भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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सप्तविंशोऽध्यायः

अथातः सिराव्यधविधिमध्येयां व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से सिराव्यध (सिरावेध) विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इसके पहले अध्याय में अलानु (तुम्बी), भुंगी, जलौका (जोंक) तथा पच्छ लगाना आदि विधियों द्वारा रक्तावसेचन (रक्तनिर्हरण अथवा रक्ताहरण) के उपायों का वर्णन किया था, उसी क्रम में आने वाले सिरावेध-विधि का स्वतन्त्र वर्णन प्रस्तुत अध्याय में किया जा रहा है, क्योंकि इसका विषय अधिक विस्तृत है।

वात आदि दोषों द्वारा दूषित रक्तधातु जब कभी रोगोत्पत्ति का प्रधान कारण हो जाता है, तब रक्तघाव किया एवं कराया जाता है और सिरावेध रक्तस्त्रावण की प्रमुख विधि है। पञ्जाब आदि देशों में जहाँ रक्तसार मनुष्य होते हैं, वहाँ वमन-विरेचन की भाँति सिरावेध भी कराया जाता है। ऋतुचर्या के क्रम में जहाँ सिरावेध कराया जाता है उसका उत्तम काल है—शरद ऋतु। ध्यान रहे, जहाँ रक्तविकार में सिरावेध कराने में किसी प्रकार की बाधा प्रतीत होती है, वहाँ विरेचन कराने से भी लाभ होता है, फिर भी रक्तजनित विकारों की सिरावेध उत्तम चिकित्सा कही गयी है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सु.सू. १४; सु.शा.८; च.सू. २४ तथा अ.सं.सू. ३६ में देखें।

मधुर लवणं किञ्चिदशीतोष्णमसंहृतम्। पञ्चन्द्रगोपहेमाविशशलोहितलोहितम् ॥ १ ॥ लोहितं प्रभवः शुद्धं, तनोस्तेनैव च स्थितिः।

शुद्ध रक्त का वर्णन —शुद्ध रक्त का परिचय—यह मधुररस युक्त, हल्का नमकीन, समशीतोष्ण, असंहत अर्थात् गाँठरहित (द्रवरूप), कमल की पंखुड़ी, इन्द्रगोप (बीरबहटी), तपाये गये सोने तथा अवि, शश (भेड़ एवं खरगोश) के रक्त के सद्गुण लाल वर्ण वाले रक्त को शुद्धरक्त कहते हैं। (हम शब्द से कुछ आचार्य 'मजीठ' का ग्रहण करते हैं।) इसी रक्त से शरीर स्थित (स्वस्थ) रहता है ॥ १ ॥

वक्तव्य —रक्त के पर्याय—लाल वर्ण वाला होने से इसे 'रक्त', इसमें लोहधातु के पाये जाने से इसे 'लोहित', गतिशील होने से इसे 'शोणित' तथा शरीर में घाव लगने पर दिखलायी देने के कारण इसे 'क्षतज' कहा जाता है। ऊपर इसे सोने के समान वर्ण वाला कहा गया है, यद्यपि सामान्य सोना पीला दिखता है किन्तु जब इसे तपाया जाता है, तब इसका वर्ण हल्का लाल हो जाता है। अतएव सुवर्ण का एक नाम 'तपनीय' भी है। जैसा कि भगवान् आत्रेय ने च.सू. २४२२ में कहा है। ऊपर शुद्ध रक्त को मधुर कहा है, यही कारण है कि उसे कुत्ता भी चाटता है, अशुद्ध को नहीं। भगवान् धन्वन्तरि ने इस शरीर का मूल आधार रक्त को ही माना है, अतएव इसकी रक्षा करनी चाहिए। इस बात को कहने के लिए उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि—'रक्त ही जीव है'। देखें—सु.सू. १४४४।

तत्तिस्त्वलेष्मलैः प्रायो दूष्यते—

रक्तदूषक तत्त्व —वह शुद्ध रक्त प्रायः पित्तदोष तथा कफदोष को बढ़ाने वाले आहार-विहारों के सेवन से दूषित हो जाता है।