भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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एकोनत्रिशोऽध्यायः

अथातः शस्त्रकर्मविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षेयः ।

अब हम यहाँ से शस्त्रकर्मविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—अब यहाँ से शस्त्रकर्मविधि नामक अध्याय की प्रस्तावना की जा रही है। क्योंकि इसके पहले २५वें अध्याय में वारभट ने 'शस्त्रेण वा विशस्यादौ' कहकर शस्त्रकर्म की उपादेयता का निर्देश किया है। अतएव इस अध्याय में शस्त्रकर्म का विधान प्रस्तुत है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सु.सू. ५, १७, १८, १९, २५; च.चि. २५।५५ से ६० तक तथा अ.सं.सू. ३८ में देखें।

ब्रणः सज्जायते प्रायः पाकाच्छ्रयथुपूर्वकात्। तमेवोपचरेत्समाद्रक्षन् पाकं प्रयलतः ॥ १ ॥ सुशीतलेपसेकाद्रमोक्षसंशोधनादिभिः ।

ब्रण के उपचार—प्रायः ब्रण की उत्पत्ति के पहले स्थान-विशेष पर शोथ होता है। सर्वप्रथम उस ब्रणोत्पादक शोथ की ही चिकित्सा करनी चाहिए, जिससे वह शोथ फोड़ा का रूप धारणकर पकने न पाये।

ब्रणशोथ-चिकित्सा—उस ब्रणशोथ को बैठाने के लिए शीतल लेप, शीतल सेचन, रक्तप्रावण तथा शोधन ( वमन-विरचन ) आदि उपायों का प्रयोग करें। यहाँ शीतल का अर्थ है—शीतवीर्य पदार्थ, जो स्पर्श में भी शीत हो ॥ १ ॥

वक्तव्य—ब्रण के सम्बन्ध में ऊपर जो सुश्रुत के अध्यायों का निर्देश किया है, उनके अतिरिक्त सु.सू. २१, २२, २८ अध्यायों का भी अवलोकन कर लें। शेष देखें—अ.हू.उ. २५ में। इसकी प्रस्तावना यहाँ केवल इस उद्देश्य से की है कि ब्रणशोथ के दर्शन होते ही उसकी शान्ति के उपाय करने चाहिए, क्योंकि ब्रणशोथ का पाक हो जाने पर अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है।

शोफोऽल्पोऽल्पोष्मरुक्सामः सवर्णः कठिनः स्थिरः ॥ २ ॥

आमशोथ के लक्षण—आमशोथ ( जो शोथ अभी पका नहीं ) उसे कहते हैं जिसमें थोड़ी-थोड़ी ऊष्मता ( गर्मी ) और पीड़ा होती हो, जिसका वर्ण त्वचा के समान हो, जो स्पर्श करने में कठिन ( कड़ा ) तथा स्थिर ( अचल ) हो ॥ २ ॥

वक्तव्य—इसी ब्रणशोथ को बैठाने ( न पकने ) के लिए विम्लापन, सुशीतल लेप, सेक, रक्तमोक्षण, संशोधन आदि का निर्देश ऊपर श्लोक १ में दिया गया है, न कि पच्यमान ब्रणशोथ में।

पच्यमानो विवर्णस्तु रागी बस्तिरिवाततः। स्फुटतीच सनिस्तोदः साङ्गमर्दविजृम्भिकः ॥ ३ ॥ संरम्भारुचिदाहोपातृइवरात्रिन्द्रतान्तिः। स्यान् विध्यन्द्यत्याज्यं ब्रणवत्स्पर्शनासहः ॥ ४ ॥

पच्यमान ब्रणशोथ के लक्षण—जब पच्यमान वह शोथ फोड़ा का रूप धारण करने लगता है तो वहाँ की त्वचा का वर्ण विशिष्ट वर्ण का हो जाता है। उसमें कुछ लालिमा दिखलायी देती है और वह बस्ति ( भरी हुई मशक ) की भाँति तन जाता है। उसमें ऐसी पीड़ा होती है मानो वह फूट रहा हो, उस समय अन्य सभी अंगों में पीड़ा होती है और जैभाइयों आने लगती हैं। और भी अनेक प्रकार की