहिमुख (Trocar), १७. आरा (Owl like knife), १८. बडिश (Hooks), १९. दन्तशंकु (Tooth pick) तथा २०. एषणी (Sharp proves)।
वाग्भट ने सुश्रुत से अधिक जिन शस्त्रों का वर्णन किया है, वे इस प्रकार हैं—सर्पवक्त्र, शलाका, कर्तरी, सूचीकूर्च, खज एवं कर्णव्यघन। विशेष अष्टाङ्गसंग्रह-सू.अ. ३४ में देखें।
मण्डलाग्रं फले तेषां तर्जन्यन्तर्नखाकृति। लेखने छेदने योज्यं पोथकीशुण्डिकादिषु ॥५॥
मण्डलाग्र शस्त्र —ऊपर कहे गये शस्त्रों में से सर्वप्रथम यहाँ मण्डलाग्र शस्त्र का वर्णन किया जा रहा है। इसके फल (अग्रभाग) का स्वरूप तर्जनी (अँगूठा के बगल वाली) अँगुली के नख के भीतरी भाग के सदृश होता है। इसका उपयोग पोथकी (रोहा) तथा गल्फशुण्डि आदि रोगों के लेखन (छीलना, खुरचना) तथा छेदन (काटना) में होता है ॥५॥
वृद्धिपत्रं झुराकारं छेदभेदनपाटने। ऋज्वग्रमुन्नते शोफे गम्भीरे च तदन्त्यथा ॥६॥ तत्राग्नं पुच्छतो दीर्घहृस्वक्त्रं यथाश्रयम्।
वृद्धिपत्र शस्त्र —वृद्धिपत्र शस्त्र छुरा (उस्तरा) के आकार का होता है, इसका अगला भाग ऋजु (सीधा) होता है। इसका प्रयोग ऊँचे (उभार युक्त) ब्रणशोथ को छेदने, भेदने तथा पाटन (चौरने) कर्म के लिए होता है। इससे विपरीत गम्भीर ब्रणशोथ के छेदने आदि कर्मों के लिए प्रयुक्त होता है। उस वृद्धिपत्र शस्त्र का आकार पीछे की ओर को झुका हुआ तथा ब्रणशोथ की स्थिति के अनुसार लम्बे अथवा छोटे मुखवाला होता है ॥६॥
उत्पलाध्धर्धधाराख्ये भेदने तथा ॥७॥
उत्पल एवं अध्धर्धधारक शस्त्र —उत्पलपत्रक एवं अध्धर्धधारक ये दो शस्त्र भी भेदन, छेदन तथा पाटन कर्म में प्रयुक्त होते हैं ॥७॥
सर्पास्यं घ्राणकर्णार्शश्चछेदनेऽर्धङ्गुलं फले।
सर्पवक्त्र शस्त्र —सर्पास्य (सर्पमुख) नामक शस्त्र के फलभाग की लम्बाई आधा अंगुल होती है। इसका प्रयोग नासिकाछिद्रों तथा कानों के भीतर उत्पन्न अशार्कुरों को काटने के लिए होता है।
गतेरन्वेषणे श्लक्ष्णा गण्डूपदमुखेषणी ॥८॥
१. एषणी शस्त्र —एषणी नामक शस्त्र नाडीब्रण (नामूर) का घाव कहाँ तक हुआ है, इसको ढूँढने के लिए होता है। इसका मुख केंचुए के मुख जैसा होता है, वह एषणी स्पर्श में कोमल होती है ॥८॥
भेदनार्थेऽपरा सूचीमुखा मूलनिविष्ट्वा।
२. एषणी शस्त्र —एषणी नामक दूसरा शस्त्र भेदन कर्म के लिए प्रयुक्त होता है। इसका मुख सूर्य के जैसा तीखा होता है। सूर्य की भाँति उसकी जड़ में भी छिद्र होता है। इसके द्वारा क्षारभावित सूत्र का भगन्दर में प्रवेश किया जाता है।