अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
शल्यनिर्हरण-निर्देश—शल्यों की, शरीर के अवयवों की तथा शल्य निकालने वाले यन्त्रों की विविधरूपता का ध्यान रखकर उन-उन शल्य निकालने के उपायों का प्रयोग कर जो जैसा शल्य हो उसे उस प्रकार निकालना चाहिए ॥ ४७ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने मूलतः शल्यों का विभाजन दो प्रकार से किया है—१. अवबद्ध ( जो मांस-अस्थि आदि में फँसा हो और दूसरा ) २. अनवबद्ध ( जो प्रथम के विपरीत हो )। इनमें दूसरे प्रकार के शल्यों को निकालने के पन्द्रह उपायों का इस प्रकार उल्लेख किया है—१. स्वभाव, २. पाचन, ३. भेदन, ४. दारण, ५. पीडन, ६. प्रमार्जन, ७. निर्धमपन, ८. वमन, ९. विरेचन, १०. प्रक्षालन, ११. प्रतिमर्श ( यह नस्य वाला नहीं है, इसमें अँगुली आदि से घिसा जाता है ), १२. प्रवाहण ( गर्भशल्य में इसका उपयोग होता है ), १३. आनूषण ( पृथ्यशल्य को निकालने में ), १४. अयस्कात्त ( चुम्बक ) और १५. हर्ष ( शोकशल्य को दूर करने के लिए )। अष्टांगसंग्रह में शल्य रहित व्रण का लक्षण इस प्रकार दिया है—'व्रणस्थान स्वच्छ हो, उसके आसपास दबाने में कष्ट न हो, शोथ तथा सन्ताप घट रहा हो तो अब व्रणस्थान में शल्य नहीं है, ऐसा समझ लेना चाहिए। देखें—अ. सं. सू. ३७।३२।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में शल्याहरणविधि नामक अष्टाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २८ ॥