भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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सिराव्यवधिरेखायः २७ ]

सूत्रस्थानम्

२९५

—कुर्वते ततः ॥ २ ॥

विसर्पविद्रधिष्ठीहगुल्माग्रिसदनज्वरान् । मुवनेत्रशिरोरोगमदतुङ्गलवणास्पत्याः ॥ ३ ॥ कुष्ठवातास्रपित्तास्रकन्दम्लोद्विरणघ्रमान् । शीतोष्णस्निग्धरूक्षार्चरूपक्रान्ताश्च ये गदाः ॥ ४ ॥ सम्यक्साध्या न सिध्यन्ति ते च रक्तप्रकोपजाः ।

रक्तज रोग—इस प्रकार दूषित हुआ वह रक्तधातु विसर्प, विद्रधि, प्लीहाविकार, गुल्मरोग, अग्रिमान्द्य, ज्वर, मुखरोग, नेत्ररोग, शिरोरोग, मद, तुषा, मुख का नमकीन बना रहना, कुष्ठरोग, वातरक्त, पित्तरक्त या रक्तपित्त, कडुवें एवं खट्टे इकारों का आना, वमन तथा चक्करों का आना—इन रोगों को उत्पन्न कर देता है। और जो सम्यक्साध्य रोग शीत, उष्ण, स्निग्ध तथा रूक्ष उपचारों के करने पर भी शान्त नहीं हो पाते वे रोग भी रक्तदोष के प्रकोप से उत्पन्न हुए हैं, ऐसा समझ लेना चाहिए ॥ २-४ ॥

बक्तव्य—उक्त रक्तज रोगों की चिकित्सा रक्तशोधक औषध-द्रव्यों के प्रयोग से करें। यदि इनसे भी लाभ न हो तो सिरावेध द्वारा रक्तस्रावण कराना चाहिए।

तेषु स्रावयितुं रक्तमुद्रिक्तं व्यधयेत्सिराम् ॥ ५ ॥

सिरावेध का निर्देश—उक्त रक्तज रोगों में विकारयुक्त अतएव उभड़े हुए रक्त को निकालने के लिए निम्नलिखित विधि से सिरावेध कराना चाहिए ॥ ५ ॥

न तूनपोडशातीतससत्यब्धुतासृजाम् । अस्निग्धास्वेदितारत्यर्थस्वेदितानिलरोगिणाम् ॥ ६ ॥ गर्भिणीसूतिकार्जोणपित्तास्रभासकासिनाम् । अतीसारोदरच्छर्दिपाण्डुसर्वाङ्गशोफिनाम् ॥ ७ ॥ स्नेहपीते प्रयुक्तेषु तथा पञ्चसु कर्मसु । नायन्त्रितां सिरां विध्वेन्न तिर्यङ्नायन्युत्थिताम् ॥ ८ ॥ नातिशीतोष्णवाताम्ब्रेष्वन्यत्रात्ययिकाद्वादात् ।

सिरावेध-विधि—सिरावेध में आयुसीमा—१६ वर्ष की अवस्था से पहले और ७० वर्ष की अवस्था के बाद सिरावेध नहीं कराना चाहिए। जिनका अन्य कारणों से रक्त निकल चुका हो, जिनका स्नेहन तथा स्वेदन न किया गया हो अथवा जिनका अधिक स्वेदन हो गया हो, जो वातरोगी हों, गर्भिणी, सूतिका, अजीर्णरोगी, रक्तपित्त के रोगी, श्वास, कास, अतिसार, उदररोगी, छर्दि ( वमन ) रोगी, पाण्डुरोगी, जिनके सम्पूर्ण शरीर में शोथ हो गया हो, जिसने अभी-अभी स्नेहपान किया हो तथा पंचकर्म कराने के तत्काल बाद सिरावेधन नहीं कराना चाहिए। सिरावेध करने के पहले उसे भलीभाँति बाँध देना चाहिए तभी सिरावेध करें अर्थात् बिना बाँधे सिरावेध न करें। टेढ़ी तथा बिना उभरी सिरा का भी वेधन न करें। अधिक शीत तथा अधिक उष्ण कालों में, जब तेज हवा चल रही हो, बादल छाये हों इन स्थितियों में भी सिरावेध न करें। यदि अत्यन्त आवश्यकता हो तो सावधानीपूर्वक सिरावेध कर डालना चाहिए। यहाँ आत्ययिक रोग से तात्पर्य है—जब अन्य विधियों से लाभ न हो रहा हो तो ऐसी स्थिति को आत्ययिक कहते हैं, ऐसे में सिरावेध कर लेना चाहिए ॥ ६-८ ॥

बक्तव्य—सिराव्यन्त्रण की विधि आगे इसी अध्याय के १८ से २२ तक के पद्यों में दी गयी है।

शिरोनेत्रविकारेषु ललाटघां मोक्षयेत्सिराम् ॥ ९ ॥

अपाङ्गद्यामुपनास्यां वा—

रोग-विशेष में सिरावेध—शिरोरोग तथा नेत्ररोगों में माथा पर की सिरा का अथवा अपांगों ( नेत्र के बाहर के कोण की ) अथवा नासिका के समीप की सिरा का वेधन करे ॥ ९ ॥

—कर्णरोगेषु कर्णजाम् ।

कर्णरोग में सिरावेध—कान के रोगों में कान के समीप वाली सिरा का वेधन करना चाहिए।