भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

हृदये संस्थितं शल्यं त्रासितस्य हिमाम्बुना ॥ २६ ॥

ततः स्थानान्तरं प्राप्तमाहरेत्तद्यथायथम् । यथामार्गं दुराकर्म्म—

हृदयगत शल्य—जिसके हृदय में शल्य चुभा हो उस व्यक्ति को शीतल जल के छींटों को डालकर उसे घबड़ा दें (यह विवासन जाड़े में ही हो सकता है), तब तत्काल उचित यन्त्र की सहायता से उसे निकाल डालें। यदि इसी प्रकार निकालना सम्भव न हो अथवा हानिकारक हो तो शल्य को इधर-उधर ले जाकर जैसे सम्भव हो, उसे निकाल दें। यदि जहाँ से शल्य घुसा है, उस मार्ग से निकालने में कठिनाई हो तो ॥ २६ ॥

—अन्यतोऽध्येवमाहरेत् ॥ २७ ॥

शल्याहरण की अन्य विधि—उसे खाँचकर के दूसरी ओर से ऐसे ही निकाल लें ॥ २७ ॥

अस्थिदण्डे नरं पद्म्यां पोडयित्वा विनिहरेत् ।

अस्थिगत शल्य—यदि शल्य अस्थि में चुभा हो तो उस पुरुष को पैरों से दबाकर शल्य को पकड़कर जोर से निकालें।

इत्यशक्ये सुबलिभिः सुगृहीतस्य किङ्कुरैः ॥ २८ ॥

दूसरी विधि—यदि अस्थिगत शल्य को अकेला चिकित्सक न निकाल सके तो बलवान् सेवकों द्वारा उसे पकड़वा कर शल्य को निकलवा दें ॥ २८ ॥

तथाऽप्यशक्ये वारङ्गं वक्रीकृत्य धनुर्ज्याया । सुबद्धं वक्त्रकटके बन्धीयात्सुसमाहितः ॥ २९ ॥

सुसंयतस्य पञ्चाङ्ग्या वाजिनः कशयाऽथ तम् । ताडयेदिति मूर्धानं वेगेनोन्नमयन् यथा ॥ ३० ॥

उद्धरेच्छल्यम्—

तीसरी विधि—यदि उक्त विधि से शल्य न निकल सके तो शल्य के पकड़ने योग्य ऊपरी भाग वारंग (मूठ) को टेढ़ा करके धनुष की डोरी से भलीभाँति बाँधकर उस डोरी के दूसरे छोर को सावधान होकर पंचांगी (चारों पैर तथा मुख) से बाँधे गये घोड़े के मुखकटक (लगाम) से बाँध दे और फिर उस घोड़े को कोई से इस प्रकार मारे जिससे घोड़ा अपने सिर को बैग (झटका) से उठाये और शल्य निकल जाय ॥ २९-३० ॥

—एवं वा शाखायां कल्पयेत्तरोः ।

चाँची विधि—अथवा इसी प्रकार वृक्ष की डाल को नीचे की ओर झुकाकर उस शल्य में बाँधी हुई डोरी का दूसरा छोर इस झुकाई हुई डाल में बाँधकर झटके से उस डाल को छोड़ दें, वह अपने बैग से शल्य को निकाल देगी। इन दोनों स्थितियों में शल्यविद्ध रोगी को आत्मीयजन सावधानी से पकड़े रहें।

बद्ध्वा दुर्बलवारङ्गं कुशाभिः शल्यमाहरेत् ॥ ३१ ॥

पाँचबीं विधि—जिस शल्य का वारंग (मूठ) कमजोर हो तो उसे कुश आदि की रस्सियों से कसकर तब शल्य का निर्हरण करना चाहिए ॥ ३१ ॥

श्वयथुग्रस्तवारङ्गं शोफमुत्पीड्य युक्तिः ।

छठी विधि—जिस शल्य का वारंग (मूठ) सूजन से ढक जाय तो उसके सूजन को दबाकर यन्त्र द्वारा युक्तिपूर्वक शल्य को निकालें।

मुद्गराहतया नाड्या निर्घात्योत्पिडतं हरेत् ॥ ३२ ॥

सातवीं विधि—यदि शल्य फफोले की भाँति सामने आ गया हो तो नाडीयन्त्र से उसे इधर-उधर से हिलाकर मुद्गर से उस शल्य का मुख टेढ़ा करके उसे निकालें ॥ ३२ ॥