अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
गले में फँसे हुए शल्य को निकालना—यदि अस्थि ( हड्डी या हड्डों का टुकड़ा ) अथवा कण्टक ( मछली का काँटा ) आदि शल्य गला के भीतर फँस गया हो तो बालों को सुदृढ़ धागा से बाँधकर दूध आदि के साथ निगला दें और फिर उसे उल्टी करा कर उसके साथ उक्त शल्य को खींचकर निकाल लें॥ ३७॥
—तेन चेतर्त् ।
यदि उक्त शल्य ऊपर कही गयी विधि से न निकल सके या न निकाला जा सके तो चिकित्सक अपनी बुद्धि से दूसरी विधि से निकालने का प्रयत्न करें।
अपानकं मुखनासाभ्यामहर्तु परतो नुदेत्॥ ३८॥
कभी-कभी इस प्रकार के प्रयत्नों के द्वारा छोटे शल्य वमन के साथ मुख अथवा नासिका के छिद्रों से निकल जाते हैं। यदि न निकल सकें तो कुछ पेय पदार्थ उसे पिलाकर आहारनलिका से उसे भीतर की ओर प्रेरित कर ( ढकेल ) दें॥ ३८॥
अपानस्कन्धघाताभ्यां ग्रासशल्यं प्रवेशयेत् ।
यदि आहारनलिका में ग्रास ( कौर ) नामक शल्य फँस गया हो तो उसे जल अथवा घी-तेल आदि पिलाकर स्कन्ध भाग में मुड़ी आदि द्वारा मार या ठोक कर ग्रास को भीतर की ओर जाने में सहायता करें।
वक्तव्य—प्रायः ऐसी परिस्थिति बालकों के भोजन काल में देखी जाती है। पास में बैठी हुई माता, दादी आदि इसी प्रकार के व्यवहार से 'ग्रासशल्य' को भीतर या बाहर की ओर करते-कराते देखी जाती है। यह वाग्भट की सूक्ष्म दृष्टि है।
सूक्ष्माक्षिन्नशल्यानि श्लोमवालजलैर्हरिर्त्॥ ३९॥
आँख एवं ब्रण में पड़े शल्य को निकालना—आँख में घुसे तथा घाव में पड़े हुए सूक्ष्म छोटे से छोटे शल्य ( बाल या बालू के कण ) को रेशमी वस्त्र के कोने से केश ( बाल ) की सहायता से निकाले अथवा पानी के छींटे डालकर निकालें ( इस प्रकार के लघु शल्यों को अनुभववी बूढ़े लोग सरलता से निकाल देते हैं )॥ ३९॥
अपां पूर्णं विघ्नयुयादवाक्षिरसमायतम् । वामयेच्चामुखं भस्मराशीं वा निखनेन्नरम्॥ ४०॥
उदरगत जल निकालने की विधि—तैरते समय डूब जाने से पेट में पानी भर जाता है। यह जल भी शल्य है, न कि भोजन के साथ पीया गया जल। उक्त जल को निकालने की विधि—जिसके पेट में पानी भर गया हो, उसे तत्काल उलटा करके झकझोरें, लटकायें; जब कुछ शान्त हो जाय तो उसे वमन कराये तथा मुख तक उसे भस्म के ढेर में गाड़ दें। इस विधि से बहुत-सा जल भस्म अपने में सुखा लेता है॥ ४०॥
कर्णोऽम्बुपूर्णं हस्तेन मथित्वा तैलवारिणी । क्षिपेदधोमुखं कर्णं हन्याद्वाऽऽचूषयेत् वा॥ ४१॥
कर्णगत जल एवं क्रिमि निकालने की विधि—कान के छिद्रों में जल भर जाने पर तेल और पानी को हाथ से मथकर जब वह घी जैसा हो जाता है तब उसे कान में डालें। उसके कान को उलटा करके हाथ से थपथपायें, ठोके अथवा कोई दूसरा व्यक्ति उसके कान में मुख लगाकर पानी को चूसकर थूक दें॥ ४१॥
कीटे द्रोतोगते कर्णं पूर्येल्लवणाम्बुना । सुक्तेन वा सुखोष्णेन मृते क्लेदहरो विधिः॥ ४२॥