भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]

सूत्रस्थानम्

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प्रकार एक ही विषय का दो स्थानों पर समान वर्णन करना यह प्रमाणित करता है कि विश्लयन्धन शल्य का आहरण नहीं करना चाहिए।

अथाहरेत्करप्राप्य करेणैव—

शल्यनिर्हरण-विधि —तदनन्तर हाथ से पकड़ने योग्य शल्य को हाथ से ही पकड़कर खींच लेना चाहिए। क्योंकि सुश्रुत ने हाथ को ही प्रधान यन्त्र माना है। देखें—सू.सू. ७३।

—इतरत्युतः। दृश्यं सिंहाहिमकरवर्मिककटकाननैः ॥ २२ ॥

दृश्य शल्य-निर्हरण —जो हाथ से न पकड़ा जा रहा हो किन्तु दिखलाई दे रहा हो, उसे सिंहमुख, अहि (सर्प) मुख, मकरमुख, वर्मि (मत्स्य-विशेष) मुख अथवा कर्कटमुख नामक यन्त्रों द्वारा पकड़कर निकालना चाहिए ॥ २२ ॥

अदृश्यं ब्रणसंस्थानादग्रहीतुं शक्यते यतः। कङ्कभृङ्गाह्नुकरशरारीवायसाननैः ॥ २३ ॥

अदृश्य शल्य-निर्हरण —अदृश्य शल्य का आहरण ब्रण (घाव) की आकृति को देखकर जिन यन्त्रों से पकड़ कर निकाला जा सकता है, वे यन्त्र हैं—कंकमुख, भृंगराजमुख, कुररमुख, शरारिमुख अथवा काकमुख। यहाँ मुख शब्द का अर्थ है—इन पक्षियों की चोंच की आकृति के यन्त्र ॥ २३ ॥

सन्दंशाभ्यां त्वगादित्यं—

सन्दंशयन्त्र-प्रयोग —त्वचा तथा मांस में घँसे हुए शल्य को संदंश (सँइसी) नामक यन्त्रों से पकड़कर निकालना चाहिए।

—तालाभ्यां सुषिरं हरेत्।

तालयन्त्र-प्रयोग —त्वचा आदि में स्थित सुषिर (भीतर से छिद्रवाले) शल्य को तालयन्त्रों की सहायता से निकालना चाहिए, न कि सन्दंशयन्त्रों से।

सुषिरस्यं तु नलकैः—

नाडीयन्त्र-प्रयोग —सुषिरस्य (भीतर से पोली अस्थि अथवा अस्थियों में चुभे हुए) शल्य को नाडीयन्त्रों से पकड़कर खींचना चाहिए।

शेषं शेषैर्यथायथम् ॥ २४ ॥

शेष यन्त्र-प्रयोग —शेष (ऊपरवर्णित शल्यों से अतिरिक्त) शल्यों को उन यन्त्रों से सोच-समझकर निकालना चाहिए, जिनका वर्णन ऊपर नहीं किया गया है तथा जो यन्त्र जिस शल्य को निकालने में समर्थ हों। २४ ॥

शस्त्रेण वा विशास्यादौ ततो निर्लोहितं ब्रणम्। कृत्वा घृतेन संस्वेद्य बद्ध्वाऽऽचारिकमादिशेत् ॥

निर्हित शल्य का पश्चात्कर्म —अथवा (जब शल्य चुभे हुए स्थान को बिना काटे यन्त्रों की सहायता से न निकल सके तो) पहले उस स्थान को जहाँ शल्य घँसा हो, काटकर शल्य को निकालकर उसमें बहते हुए रक्त को रोकने का उपाय कर तदनन्तर घाव में लगे हुए रक्त को धोकर अर्थात् साफ करके गुनगुने घी से उस ब्रणस्थान का स्वेदन करके उसमें ब्रणरोपण लेप (मलहम) लगाकर उसे ब्रणीपचार की विधि समझा देनी चाहिए ॥ २५ ॥

बक्तव्य —अष्टगृह्दय-सूत्रस्थान अध्याय १६।२६-२८ में इसके उपचारों का निर्देश किया गया है।

सिरास्तायुबिलस्यं तु चालयित्वा शलाकाया।

सिरा-स्तायुगत शल्य —सिरा तथा स्नायु में घँसे हुए शल्य को शलाकायन्त्र से हिला-डुला करके उसे ढीला करके निकालें।

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