अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 318, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें२८९
अष्टाङ्गहृदये
(इससे क्रोधशत्य निकल जाता है) और हर्ष (इससे शोकशत्य निकल जाता है)—ये १९ अनुयन्त्र हैं। शल्यों को निकालने के उपायों को जानने वाले चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह समय पर अपनी बुद्धि से विचार करके भी अनुयन्त्रों का विभाजन करे; यही उनका उपयोग है॥ ३९-४० ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने इन्हें उपयन्त्र कहा है। देखें—सू. सू. ८।१५।
निर्घातितोन्मथनपूरणमार्गशुद्धिसंयूहनाहरणबन्धनपीडनानि ।
आचूषणोन्नमननामनचालभङ्गव्यावर्तनर्जुकरणानि च यन्त्रकर्म॥ ४१ ॥
यन्त्रों के विविध कर्म—निर्घातन, उन्मथन, पूरण (बस्ति में द्रव का), मार्गशुद्धि, संयूहन (इकट्ठा करना), आहरण, बन्धन, पीडन (दबाना), आचूषण, उन्मन (उठाना), नामन (झुकाना), चालन, भंग (तोड़ना), व्यावर्तन (घुमाना) तथा ऋजुकरण (सीधा करना)—ये सभी कर्म यन्त्रसाध्य होते हैं॥ ४१ ॥
वक्तव्य—वृद्धवाग्भट ने इनके अतिरिक्त ९ यन्त्रकर्मों का परिगणन इस प्रकार किया है—१. विवरण, २. एषण, ३. प्रमार्जन, ४. प्रक्षालन, ५. प्रघमन, ६. विकर्षण, ७. ब्यंजन (व्यक्त करना), ८. अज्जन और ९. दारण—इस प्रकार ये कुल मिलाकर १५ + ९ = २४ यन्त्र हो जाते हैं। देखें—अ.सं.सू. ३४।२०। सुश्रुत ने १२ यन्त्रदोषों का भी उल्लेख किया है। इस प्रसंग में इनका भी अवलोकन कर लेना चाहिए। देखें—सू. सू. ८।१९। वृद्धवाग्भट ने ८ यन्त्रदोषों का वर्णन किया है। देखें—अ.सं.सू. ३४।३३।
विवर्तते साध्वबगाहते च ग्राह्यं गृहीत्वोदरते च यस्मात्।
यन्त्रेष््वतः कङ्कमुखं प्रधानं स्थानेषु सर्वेष्वधिकारि यच्च॥ ४२ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने यन्त्रविधिर्नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
कंकमुखयन्त्र—कंकमुख नामक यन्त्र उक्त सभी यन्त्रों में प्रधान माना जाता है, क्योंकि यह आवश्यकतानुसार घुमाया जा सकता है, झोलों में इसका सरलता से प्रवेश हो जाता है, ग्रहण करने योग्य शल्य को पकड़कर यह निकाल देता है और सभी अवयवों में प्रविष्ट होकर साधिकार अपना कर्म करता है॥ ४२ ॥
वक्तव्य—उक्त पद्य अविकल रूप से अष्टांगसंग्रह (सू. ३४।२१) में भी सुलभ है। सभी यन्त्र अपने-अपने कार्यक्षेत्र में प्रशंसा पाते ही हैं। कंकमुख यन्त्र पर वाग्भटद्वय की विशेष अनुकम्पा है, अतएव उसकी प्रशंसा यहाँ की गयी है। इस अध्याय में उक्त यन्त्रों के कर्मों का संक्षेप में वर्णन कर दिया है। वास्तव में जहाँ-जहाँ इनके प्रयोगस्थल हैं, वहाँ-वहाँ इनके प्रयोगों का विस्तारपूर्वक वर्णन है।
इस प्रकार वैद्यरत्न परिणित तारावत् त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान में
यन्त्रविधि-वर्णन नामक पचीसवें अध्याय समाप्त॥ २५ ॥