अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशोऽध्यायः
अथातः शस्त्रविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से शस्त्रविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—इसके पहले अध्याय में यन्त्रों का वर्णन किया जा चुका है, तदनन्तर अब इस अध्याय में शस्त्रों का भेद-उपभेद सहित वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सू.सू. ८ तथा १३ में और अ.सं.सू. ३४ एवं ३५ में देखें। चरकसंहिता में शस्त्रों का वर्णन नहीं किया गया है, तथापि च.वि. २५ में षड्विधि शस्त्रकर्म का उल्लेख श्लोक ५५ से ६० तक किया गया है।
षड्विंशतिः सुकर्मा रैधटितानि यथाविधि। शस्त्राणि रोमबाहीनि ब्राहुत्येनाङ्गुलानि षट् ॥ १ ॥
सुरूपाणि सुधाराणि सुग्रहाणि च कारयेत्। अकरालानि सुधमातसुतीष्णावर्तितेऽयसि ॥ २ ॥
समाहितमुखाग्राणि नीलाम्भोजच्छवीनि च। नामानुगतरूपाणि सदा सन्निहितानि च ॥ ३ ॥
स्वोन्मानाद्यचतुर्थशफलात्येकैकशोऽपि च। प्रायो द्विग्राणि, युञ्जीत तानि स्थानविशेषतः ॥ ४ ॥
( मण्डलाग्रं वृद्धिपत्रमुत्पलाध्यर्द्धधारके। सर्पैषण्यो वेतसाख्यं शरायस्यत्रिकूर्चके ॥ १ ॥
कुशास्यं साटवदनमन्तर्वक्रार्धचन्द्रके ( कम् )। ब्रीहिमुखं कुठारी च शलाकाङ्गुलिशस्त्रके ॥ २ ॥
बडिशं करपत्राख्यं कर्तरी नखशस्त्रकम्। दन्तलेखनकं सूच्यः कूर्चो नाम खजाह्वयम् ॥ ३ ॥
आरा चतुर्विधाकारा तथा स्यात्कर्णवेधनी ( नम् ) ।।
शस्त्रों का वर्णन—सामान्यतः शस्त्रों की संख्या २६ है, जिनका आगे परिगणन किया गया है। इन शस्त्रों का निर्माण कुशल कर्मरों ( कारीगरों ) द्वारा विधिपूर्वक करवाना चाहिए। ये शस्त्र इतने तेज धार वाले हैं जिससे वे रोमों को भी काट सकें, इनकी लम्बाई छः अंगुल होती चाहिए, शस्त्र देखने में सुन्दर ( सुझील ), सुन्दर धार वाले हैं और इनकी मूठ भी अच्छी बनी हो, जिससे वे अच्छी तरह पकड़े जा सकें। इनकी आकृति डरावनी न हो, जिस लोहे से बनाये जायें वह लोहा आग में खूब घमाया ( तपाया ) गया हो और तीक्ष्णायस ( फौलाद ) से बनाये जायें। इन शस्त्रों के मुखाग्र ( फल ) मजबूत हों, इनका वर्ण नीलकमल की आकृति का हो। इन शस्त्रों के आकार आगे वर्णित शस्त्रों के नामों के अनुरूप हों, ये शस्त्र सदा ( चिकित्सकाल में ) चिकित्सक के पास हों। आधे में उसका फल हो और आधे में उसकी मूठ हो। यह दृष्टिकोण प्रत्येक शस्त्र के निर्माण में होना चाहिए। प्रायः स्थान-विशेष के प्रयोग में एक ही प्रकार के दो-तीन शस्त्रों की आवश्यकता पड़ सकती है ॥ १-४ ॥
( छब्बीस शस्त्रों के नाम— १. मण्डलाग्र, २. वृद्धिपत्र, ३. उत्पल, ४. अध्यर्धधारक, ५. सर्प, ६. एषणी, ७. वेतस या वेतसाग्र, ८. शरायस्य, ९. त्रिकूर्चक, १०. कुशास्य, ११. साटवदन, १२. अन्तर्वक्रार्धचन्द्रक, १३. ब्रीहिमुख, १४. कुठारी, १५. शलाका, १६. अंगुलिशस्त्र, १७. बडिश, १८. करपत्र, १९. कर्तरी, २०. नखशस्त्र, २१. दन्तलेखनक, २२. मुर्ध्या, २३. कूर्च, २४. खज ( मथानी ), २५. आरा ( ये चार प्रकार के होते हैं ) तथा २६. कर्णवेधन ॥ १-३ ॥ )