भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]

सूत्रस्थानम्

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रागरुढाहसंरम्भा यत्र चाज्यं विलीयते। आशु शूष्यति लेपो वा तत्स्थानं शल्यबद्धते॥ १२॥

शल्यज्ञान के उपाय—त्वचा आदि स्थानों में अदृश्य हुए शल्य को कैसे जानना चाहिए, इसके उपायों का क्रमशः वर्णन किया जा रहा है। त्वचागत शल्य—जहाँ त्वचा में शल्य प्रवेश कर अदृश्य हो गया हो, उसका पता लगाने के ये उपाय हैं—वहाँ अभ्यंग, स्वेदन तथा मर्दन करने से उस स्थान-विशेष पर लालिमा, पीड़ा, दाह तथा संरम्भ ( हलचल ) होता है; वहाँ घी सरलता से पिघल जाता है और लगाया हुआ लेप शीघ्र सूख जाता है। ऐसे स्थान को शल्य युक्त समझें॥ ११-१२॥

मांसप्रणष्टं संशुद्ध्या कर्शनाच्छूलयतां गतम्। क्षोभद्रागादिभिः शल्यं लक्षयेत्—

मांसगत शल्य—मांसपेशियों में खोये हुए शल्य को वमन-विरचन द्वारा शरीर-शोधन करने के कारण शरीर के शिथिल हो जाने पर, शरीर के हिलने-डुलने से, लालिमा दिखलायी देने से तथा पीड़ा आदि से यहाँ शल्य होना चाहिए, ऐसा समझना चाहिए।

—तद्वदेव च॥ १३॥

पेश्यस्यिसन्धिकोष्ठेषु नष्टम्—

पेशीगत आदि शल्य—इसी प्रकार मांसपेशियों के मध्य में, अस्थिसन्धियों में तथा कोष्ठप्रदेश के अन्तर्गत अदृश्य शल्य के प्रमुख स्थान को पहचान लेना चाहिए॥ १३॥

—अस्थिषु लक्षयेत्। अस्न्यामभ्यज्जनस्वेदबन्धपीडनमर्दनैः॥ १४॥

अस्थिगत शल्य—अस्थियों में अदृश्य हुए शल्य को अभ्यंग, स्वेदन, बन्धन, पीडन तथा मर्दन विधियों से उसका स्थान-निर्धारण कर लें॥ १४॥

प्रसारणाकुञ्चनतः सन्धिन्ष्टं तथाऽस्थिवत्।

सन्धिगत शल्य—सन्धिगत अदृश्य शल्य का ज्ञान अस्थिगत शल्य की भाँति करें। विशेष करके प्रसारण ( फैलाना ) तथा आकुंचन ( सिकोड़ना या बटोरना ) आदि क्रियाओं से समझें।

नष्टे स्नायुशिराघ्नोतोधमनीञ्चसमे पथि॥ १५॥

अधयुक्तं रथं खण्डचक्रमारोप्य रोगिणम्। शीघ्रं नयेतस्तस्य संरम्भाच्छल्यमादिशेत्॥ १६॥

स्नायु आदि गत शल्य—स्नायु, सिरा, घ्नोतसों तथा धमनियों में प्रविष्ट शल्य जब अदृश्य हो जाय तो उस रोगी को टूटे पहिये वाले रथ पर बैठाकर उसमें घोड़ा जोतकर शीघ्र ले जाय। उसके संरम्भ से जहाँ शल्य होगा-वह स्थान दुःखने लगेगा॥ १५-१६॥

मर्मनष्टं पृथङ्नोक्तं तेषां मांसादिसंश्रयात्।

मर्मगत शल्य—यहाँ मर्मगत शल्य को अलग से नहीं कहा गया है, क्योंकि मर्मस्थलों के आश्रयस्थल मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि तथा सन्धियाँ ही हैं।

सामान्येन सशल्यं तु क्षोभिण्या क्रियया सख्यु॥ १७॥

सामान्य निर्देश—सामान्य रूप से वहाँ शल्य समझना चाहिए, जहाँ हिलाने-डुलाने तथा दबाने से पीड़ा हो॥ १७॥

वृत्तं पृथु चतुष्कोणं त्रिपुटे च समासतः। अदृश्यशल्यसंस्थानं ब्रणाकृत्या विभावयेत्॥ १८॥

शल्य के स्वरूपों का अनुमान—अदृश्य ( जो देखा गया न हो ऐसे ) शल्य के स्वरूप का ज्ञान ब्रण ( घाव ) की आकृति से समझने का प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि प्रायः सभी शल्यों के अवयव नष्ट