अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंशल्याहरणविधिर्ध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०५
पीडनाक्षमता पाकः शल्यमार्गो न रोहति।
मांसगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मांसाधतु में प्रविष्ट होता है तो चोष ( चूसने की जैसी पीड़ा ) होता है, उस स्थान पर शोथ बहने लगता है, उस स्थान को छूने में कष्ट होता है, वह स्थान पक जाता है और चिकित्सा करने पर शल्यमार्ग ( जहाँ से शल्य भीतर घुसा वह ) शोष भरता नहीं है ॥ ३ ॥
पेश्यन्तरगते मांसप्राप्तवच्छ्रयं विना ॥४॥
पेशीगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मांसपेशियों ( मांसाधतु में ही प्रविष्ट होकर वायुपेशियों का विभाजन करता है ) के भीतर प्रविष्ट हो जाता है, तो इसमें भी मांसगत शल्य के उक्त सभी लक्षण हो जाते हैं, किन्तु इसमें सूजन नहीं होती ॥ ४ ॥
आक्षेपः स्नायुजालस्य संरम्भस्तम्भवेदनाः । स्नायुगे दुर्हरं चैतत्—
स्नायुगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य स्नायुओं में प्रविष्ट हो जाता है तो स्नायुजाल में आक्षेप ( विंचाव ), संरम्भ ( क्षोभ—हलचल ), स्तम्भ ( जड़ता ) तथा पीड़ा होती है और यह शल्य बड़े कष्ट से निकाला जा सकता है।
बक्तव्य—स्नायु-परिचय—इनसे शरीर में स्थित मांसपेशियाँ, अस्थियाँ, मेदोधातु तथा सन्धियाँ दृढ़ता से बँधी रहती हैं। ये शिराओं से अधिक मजबूत होती हैं। देखें—शा. सं. पू. खं. ५५५।
—सिराध्मानं सिराश्रिते ॥५॥
सिरागत शल्य के लक्षण—यदि शल्य सिराओं में प्रविष्ट हो जाता है तो सिराएँ आध्मान युक्त हो जाती हैं अर्थात् फूल जाती हैं ॥ ५ ॥
स्वकर्म्मगुणहानिः स्यात्स्रोतसां स्रोतसि स्थिते ।
स्रोतोगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य स्रोतों में प्रविष्ट हो जाता है तो स्रोतों के कर्मा तथा गुणों की हानि हो जाती है।
बक्तव्य—स्रोतसु-परिचय—सु.शा. ५६; सु.शा. ९१२ तथा च.शा. ७१२ में देखें। शरीर के भीतर मन, प्राण, अन्न, जल, दोष, धातु, उपधातु, धातुओं के मल तथा मूत्र आदि जिन मार्गों में से होकर संचार करते हैं, उन्हें स्रोतसु कहते हैं। इनका निर्माण—वायु ऊष्मा से युक्त होकर यथायोग्य इन स्रोतों का निर्माण करता है।
धमनीस्थेऽनिलो रक्तं फेनयुक्तमुदीरयेत् ॥६॥
नियर्याति शब्दवान् स्याच्च हृत्लासः साङ्ख्यवेदनः ।
धमनीगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य धमनी में प्रविष्ट हो तो वायु झागदार रक्त को बाहर की ओर निकालता है तथा शब्द करता हुआ वायु भी उसमें से निकलता है और सम्पूर्ण शरीर में वेदना होती है, जो मिचलता है ॥ ६ ॥
सङ्ख्यो बलवानस्थिसन्धिप्राप्तेऽस्थिपूर्णता ॥७॥
अस्थिसन्धिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य अस्थि की सन्धि में प्रविष्ट होता है तो उसमें जोरदार रगड़ लगती है और अस्थि का वह पोल्ला भाग उस शल्य से भर जैसा जाता है, यही उसकी पूर्णता है ॥ ७ ॥
बक्तव्य—यहाँ महर्षि वाग्भट पूर्णतया सुश्रुत से प्रभावित हैं। देखें—‘अस्थिविवरणतेऽस्थि-पूर्णताऽस्थिनित्तोदः संहर्यो बलवांश्च’ । ( सु.सू. २६१० ) वाग्भट ने जहाँ ‘अस्थिसन्धि’ कहा है, उसे सुश्रुत
२० अ० ह०