भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

सिरावेधन करना है, वह बलवान् हो। उसे स्निग्ध रस (मांसरस) युक्त भोजन करा दिया हो, अग्निताप से अथवा आतप (धूप) से उसका स्वेदन कराकर जानुभर ऊँचे आसन (कुर्सी) पर उसे बैठाये। उसके बालों को कोमल वस्त्र से बाँध दें, उसकी दोनों कोहनियों को दोनों घुटनों पर रख दें और दोनों हाथों में कपड़े के टुकड़े देकर मुद्रियाँ बाँधकर उनसे दोनों मन्चाओं (गरदन की दोनों ओर की धमनियों) को जोर से दबाये। इस समय रोगी दाँतों को कसकर दबाये, खाँसने का प्रयत्न न करे और अपने गालों को फुलाये। इसी समय परिच्चारक (कम्माउण्डर) पीठ की ओर खड़ा होकर कपड़े से इसके गला को लपेटता हुआ अपने बायें हाथ की तर्जनी अँगुली को कपड़ा के दोनों भागों के मध्य में रखकर उसके गले को कसकर बाँधे। यह मुख के भीतरी सिराओं के अतिरिक्त शिरःप्रदेश में स्थित सभी शिराओं को उभाड़ने के लिए यन्त्रणविधि कही गयी है। १८-२९॥

बक्तव्य —इस सिरायन्त्रण कार्य में यह सावधानी रखनी चाहिए कि कहीं अधिक रोगी के श्वास-प्रश्वास न रुके। इस प्रकार यन्त्रित कर देने पर रोगी का मुखमण्डल लाल होकर सभी सिराएँ उभरी हुई दिखलायी देती हैं, इसके बाद ही सिरावेध किया जाता है।

ततो मध्यमयाऽङ्गुल्या वैद्योऽङ्गुष्ठविमुक्त्या। ताडयेत्—

सिरावेधन-विधि—समुचित विधि से सिरायन्त्रण कर देने के बाद चिकित्सक अँगूठा द्वारा छटकायी हुई मध्यम अँगुली से निर्दिष्ट सिरा का ताडन करें।

—उत्थितां ज्ञात्वा स्पर्शाद्वाऽङ्गुष्ठपीडनैः ॥ २३ ॥

कुठार्या लक्षयेन्मध्ये वामहस्तगृहीतया। फलोद्देशे सुनिष्कम्पं सिरां, तद्रुच्च मोक्षयेत् ॥ २४ ॥

ताडयन् पीडयंश्चैनां—

कुठारिका-प्रयोग—जब सिरा उभर आये तब उसे मसल कर अथवा अँगूठा से दबाकर उसे और भी उभार लें, उसके बाद बायें हाथ से मूठ पर पकड़ी गयी कुठारिका को उस उठी हुई सिरा के ऊपर रखकर अँगूठा द्वारा छटकायी गयी मध्यम अँगुली से उस कुठारिका पर आघात करें (चोट मारे), जिससे सिरावेध हो जाता है, फिर रक्तध्राव होने दें। २३-२४॥

—विध्येद्व्रीहिमुखेन तु। अङ्गुष्ठेनोन्नमम्याग्रे नासिकामुपनासिकाम् ॥ २५ ॥

उपनासिका-सिरावेध—नासिका के अगले भाग को अँगूठा से ऊपर की ओर उठाकर उपनासिका सिरा का वेधन ब्रीहिमुख नामक शस्त्र से करना चाहिए। २५॥

अभ्युन्नतविदष्टाग्रजिह्वस्याधस्तदाश्रयाम्।

जिह्वा-सिरावेध—जीभ को तालु की ओर ले जाकर उसे दाँतों से दबाकर जीभ के निचले भाग में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।

यन्त्रयेत्तनयोर्हर्षं ग्रीवाश्रितसिराव्यधे ॥ २६ ॥ ॥

ग्रीवा-सिरावेध—ग्रीवाप्रदेश में आश्रित सिरा का वेधन करने के लिए दोनों स्तनों के ऊपर की ओर यन्त्रण करें। २६॥

पाषाणगर्भहस्तस्य जानुस्थे प्रसूते भुजे। कुशेराश्व्य मृदिते विध्येद्दोर्ध्वपट्टके ॥ २७ ॥

फिर रोगी दोनों हाथों में पत्थर के टुकड़ों को पकड़कर दोनों भुजाओं को घुटनों के ऊपर रख कर और उन्हें फैलाकर बैठ जाय तथा उसके पेट से लेकर गरदन तक के अंगों को मसला जाय और उसके ऊपर पट्टी बाँध दी जाय, तदनन्तर ग्रीवा में सिरावेध करें। २७॥

बक्तव्य —पेट तथा छाती की सिराओं के वेधन के लिए देखें—‘उदरो’...‘देहस्य’। (सु.शा. ८।८)