अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसिराव्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
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गलगण्डरोगं—गलगण्ड (घेघा) तथा गण्डमाला रोगों में ऊष्ममूलगत सिरा का वेधन करना चाहिए ॥ १४ ॥
गृधस्यां जानुनोऽधस्तादूर्ध्वं वा चतुरङ्गुले ।
गृधसीरोगं—गृधसीरोग में जानुसन्धि के चार अंगुल नीचे अथवा चार अंगुल ऊपर में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए ।
इन्द्रबस्तेरधोऽपच्यां द्रघङ्गुले—
अपचीरोगं—अपचीरोग में इन्द्रबस्ति नामक मर्म के दो अंगुल नीचे सिरावेधन करना चाहिए ।
वक्तव्य—इन्द्रबस्ति-मांसमर्म तथा कालान्तर प्राणहरमर्म है, 'पार्णि प्रति जह्नामध्ये इन्द्रबस्तिः' अर्थात् पार्णि (एडी) के ऊपर जंघा के बीच में 'इन्द्रबस्ति' नामक मर्म है। इसी से दूसरी टाँग और बाँह के मर्मों को भी समझ लेना चाहिए। देखें—सु. शा. ६।२४। इसका वर्णन सु.चि. १।८२५ में भी किया है। और देखें—अ.हू.शा. ४।५। गण्डमाला और अपची में भेद है। देखें—सु.नि. १।१११।
—चतुरङ्गुले ॥ १५ ॥
ऊर्ध्वं गुल्फस्य सव्यथर्तौ, तथा क्रोष्टुकशीर्षके ।
प्रमुख वातरोगों में—सविगगत वातज रोगों (खंजता, पंगुता आदि) में और क्रोष्टुशीर्षक रोग में गुल्फ (एडी के ऊपर की गाँठ, टखना या घुट्टी की) सन्धि के चार अंगुल ऊपर सिरावेध करना चाहिए ॥ १५ ॥
पादवाहे खुडे हर्षे विपाद्यां वातकण्टके ॥ १६ ॥
चिप्पे च द्रघङ्गुले विध्येदुपरि क्षिप्रमर्मणः ।
पादवाह आदि में—पादवाह, खुड (वातरक्त) रोग, पादहर्ष, विपादिका, वातकण्टक तथा विष्प नामक नखरोग में क्षिप्र नामक मर्म (अंगुष्ठ एवं अंगुलि के बीच में स्थित) के दो अंगुल ऊपर सिरावेध करना चाहिए ॥ १६ ॥
गृधस्यामिव विश्वाच्यां—
विश्वाचीरोगं—विश्वाचीरोग में गृधसीरोग के समान कूर्पर सन्धि के नीचे या ऊपर चार अंगुल पर सिरावेध करना चाहिए ।
—यथोक्तानामदर्शने ॥ १७ ॥
मर्महीने यथासन्ने देशेऽन्यां व्यधयेत् सिराम् ।
अन्यत्र सिरावेध-निर्देश—ऊपर कहे गये रोगों में निर्दिष्ट सिराएँ उभार युक्त न दिखलायी दें, तो समीप में स्थित एवं मर्मरहित किसी अन्य सिरा का वेधन सावधानी से कर लेना चाहिए ॥ १७ ॥
अथ स्निग्धतनुः सज्जसर्वोपकरणो बली ॥ १८ ॥
कृतस्वस्थयनः स्निग्धरसात्प्रतिभोजितः । अग्रितापातपस्विन्नो जानुच्चासनसंस्थितः ॥ १९ ॥
मृदुपट्टातकेशान्तो जानुस्थापितकूर्परः । मुष्टिभ्यां वस्त्रगर्भाभ्यां मन्ये गाढं तिपीडयेत् ॥ २० ॥
दन्तप्रपीडनोत्कासगण्डाध्माननि चाचरेत् । पृष्ठतो यन्त्रयेच्चैवं वस्त्रमावेष्टयन्नरः ॥ २१ ॥
कन्धरायां परिक्षिप्य न्यस्यान्तर्वाभतर्जनीम् । एषोऽन्तर्मुखवर्ज्यानां सिराणां यन्त्रणे विधिः ॥
सिरायन्त्रण-विधि—सिरावेधन करने के पहले स्वस्तिवाचन आदि मांगलिक कार्य करकर जब उन व्यक्ति (रोगी) का भलीभाँति स्नेहन करना चाहिए और सिरावेधन के उपयोग में आने वाले सभी यन्त्रों (रस्सी, पट्टी, कुठारिका आदि शस्त्र, रक्तप्रावक तथा रोधक औषध-द्रव्य) तैयार रखे जायें हो किन्तु