भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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शस्त्रविधिरध्यायः २६ ]

सूत्रस्थानम्

२९१

पूर्ववत् पटुता दादर्घ सम्यग्वान्ते जलौकसाम् ॥ ४४ ॥

रक्तवमन का सम्यग्योग—वमन का सम्यक् योग हो जाने पर जोंकों में पहले की भाँति कुशलता तथा दृढ़ता ( सबलता ) प्राप्त हो जाती है ॥ ४४ ॥

कलमोऽतियोगान्मृत्युर्वा—

रक्तवमन का अतियोग—वमन का अतियोग हो जाने पर जोंकों में कलम ( मुस्ती या हर्षक्षय ) हो जाता है अथवा वे मर जाती हैं।

—दुर्वान्ते स्तन्धता मदः ।

रक्तवमन का मिथ्यायोग—वमन का मिथ्यायोग हो जाने पर जोंकों में स्तन्धता ( इधर-उधर घूमने-फिरने में रुकावट ) तथा उन्हें 'रक्तमद' नामक असाध्य रोग हो जाता है, जिससे प्रायः उनकी मृत्यु भी हो जाती है।

अन्यत्रान्यत्र ताः स्थाप्या घटे मृत्तान्मृगभिर्णि ॥ ४५ ॥

लालादिकोयनाशार्थ, सविषाः स्युस्तदन्वयात् ।

जलौकापालन-विधि—जोंकों को उनके स्थानों से लाकर शुद्ध जल में या तालाब के जल में मिट्टी मिलाकर अलग-अलग मिट्टी के घड़ों में रख दें। इनके खाने के लिए सिवार, जलचर प्राणियों के सूखे मांस और कन्दों के चूर्ण दें, सोने के लिए कमलपत्र आदि उसमें डाल दें। तीसरे-तीसरे दिन इस पानी को बदल दें और भोजन-पदार्थ उस जल में डाल दें। सब को अलग रखने का प्रयोजन—इससे जोंकों के परस्पर लालाभाव की सङ्गन नहीं हो पायेगी, क्योंकि लालाभाव के संयोग से ये विषैली हो जाती हैं ॥ ४५ ॥

अशुद्धौ स्रावयेदंशान् हरिद्रागुडमाक्षिकैः ॥ ४६ ॥

जलौकावचारण-पश्चात्कर्म—जोंक को हटा लेने पर भी दंशस्थान से यदि रक्तस्राव हो रहा हो तो रक्त के शुद्ध-अशुद्ध का विचार कर लें। यदि वह दूषित रक्त हो तो उसे बहने दें और उसे बहने देने में हल्दी, गुड़ तथा मधु लगाकर सहायता करें, जिससे वह दूषित रक्त पूर्ण रूप से निकल जाय ॥ ४६ ॥

शतधौताज्यपिचवस्ततो लेपाश्च शीतलाः ।

रक्तावरोधक उपचार—यदि शुद्ध रक्त दंशस्थान से बह रहा हो ( जैसा हमने श्लोक ४९ के वक्तव्य में कहा है ) तो शतधौत घृत के पिचुओं को उन दंशस्थानों में रखें और शीतवीर्यरोपण पदार्थों से निर्मित लेपों को उन स्थानों पर लगायें। इनके प्रयोगों से रक्तस्राव रुक जाता है।

दुष्टरक्तापगमनात् सद्यो रागरुजां शमः ॥ ४७ ॥

रक्तस्रावण का फल—दूषित रक्त के निकल जाने से रोगी की पीड़ाओं तथा उस स्थान पर दिखलायी पड़ने वाली लालिमा का तत्काल शमन हो जाता है ॥ ४७ ॥

अशुद्धं चलितं स्थानात्स्थितं रक्तं ब्रणाशये । व्यस्तीभवत्पर्युषितं तस्मात्तस्त्रावयेत्युनः ॥ ४८ ॥

पुनः रक्तस्रावण—यदि अशुद्ध ( दूषित ) रक्त रणस्थान से विचलित होकर जोंक द्वारा किये गये वाव पर आकर रुक गया हो तो वहाँ आया हुआ वह रक्त बासी होकर खट्टा हो जाता है, अतः उसे पुनः तीसरे दिन जोंक लगाकर निकलवा देना चाहिए ॥ ४८ ॥

युज्यान्नालालाबुघटिका रक्ते पिसेन दूषिते । तासामनलसंयोगात्—

अलालाबुघटिप्रयोग-निषिद्ध—पित्तदोष द्वारा दूषित हुए रक्त का स्रावण करने के लिए अलालाबुघटिका ( तुम्बी ) यन्त्र का प्रयोग न करें, क्योंकि उसके प्रयोग में अग्निसंयोग किया जाता है।