अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—अन्य अनुशस्त्रों में इनका भी परिगणन किया जाता है—बांस की खपाची, बबूल के काँटे, गाजवाँ आदि की पत्तियाँ, समुद्रफेन और सूखा गोबर ( कनोपल ) ये सभी शस्त्रक्रिया में उपयोगी होते हैं। यहाँ 'यन्त्रादीनि' पद में आये हुए आदि शब्द से शस्त्रों का भी ग्रहण कर लिया गया है।
उत्साटघपाटघसीव्येष्ट्यलेष्वप्रच्छानकुट्टनम् ॥ २८ ॥
छेद्यं भेद्यं व्यधो मन्यो ग्रहो दाहश्च तत्क्रियाः ।
शस्त्रकर्मा का वर्णन—१. उत्साटघ ( शल्य को निकालना ), २. पाटघ ( चीरना ), ३. सीव्य ( सीना ), ४. एष्य ( घाव कहाँ तक हुआ है, उसे ढूँढना ), ५. लेष्य ( लेखन कर्म करना ), ६. प्रच्छान ( पच्छ लगाना ), ७. कुट्टन कर्म ( गोदना ), ८. छेद्य ( छेदन करना ), ९. भेद्य ( फोड़ना ), १०. व्यध ( वेधन कर्म ), ११. मन्य ( मथना ), १२. ग्रह ( ग्रहण या चूषण करना ) तथा १३. दाह ( स्नार अथवा अग्नि से जलाना )—ये शस्त्रों एवं अनुशस्त्रों के कर्म हैं। २८ ॥
बक्तव्य—सुश्रुत ने आठ प्रकार का शस्त्रकर्म कहा है—छेद्य, भेद्य, लेष्य, वेध्य, एष्य, आहार्य, विघ्नव्य तथा सीव्य। देखें—सु.सू. ५।५। इस दृष्टि से महर्षि वाग्भट ने उत्साटन, कुट्टन, मन्थन, ग्रहण और दाहन कर्म अधिक माने हैं। भगवान् आर्ये ने पाटन, व्यधन, छेदन, लेपन, प्रच्छन तथा सीवन ये छः शस्त्रकर्म कहे हैं। देखें—च.चि. २५।५५। वास्तव में यह आचार्यों का उत्कृष्टवैचित्र्य ही है।
कुण्डखण्डतनुस्थूलहृस्वदीर्घत्ववक्रताः ॥ २९ ॥
शस्त्राणां खरधारत्वमष्टौ दोषाः प्रकीर्तिताः ।
शस्त्रों के आठ दोष—शस्त्रों के ये आठ दोष हैं—१. कुण्डता ( तेज न होना ), २. खण्ड ( टूट जाना ), ३. तनु ( पतलापन ), ४. स्थूल ( आवश्यकता से अधिक मोटा होना ), ५. हृस्व ( प्रमाण से छोटा होना ), ६. दीर्घत्व ( प्रमाण से लम्बा होना ), ७. वक्रता ( टेढ़ापन ) तथा ८. खरधारत्व ( धार में खुरदरापन ) होना ॥ २९ ॥
बक्तव्य—शस्त्रों में 'करपत्र' का भी वर्णन है और इसका 'खरधारत्व' गुण है। अतएव भगवान् धन्वन्तरि की स्पष्टवादिता पर ध्यान दें—'अतो विपरीतगुणमादौत, अन्यत्र करपत्रात्' ( सु.सू. ८।९१ )
छेदभेदनलेष्यार्थं शस्त्रं वृत्तफलान्तरं ॥ ३० ॥
तर्जनीमध्यमाइगुष्टैर्गृहीत्यात्सुसमाहितः । विघ्नावणानि वृत्ताग्रे तर्जन्त्यइगुष्ठकेन च ॥ ३१ ॥
तलप्रच्छन्नवृत्ताग्रं प्राह्यं ब्रीहिमुखं मुखे । मूलेष्वाहरणार्थानि क्रियासौकर्यतोऽपरम् ॥ ३२ ॥
शस्त्रग्रहण-विधि—छेदन, भेदन तथा लेखन कर्म करते समय शस्त्र को फल के अन्त एवं वृत्त ( मूठ ) के मध्यभाग को तर्जनी-मध्यमा अँगुलियों तथा अँगूठा से सावधान होकर पकड़ना चाहिए। विघ्नावण कर्म करते समय शस्त्र को वृत्त ( मूठ ) के अगले भाग में तर्जनी एवं अँगूठे से पकड़ना चाहिए। ब्रीहिमुख शस्त्र को मुख पर तर्जनी अँगुली तथा अँगूठा से पकड़ कर उसके वृत्त ( बेंट या मूठ ) को हाथ के तलुवे से ढाककर शस्त्रकर्म करना चाहिए। आहरण कर्म के लिए शस्त्र को मूलभाग में ग्रहण करना चाहिए। शेष कर्मों में शस्त्र को जहाँ पकड़ने से शस्त्रकर्म करने में सरलता हो वहाँ पकड़कर शस्त्रकर्म करना चाहिए ॥ ३०-३२ ॥
बक्तव्य—शस्त्रों के दोषों को दूर करने के लिए सुश्रुत ने 'पायना' तथा 'निशाणन' कर्मों का वर्णन सु.सू. ८।१२-१३ में किया है। शस्त्रों में तीक्ष्णता आदि गुणों का आधान करने के लिए क्षारोदक, सामान्य जल तथा तेल में बुझाया जाता है। यदि इन शस्त्रों को विषैला बनाना हो तो इन्हें विष के घोल में भी बुझाया जाता है। इनके स्पर्श मात्र से घाव होकर पड़ने लग जाता है। लोहा द्वारा इस प्रकार तैयार किये गये शस्त्रों की धार को तेज करने के लिए काले चिकने पत्थर ( कसौटी ) का उपयोग किया जाता है;
शस्त्रविधिप्रध्यायः २६ ]
सूत्रस्थानम्
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आप भी देखें। धार की सही पहचान है—जब वह रोमों को आसानी के काटने लगे तब समझे कि वह तेज हो गयी है। देखें—सु.सू. ८।१४। इसी प्रकार के दोष रहित शस्त्र का प्रयोग करना चाहिए।
स्यात्रवाङ्गुलविस्तारः सुघनो द्वादशाङ्गुलः। क्षौमपत्रोर्णकौशेयदुक्कूलमृदुचर्मजः ॥ ३३ ॥ विन्यस्तपाशः सुस्तृतः सान्तरोर्णास्थशस्त्रकः। शलाकापिहितस्यास्थ्य शस्त्रकोशः सुसन्ध्रयः ॥
शस्त्रकोष का विस्तार—शस्त्रों को रखने की पेट्टी की चौड़ाई ९ अंगुल और लम्बाई १२ अंगुल होनी चाहिए। उसे घना होना चाहिए, जिससे शस्त्र सुरक्षित रहें, एक-दूसरे से टकराये नहीं; घन का यहाँ तात्पर्य है। वह शस्त्रकोष क्षौम (अलसी के तारों का बना हुआ) का, पत्तों का, ऊनी कपड़े का, कौशेय (रेशमी वस्त्र) का, सामान्य वस्त्र का अथवा मुलायम चमड़े का बनाया जाना चाहिए। उसमें भीतर से पेट्टी लगी हुई हो, अच्छी प्रकार सिला गया हो, प्रत्येक शस्त्र दूर-दूर में ऊन के वस्त्र से लपेट कर रखा गया हो तथा शलाकाओं से इनका मुख ढका रहना चाहिए। यह शस्त्रकोष (पेट्टी) नाई की पेट्टी के समान इधर-उधर ले जाने योग्य हो ॥ ३३-३४ ॥
जलोत्कसस्तु सुखिनां रक्तप्रावाय योजयेत्।
जोंकों का प्रयोग—सुख से जीवन-यापन करने वालों (सुकुमारों) का रक्तप्रावण करने के लिए जोंकों का प्रयोग करना चाहिए।
दुष्टाम्बुमत्स्यभेकाहिशबकोधमलोद्भवः ॥ ३५ ॥
रक्ताः श्वेता भृशं कृष्णाश्चपलाः स्थूलपिच्छलाः। इन्द्रायुधविचित्रोर्वर्धराजयो रोमशाश्च ताः ॥ सविद्या वर्जयेत्—
त्याज्य जोंकों का वर्णन—जो जोंकें दूषित जल में अथवा मछली, मेंढक, सांप आदि प्राणियों के शवों की सड़न से अथवा उनके मल-मूत्रमिश्रित कीचड़ में से पैदा होती हैं, जो लाल, सफेद, अधिक काली, चंचल, मोटी अर्थात् आकार में बड़ी तथा चिपचिपी होती हैं, जिनकी पीठ पर इन्द्रधनुष के आकार की विचित्र ऊपर की ओर रेखाएँ होती हैं एवं जिनके शरीर के ऊपर रोएँ होते हैं वे जोंकें जहरीली होती हैं; उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३५-३६ ॥
—ताभिः कण्टूपाकज्वरप्रमाः। विषपिताम्रनुत्कार्य तत्र—
त्याज्य जोंकों का निषेध—उक्त प्रकार की जोंकों का यदि रक्तविप्रावण में उपयोग किया जाता है, तो खुजली, पाक (पकना), ज्वर, चक्करों का आना आदि उपद्रव हो जाते हैं। इस स्थिति में विषनाशक, पित्तशामक तथा रक्तशोधक चिकित्सा करनी चाहिए।
—शुद्धाम्बुजाः पुनः ॥ ३७ ॥
निर्विषाः शैवलक्षयावा वृत्ता नीलोर्व्वराजयः। कषायपृष्टास्तन्वङ्ग्यः किञ्चित्पीतोदराश्च याः ॥
ग्राह्य जोंकों का वर्णन—जो जोंकें साफ जल में पैदा होती हैं, वे निर्विष होती हैं। उनका वर्ण सिंवार के सदृश साँवला तथा शरीर लम्बा एवं गोल होता है। उसके ऊपर नीली रेखाएँ ऊपर की ओर की होती हैं। उनकी पीठ का रंग बरगद वृक्ष की छाल का जैसा होता है। ये पतले आकार की होती हैं और इनके पेट का वर्ण कुछ पीताभ होता है ॥ ३७-३८ ॥
ता अय्यसम्यक्वमनात् प्रततं च निपातनात्। सीदन्तीः सलिलं प्राप्य रक्तमत्ता इति त्यजेत् ॥ ३९ ॥
त्याज्य जोंकों के लक्षण—वे अच्छी अर्थात् उपयोग में लाने योग्य जोंकें भी यदि रक्तपान कराने के बाद उन्हें भलीभाँति वमन न कराया गया अथवा रक्तचूषण के लिए उन्हें बार-बार लगाने के बाद जब पानी में डाला जाता है और वे दुःखी जैसी प्रतीत होती हैं तो वे रक्तपान करने से मदमत्त हो गयी हैं, ऐसा समझकर उन्हें छोड़ दें ॥ ३९ ॥
१९ अ० हू०
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अष्टाङ्गहृदये
अथेतरा निशाकलकमुक्तेऽस्मसि परिप्लुताः । अवन्तिसोमे तत्रे वा पुनश्चाभ्रासिता जले ॥ ४० ॥ लागयेद्दत्तमुत्तन्तरक्तशस्त्रनिपातनैः । पिवन्तीरत्रतस्कन्धाश्चन्नादयेन्मुदुवाससा ॥ ४१ ॥
जोंक रखने एवं लगाने की विधि—तदनन्तर जो जोंक निर्विष हो उन्हें हल्दी के कल्क से मिले हुए जल से अथवा अवन्तिसोम (काँजी) से या मठा से नहलाकर उसे पानी में छोड़ दें, जिससे वे आश्चर्य हो जायें। यदि वे मनुष्य के शरीर को नहीं पकड़ रही हों तो उस स्थान पर घी, मिट्टी, स्त्री का दूध या रक्त लगा दें अथवा शस्त्र द्वारा पच्छ लगा दें तब वह पकड़ लेगी। जब वह अपने कन्धे को ऊपर की ओर को उठा ले, तो समझ लें वह रक्तपान कर रही है, इस स्थिति में उसे कोमल वस्त्र से ढक देना चाहिए ॥ ४०-४१ ॥
वक्तव्य—सुश्रुतसंहिता-सूत्रस्थान के सम्पूर्ण १३वें अध्याय का भलीभाँति अनुशीलन करें, इसका नाम 'जलीकावचारणीय' है। इसमें उक्त विषय का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
सम्भुक्तादुष्टशुद्धाघ्राज्जलीका दुष्टशोणितम् । आदत्ते प्रथमं हंसः क्षीरं क्षीरोदकादिष्व ॥ ४२ ॥ (गुल्माशौचित्विद्रधीन् कुष्ठवातरक्तगलामयान् । नेत्ररुचिष्ववीसर्पान् शमयन्ति जलीकसः ॥ १ ॥)
दुष्ट रक्तग्रहण-दृष्टान्त—मिले हुए दूषित तथा शुद्ध रक्त में से पहले जोंक दूषित रक्त को चूसती है। जैसे—मिले हुए दूध तथा जल में से हंस पक्षी पहले दूध को पीता है ॥ ४२ ॥ (जोंक लगाने पर जो वह रक्त का आचूषण करती है, उससे गुल्म, अर्ध, विद्रधि (बड़े फोड़े), कुष्ठ, वातरक्त, गल सम्बन्धी रक्त रोग, नेत्रपीड़ा, विषज विकार तथा विसर्पयोग शान्त हो जाते हैं ॥ १ ॥)
वक्तव्य—उक्त दृष्टान्त से यह ज्ञात होता है कि जैसे हंस केवल दूध पी लेता है और जल छोड़ देता है, वैसे ही जोंक भी दुष्ट रक्त का पान कर शुद्ध रक्त को छोड़ देती है। परन्तु यहाँ ऐसी बात नहीं है। आप देखें—'दंशे'...'वकिरेत्' ॥ (सू.सू. १३।२१) अर्थात् विशुद्ध रक्त के पीने पर दंशस्थान पर पीड़ा, खजली आदि लक्षणों को देखकर समझ लेना चाहिए कि यह शुद्ध रक्त का पान कर रही है। इस स्थिति में इसे हटा देना चाहिए। हंस भी तो पानी पीता ही है।
कभी-कभी जोंक के काट लेने पर बहुत रक्तप्राव होने लगता है। इसका कारण है—जोंक के सिर में कई छोटी-छोटी गठि होती हैं, जिनका रस उसके दंशस्थान में पहुँच जाता है। इस रस में हीरुडीन (Hirudin) नामक द्रव्य होता है। जब इसका रक्त में मिश्रण हो जाता है तो रक्त जल्दी जमता नहीं, अतः वह बहता रहता है।
दंशस्थ तोये कण्डुवां वा मोक्षयेत्—
जोंक छुड़ाने की स्थिति—जहाँ जोंक लगी हो अर्थात् रक्त चूस रही हो, वहाँ यदि सूरि चुभाने की-सी पीड़ा हो अथवा खजली हो रही हो तो उसे छुड़ा दें—
—वामयेच्च ताम् । पटुतैलात्कवदानां श्लक्षणकण्डनरुपिताम् ॥ ४३ ॥
जोंक का उपचार—तोद एवं कण्डु लक्षणों से यह समझना चाहिए कि वह शुद्ध रक्त पी रही है। अतः उसे हटा दें, यदि वह न छोड़े तो दंशस्थान पर नमक का चूर्ण बुरक दें और उसके मुख पर तेल लगा दें, इससे वह छोड़ देती है। उसके बाद उसके शरीर पर चावल का चूर्ण डाल कर उसे भलीभाँति व्रमन कराना चाहिए ॥ ४३ ॥
रक्षन् रक्तमदाद्रूपः ससाहं ता न पातयेत् ।
रक्तमद से रक्षा—समुचित व्रमन न कराने पर जोंकों को 'रक्तमद' नामक विकार हो जाता है, इससे जोंकों की रक्षा करनी चाहिए। इस प्रकार एक बार लगाने के बाद फिर उस जोंक को एक सप्ताह तक नहीं लगाना चाहिए।
शस्त्रविधिरध्यायः २६ ]
सूत्रस्थानम्
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पूर्ववत् पटुता दादर्घ सम्यग्वान्ते जलौकसाम् ॥ ४४ ॥
रक्तवमन का सम्यग्योग—वमन का सम्यक् योग हो जाने पर जोंकों में पहले की भाँति कुशलता तथा दृढ़ता ( सबलता ) प्राप्त हो जाती है ॥ ४४ ॥
कलमोऽतियोगान्मृत्युर्वा—
रक्तवमन का अतियोग—वमन का अतियोग हो जाने पर जोंकों में कलम ( मुस्ती या हर्षक्षय ) हो जाता है अथवा वे मर जाती हैं।
—दुर्वान्ते स्तन्धता मदः ।
रक्तवमन का मिथ्यायोग—वमन का मिथ्यायोग हो जाने पर जोंकों में स्तन्धता ( इधर-उधर घूमने-फिरने में रुकावट ) तथा उन्हें 'रक्तमद' नामक असाध्य रोग हो जाता है, जिससे प्रायः उनकी मृत्यु भी हो जाती है।
अन्यत्रान्यत्र ताः स्थाप्या घटे मृत्तान्मृगभिर्णि ॥ ४५ ॥
लालादिकोयनाशार्थ, सविषाः स्युस्तदन्वयात् ।
जलौकापालन-विधि—जोंकों को उनके स्थानों से लाकर शुद्ध जल में या तालाब के जल में मिट्टी मिलाकर अलग-अलग मिट्टी के घड़ों में रख दें। इनके खाने के लिए सिवार, जलचर प्राणियों के सूखे मांस और कन्दों के चूर्ण दें, सोने के लिए कमलपत्र आदि उसमें डाल दें। तीसरे-तीसरे दिन इस पानी को बदल दें और भोजन-पदार्थ उस जल में डाल दें। सब को अलग रखने का प्रयोजन—इससे जोंकों के परस्पर लालाभाव की सङ्गन नहीं हो पायेगी, क्योंकि लालाभाव के संयोग से ये विषैली हो जाती हैं ॥ ४५ ॥
अशुद्धौ स्रावयेदंशान् हरिद्रागुडमाक्षिकैः ॥ ४६ ॥
जलौकावचारण-पश्चात्कर्म—जोंक को हटा लेने पर भी दंशस्थान से यदि रक्तस्राव हो रहा हो तो रक्त के शुद्ध-अशुद्ध का विचार कर लें। यदि वह दूषित रक्त हो तो उसे बहने दें और उसे बहने देने में हल्दी, गुड़ तथा मधु लगाकर सहायता करें, जिससे वह दूषित रक्त पूर्ण रूप से निकल जाय ॥ ४६ ॥
शतधौताज्यपिचवस्ततो लेपाश्च शीतलाः ।
रक्तावरोधक उपचार—यदि शुद्ध रक्त दंशस्थान से बह रहा हो ( जैसा हमने श्लोक ४९ के वक्तव्य में कहा है ) तो शतधौत घृत के पिचुओं को उन दंशस्थानों में रखें और शीतवीर्यरोपण पदार्थों से निर्मित लेपों को उन स्थानों पर लगायें। इनके प्रयोगों से रक्तस्राव रुक जाता है।
दुष्टरक्तापगमनात् सद्यो रागरुजां शमः ॥ ४७ ॥
रक्तस्रावण का फल—दूषित रक्त के निकल जाने से रोगी की पीड़ाओं तथा उस स्थान पर दिखलायी पड़ने वाली लालिमा का तत्काल शमन हो जाता है ॥ ४७ ॥
अशुद्धं चलितं स्थानात्स्थितं रक्तं ब्रणाशये । व्यस्तीभवत्पर्युषितं तस्मात्तस्त्रावयेत्युनः ॥ ४८ ॥
पुनः रक्तस्रावण—यदि अशुद्ध ( दूषित ) रक्त रणस्थान से विचलित होकर जोंक द्वारा किये गये वाव पर आकर रुक गया हो तो वहाँ आया हुआ वह रक्त बासी होकर खट्टा हो जाता है, अतः उसे पुनः तीसरे दिन जोंक लगाकर निकलवा देना चाहिए ॥ ४८ ॥
युज्यान्नालालाबुघटिका रक्ते पिसेन दूषिते । तासामनलसंयोगात्—
अलालाबुघटिप्रयोग-निषिद्ध—पित्तदोष द्वारा दूषित हुए रक्त का स्रावण करने के लिए अलालाबुघटिका ( तुम्बी ) यन्त्र का प्रयोग न करें, क्योंकि उसके प्रयोग में अग्निसंयोग किया जाता है।
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अष्टाङ्गहृदये
—युज्यात् कर्कवायुना ॥ ४९ ॥
अलाबूयन्त्र-प्रयोग विहित—यदि कफ एवं वात दोष से दूषित रक्तधातु को निकालना हो तो उसमें अलाबूयन्त्र का प्रयोग करें ॥ ४९ ॥
कफेन दुष्टं रुधिरं न शृङ्गेण विनिर्हरेत्। स्कन्धत्वात्—
शृंगयन्त्रप्रयोग-निषेध—कफदोष से दूषित रक्तधातु जम जाता है, अतएव इसका निर्हरण भी शृंगयन्त्र से नहीं करना चाहिए। क्योंकि इसमें अग्निसंयोग का अभाव रहता है, अतः कफ पिघल नहीं सकता।
वक्तव्य—विशेष परिस्थिति के लिए देखें—अ.हृ.सू. २५।२७।
—वातपिताभ्यां दुष्टं शृङ्गेण निर्हरेत् ॥ ५० ॥
शृंगयन्त्रप्रयोग-निर्देश—वातदोष तथा पित्तदोष से दूषित रक्त का निर्हरण शृंगयन्त्र द्वारा करना चाहिए ॥ ५० ॥
गात्रं बद्धवोपरि वृद्धं रज्जा पट्टेन वा समम्। स्नायुसन्ध्यस्थिमर्माणि त्यजन् प्रच्छानमाचरेत् ॥
अधोदेशप्रविसृतेः पदरूपरिगामिभिः। न गाढघनतिर्यभिर्न पदे पदमाचरन् ॥ ५२ ॥
प्रच्छाननैकदेशस्थं ग्रथितं जलजन्मभिः। हरेच्छृङ्गादिभिः सुसप्तसृग्यापि शिराव्यष्टिः ॥ ५३ ॥
प्रच्छानकर्म-निर्देश—प्रच्छान कर्म अर्थात् पच्छ लगाने की विधि—यदि शाखाओं ( हाथ-पैरों ) से पच्छ लगाकर रक्त निकालना हो तो उस स्थान से ५-७ अंगुल ऊपर के अवयव को रस्सी या पट्टी से कसकर बाँधकर तब पच्छ लगाना चाहिए। ध्यान रहे, यह प्रच्छानकर्म स्नायु, सन्धि तथा अस्थि मर्मों के स्थानों को छोड़कर ही लगाना चाहिए। पच्छ लगाते समय नीचे भाग से ऊपर की ओर को पद करने चाहिए। वे ( पद ) न बहुत गहरे हों, न पास-पास में हों, न तिरछे हों और न पद के ऊपर दूसरा पद ( शस्त्र द्वारा घाव ) बनाना चाहिए। एक स्थान स्थित रक्त को पच्छ लगाकर, ग्रन्थि तथा अर्बुद आदि के गठीले रक्त को जोक लगाकर, जहाँ का रक्त सुन्न पड़ गया हो, उसे शृंगयन्त्र द्वारा और सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए दूषित रक्त को सिरावेध द्वारा निकालना चाहिए ॥ ५१-५३ ॥
प्रच्छानं पिण्डिते वा स्यात्—
प्रच्छान आदि का विकल्प—पिण्डित ( गाढ़े ) रक्त में प्रच्छान क्रिया अर्थात् पच्छ लगाना चाहिए।
—अवगाढे जलोक्तसः ।
जलोक्ता-प्रयोग—अवगाढ अर्थात् गम्भीर रक्त में जोक को लगाकर रक्त-निर्हरण करना चाहिए।
त्वकस्येऽलाबुघटीशृङ्गम्—
तुम्बी एवं शृंगी यन्त्र—त्वचागत रक्त को निकालने में पच्छ लगाकर तुम्बीयन्त्र और शृंगीयन्त्र का प्रयोग करना चाहिए।
वक्तव्य—प्रच्छान कर्म सामान्य-विशेष भेद से दो प्रकार का होता है—१. सामान्य खुरचना और २. विशेष छुरा ( उत्तरा ) आदि से गहरा घाव बनाना।
—शिरैव व्यापकेऽसुजि ॥ ५४ ॥
सिरावेध-प्रयोग—सम्पूर्ण शरीर में दूषित रक्त के फैल जाने पर सिरामोक्षण अर्थात् सिरावेध का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५४ ॥
शस्त्रविधिर्ध्यायः २६ ]
सूत्रस्थानम्
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वातादिधाम वा भृङ्गजलीकोलावृषिः क्रमात् ।
रक्तप्रावणविधि-विकल्प—वातदूषित रक्त का शृंगीयन्त्र द्वारा, पित्तदूषित रक्त का जोंक द्वारा तथा कफदूषित रक्त का अलाबु ( तुम्बी ) यन्त्र द्वारा रक्तप्रावण करना चाहिए।
सुतासृजः प्रदेहाद्यैः शीतैः स्याद्वायुकोपतः ॥ ५५ ॥
सतोदकण्डूः शोफस्तं सर्पिषोष्णेन सेचयेत् ।
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसुतुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने शस्त्रविधिर्नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
रक्तप्रावण में उपद्रव एवं शान्ति—रक्तप्रावण कर्म करने के बाद भी जब रक्त निकलता रहता है तो उसे रोकने के लिए शीतल लेप आदि का प्रयोग करने से कभी वात प्रकुपित हो जाता है, तब उस स्थान पर तोद, कण्डू, सूजन आदि उपद्रव हो जाते हैं। उनकी शान्ति के लिए उस स्थान पर गुनगुने घी का सेचन करना चाहिए ॥ ५५ ॥
वक्तव्य—इस प्रकार की वेदनाओं की शान्ति का उपाय भगवान् धन्वन्तरि ने सु.सू. ५।४१ में दिया है, देखें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में शस्त्रविधि नामक छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २६ ॥
सप्तविंशोऽध्यायः
अथातः सिराव्यधविधिमध्येयां व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से सिराव्यध (सिरावेध) विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —इसके पहले अध्याय में अलानु (तुम्बी), भुंगी, जलौका (जोंक) तथा पच्छ लगाना आदि विधियों द्वारा रक्तावसेचन (रक्तनिर्हरण अथवा रक्ताहरण) के उपायों का वर्णन किया था, उसी क्रम में आने वाले सिरावेध-विधि का स्वतन्त्र वर्णन प्रस्तुत अध्याय में किया जा रहा है, क्योंकि इसका विषय अधिक विस्तृत है।
वात आदि दोषों द्वारा दूषित रक्तधातु जब कभी रोगोत्पत्ति का प्रधान कारण हो जाता है, तब रक्तघाव किया एवं कराया जाता है और सिरावेध रक्तस्त्रावण की प्रमुख विधि है। पञ्जाब आदि देशों में जहाँ रक्तसार मनुष्य होते हैं, वहाँ वमन-विरेचन की भाँति सिरावेध भी कराया जाता है। ऋतुचर्या के क्रम में जहाँ सिरावेध कराया जाता है उसका उत्तम काल है—शरद ऋतु। ध्यान रहे, जहाँ रक्तविकार में सिरावेध कराने में किसी प्रकार की बाधा प्रतीत होती है, वहाँ विरेचन कराने से भी लाभ होता है, फिर भी रक्तजनित विकारों की सिरावेध उत्तम चिकित्सा कही गयी है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सु.सू. १४; सु.शा.८; च.सू. २४ तथा अ.सं.सू. ३६ में देखें।
मधुर लवणं किञ्चिदशीतोष्णमसंहृतम्। पञ्चन्द्रगोपहेमाविशशलोहितलोहितम् ॥ १ ॥ लोहितं प्रभवः शुद्धं, तनोस्तेनैव च स्थितिः।
शुद्ध रक्त का वर्णन —शुद्ध रक्त का परिचय—यह मधुररस युक्त, हल्का नमकीन, समशीतोष्ण, असंहत अर्थात् गाँठरहित (द्रवरूप), कमल की पंखुड़ी, इन्द्रगोप (बीरबहटी), तपाये गये सोने तथा अवि, शश (भेड़ एवं खरगोश) के रक्त के सद्गुण लाल वर्ण वाले रक्त को शुद्धरक्त कहते हैं। (हम शब्द से कुछ आचार्य 'मजीठ' का ग्रहण करते हैं।) इसी रक्त से शरीर स्थित (स्वस्थ) रहता है ॥ १ ॥
वक्तव्य —रक्त के पर्याय—लाल वर्ण वाला होने से इसे 'रक्त', इसमें लोहधातु के पाये जाने से इसे 'लोहित', गतिशील होने से इसे 'शोणित' तथा शरीर में घाव लगने पर दिखलायी देने के कारण इसे 'क्षतज' कहा जाता है। ऊपर इसे सोने के समान वर्ण वाला कहा गया है, यद्यपि सामान्य सोना पीला दिखता है किन्तु जब इसे तपाया जाता है, तब इसका वर्ण हल्का लाल हो जाता है। अतएव सुवर्ण का एक नाम 'तपनीय' भी है। जैसा कि भगवान् आत्रेय ने च.सू. २४२२ में कहा है। ऊपर शुद्ध रक्त को मधुर कहा है, यही कारण है कि उसे कुत्ता भी चाटता है, अशुद्ध को नहीं। भगवान् धन्वन्तरि ने इस शरीर का मूल आधार रक्त को ही माना है, अतएव इसकी रक्षा करनी चाहिए। इस बात को कहने के लिए उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि—'रक्त ही जीव है'। देखें—सु.सू. १४४४।
तत्तिस्त्वलेष्मलैः प्रायो दूष्यते—
रक्तदूषक तत्त्व —वह शुद्ध रक्त प्रायः पित्तदोष तथा कफदोष को बढ़ाने वाले आहार-विहारों के सेवन से दूषित हो जाता है।
सिराव्यवधिरेखायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
२९५
—कुर्वते ततः ॥ २ ॥
विसर्पविद्रधिष्ठीहगुल्माग्रिसदनज्वरान् । मुवनेत्रशिरोरोगमदतुङ्गलवणास्पत्याः ॥ ३ ॥ कुष्ठवातास्रपित्तास्रकन्दम्लोद्विरणघ्रमान् । शीतोष्णस्निग्धरूक्षार्चरूपक्रान्ताश्च ये गदाः ॥ ४ ॥ सम्यक्साध्या न सिध्यन्ति ते च रक्तप्रकोपजाः ।
रक्तज रोग—इस प्रकार दूषित हुआ वह रक्तधातु विसर्प, विद्रधि, प्लीहाविकार, गुल्मरोग, अग्रिमान्द्य, ज्वर, मुखरोग, नेत्ररोग, शिरोरोग, मद, तुषा, मुख का नमकीन बना रहना, कुष्ठरोग, वातरक्त, पित्तरक्त या रक्तपित्त, कडुवें एवं खट्टे इकारों का आना, वमन तथा चक्करों का आना—इन रोगों को उत्पन्न कर देता है। और जो सम्यक्साध्य रोग शीत, उष्ण, स्निग्ध तथा रूक्ष उपचारों के करने पर भी शान्त नहीं हो पाते वे रोग भी रक्तदोष के प्रकोप से उत्पन्न हुए हैं, ऐसा समझ लेना चाहिए ॥ २-४ ॥
बक्तव्य—उक्त रक्तज रोगों की चिकित्सा रक्तशोधक औषध-द्रव्यों के प्रयोग से करें। यदि इनसे भी लाभ न हो तो सिरावेध द्वारा रक्तस्रावण कराना चाहिए।
तेषु स्रावयितुं रक्तमुद्रिक्तं व्यधयेत्सिराम् ॥ ५ ॥
सिरावेध का निर्देश—उक्त रक्तज रोगों में विकारयुक्त अतएव उभड़े हुए रक्त को निकालने के लिए निम्नलिखित विधि से सिरावेध कराना चाहिए ॥ ५ ॥
न तूनपोडशातीतससत्यब्धुतासृजाम् । अस्निग्धास्वेदितारत्यर्थस्वेदितानिलरोगिणाम् ॥ ६ ॥ गर्भिणीसूतिकार्जोणपित्तास्रभासकासिनाम् । अतीसारोदरच्छर्दिपाण्डुसर्वाङ्गशोफिनाम् ॥ ७ ॥ स्नेहपीते प्रयुक्तेषु तथा पञ्चसु कर्मसु । नायन्त्रितां सिरां विध्वेन्न तिर्यङ्नायन्युत्थिताम् ॥ ८ ॥ नातिशीतोष्णवाताम्ब्रेष्वन्यत्रात्ययिकाद्वादात् ।
सिरावेध-विधि—सिरावेध में आयुसीमा—१६ वर्ष की अवस्था से पहले और ७० वर्ष की अवस्था के बाद सिरावेध नहीं कराना चाहिए। जिनका अन्य कारणों से रक्त निकल चुका हो, जिनका स्नेहन तथा स्वेदन न किया गया हो अथवा जिनका अधिक स्वेदन हो गया हो, जो वातरोगी हों, गर्भिणी, सूतिका, अजीर्णरोगी, रक्तपित्त के रोगी, श्वास, कास, अतिसार, उदररोगी, छर्दि ( वमन ) रोगी, पाण्डुरोगी, जिनके सम्पूर्ण शरीर में शोथ हो गया हो, जिसने अभी-अभी स्नेहपान किया हो तथा पंचकर्म कराने के तत्काल बाद सिरावेधन नहीं कराना चाहिए। सिरावेध करने के पहले उसे भलीभाँति बाँध देना चाहिए तभी सिरावेध करें अर्थात् बिना बाँधे सिरावेध न करें। टेढ़ी तथा बिना उभरी सिरा का भी वेधन न करें। अधिक शीत तथा अधिक उष्ण कालों में, जब तेज हवा चल रही हो, बादल छाये हों इन स्थितियों में भी सिरावेध न करें। यदि अत्यन्त आवश्यकता हो तो सावधानीपूर्वक सिरावेध कर डालना चाहिए। यहाँ आत्ययिक रोग से तात्पर्य है—जब अन्य विधियों से लाभ न हो रहा हो तो ऐसी स्थिति को आत्ययिक कहते हैं, ऐसे में सिरावेध कर लेना चाहिए ॥ ६-८ ॥
बक्तव्य—सिराव्यन्त्रण की विधि आगे इसी अध्याय के १८ से २२ तक के पद्यों में दी गयी है।
शिरोनेत्रविकारेषु ललाटघां मोक्षयेत्सिराम् ॥ ९ ॥
अपाङ्गद्यामुपनास्यां वा—
रोग-विशेष में सिरावेध—शिरोरोग तथा नेत्ररोगों में माथा पर की सिरा का अथवा अपांगों ( नेत्र के बाहर के कोण की ) अथवा नासिका के समीप की सिरा का वेधन करे ॥ ९ ॥
—कर्णरोगेषु कर्णजाम् ।
कर्णरोग में सिरावेध—कान के रोगों में कान के समीप वाली सिरा का वेधन करना चाहिए।
२९६
अष्टाङ्गहृदये
नासारोगेषु नासाग्रे स्थितां—
नासारोग में सिराबेध—नासारोगों में नासिका के अग्रभाग की सिरा का वेधन करना चाहिए।
—नासाललाटयोः ॥ १० ॥
पीनसे—
पीनसरोग में सिराबेध—पीनस (प्रतिश्याय) रोग में नासिका के अग्रभाग की तथा ललाट (माथा) की सिरा का वेधन करें ॥ १० ॥
—मुखरोगेषु जिह्वाछहनुतालुगाः ।
मुखरोग में सिराबेध—मुख सम्बन्धी रोगों में जीभ, ओष्ठ (होंठ), हनु (ठुंडी) अथवा तालु की सिरा का वेधन करें।
जत्रुर्ध्वग्रन्थिषु ग्रीवाकर्णशङ्खशिरःभ्रिताः ॥ ११ ॥
ऊर्ध्वजत्रु के रोगों में—जत्रुअस्थि के ऊपर की ग्रन्थियों में होने वाले रोगों में ग्रीवा (गरदन), कर्ण, शंख (कनपटी) तथा सिर की सिराओं का वेधन करना चाहिए ॥ ११ ॥
उरोपाङ्गललाटस्था उन्मादे—
उन्मादरोग में—उन्मादरोग में उरसु (छाती), अपांग (आँख का कोण) तथा ललाट की सिरा का वेधन करें।
—ऽपस्मृतौ पुनः ।
हनुसन्धी समस्ते वा शिरां भ्रूमध्यगामिनीम् ॥ १२ ॥
अपस्माररोग में—अपस्माररोग में हनुसन्धि में अथवा सम्पूर्ण हनुप्रदेश की सिराओं में अथवा दोनों भाँहों के बीच में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए ॥ १२ ॥
विद्रघौ पार्श्वशूलं च पार्श्वकक्षास्तनान्तरे ।
विद्रधि तथा पार्श्वशूल में—विद्रधि तथा पार्श्वशूल में पसलियों में, कक्षाओं में तथा स्तनों के बीच में स्थित सिराओं का वेधन करना चाहिए।
तृतीयकेंऽस्योर्मध्ये—
तृतीयकज्वर में—तृतीयकज्वर में दोनों असफलकों के बीच में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
—स्कन्धस्याधश्चतुर्थके ॥ १३ ॥
चतुर्थकज्वर में—चतुर्थकज्वर में दोनों स्कन्धसन्धियों के निचले भाग में सिरावेधन करना चाहिए।
प्रवाहिकायां शूलिन्यां श्रोणितो द्रघङ्गुले स्थिताम् ।
प्रवाहिकारोग में—शूल युक्त प्रवाहिकारोग में किसी एक श्रोणि (नितम्ब या चूतड़) में कमर के नीचे दो अंगुल दूरी पर स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
शुक्रमेद्दामये मेद्रे—
शुक्र एवं शिशन रोगों में—शुक्र सम्बन्धी रोगों में तथा शिशन (पुरुष-मूत्रेन्द्रिय) सम्बन्धी (शूकदोष, उपदंश एवं परिवर्तिका आदि) रोगों में शिशन (लिंग) की सिरा का वेधन करना चाहिए।
—ऊर्गां गलगण्डयोः ॥ १४ ॥
सिराव्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
२९७
गलगण्डरोगं—गलगण्ड (घेघा) तथा गण्डमाला रोगों में ऊष्ममूलगत सिरा का वेधन करना चाहिए ॥ १४ ॥
गृधस्यां जानुनोऽधस्तादूर्ध्वं वा चतुरङ्गुले ।
गृधसीरोगं—गृधसीरोग में जानुसन्धि के चार अंगुल नीचे अथवा चार अंगुल ऊपर में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए ।
इन्द्रबस्तेरधोऽपच्यां द्रघङ्गुले—
अपचीरोगं—अपचीरोग में इन्द्रबस्ति नामक मर्म के दो अंगुल नीचे सिरावेधन करना चाहिए ।
वक्तव्य—इन्द्रबस्ति-मांसमर्म तथा कालान्तर प्राणहरमर्म है, 'पार्णि प्रति जह्नामध्ये इन्द्रबस्तिः' अर्थात् पार्णि (एडी) के ऊपर जंघा के बीच में 'इन्द्रबस्ति' नामक मर्म है। इसी से दूसरी टाँग और बाँह के मर्मों को भी समझ लेना चाहिए। देखें—सु. शा. ६।२४। इसका वर्णन सु.चि. १।८२५ में भी किया है। और देखें—अ.हू.शा. ४।५। गण्डमाला और अपची में भेद है। देखें—सु.नि. १।१११।
—चतुरङ्गुले ॥ १५ ॥
ऊर्ध्वं गुल्फस्य सव्यथर्तौ, तथा क्रोष्टुकशीर्षके ।
प्रमुख वातरोगों में—सविगगत वातज रोगों (खंजता, पंगुता आदि) में और क्रोष्टुशीर्षक रोग में गुल्फ (एडी के ऊपर की गाँठ, टखना या घुट्टी की) सन्धि के चार अंगुल ऊपर सिरावेध करना चाहिए ॥ १५ ॥
पादवाहे खुडे हर्षे विपाद्यां वातकण्टके ॥ १६ ॥
चिप्पे च द्रघङ्गुले विध्येदुपरि क्षिप्रमर्मणः ।
पादवाह आदि में—पादवाह, खुड (वातरक्त) रोग, पादहर्ष, विपादिका, वातकण्टक तथा विष्प नामक नखरोग में क्षिप्र नामक मर्म (अंगुष्ठ एवं अंगुलि के बीच में स्थित) के दो अंगुल ऊपर सिरावेध करना चाहिए ॥ १६ ॥
गृधस्यामिव विश्वाच्यां—
विश्वाचीरोगं—विश्वाचीरोग में गृधसीरोग के समान कूर्पर सन्धि के नीचे या ऊपर चार अंगुल पर सिरावेध करना चाहिए ।
—यथोक्तानामदर्शने ॥ १७ ॥
मर्महीने यथासन्ने देशेऽन्यां व्यधयेत् सिराम् ।
अन्यत्र सिरावेध-निर्देश—ऊपर कहे गये रोगों में निर्दिष्ट सिराएँ उभार युक्त न दिखलायी दें, तो समीप में स्थित एवं मर्मरहित किसी अन्य सिरा का वेधन सावधानी से कर लेना चाहिए ॥ १७ ॥
अथ स्निग्धतनुः सज्जसर्वोपकरणो बली ॥ १८ ॥
कृतस्वस्थयनः स्निग्धरसात्प्रतिभोजितः । अग्रितापातपस्विन्नो जानुच्चासनसंस्थितः ॥ १९ ॥
मृदुपट्टातकेशान्तो जानुस्थापितकूर्परः । मुष्टिभ्यां वस्त्रगर्भाभ्यां मन्ये गाढं तिपीडयेत् ॥ २० ॥
दन्तप्रपीडनोत्कासगण्डाध्माननि चाचरेत् । पृष्ठतो यन्त्रयेच्चैवं वस्त्रमावेष्टयन्नरः ॥ २१ ॥
कन्धरायां परिक्षिप्य न्यस्यान्तर्वाभतर्जनीम् । एषोऽन्तर्मुखवर्ज्यानां सिराणां यन्त्रणे विधिः ॥
सिरायन्त्रण-विधि—सिरावेधन करने के पहले स्वस्तिवाचन आदि मांगलिक कार्य करकर जब उन व्यक्ति (रोगी) का भलीभाँति स्नेहन करना चाहिए और सिरावेधन के उपयोग में आने वाले सभी यन्त्रों (रस्सी, पट्टी, कुठारिका आदि शस्त्र, रक्तप्रावक तथा रोधक औषध-द्रव्य) तैयार रखे जायें हो किन्तु
२९८
अष्टाङ्गहृदये
सिरावेधन करना है, वह बलवान् हो। उसे स्निग्ध रस (मांसरस) युक्त भोजन करा दिया हो, अग्निताप से अथवा आतप (धूप) से उसका स्वेदन कराकर जानुभर ऊँचे आसन (कुर्सी) पर उसे बैठाये। उसके बालों को कोमल वस्त्र से बाँध दें, उसकी दोनों कोहनियों को दोनों घुटनों पर रख दें और दोनों हाथों में कपड़े के टुकड़े देकर मुद्रियाँ बाँधकर उनसे दोनों मन्चाओं (गरदन की दोनों ओर की धमनियों) को जोर से दबाये। इस समय रोगी दाँतों को कसकर दबाये, खाँसने का प्रयत्न न करे और अपने गालों को फुलाये। इसी समय परिच्चारक (कम्माउण्डर) पीठ की ओर खड़ा होकर कपड़े से इसके गला को लपेटता हुआ अपने बायें हाथ की तर्जनी अँगुली को कपड़ा के दोनों भागों के मध्य में रखकर उसके गले को कसकर बाँधे। यह मुख के भीतरी सिराओं के अतिरिक्त शिरःप्रदेश में स्थित सभी शिराओं को उभाड़ने के लिए यन्त्रणविधि कही गयी है। १८-२९॥
बक्तव्य —इस सिरायन्त्रण कार्य में यह सावधानी रखनी चाहिए कि कहीं अधिक रोगी के श्वास-प्रश्वास न रुके। इस प्रकार यन्त्रित कर देने पर रोगी का मुखमण्डल लाल होकर सभी सिराएँ उभरी हुई दिखलायी देती हैं, इसके बाद ही सिरावेध किया जाता है।
ततो मध्यमयाऽङ्गुल्या वैद्योऽङ्गुष्ठविमुक्त्या। ताडयेत्—
सिरावेधन-विधि—समुचित विधि से सिरायन्त्रण कर देने के बाद चिकित्सक अँगूठा द्वारा छटकायी हुई मध्यम अँगुली से निर्दिष्ट सिरा का ताडन करें।
—उत्थितां ज्ञात्वा स्पर्शाद्वाऽङ्गुष्ठपीडनैः ॥ २३ ॥
कुठार्या लक्षयेन्मध्ये वामहस्तगृहीतया। फलोद्देशे सुनिष्कम्पं सिरां, तद्रुच्च मोक्षयेत् ॥ २४ ॥
ताडयन् पीडयंश्चैनां—
कुठारिका-प्रयोग—जब सिरा उभर आये तब उसे मसल कर अथवा अँगूठा से दबाकर उसे और भी उभार लें, उसके बाद बायें हाथ से मूठ पर पकड़ी गयी कुठारिका को उस उठी हुई सिरा के ऊपर रखकर अँगूठा द्वारा छटकायी गयी मध्यम अँगुली से उस कुठारिका पर आघात करें (चोट मारे), जिससे सिरावेध हो जाता है, फिर रक्तध्राव होने दें। २३-२४॥
—विध्येद्व्रीहिमुखेन तु। अङ्गुष्ठेनोन्नमम्याग्रे नासिकामुपनासिकाम् ॥ २५ ॥
उपनासिका-सिरावेध—नासिका के अगले भाग को अँगूठा से ऊपर की ओर उठाकर उपनासिका सिरा का वेधन ब्रीहिमुख नामक शस्त्र से करना चाहिए। २५॥
अभ्युन्नतविदष्टाग्रजिह्वस्याधस्तदाश्रयाम्।
जिह्वा-सिरावेध—जीभ को तालु की ओर ले जाकर उसे दाँतों से दबाकर जीभ के निचले भाग में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
यन्त्रयेत्तनयोर्हर्षं ग्रीवाश्रितसिराव्यधे ॥ २६ ॥ ॥
ग्रीवा-सिरावेध—ग्रीवाप्रदेश में आश्रित सिरा का वेधन करने के लिए दोनों स्तनों के ऊपर की ओर यन्त्रण करें। २६॥
पाषाणगर्भहस्तस्य जानुस्थे प्रसूते भुजे। कुशेराश्व्य मृदिते विध्येद्दोर्ध्वपट्टके ॥ २७ ॥
फिर रोगी दोनों हाथों में पत्थर के टुकड़ों को पकड़कर दोनों भुजाओं को घुटनों के ऊपर रख कर और उन्हें फैलाकर बैठ जाय तथा उसके पेट से लेकर गरदन तक के अंगों को मसला जाय और उसके ऊपर पट्टी बाँध दी जाय, तदनन्तर ग्रीवा में सिरावेध करें। २७॥
बक्तव्य —पेट तथा छाती की सिराओं के वेधन के लिए देखें—‘उदरो’...‘देहस्य’। (सु.शा. ८।८)
सिराव्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
२९९
विध्यैद्वस्तशिरां बाहवाक्वाकुञ्चितकूपैर । बद्ध्वा सुलोपविष्यस्य मुष्टिमङ्गुष्ठगर्भिणम् ॥ २८ ॥ ऊर्ध्वं वेध्यप्रदेशान्च पट्टिकां चतुरङ्गुले ।
बाहु-सिरावेध—बाँह को फैलाकर तथा अँगूठा को बीच में रखकर मुट्ठी बाँधकर सुख (आराम) से बैठे हुए रोगी के बाँह पर वेधन योग्य स्थान से चार अंगुल ऊपर पट्टी बाँधकर सिरावेध करें ॥ २८ ॥
विध्यैदालम्बमानस्य बाहुभ्यां पार्श्वयोः सिराम् ॥ २९ ॥
पार्श्वस्य सिरावेध—बाहुओं के बल से लटकते हुए दाहिने तथा बायें पार्श्व की किसी एक सिरा का वेधन करें ॥ २९ ॥
प्रहृष्टे मेहने—
लिंग का सिरावेध—मेहन (पुरुष-मूत्रेन्द्रिय) के उत्तेजित होने पर इसकी सिरा का वेधन करें।
—जङ्गासिरां जानुन्यकुञ्चिते ।
जंघा-सिरावेध—प्राँनों को फैलाकर जंघा की सिरा का वेधन करना चाहिए।
पादे तु सुस्थितेऽधस्ताज्जानुसन्धेर्निपीडिते ॥ ३० ॥
गाढ़ं कराभ्यामागुल्फं चरणे तस्य चोपरि । द्वितीये कुञ्चिते किञ्चिदारूढे हस्तवत्ततः ॥ ३१ ॥
बद्ध्वा विध्यैस्तिराम्—
पाद-सिरावेध—पैरों को समतल भूमि पर रखकर जानुसन्धि के नीचे से लेकर गुल्फसन्धि तक हाथों से दबाकर उस पैर के ऊपर दूसरे पैर को कुछ मोड़कर रखें और उसे कुछ ऊँचा करके बाँह के सिरावेध की भाँति जहाँ सिरावेध करना है उससे चार अंगुल ऊपर पट्टी बाँधकर सिरावेधन करें। यह पादसिराओं के यन्त्रण-विधि से लेकर सिरावेध तक का वर्णन कर दिया है ॥ ३०-३१ ॥
—इत्यमनुक्तेष्वपि कल्पयेत् । तेषु तेषु प्रदेशेषु तत्तद्यन्त्रमुपायवित् ॥ ३२ ॥
सिरावेध-निर्देश—उक्त निर्देशों के अनुसार उपाय को जानने वाला चिकित्सक शरीर के उन-उन अनुक्त अंगों का बन्धन कर सिरा को उभाड़ कर उसका वेधन करें ॥ ३२ ॥
मांसले निक्षिपेदेशे ब्रीह्यास्य ब्रीहिमात्रकम् । यवार्धमस्मान्मुपरि सिरां विध्यन् कुठारिकाम् ॥
वेध का परिमाण—मांसल शरीर के अवयवों में ब्रीहिमुख नामक शस्त्र से जी के बराबर गहरा घाव बनाना चाहिए। अस्थियों के ऊपर से गई हुई सिरा का वेधन करना हो तो कुठारिका नामक शस्त्र से आधा जी के बराबर गहरा घाव करना चाहिए ॥ ३३ ॥
सम्यविद्वा स्रवेद्वारां यन्त्रे मृक्ते तु न स्रवेत् ।
सम्यक् वेध का वर्णन—सिरावेध समुचित रूप से हो जाने पर उसमें से रक्त की तेज धारा निकलती है और ज्यों ही यन्त्रण (बन्धन) खोल दिया जाता है, फिर रक्त नहीं निकलता या थोड़ा निकलता है।
अल्पकालं वहत्यल्पं, दुर्विद्वा तैलचूर्णनैः ॥ ३४ ॥
सशब्दमतिविद्वा तु स्रवेद् दुःखेन धार्यते ।
दुर्बेध आदि का वर्णन—सिरा का मिथ्यावेध होने पर थोड़ा-सा रक्त थोड़े समय तक बहता है अथवा तैलमिश्रित चूर्णों के प्रयोग करने पर थोड़ा निकलता है। अतिवेध होने पर अत्यन्त शब्द के साथ रक्त बहने लगता है और रोकने का प्रयास करने पर वह (रक्त) रुक पाता है ॥ ३४ ॥
भीमूर्च्छायन्त्रशैथिल्यकुण्ठशस्त्रातितुतयः ॥ ३५ ॥
क्षामत्त्ववैगितास्वेदा रक्तस्यास्रुतिहेतवः ।
३००
अष्टाङ्गहृदये
रक्त न बहने के कारण—भय, मूर्च्छा, यन्त्रण कर्म का ढीलापन, यन्त्र के कुण्ठित होने से सिरा का समुचित वेध न हो पाना, अधिक भोजन करने के बाद सिरावेध करना, शरीर की क्षीणता, मल-मूत्र आदि के वेग की तीव्र प्रवृत्ति तथा सिरावेध के पहले समुचित स्वेदन कर्म का अभाव—ये सभी सिरावेध में से रक्त न निकल पाने में प्रमुख कारण माने गये हैं ॥ ३५ ॥
असम्यगस्ते स्रवति वेत्तव्योषनिशानतैः ॥ ३६ ॥
सागरधूमलवणतैलैर्दिग्वाच्छिरामुखम् ।
रक्तप्रावण के उपाय—यदि सिरावेध करने पर उचित रूप से रक्त न निकल रहा हो तो जिस स्थान पर सिरावेध किया गया है उसके मुखमार्ग पर वायविंडा, साँठ, मरिच, पीपल, हल्दी, तगर, गृहधूम तथा नमक के चूर्ण को तेल में मिलाकर लेप लगा दें ॥ ३६ ॥
सम्यक्प्रवृत्ते कोण्णेन तैलेन लवणेन च ॥ ३७ ॥
जब समुचित ढंग से रक्त निकल रहा हो तो भी सिरामुख में गुनगुना तेल में नमक मिलाकर लेप कर दें। इस उपाय से रक्त के निकलने में कोई बाधा ( हकावट ) नहीं होती ॥ ३७ ॥
अग्रे स्रवति दुष्टाद्यं कुसुम्भादिव पीतिका।
रक्तप्राव का वर्णन—सिरावेध करते ही सबसे पहले दोषदूषित रक्त उस प्रकार निकलता है, जैसे कुसुम्ब के फूलों में से पीला रंग।
सम्यक्प्रवृत्वा स्वयं तिष्ठेच्छुद्धं तदिति नाहरेत् ॥ ३८ ॥
प्रावण-उपायों का निषेध—यदि सिरावेध करने पर उचित मात्रा में दूषित रक्त निकल कर स्वयं रुक जाय तो फिर ऊपर श्लोक ३६-३७ में कहे गये रक्तप्रावण के उपायों का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्वयं रक्तप्राव के रुक जाने के बाद उक्त प्रयत्न करने पर जो रक्त निकलेगा वह शुद्ध रक्त होगा, उसकी रक्षा करें ॥ ३८ ॥
यन्त्रं विमुच्य मूर्च्छायां वीजिते व्यजनैः पुनः । प्रावयेन्मूर्च्छति पुनस्त्वपरेद्युस्थ्यहेऽपि वा ॥ ३९ ॥
मूर्च्छा में कर्तव्य—यदि सिरावेध करते समय रोगी को रक्तदर्शन से मूर्च्छा ( बेहोशी ) आ जाय तो शीघ्र ही बन्धन को खोलकर उसे पंखे से हवा करनी चाहिए, इससे उसकी मूर्च्छा शान्त हो जाती है। इतने पर भी शान्त न हो तो मूर्च्छानाशक अन्य उपाय करें। स्वास्थ्य-लाभ हो जाने पर पुनः सिरावेध करें, यदि फिर मूर्च्छित हो जाय तो दूसरे अथवा तीसरे दिन फिर सिरावेध करें ॥ ३९ ॥
वक्तव्य—रक्तदर्शन का प्रभाव ऐसा होता है कि इससे डरपोक तथा साहसी दोनों भी मूर्च्छित होते देखे जाते हैं। देखें—'वातादिभिः शोणितेन' ( सु.उ. ४६।८ ) अर्थात् छः प्रकार से होने वाली मूर्च्छा में शोणित ( रक्त ) भी अन्यतम कारण होता है। सिरावेध द्वारा साध्य रोगों में इसे कराना आवश्यक होता है। रक्त को देखकर आने वाली मूर्च्छा बार-बार नहीं आती। इससे सम्बन्धित सु.शा. ८।१३-१५ के इन पद्यों का भी परिशीलन अवश्य कर लेना चाहिए।
वाताच्छचावारुणं रुक्षं वेगप्राग्व्यच्छफेनितम् ।
वातदूषित रक्त के लक्षण—वातदोष से दूषित रक्त का वर्ण श्याव तथा अरुण ( ईट के वर्ण का ), रुक्ष, वेग से निकलने वाला, पतला तथा झागदार होता है।
पित्तात् पीतासितं विघ्नमस्कन्दौष्यात्सचन्द्रिकम् ॥ ४० ॥
पित्तदूषित रक्त के लक्षण—पित्तदोष से दूषित रक्त का वर्ण कुछ पीला, कुछ काला, विघ्न ( आमगन्ध वाला ), शीघ्र न जमने वाला, उष्ण होने के कारण चन्द्रिकाओं ( चमकीली रेखाओं ) से युक्त देखा जाता है ॥ ४० ॥
सिराब्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
३०१
कफात् स्निग्धमसुक्पाण्डु तन्तुमप्लिच्छिन् धनम्।
कफदूषित रक्त के लक्षण—कफदोष से दूषित रक्त स्निग्ध ( चिकना ), पीले वर्ण वाला, तन्तुमत् ( लार के सदृश ), प्लिच्छिन् ( चिपचिपा ) तथा गाढ़ा होता है।
संयुष्टलिङ्गं संसर्गात्—
द्वन्द्वज रक्त के लक्षण—दो-दो दोषों द्वारा दूषित रक्त में उन-उन दोषों के लक्षण दिखलायी देते हैं, जिन्से वह रक्त युक्त होता है।
—त्रिदोषं मलिनाविलम् ॥ ४१ ॥
त्रिदोषज रक्त के लक्षण—त्रात आदि तीनों दोषों से दूषित रक्त मलिन वर्ण वाला तथा आविल ( गदला ) होता है ॥ ४१ ॥
अशुद्धौ बलिनोऽप्यन्नं न प्रस्थात्तावयेत्परम्। अतिसुतो हि मृत्युः स्याद्वाऋणा वा चलाभयाः ॥
सिरावेध में रक्त का परिमाण—बलवान् रोगी का भी अशुद्ध रक्त एक बार में एक प्रस्थ से अधिक नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि अधिक मात्रा में रक्त के निकल जाने पर अत्यन्त कष्टकारक वातरोग हो सकते हैं अथवा मृत्यु भी हो सकती है ॥ ४२ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने भी रक्तमोक्षण का १ प्रस्थ परिमाण माना है। 'बलवान्, प्रचुर दोष वाले तथा युवा पुरुष का अधिक-से-अधिक १ प्रस्थ रक्त निकालना चाहिए'। देखें—सु. शा. ८।१६। इस सम्बन्ध में कहा गया है—'वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे। सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहूर्मनीषिणः'। ( शा.सं.उ. ३।१८ ) इसके अनुसार १ प्रस्थ ६४ तोला का नहीं अपितु १३ १/३ पल = ५४ तोला का होता है। सिरावेध से निकले हुए रक्त का किसी चौड़े पात्र में संग्रह करके देखें कि कहीं अधिक रक्त तो नहीं निकल गया। क्योंकि अधिक रक्त न निकल जाय, अतएव कहा है—'देहस्थ रघिरे मूलं रघिरेणैव धार्यते। तस्माद्यलनेन संस्थं रक्तं जीव इति स्थितिः' ॥ ( सु.सू. १।४४ )
तत्राभ्यङ्करसक्षीररक्तपानानि भेषजम्।
विविध चिकित्सा—यदि अधिक मात्रा में रक्त निकल गया हो तो शीघ्र ही अभ्यंग, मांसरस, दूध अथवा बकरा आदि नीरोग प्राणी का रक्त उसे पिलाना चाहिए। इसे 'स्वयोनिवर्धन' चिकित्सा कहते हैं।
सुते रक्ते शतैर्यन्त्रमपनीय हिमाञ्चुना ॥ ४३ ॥
प्रक्षाल्य तैलप्लोताक्तं बन्धनीयं सिरामुखम्।
उपचार-विधि—यदि रक्त का स्त्राव अधिक मात्रा में हो गया हो तो तत्काल बन्धन को खोलकर उस सिरा के मुख को बरफ के पानी से धोकर उसके ऊपर तेल में भिगाया हुआ रुई का फाहा रखकर पट्टी बाँध दें ॥ ४३ ॥
अशुद्धं स्त्रावयेद्भ्यः सायमहृद्यपरैऽपि वा ॥ ४४ ॥
स्नेहोपस्कृतदेहस्थ पक्षाद्वा भृशदूषितम्।
पुनः सिरावेध—यदि कुछ अशुद्ध रक्त शेष रह गया हो तो उसका पुनः सिरावेध-विधि से उसी दिन सायंकाल अथवा दूसरे दिन रक्त-निर्हरण करा दें। अधिक रक्त दूषित हो तो रोगी को स्नेहन कराकर १५ दिन में फिर सिरावेध कराना चाहिए ॥ ४४ ॥
किञ्चिद्वि शेषे दुष्टास्ते नैव रोगोऽतिवर्तते ॥ ४५ ॥
सशेषमप्यतो धार्यं न चातिस्रुतिमाचरेत्।
३०२
अष्टाङ्गहृदये
अधिक रक्तस्राव का निषेध—यदि कुछ दूषित रक्त बच भी जाता है तो रोग बढ़ता नहीं, अतः भले ही दूषित रक्त शेष रह जाता है तो बुरा नहीं है; किन्तु रक्त का अधिक स्राव नहीं होना चाहिए ॥ ४५ ॥
हरेच्छङ्गादिभिः शेषम्—
शृंगयन्त्र का प्रयोग—जो दूषित रक्त पहली बार में नहीं निकल पाया उसका निर्हरण सिंघी आदि यन्त्रों के प्रयोग से करें।
—प्रसादमथवा नयेत् ॥ ४६ ॥
शीतोपचारपित्ताघ्नक्रियाशुद्धिविशेषणैः । दुष्टं रक्तमनुद्विक्तमेवमेव प्रसादयेत् ॥ ४७ ॥
रक्तशुद्धि के उपाय—अथवा जो अशुद्ध रक्त शेष रह गया है, उसे शुद्ध करने के लिए निम्नलिखित उपायों का प्रयोग करें। शीतल उपचारों (आहार-विहार तथा औषध-प्रयोगों) से, रक्तपित्त-अधिकार में कहीं गयी चिकित्सा-विधि से, वमन-विरेचन आदि शोधन उपायों से, लंघन आदि सुखाने के उपायों से वह दूषित रक्त, जो बाहर नहीं निकल पाया है, उसे इन विधियों से शुद्ध करें ॥ ४६-४७ ॥
रक्ते त्वतिष्ठति क्षिप्रं स्तम्भनीमाचरेक्रियाम् ।
स्तम्भनक्रिया-निर्देश—यदि रक्त का स्राव न रुक रहा हो तो शीघ्र ही निम्नलिखित स्तम्भनकारक (रोकने वाली) चिकित्सा करें।
रोधप्रियङ्गुपत्तङ्गमाषयष्टद्याहुरैरैकैः ॥ ४८ ॥
मृत्कपालाज्जनक्षौममघीक्षीरित्वगङ्कुरैः । बिचूर्णयेद्व्रणमुखं पश्चादिहिमं पिबेत् ॥ ४९ ॥
तामेव वा सिरां विधेद्व्यधात्तस्मादनन्तरम् । सिरामुखं वा त्वरितं दहेत्तपशलाकया ॥ ५० ॥
रक्तस्तम्भन-उपचार—व्रणमुख (जहाँ सिरावेध किया है) पर लोह, प्रियंगु, पतंग, उड़द, मुलेठी, गेरु, मृत्कपाल (मिट्टी के घड़े के टुकड़े), सफेद या काला सुरमा, रेशमी वस्त्र की राख, क्षीरी वृक्षों (जिन वृक्षों की छाल से दूध निकलता हो) की छाल तथा अंकुरों का चूर्ण बनाकर डालें या बुरक दें अथवा पश्चादि गण (अ.हृ.सू. १५।१२) के द्रव्यों का हिम पीना चाहिए अथवा पहले किये हुए वेधस्थल से ३-४ अंगुल ऊपर की ओर सिरावेध कर दें अथवा आग में तपाईं हुई लोहे की शलाका से उस सिरावेध वाले छिद्र को जला दें। इन उपचारों से रक्त का निकलना बन्द हो जाता है ॥ ४८-५० ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने भी प्रायः ये ही उपाय रक्तस्राव को रोकने के लिए बतलाये हैं। देखें—सू. सू. १५।३९-४०।
उन्मार्गगा यन्त्रनिपीडनेन स्वस्थानमायान्ति पुनर्न यावत् ।
दोषाः प्रदुष्टा रुधिरं प्रपन्नास्तावद्विताहारविहारभाक् स्यात् ॥ ५१ ॥
रक्तस्रावण का पश्चात्कर्म—रक्तधातु में गये हुए दूषित वात आदि दोष यन्त्रण (बन्धन) क्रिया द्वारा जब उलटी ओर को गतिशील हो जाते हैं और जब तक वे दोष अपने स्थान में नहीं आ जाते, तब तक उक्त रोगी को हितकर आहार-विहार का सेवन करते रहना चाहिए ॥ ५१ ॥
नात्युष्णशीतं लघु दीपनीयं रक्तेऽपनीते हितमत्तपानम् ।
तदा शरीरं ह्यनवस्थितासुगप्रिविशेषादिति रक्षितव्यः ॥ ५२ ॥
रक्तस्रावण में पथ्य—सिरावेध-विधि से रक्त-निर्हरण करने के बाद वह अन्न (आहार), पान (पेय) हितकर होता है, जो न अधिक गरम हो और न जो अधिक शीतल हो, लघु (सुपाच्य) तथा दीपनीय (अग्निवर्धक) हो; क्योंकि उस समय अर्थात् रक्तमोक्षण काल में रक्तधातु अत्यन्तस्थित हो जाता है, अतएव पाचक आदि शरीरस्थ अग्नियों की विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
सिराब्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
३०३
वक्तव्य—सुश्रुत में उक्त विषय को इस प्रकार कहा गया है—'रक्तधातु के क्षीण हो जाने पर, रक्त का प्राप्त हो जाने पर पाचकाग्नि मन्द पड़ जाता है और वातदोष प्रकुपित हो जाता है। इसलिए न अधिक गरम, न अधिक शीतल, हल्के, स्निग्ध, रक्तवर्धक, खट्टे तथा मीठे भोजन उसे खिलायें'। चरक सू. २४ में उक्त ५१ तथा ५२ श्लोक अविकलरूप से क्रम संख्या २३ तथा २४ में दिये हैं।
प्रसन्नवर्णोन्दिप्रमिन्दिप्रार्थानिच्छन्तमव्याहतपक्ववेगम् । सुखान्वितं पुष्टिबलोपपन्नं विशुद्धरक्तं पुरुषं वदन्ति ॥५३॥ इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने शिराब्यधविधिनाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
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रक्तशुद्धि के लक्षण—जिसका वर्ण प्रसन्न ( कान्ति = प्रभासम्भ्रम ) हो, ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न हों अर्थात् अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में समर्थ हों, जो श्रोत्र आदि विषयों के अर्थों ( विषयों ) को ग्रहण करना चाहता हो, जिसकी पाचन क्रिया में किसी प्रकार की रुकावट न हो, जो सुख, पुष्टि तथा बल से युक्त हो, उस पुरुष को विशुद्ध रक्त वाला कहते हैं ॥५३॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिल्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में सिराब्यधविधि नामक सताईसवर्ग अध्याय समाप्त ॥ २७ ॥
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अष्टाविंशोऽध्यायः
अथातः शल्यहर्षणविधिमध्येषां व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से विविध प्रकार के शल्यों को निकालने की विधियों का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —सुश्रुत ने शल्य का परिचय इस प्रकार दिया है—‘त्र्व मनःशरीराऽऽबाधकराणि शल्यानि’। (सु.सू. ७।४) तथा ‘सर्वशरीराऽऽबाधकरं शल्यम्’। (सु.सू. २६।५) अर्थात् जो सम्पूर्ण शरीर तथा मन को पीड़ित करता है, उसे शल्य कहते हैं। आशुगमनार्थक शलू धातु से यत् प्रत्यय जोड़कर शल्य शब्द निष्पन्न होता है। इसके उपादान ये हैं—बर्छां, सींग, बाण, कांटा, हड्डी, दूषित रक्त, गर्भ, शोक, शत्रु, विषाद आदि। सिराबेध-विधि के बाद अब यहाँ से शल्यहर्षण-विधि का वर्णन प्रारम्भ किया जा रहा है, क्योंकि पहले अध्याय में सम्पूर्ण शरीरव्यापी दूषित रक्त रूप शल्य को निकालने का उपक्रम किया गया था। अब इस अध्याय में शरीर के प्रत्येक अवयव में प्रविष्ट लोह आदि शल्य के लक्षणों तथा उनको निकालने के उपायों का वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —सु.सू. २६-२७ तथा अ.सं.सू. ३७ में देखें। इस विषय का वर्णन चरकसंहिता में उनके सिद्धान्तानुसार नहीं है।
वक्रजूर्तिर्यगुर्धार्धः शल्यानां पञ्चधा गतिः ।
शल्य की गतियाँ—शरीरावयवों में प्रविष्ट होते समय शल्यों की गति पाँच प्रकार से होती है। यथा—१. वक्र ( टेढ़ी ), २. ऋजु ( सीधी ), ३. तिर्यक् ( तिरछी ), ४. ऊर्ध्व ( ऊपर की ओर ) तथा ५. अधः ( नीचे की ओर ) ।
वक्तव्य —उक्त पाठ के आधारस्थलों का अवलोकन करें—सु.सू. २६।८ तथा अ.सं.सू. ३७।३ पर। शल्यशास्त्र में शल्य शरीर एवं आगन्तुज भेद से दो प्रकार का माना जाता है। इनको निकालने की विधियों का इस अध्याय में वर्णन किया गया है।
ध्यामं शोफरुजावन्तं श्रवन्तं शोणितं मुहुः ॥ १ ॥
अभ्युद्गतं बुद्धवत्पिटिकोपचितं ब्रणम्। मुदुमांसं च जानीयादन्तःशल्यं समासतः ॥ २ ॥
अन्तःशल्य के लक्षण —संक्षेप से अन्तःशल्य ( भीतर गये हुए शल्य ) के ये लक्षण होते हैं—ध्याम ( काला या मलिन ) वर्ण वाला, उस स्थान पर शोथ तथा पीड़ा का होना, जिस स्थान से बार-बार रक्तस्राव हो रहा हो, जो स्थान बुलबुला की भाँति उभार युक्त हो, जिसके आस-पास में अनेक छोटी-छोटी पिडकाएँ हो गयी हों और जहाँ का मांस मुदु ( कोमल ) हो गया हो, ये अन्तःशल्य के लक्षण हैं ॥ १-२ ॥
विशेषात्स्वगते शल्ये विवर्णः कठिनायतः । शोफो भवति—
त्वचागत शल्य के लक्षण —विशेष करके यदि शल्य त्वचा में प्रविष्ट होता है, तो उस स्थान की त्वचा का रंग बदल जाता है। वह स्थान स्पर्श में कठोर तथा चौड़ा हो जाता है।
—मांसस्थे चोषः शोफो विवर्द्धते ॥ ३ ॥
शल्याहरणविधिर्ध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०५
पीडनाक्षमता पाकः शल्यमार्गो न रोहति।
मांसगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मांसाधतु में प्रविष्ट होता है तो चोष ( चूसने की जैसी पीड़ा ) होता है, उस स्थान पर शोथ बहने लगता है, उस स्थान को छूने में कष्ट होता है, वह स्थान पक जाता है और चिकित्सा करने पर शल्यमार्ग ( जहाँ से शल्य भीतर घुसा वह ) शोष भरता नहीं है ॥ ३ ॥
पेश्यन्तरगते मांसप्राप्तवच्छ्रयं विना ॥४॥
पेशीगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मांसपेशियों ( मांसाधतु में ही प्रविष्ट होकर वायुपेशियों का विभाजन करता है ) के भीतर प्रविष्ट हो जाता है, तो इसमें भी मांसगत शल्य के उक्त सभी लक्षण हो जाते हैं, किन्तु इसमें सूजन नहीं होती ॥ ४ ॥
आक्षेपः स्नायुजालस्य संरम्भस्तम्भवेदनाः । स्नायुगे दुर्हरं चैतत्—
स्नायुगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य स्नायुओं में प्रविष्ट हो जाता है तो स्नायुजाल में आक्षेप ( विंचाव ), संरम्भ ( क्षोभ—हलचल ), स्तम्भ ( जड़ता ) तथा पीड़ा होती है और यह शल्य बड़े कष्ट से निकाला जा सकता है।
बक्तव्य—स्नायु-परिचय—इनसे शरीर में स्थित मांसपेशियाँ, अस्थियाँ, मेदोधातु तथा सन्धियाँ दृढ़ता से बँधी रहती हैं। ये शिराओं से अधिक मजबूत होती हैं। देखें—शा. सं. पू. खं. ५५५।
—सिराध्मानं सिराश्रिते ॥५॥
सिरागत शल्य के लक्षण—यदि शल्य सिराओं में प्रविष्ट हो जाता है तो सिराएँ आध्मान युक्त हो जाती हैं अर्थात् फूल जाती हैं ॥ ५ ॥
स्वकर्म्मगुणहानिः स्यात्स्रोतसां स्रोतसि स्थिते ।
स्रोतोगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य स्रोतों में प्रविष्ट हो जाता है तो स्रोतों के कर्मा तथा गुणों की हानि हो जाती है।
बक्तव्य—स्रोतसु-परिचय—सु.शा. ५६; सु.शा. ९१२ तथा च.शा. ७१२ में देखें। शरीर के भीतर मन, प्राण, अन्न, जल, दोष, धातु, उपधातु, धातुओं के मल तथा मूत्र आदि जिन मार्गों में से होकर संचार करते हैं, उन्हें स्रोतसु कहते हैं। इनका निर्माण—वायु ऊष्मा से युक्त होकर यथायोग्य इन स्रोतों का निर्माण करता है।
धमनीस्थेऽनिलो रक्तं फेनयुक्तमुदीरयेत् ॥६॥
नियर्याति शब्दवान् स्याच्च हृत्लासः साङ्ख्यवेदनः ।
धमनीगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य धमनी में प्रविष्ट हो तो वायु झागदार रक्त को बाहर की ओर निकालता है तथा शब्द करता हुआ वायु भी उसमें से निकलता है और सम्पूर्ण शरीर में वेदना होती है, जो मिचलता है ॥ ६ ॥
सङ्ख्यो बलवानस्थिसन्धिप्राप्तेऽस्थिपूर्णता ॥७॥
अस्थिसन्धिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य अस्थि की सन्धि में प्रविष्ट होता है तो उसमें जोरदार रगड़ लगती है और अस्थि का वह पोल्ला भाग उस शल्य से भर जैसा जाता है, यही उसकी पूर्णता है ॥ ७ ॥
बक्तव्य—यहाँ महर्षि वाग्भट पूर्णतया सुश्रुत से प्रभावित हैं। देखें—‘अस्थिविवरणतेऽस्थि-पूर्णताऽस्थिनित्तोदः संहर्यो बलवांश्च’ । ( सु.सू. २६१० ) वाग्भट ने जहाँ ‘अस्थिसन्धि’ कहा है, उसे सुश्रुत
२० अ० ह०
३०६
अष्टाङ्गहृदये
ने 'अस्थिविवर' कहा है। इस दृष्टि से सुश्रुतकोष पाठ अधिक समीचीन है, क्योंकि विवर की पूर्णता बाहरी शल्य से हुई है, यह स्थिति अस्थिसन्धि में नहीं होती। क्या यहाँ ऐसा पाठ तो नहीं रहा? 'सद्घर्षं बलवान्स्थिमध्यप्राप्ते'। विद्वान् विचार करें, क्योंकि आगे अस्थिसन्धि का वर्णन दिया है।
नैकरूपा रुजोऽस्थिस्थे शोफः—
अस्थिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य अस्थि में प्रविष्ट (धँसा) होता है तो अनेक प्रकार की (भ्रम, लूण, मुदित, पीडित, नीचे की ओर को झुकाना आदि) पीड़ाओं की उत्पत्ति होती है और उसके आसपास सूजन भी हो जाती है।
—तद्वच्च सन्धिगे।
चेष्टानिवृत्तिश्च भवेत्—
सन्धिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य सन्धियों में धँसा होता है तो अस्थिशल्य के समान लक्षण इसमें भी होते हैं और उस सन्धि में पहले की भाँति लोच नहीं रह जाती अर्थात् वह सन्धि ठीक से मुड़ नहीं सकती।
—आटोपः कोष्ठसन्धिते ॥ ८ ॥
आनाहोऽन्नशकृन्मूत्रदर्शनं च व्रणानने।
कोष्ठगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य कोष्ठ में प्रविष्ट हुआ हो तो व्रण के मुख में अन्न, मल तथा मूत्र का दिखलायी देना, पेट में हलचल तथा आनाह (अफरा) ये लक्षण दिखलायी पड़ते हैं ॥ ८ ॥
विद्यान्मर्मगतं शल्यं मर्मविद्रोपलक्षणैः ॥ ९ ॥
मर्मगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मर्मस्थान में धँसा हो तो उसमें मर्मविद्र के लक्षण दिखलायी देते हैं ॥ ९ ॥
वक्तव्य—देखें—सू. सू. २५।३५; सु. शा. ६।१९-२० तथा अ. हू. शा. ४।४७ में मर्मविद्र के लक्षण।
यथास्वं च परिस्रावैस्त्वगादिषु विभावयेत्।
सामान्य निर्देश—'यथास्वं' का अर्थ है लचा आदि के स्रावों को देखकर शल्य कहाँ धँसा है, उसका निर्णय इस दृष्टि से करें। यथा—त्वचा में लसीकास्राव को देखकर, सिरा में रक्तस्राव से, अस्थि में मज्जास्राव से, आमाशय में अन्न के निकलने से, मलाशय में मल के निकलने से और मूत्राशय में मूत्र के निकलने को देखकर शल्य का निर्णय कर लेना चाहिए।
रुह्यते शुद्धदेहानामनुलोमस्थितं तु तत् ॥ १० ॥
शल्यव्रण का रोपण—वमन तथा विरेचन आदि शोधन-क्रियाओं द्वारा शुद्ध शरीर वालों का वह शल्य के चुभने से हुआ व्रण शल्य के अनुलोम गति से भीतर स्थित रहने पर भी स्वयं ही भर गया है, ऐसा प्रतीत होता है ॥ १० ॥
दोषकोपाभिघातादिशोभाद्रयोऽपि ब्राधते।
पुनः पीडाकर्तृत्व—शल्य के निकल जाने पर ही व्रण को सम्यक् रुद्ध नहीं समझ लेना चाहिए, क्योंकि इस व्रणस्थान पर पुनः कभी दोषों का प्रकोप होने पर, चोट लगने पर या धक्का आदि के लगने पर भीतर स्थित शल्य फिर भी पीड़ा पहुँचा सकता है।
त्वङ्नष्टे यत्र तत्र स्युरभ्यङ्गस्वेदमर्दनैः ॥ ११ ॥
शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०७
रागरुढाहसंरम्भा यत्र चाज्यं विलीयते। आशु शूष्यति लेपो वा तत्स्थानं शल्यबद्धते॥ १२॥
शल्यज्ञान के उपाय—त्वचा आदि स्थानों में अदृश्य हुए शल्य को कैसे जानना चाहिए, इसके उपायों का क्रमशः वर्णन किया जा रहा है। त्वचागत शल्य—जहाँ त्वचा में शल्य प्रवेश कर अदृश्य हो गया हो, उसका पता लगाने के ये उपाय हैं—वहाँ अभ्यंग, स्वेदन तथा मर्दन करने से उस स्थान-विशेष पर लालिमा, पीड़ा, दाह तथा संरम्भ ( हलचल ) होता है; वहाँ घी सरलता से पिघल जाता है और लगाया हुआ लेप शीघ्र सूख जाता है। ऐसे स्थान को शल्य युक्त समझें॥ ११-१२॥
मांसप्रणष्टं संशुद्ध्या कर्शनाच्छूलयतां गतम्। क्षोभद्रागादिभिः शल्यं लक्षयेत्—
मांसगत शल्य—मांसपेशियों में खोये हुए शल्य को वमन-विरचन द्वारा शरीर-शोधन करने के कारण शरीर के शिथिल हो जाने पर, शरीर के हिलने-डुलने से, लालिमा दिखलायी देने से तथा पीड़ा आदि से यहाँ शल्य होना चाहिए, ऐसा समझना चाहिए।
—तद्वदेव च॥ १३॥
पेश्यस्यिसन्धिकोष्ठेषु नष्टम्—
पेशीगत आदि शल्य—इसी प्रकार मांसपेशियों के मध्य में, अस्थिसन्धियों में तथा कोष्ठप्रदेश के अन्तर्गत अदृश्य शल्य के प्रमुख स्थान को पहचान लेना चाहिए॥ १३॥
—अस्थिषु लक्षयेत्। अस्न्यामभ्यज्जनस्वेदबन्धपीडनमर्दनैः॥ १४॥
अस्थिगत शल्य—अस्थियों में अदृश्य हुए शल्य को अभ्यंग, स्वेदन, बन्धन, पीडन तथा मर्दन विधियों से उसका स्थान-निर्धारण कर लें॥ १४॥
प्रसारणाकुञ्चनतः सन्धिन्ष्टं तथाऽस्थिवत्।
सन्धिगत शल्य—सन्धिगत अदृश्य शल्य का ज्ञान अस्थिगत शल्य की भाँति करें। विशेष करके प्रसारण ( फैलाना ) तथा आकुंचन ( सिकोड़ना या बटोरना ) आदि क्रियाओं से समझें।
नष्टे स्नायुशिराघ्नोतोधमनीञ्चसमे पथि॥ १५॥
अधयुक्तं रथं खण्डचक्रमारोप्य रोगिणम्। शीघ्रं नयेतस्तस्य संरम्भाच्छल्यमादिशेत्॥ १६॥
स्नायु आदि गत शल्य—स्नायु, सिरा, घ्नोतसों तथा धमनियों में प्रविष्ट शल्य जब अदृश्य हो जाय तो उस रोगी को टूटे पहिये वाले रथ पर बैठाकर उसमें घोड़ा जोतकर शीघ्र ले जाय। उसके संरम्भ से जहाँ शल्य होगा-वह स्थान दुःखने लगेगा॥ १५-१६॥
मर्मनष्टं पृथङ्नोक्तं तेषां मांसादिसंश्रयात्।
मर्मगत शल्य—यहाँ मर्मगत शल्य को अलग से नहीं कहा गया है, क्योंकि मर्मस्थलों के आश्रयस्थल मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि तथा सन्धियाँ ही हैं।
सामान्येन सशल्यं तु क्षोभिण्या क्रियया सख्यु॥ १७॥
सामान्य निर्देश—सामान्य रूप से वहाँ शल्य समझना चाहिए, जहाँ हिलाने-डुलाने तथा दबाने से पीड़ा हो॥ १७॥
वृत्तं पृथु चतुष्कोणं त्रिपुटे च समासतः। अदृश्यशल्यसंस्थानं ब्रणाकृत्या विभावयेत्॥ १८॥
शल्य के स्वरूपों का अनुमान—अदृश्य ( जो देखा गया न हो ऐसे ) शल्य के स्वरूप का ज्ञान ब्रण ( घाव ) की आकृति से समझने का प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि प्रायः सभी शल्यों के अवयव नष्ट