अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशल्याहरणविधिर्ध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
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यदि कान के छेद में कोई कीड़ा या कनखरूरा चला जाय तो उसमें नमक मिला हुआ पानी डाल दें अथवा गुनगुना सिरका डाल दें। इससे कीड़ा स्वयं बाहर चला आता है या मर जाता है। मर जाने पर कान का मैल निकालने के लिए जो विधि निर्दिष्ट है, उसे करें ॥ ४२ ॥
जातुषं हेमरूपादिधातुजं च चिरस्थितम्। ऊष्मणा प्रायशः शल्यं देहजेन विलीयते ॥ ४३ ॥
शरीर में शल्य का विलयन—लाख, सोना, चाँदी आदि से सम्बन्धित शल्य यदि छोटे हों और बहुत समय तक शरीर में पड़े रह गये हों तो वे शरीर सम्बन्धी गर्मी से स्वयं ही पिघल जाते हैं ॥ ४३ ॥
मुद्रेणुदारुशुङ्गास्थितव्तालोपलानि न । विषाणवेण्वयस्तालदारुशल्यं चिरादपि ॥ ४४ ॥ प्रायो निर्भुज्यते तद्धि पचत्याशु पलासुजी।
विलीन न होने वाले शल्य—मिट्टी, वेणु ( बाँस ), लकड़ी, साँग, अस्थि ( हड्डी ), दांत, बाल, विषाण ( हाथीदांत ), वेणु ( ईख का छिलका ), लोह, ताड़ तथा दारु ( कच्चा लोहा या पीतल, देखें—वी. एस्. आर्प्टे-कोश ) इनके शल्य भले ही कुछ समय के बाद टेढ़े तो हो जाते हैं परन्तु विलीन नहीं होते। ये शल्य अपने द्वारा रक्त एवं मांस पका देते हैं ॥ ४४ ॥
बक्तव्य—'मुद्रेणु'...'पलासुजी'। यहाँ तक कुछ संस्करणों में ४ पंक्तियाँ हैं, वहाँ दूसरी पंक्ति इस प्रकार है—'शल्यानि न विशीर्यन्ते शरीरे मुन्मयानि'। यह पंक्ति अन्य संस्करणों में सम्भवतः इसलिए नहीं ली गयी कि इसका ग्रहण करने से 'मुद्' एवं 'मुन्मय' दोनों एकार्थवाची शब्दों का ग्रहण हो रहा था, किन्तु 'न विशीर्यन्ते' यह क्रिया इसके अभाव में दुर्लभ हो रही है। श्रीअरुणदत्त तथा श्रीहेमाद्रि टीका युक्त वाग्भट में जिन तीन पंक्तियों का ग्रहण किया है, उनमें 'विषाण, वेणु तथा दारु' इन तीन शब्दों की पुनरक्ति हो रही है। हमने महर्षि वाग्भट की सदाशयता को ध्यान में रखकर उनके दूसरे अर्थ दिये हैं। इस दृष्टि से अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान ३७।२७-२८ श्लोक निर्घन्त हैं। इसी प्रकार सु.सू. २६।२२ पद्य भी इस प्रसंग में अनुकरणीय है।
शल्ये मांसावगाढे चेत्स देशो न विदह्यते ॥ ४५ ॥
ततस्तं मर्दनस्वेदशुद्धिकर्षणबुंहणेः । तीक्ष्णोपनाहपानाश्रयनशस्त्रपदाङ्गनैः ॥ ४६ ॥ पाचयित्वा हरेच्छल्यं पाटनैषणभेदनैः।
शल्य-निर्हरणोपाय—जब शल्य मांसल प्रदेश में घँसा हो और घँसने के बाद भी उसमें विदाह आदि पाक के लक्षण न दिखायी दे रहे हों तो उस स्थान पर मसल्ला, स्वेदन, शोधनों ( वमन-विरंजन आदि ) द्वारा कर्षणकर्म, बुंहणकर्म, तीक्ष्ण उपनाह ( जिससे उसका शीघ्र पाक हो ), उचित पेय पदार्थों को पिलाना, आहारों को खिलाना तथा शस्त्र द्वारा सघन पदांकन ( पच्छ लगाना ) आदि विधियों से उसे पकाने का प्रयत्न करना चाहिए। पक जाने पर उस शल्य को निकालें। यदि इस प्रकार भी न निकले तो पाटन, एषण तथा भेदन क्रियाओं द्वारा शल्य को निकाल देना चाहिए ॥ ४५-४६ ॥
बक्तव्य—यहाँ 'पाटनैषणभेदनैः' ये क्रियाएँ उन आशुकारी शल्यों को निकालने के लिए हैं, जिनके शरीर में कुछ समय तक रह जाने से मृत्यु का भय होता है अथवा उस अवयव को काट देना पड़ता है। शेष के लिए तो पकाकर निकालने का शास्त्र ने आदेश दिया ही है। देखें—सू. सू. २७।२७।
शल्यप्रदेशयन्त्राणामवेक्ष्य बहुरुपताम् ॥ ४७ ॥
तैस्तैरुपायैर्मतिमान् शल्यं विद्यातथाऽऽहरेत्।
इति श्रीवेद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गद्वयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने शल्याहरणविधिर्नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥