अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशल्याहरणविधिध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
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तैरेव चानयेन्मार्गममार्गोत्पिण्डतं तु यत्।
आठवीं विधि—जो शल्य दूसरे मार्ग से दूसरी ओर को निकल आया हो, उसे सही मार्ग (जहाँ से उसे निकालने में सरलता हो) में ले जाकर निकाल दें।
मृदित्वा कर्णिनां कर्णं नाड्यास्थेन निगृह्य वा ॥ ३३ ॥
नबीं बिधि—एक, दो अथवा तीन कर्णों (फरों) वाले शल्यों के कर्णों को रेतीयन्त्र से घिसकर और नाडीयन्त्र से दबाकर शल्य को निकाल दें। ॥ ३३ ॥
अयस्कात्तेन निष्कर्णं विवृतास्यमुजुस्थितम्।
दसवीं विधि—जो लौहनिर्मित शल्य सीधा शरीर के किसी भाग में स्थित हो, जिसमें कर्ण (फर) न हों और जिस ब्रण का मुख खुला हो उसे चुम्बक लगाकर खींच लेना चाहिए।
पक्वाशयगतं शल्यं विरेकेण विनिर्हरेत् ॥ ३४ ॥
पक्वाशयगत शल्य—यदि शल्य पक्वाशय में पहुँच गया हो तो उसे विरेचन करा कर निकाल लेना चाहिए। ॥ ३४ ॥
दुष्टवातविषस्तन्यरक्तोयादि चूषणेः ।
वात आदि शल्य—दूषित वात, दष्टस्थान का विष, दुष्टतन्य (इसी से स्त्रियों को धनेला रोग हो जाता है), दूषित रक्त तथा जल में डूबने से पानी का भर जाना आदि की चिकित्सा चूषणयन्त्रों (सिंगी, तुम्बी आदि) से करें।
कण्ठघ्रोतोगते शल्ये सूत्रं कण्ठे प्रवेशयेत् ॥ ३५ ॥
बिसेनासे ततः शल्ये बिसं सूत्रं समं हरेत्।
कण्ठघ्रोतगत शल्य—कण्ठ (गले) के घ्रोतस् में शल्य के फँस जाने पर बिस(कमल)नाल के साथ धागा का प्रवेश करें। धागा या बिसनाल में शल्य के फँस जाने पर उन दोनों को शल्य के साथ बाहर निकाल लें। ॥ ३५ ॥
नाड्याऽग्नितापितां क्षिप्त्वा शलाकामप्थिरीकृताम् ॥ ३६ ॥
आनयेज्जातुषं कण्ठात्—
जतुशल्य-निर्हरण—यदि कण्ठ (गले) के घ्रोतस् में जतु = लाख का टुकड़ा रूपी शल्य फँस गया हो तो आग में तपायी गयी लाख की सीक को नाडीयन्त्र के भीतर से उस जतुशल्य तक पहुँचाकर उससे सटा दें और वह शल्य उस सीक के साथ सट जायेगा। उसके बाद उस व्यक्ति को पानी पिला दें, जिससे सीक ठण्डी होकर शल्य को अपने साथ जोड़ लेगी। अब आप उस जतुशल्य को गले से बाहर नाडी के साथ निकाल लें। ॥ ३६ ॥
—जतुदिग्धामजातुषम्।
अन्य शल्य-निर्हरण—इसी प्रकार लाख से अतिरिक्त अन्य लकड़ी आदि शल्यों को भी लाख की गरम शलाका को नाडीयन्त्र के भीतर से डालकर कण्ठघ्रोतस् के भीतर धँसे हुए शल्य का भी निर्हरण कर सकते हैं।
केशोन्दुकेन पीतेन द्रवैः कण्टकमाक्षिपेत् ॥ ३७ ॥
सहसा सूत्रबद्धेन वमतः—