भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

—युज्यात् कर्कवायुना ॥ ४९ ॥

अलाबूयन्त्र-प्रयोग विहित—यदि कफ एवं वात दोष से दूषित रक्तधातु को निकालना हो तो उसमें अलाबूयन्त्र का प्रयोग करें ॥ ४९ ॥

कफेन दुष्टं रुधिरं न शृङ्गेण विनिर्हरेत्। स्कन्धत्वात्—

शृंगयन्त्रप्रयोग-निषेध—कफदोष से दूषित रक्तधातु जम जाता है, अतएव इसका निर्हरण भी शृंगयन्त्र से नहीं करना चाहिए। क्योंकि इसमें अग्निसंयोग का अभाव रहता है, अतः कफ पिघल नहीं सकता।

वक्तव्य—विशेष परिस्थिति के लिए देखें—अ.हृ.सू. २५।२७।

—वातपिताभ्यां दुष्टं शृङ्गेण निर्हरेत् ॥ ५० ॥

शृंगयन्त्रप्रयोग-निर्देश—वातदोष तथा पित्तदोष से दूषित रक्त का निर्हरण शृंगयन्त्र द्वारा करना चाहिए ॥ ५० ॥

गात्रं बद्धवोपरि वृद्धं रज्जा पट्टेन वा समम्। स्नायुसन्ध्यस्थिमर्माणि त्यजन् प्रच्छानमाचरेत् ॥

अधोदेशप्रविसृतेः पदरूपरिगामिभिः। न गाढघनतिर्यभिर्न पदे पदमाचरन् ॥ ५२ ॥

प्रच्छाननैकदेशस्थं ग्रथितं जलजन्मभिः। हरेच्छृङ्गादिभिः सुसप्तसृग्यापि शिराव्यष्टिः ॥ ५३ ॥

प्रच्छानकर्म-निर्देश—प्रच्छान कर्म अर्थात् पच्छ लगाने की विधि—यदि शाखाओं ( हाथ-पैरों ) से पच्छ लगाकर रक्त निकालना हो तो उस स्थान से ५-७ अंगुल ऊपर के अवयव को रस्सी या पट्टी से कसकर बाँधकर तब पच्छ लगाना चाहिए। ध्यान रहे, यह प्रच्छानकर्म स्नायु, सन्धि तथा अस्थि मर्मों के स्थानों को छोड़कर ही लगाना चाहिए। पच्छ लगाते समय नीचे भाग से ऊपर की ओर को पद करने चाहिए। वे ( पद ) न बहुत गहरे हों, न पास-पास में हों, न तिरछे हों और न पद के ऊपर दूसरा पद ( शस्त्र द्वारा घाव ) बनाना चाहिए। एक स्थान स्थित रक्त को पच्छ लगाकर, ग्रन्थि तथा अर्बुद आदि के गठीले रक्त को जोक लगाकर, जहाँ का रक्त सुन्न पड़ गया हो, उसे शृंगयन्त्र द्वारा और सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए दूषित रक्त को सिरावेध द्वारा निकालना चाहिए ॥ ५१-५३ ॥

प्रच्छानं पिण्डिते वा स्यात्—

प्रच्छान आदि का विकल्प—पिण्डित ( गाढ़े ) रक्त में प्रच्छान क्रिया अर्थात् पच्छ लगाना चाहिए।

—अवगाढे जलोक्तसः ।

जलोक्ता-प्रयोग—अवगाढ अर्थात् गम्भीर रक्त में जोक को लगाकर रक्त-निर्हरण करना चाहिए।

त्वकस्येऽलाबुघटीशृङ्गम्—

तुम्बी एवं शृंगी यन्त्र—त्वचागत रक्त को निकालने में पच्छ लगाकर तुम्बीयन्त्र और शृंगीयन्त्र का प्रयोग करना चाहिए।

वक्तव्य—प्रच्छान कर्म सामान्य-विशेष भेद से दो प्रकार का होता है—१. सामान्य खुरचना और २. विशेष छुरा ( उत्तरा ) आदि से गहरा घाव बनाना।

—शिरैव व्यापकेऽसुजि ॥ ५४ ॥

सिरावेध-प्रयोग—सम्पूर्ण शरीर में दूषित रक्त के फैल जाने पर सिरामोक्षण अर्थात् सिरावेध का प्रयोग करना चाहिए ॥ ५४ ॥