अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशस्त्रविधिप्रध्यायः २६ ]
सूत्रस्थानम्
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आप भी देखें। धार की सही पहचान है—जब वह रोमों को आसानी के काटने लगे तब समझे कि वह तेज हो गयी है। देखें—सु.सू. ८।१४। इसी प्रकार के दोष रहित शस्त्र का प्रयोग करना चाहिए।
स्यात्रवाङ्गुलविस्तारः सुघनो द्वादशाङ्गुलः। क्षौमपत्रोर्णकौशेयदुक्कूलमृदुचर्मजः ॥ ३३ ॥ विन्यस्तपाशः सुस्तृतः सान्तरोर्णास्थशस्त्रकः। शलाकापिहितस्यास्थ्य शस्त्रकोशः सुसन्ध्रयः ॥
शस्त्रकोष का विस्तार—शस्त्रों को रखने की पेट्टी की चौड़ाई ९ अंगुल और लम्बाई १२ अंगुल होनी चाहिए। उसे घना होना चाहिए, जिससे शस्त्र सुरक्षित रहें, एक-दूसरे से टकराये नहीं; घन का यहाँ तात्पर्य है। वह शस्त्रकोष क्षौम (अलसी के तारों का बना हुआ) का, पत्तों का, ऊनी कपड़े का, कौशेय (रेशमी वस्त्र) का, सामान्य वस्त्र का अथवा मुलायम चमड़े का बनाया जाना चाहिए। उसमें भीतर से पेट्टी लगी हुई हो, अच्छी प्रकार सिला गया हो, प्रत्येक शस्त्र दूर-दूर में ऊन के वस्त्र से लपेट कर रखा गया हो तथा शलाकाओं से इनका मुख ढका रहना चाहिए। यह शस्त्रकोष (पेट्टी) नाई की पेट्टी के समान इधर-उधर ले जाने योग्य हो ॥ ३३-३४ ॥
जलोत्कसस्तु सुखिनां रक्तप्रावाय योजयेत्।
जोंकों का प्रयोग—सुख से जीवन-यापन करने वालों (सुकुमारों) का रक्तप्रावण करने के लिए जोंकों का प्रयोग करना चाहिए।
दुष्टाम्बुमत्स्यभेकाहिशबकोधमलोद्भवः ॥ ३५ ॥
रक्ताः श्वेता भृशं कृष्णाश्चपलाः स्थूलपिच्छलाः। इन्द्रायुधविचित्रोर्वर्धराजयो रोमशाश्च ताः ॥ सविद्या वर्जयेत्—
त्याज्य जोंकों का वर्णन—जो जोंकें दूषित जल में अथवा मछली, मेंढक, सांप आदि प्राणियों के शवों की सड़न से अथवा उनके मल-मूत्रमिश्रित कीचड़ में से पैदा होती हैं, जो लाल, सफेद, अधिक काली, चंचल, मोटी अर्थात् आकार में बड़ी तथा चिपचिपी होती हैं, जिनकी पीठ पर इन्द्रधनुष के आकार की विचित्र ऊपर की ओर रेखाएँ होती हैं एवं जिनके शरीर के ऊपर रोएँ होते हैं वे जोंकें जहरीली होती हैं; उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३५-३६ ॥
—ताभिः कण्टूपाकज्वरप्रमाः। विषपिताम्रनुत्कार्य तत्र—
त्याज्य जोंकों का निषेध—उक्त प्रकार की जोंकों का यदि रक्तविप्रावण में उपयोग किया जाता है, तो खुजली, पाक (पकना), ज्वर, चक्करों का आना आदि उपद्रव हो जाते हैं। इस स्थिति में विषनाशक, पित्तशामक तथा रक्तशोधक चिकित्सा करनी चाहिए।
—शुद्धाम्बुजाः पुनः ॥ ३७ ॥
निर्विषाः शैवलक्षयावा वृत्ता नीलोर्व्वराजयः। कषायपृष्टास्तन्वङ्ग्यः किञ्चित्पीतोदराश्च याः ॥
ग्राह्य जोंकों का वर्णन—जो जोंकें साफ जल में पैदा होती हैं, वे निर्विष होती हैं। उनका वर्ण सिंवार के सदृश साँवला तथा शरीर लम्बा एवं गोल होता है। उसके ऊपर नीली रेखाएँ ऊपर की ओर की होती हैं। उनकी पीठ का रंग बरगद वृक्ष की छाल का जैसा होता है। ये पतले आकार की होती हैं और इनके पेट का वर्ण कुछ पीताभ होता है ॥ ३७-३८ ॥
ता अय्यसम्यक्वमनात् प्रततं च निपातनात्। सीदन्तीः सलिलं प्राप्य रक्तमत्ता इति त्यजेत् ॥ ३९ ॥
त्याज्य जोंकों के लक्षण—वे अच्छी अर्थात् उपयोग में लाने योग्य जोंकें भी यदि रक्तपान कराने के बाद उन्हें भलीभाँति वमन न कराया गया अथवा रक्तचूषण के लिए उन्हें बार-बार लगाने के बाद जब पानी में डाला जाता है और वे दुःखी जैसी प्रतीत होती हैं तो वे रक्तपान करने से मदमत्त हो गयी हैं, ऐसा समझकर उन्हें छोड़ दें ॥ ३९ ॥
१९ अ० हू०