अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
अथेतरा निशाकलकमुक्तेऽस्मसि परिप्लुताः । अवन्तिसोमे तत्रे वा पुनश्चाभ्रासिता जले ॥ ४० ॥ लागयेद्दत्तमुत्तन्तरक्तशस्त्रनिपातनैः । पिवन्तीरत्रतस्कन्धाश्चन्नादयेन्मुदुवाससा ॥ ४१ ॥
जोंक रखने एवं लगाने की विधि—तदनन्तर जो जोंक निर्विष हो उन्हें हल्दी के कल्क से मिले हुए जल से अथवा अवन्तिसोम (काँजी) से या मठा से नहलाकर उसे पानी में छोड़ दें, जिससे वे आश्चर्य हो जायें। यदि वे मनुष्य के शरीर को नहीं पकड़ रही हों तो उस स्थान पर घी, मिट्टी, स्त्री का दूध या रक्त लगा दें अथवा शस्त्र द्वारा पच्छ लगा दें तब वह पकड़ लेगी। जब वह अपने कन्धे को ऊपर की ओर को उठा ले, तो समझ लें वह रक्तपान कर रही है, इस स्थिति में उसे कोमल वस्त्र से ढक देना चाहिए ॥ ४०-४१ ॥
वक्तव्य—सुश्रुतसंहिता-सूत्रस्थान के सम्पूर्ण १३वें अध्याय का भलीभाँति अनुशीलन करें, इसका नाम 'जलीकावचारणीय' है। इसमें उक्त विषय का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
सम्भुक्तादुष्टशुद्धाघ्राज्जलीका दुष्टशोणितम् । आदत्ते प्रथमं हंसः क्षीरं क्षीरोदकादिष्व ॥ ४२ ॥ (गुल्माशौचित्विद्रधीन् कुष्ठवातरक्तगलामयान् । नेत्ररुचिष्ववीसर्पान् शमयन्ति जलीकसः ॥ १ ॥)
दुष्ट रक्तग्रहण-दृष्टान्त—मिले हुए दूषित तथा शुद्ध रक्त में से पहले जोंक दूषित रक्त को चूसती है। जैसे—मिले हुए दूध तथा जल में से हंस पक्षी पहले दूध को पीता है ॥ ४२ ॥ (जोंक लगाने पर जो वह रक्त का आचूषण करती है, उससे गुल्म, अर्ध, विद्रधि (बड़े फोड़े), कुष्ठ, वातरक्त, गल सम्बन्धी रक्त रोग, नेत्रपीड़ा, विषज विकार तथा विसर्पयोग शान्त हो जाते हैं ॥ १ ॥)
वक्तव्य—उक्त दृष्टान्त से यह ज्ञात होता है कि जैसे हंस केवल दूध पी लेता है और जल छोड़ देता है, वैसे ही जोंक भी दुष्ट रक्त का पान कर शुद्ध रक्त को छोड़ देती है। परन्तु यहाँ ऐसी बात नहीं है। आप देखें—'दंशे'...'वकिरेत्' ॥ (सू.सू. १३।२१) अर्थात् विशुद्ध रक्त के पीने पर दंशस्थान पर पीड़ा, खजली आदि लक्षणों को देखकर समझ लेना चाहिए कि यह शुद्ध रक्त का पान कर रही है। इस स्थिति में इसे हटा देना चाहिए। हंस भी तो पानी पीता ही है।
कभी-कभी जोंक के काट लेने पर बहुत रक्तप्राव होने लगता है। इसका कारण है—जोंक के सिर में कई छोटी-छोटी गठि होती हैं, जिनका रस उसके दंशस्थान में पहुँच जाता है। इस रस में हीरुडीन (Hirudin) नामक द्रव्य होता है। जब इसका रक्त में मिश्रण हो जाता है तो रक्त जल्दी जमता नहीं, अतः वह बहता रहता है।
दंशस्थ तोये कण्डुवां वा मोक्षयेत्—
जोंक छुड़ाने की स्थिति—जहाँ जोंक लगी हो अर्थात् रक्त चूस रही हो, वहाँ यदि सूरि चुभाने की-सी पीड़ा हो अथवा खजली हो रही हो तो उसे छुड़ा दें—
—वामयेच्च ताम् । पटुतैलात्कवदानां श्लक्षणकण्डनरुपिताम् ॥ ४३ ॥
जोंक का उपचार—तोद एवं कण्डु लक्षणों से यह समझना चाहिए कि वह शुद्ध रक्त पी रही है। अतः उसे हटा दें, यदि वह न छोड़े तो दंशस्थान पर नमक का चूर्ण बुरक दें और उसके मुख पर तेल लगा दें, इससे वह छोड़ देती है। उसके बाद उसके शरीर पर चावल का चूर्ण डाल कर उसे भलीभाँति व्रमन कराना चाहिए ॥ ४३ ॥
रक्षन् रक्तमदाद्रूपः ससाहं ता न पातयेत् ।
रक्तमद से रक्षा—समुचित व्रमन न कराने पर जोंकों को 'रक्तमद' नामक विकार हो जाता है, इससे जोंकों की रक्षा करनी चाहिए। इस प्रकार एक बार लगाने के बाद फिर उस जोंक को एक सप्ताह तक नहीं लगाना चाहिए।