अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसिराव्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
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विध्यैद्वस्तशिरां बाहवाक्वाकुञ्चितकूपैर । बद्ध्वा सुलोपविष्यस्य मुष्टिमङ्गुष्ठगर्भिणम् ॥ २८ ॥ ऊर्ध्वं वेध्यप्रदेशान्च पट्टिकां चतुरङ्गुले ।
बाहु-सिरावेध—बाँह को फैलाकर तथा अँगूठा को बीच में रखकर मुट्ठी बाँधकर सुख (आराम) से बैठे हुए रोगी के बाँह पर वेधन योग्य स्थान से चार अंगुल ऊपर पट्टी बाँधकर सिरावेध करें ॥ २८ ॥
विध्यैदालम्बमानस्य बाहुभ्यां पार्श्वयोः सिराम् ॥ २९ ॥
पार्श्वस्य सिरावेध—बाहुओं के बल से लटकते हुए दाहिने तथा बायें पार्श्व की किसी एक सिरा का वेधन करें ॥ २९ ॥
प्रहृष्टे मेहने—
लिंग का सिरावेध—मेहन (पुरुष-मूत्रेन्द्रिय) के उत्तेजित होने पर इसकी सिरा का वेधन करें।
—जङ्गासिरां जानुन्यकुञ्चिते ।
जंघा-सिरावेध—प्राँनों को फैलाकर जंघा की सिरा का वेधन करना चाहिए।
पादे तु सुस्थितेऽधस्ताज्जानुसन्धेर्निपीडिते ॥ ३० ॥
गाढ़ं कराभ्यामागुल्फं चरणे तस्य चोपरि । द्वितीये कुञ्चिते किञ्चिदारूढे हस्तवत्ततः ॥ ३१ ॥
बद्ध्वा विध्यैस्तिराम्—
पाद-सिरावेध—पैरों को समतल भूमि पर रखकर जानुसन्धि के नीचे से लेकर गुल्फसन्धि तक हाथों से दबाकर उस पैर के ऊपर दूसरे पैर को कुछ मोड़कर रखें और उसे कुछ ऊँचा करके बाँह के सिरावेध की भाँति जहाँ सिरावेध करना है उससे चार अंगुल ऊपर पट्टी बाँधकर सिरावेधन करें। यह पादसिराओं के यन्त्रण-विधि से लेकर सिरावेध तक का वर्णन कर दिया है ॥ ३०-३१ ॥
—इत्यमनुक्तेष्वपि कल्पयेत् । तेषु तेषु प्रदेशेषु तत्तद्यन्त्रमुपायवित् ॥ ३२ ॥
सिरावेध-निर्देश—उक्त निर्देशों के अनुसार उपाय को जानने वाला चिकित्सक शरीर के उन-उन अनुक्त अंगों का बन्धन कर सिरा को उभाड़ कर उसका वेधन करें ॥ ३२ ॥
मांसले निक्षिपेदेशे ब्रीह्यास्य ब्रीहिमात्रकम् । यवार्धमस्मान्मुपरि सिरां विध्यन् कुठारिकाम् ॥
वेध का परिमाण—मांसल शरीर के अवयवों में ब्रीहिमुख नामक शस्त्र से जी के बराबर गहरा घाव बनाना चाहिए। अस्थियों के ऊपर से गई हुई सिरा का वेधन करना हो तो कुठारिका नामक शस्त्र से आधा जी के बराबर गहरा घाव करना चाहिए ॥ ३३ ॥
सम्यविद्वा स्रवेद्वारां यन्त्रे मृक्ते तु न स्रवेत् ।
सम्यक् वेध का वर्णन—सिरावेध समुचित रूप से हो जाने पर उसमें से रक्त की तेज धारा निकलती है और ज्यों ही यन्त्रण (बन्धन) खोल दिया जाता है, फिर रक्त नहीं निकलता या थोड़ा निकलता है।
अल्पकालं वहत्यल्पं, दुर्विद्वा तैलचूर्णनैः ॥ ३४ ॥
सशब्दमतिविद्वा तु स्रवेद् दुःखेन धार्यते ।
दुर्बेध आदि का वर्णन—सिरा का मिथ्यावेध होने पर थोड़ा-सा रक्त थोड़े समय तक बहता है अथवा तैलमिश्रित चूर्णों के प्रयोग करने पर थोड़ा निकलता है। अतिवेध होने पर अत्यन्त शब्द के साथ रक्त बहने लगता है और रोकने का प्रयास करने पर वह (रक्त) रुक पाता है ॥ ३४ ॥
भीमूर्च्छायन्त्रशैथिल्यकुण्ठशस्त्रातितुतयः ॥ ३५ ॥
क्षामत्त्ववैगितास्वेदा रक्तस्यास्रुतिहेतवः ।