भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

ने 'अस्थिविवर' कहा है। इस दृष्टि से सुश्रुतकोष पाठ अधिक समीचीन है, क्योंकि विवर की पूर्णता बाहरी शल्य से हुई है, यह स्थिति अस्थिसन्धि में नहीं होती। क्या यहाँ ऐसा पाठ तो नहीं रहा? 'सद्घर्षं बलवान्स्थिमध्यप्राप्ते'। विद्वान् विचार करें, क्योंकि आगे अस्थिसन्धि का वर्णन दिया है।

नैकरूपा रुजोऽस्थिस्थे शोफः—

अस्थिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य अस्थि में प्रविष्ट (धँसा) होता है तो अनेक प्रकार की (भ्रम, लूण, मुदित, पीडित, नीचे की ओर को झुकाना आदि) पीड़ाओं की उत्पत्ति होती है और उसके आसपास सूजन भी हो जाती है।

—तद्वच्च सन्धिगे।

चेष्टानिवृत्तिश्च भवेत्—

सन्धिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य सन्धियों में धँसा होता है तो अस्थिशल्य के समान लक्षण इसमें भी होते हैं और उस सन्धि में पहले की भाँति लोच नहीं रह जाती अर्थात् वह सन्धि ठीक से मुड़ नहीं सकती।

—आटोपः कोष्ठसन्धिते ॥ ८ ॥

आनाहोऽन्नशकृन्मूत्रदर्शनं च व्रणानने।

कोष्ठगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य कोष्ठ में प्रविष्ट हुआ हो तो व्रण के मुख में अन्न, मल तथा मूत्र का दिखलायी देना, पेट में हलचल तथा आनाह (अफरा) ये लक्षण दिखलायी पड़ते हैं ॥ ८ ॥

विद्यान्मर्मगतं शल्यं मर्मविद्रोपलक्षणैः ॥ ९ ॥

मर्मगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मर्मस्थान में धँसा हो तो उसमें मर्मविद्र के लक्षण दिखलायी देते हैं ॥ ९ ॥

वक्तव्य—देखें—सू. सू. २५।३५; सु. शा. ६।१९-२० तथा अ. हू. शा. ४।४७ में मर्मविद्र के लक्षण।

यथास्वं च परिस्रावैस्त्वगादिषु विभावयेत्।

सामान्य निर्देश—'यथास्वं' का अर्थ है लचा आदि के स्रावों को देखकर शल्य कहाँ धँसा है, उसका निर्णय इस दृष्टि से करें। यथा—त्वचा में लसीकास्राव को देखकर, सिरा में रक्तस्राव से, अस्थि में मज्जास्राव से, आमाशय में अन्न के निकलने से, मलाशय में मल के निकलने से और मूत्राशय में मूत्र के निकलने को देखकर शल्य का निर्णय कर लेना चाहिए।

रुह्यते शुद्धदेहानामनुलोमस्थितं तु तत् ॥ १० ॥

शल्यव्रण का रोपण—वमन तथा विरेचन आदि शोधन-क्रियाओं द्वारा शुद्ध शरीर वालों का वह शल्य के चुभने से हुआ व्रण शल्य के अनुलोम गति से भीतर स्थित रहने पर भी स्वयं ही भर गया है, ऐसा प्रतीत होता है ॥ १० ॥

दोषकोपाभिघातादिशोभाद्रयोऽपि ब्राधते।

पुनः पीडाकर्तृत्व—शल्य के निकल जाने पर ही व्रण को सम्यक् रुद्ध नहीं समझ लेना चाहिए, क्योंकि इस व्रणस्थान पर पुनः कभी दोषों का प्रकोप होने पर, चोट लगने पर या धक्का आदि के लगने पर भीतर स्थित शल्य फिर भी पीड़ा पहुँचा सकता है।

त्वङ्नष्टे यत्र तत्र स्युरभ्यङ्गस्वेदमर्दनैः ॥ ११ ॥