अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
से चार प्रकार के होते हैं—१. वृत्त (गोल), २. पुष्प (चौड़ा), ३. चतुष्कोण (चौकोर) तथा त्रिपुट (तिकोना) ॥ १८ ॥
बक्तव्य —इन आकृतियों के अनुसार उस-उस शल्य को निकालने का प्रयत्न करना चाहिए।
तेषामाहरणोपायाः प्रतिलोमानुलोमकौ।
शल्य-निर्हरण के उपाय —उन शल्यों को निकालने के उपाय दो प्रकार के हैं—१. प्रतिलोम (वह शल्य शरीर के भीतर जैसे ही घुसा उससे उल्टा अर्थात् उसी मार्ग से बाहर को निकालना; जैसे कोटा निकाला जाता है) और २. अनुलोम (जहाँ से निकालना सरल हो, उसे अनुलोम कहते हैं)।
अर्वाचीनपराचीने निहिरेतद्विपर्यायात् ॥ १९ ॥
अर्वाचीन आदि शल्य —अर्वाचीन शल्य को प्रतिलोम-विधि से निकालना चाहिए और पराचीन शल्य को अनुलोम-विधि से निकालना चाहिए ॥ १९ ॥
बक्तव्य —अर्वाचीन शल्य वह है, जो पास में उभार युक्त दिखलायी देता है और पराचीन शल्य वह है जो इस पार से दूसरी ओर को चला जाता है। अतएव कहा गया है कि अर्वाचीन शल्य को उसने जिधर से प्रवेश किया है, उधर से ही निकाल लें और पराचीन शल्य जहाँ तक पहुँच चुका है उसके आगे कुछ अवयव काटकर निकालें, वही उसके लिए अनुलोम होगा। इस प्रसंग में सुश्रुतको निम्न उद्धरणों को भी देखें—सु.सू. २७।६-७।
सुखाहार्थं यतश्चिच्छत्वा ततस्तिर्यगातं हरेत्।
तिर्यग्गत शल्य —तिर्यग्गत (तिरछे गये हुए) शल्य को उस ओर से काटकर निकाले, जहाँ से वह सुख से निकल सके।
बक्तव्य —तिर्यग्गत शल्य को निकालने के सम्बन्ध में वृद्धवाग्भट का भी यही मत है। देखें—अ.सं. सू. ३७।१४।
शल्यं न निर्घात्यमुरः कक्षावृद्धानुपाश्वगम् ॥ २० ॥
प्रतिलोममनुतुण्डं छेद्यं पुष्पमुखं च यत्।
निर्घातन के अयोग्य शल्य —उरस, कक्षा, वंशण तथा पाश्व (पशुकास्थियों) के भीतरी अवयवों में गये या बिधे हुए शल्यों का निर्घातन नहीं करना चाहिए। जो शल्य प्रतिलोम हो, जो अनुतुण्ड (जिस शल्य का मुख दूसरी ओर न निकला) हो, जो छेदन के योग्य हो तथा जो चौड़े मुखवाला हो—इन शल्यों का भी निर्घातन न करे ॥ २० ॥
बक्तव्य —निर्घातन नामक एक यन्त्रकर्म है, जिसका वर्णन अ. द्ब. सू. २५।४१ में है। इसी अध्याय के १५वें पद्य में 'शल्यनिर्घातनी नाडीयन्त्र' का भी उल्लेख है। इस सम्बन्ध में देखें—सु.सू. २७।८-९।
नैवाहरेद्विशल्यघ्नं नष्टं वा निरुपद्रवम् ॥ २१ ॥
विशल्यघ्न शल्यारुण-निषेध —विशल्यघ्न (शल्य को निकाल देने पर मार देने वाले) शल्य को, नष्ट शल्य ('णश्च अदक्षति' अर्थात् जो न दिखलायी दे रहा हो और जो पीड़ादायक भी न हो) को अथवा उपद्रव रहित शल्य को निकालने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए ॥ २१ ॥
बक्तव्य —उक्त विषय के स्पष्टीकरण के लिए सुश्रुतको निम्न सन्दर्भों का अवलोकन करें—'तान्येतानि पञ्चविकल्पानि भवन्ति; तद्यथा—सद्यः प्राणहराणि, कालन्तरप्राणहराणि, विशल्यघ्नानि, वैकल्पकराणि, रूजाहराणि चेति'। (सु.शा. ६।८) 'तस्मात् सशल्यो जीवत्युद्भूतशल्यो प्रियते (पाकात् पतितशल्यो वा जीवति)'। (सु.शा. ६।१६) तथा 'तत्र सशल्यो जीवति पाकात् पतितशल्यो वा नोद्भूतशल्यः'। (सु.शा. ६।२७) इस