भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

पीड़ाएँ होती हैं, अरुचि, दाह, ऊषा ( भाप निकलने का-सा अनुभव ), प्यास, ज्वर तथा निद्रा का न आना, स्नान ( ढेर के रूप में संचित अर्थात् रखा या व्रण के ऊपर लगाया हुआ ) घी इधर-उधर फैल जाता है और उस स्थान पर व्रण के समान स्पर्श सहन नहीं हो पाता ॥ ३-४ ॥

पक्वेऽल्पवेगता स्त्रानिः पाण्डुता बलिसम्भवः । नामोऽन्तेपुत्रतिर्मध्ये कण्ठशोफादिमार्वम् ॥

स्पृष्टे पूयस्य सञ्चारो भवेद्वस्ताविवाभ्मसः ।

पक्वशोथ के लक्षण—व्रणशोथ के पक जाने पर वेदनाओं में कमी, शोथ के स्वरूप में मलिनता, पीलापन, झुर्रियों का पड़ जाना, सभी ओर से झुक जाना तथा बीच में ( मुखभाग ) में उभारयुक्त हो जाना, शोथ के आस-पास खुजली का होना, सूजन में कोमलता का आ जाना, हूने पर पूय का इधर-उधर जाना उस प्रकार का होता है, जैसे मशक को दबाने पर पानी ॥ ५ ॥

। पक्त्व्य—सुश्रुत ने पक्वव्रण के लक्षणों को इस प्रकार कहा है—'वेदोपशान्तिः... 'पक्वलिङ्गम्' । देखें—सु.सू. १७५। अवस्था-भेद से व्रणशोथ ( व्रणाय शोथः ) तीन प्रकार का होता है—१. आम व्रण, २. पच्यमान व्रण तथा ३. पक्व व्रण। इन स्थितियों को ठीक-ठीक जानने वाला ही योग्य चिकित्सक कहा जाता है।

शूलं नर्तेऽनिलाद्वाहः पिताच्छोफः कफोदयात् ॥ ६ ॥

रागो रक्ताच्च पाकः स्यादतो दोषैः सशोणिताः ।

व्रण में बात आदि के लक्षण—व्रणशोथ में वातदोष के बिना शूल ( वेदना ), पित्तदोष के बिना दाह, कफदोष के बिना शोथ तथा रक्त के बिना राग ( लालिमा ) नहीं होता, अतः रक्त युक्त तीनों दोषों से मिलकर व्रण का पाक होता है ॥ ६ ॥

पक्त्व्य—महर्षि वाग्भट ने 'रागो रक्ताच्च' यह सुश्रुत से अधिक कहा है, जिसका प्रसंगानुसार औचित्य है। यद्यपि रक्त और पित्त समान धर्म वाले हैं, फिर भी पाक रक्त का ही होता है, उस व्रणस्थान में स्थित मांस तथा वसा आदि का पाक नहीं होता; भले ही वे गल या सड़ जाते हैं। देखें—सु.सू. १७७।

पाकेऽतिवृत्ते सुषिरस्तनुत्वदोषभक्षितः ॥ ७ ॥

बलीभिराचितः श्यावः शीर्यमाणतनूरूहः ।

अतिपक्व व्रण के लक्षण—पाक का अतिक्रमण होने पर अर्थात् भीतर से व्रण के पक जाने पर ये लक्षण ऊपर से दिखलायी देते हैं—व्रण के भीतर से खोखला होना, व्रण के ऊपर की त्वचा का पतला पड़ जाना; ये लक्षण पूयदोष के खा जाने से हो जाते हैं, उसके ऊपर से झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, त्वचा का वर्ण काला हो जाता है और उसके ऊपर के रोयें गिरने या झड़ने लगते हैं ॥ ७ ॥

कफजेषु तु शोफेषु गम्भीरं पाकमेत्यसुक् ॥ ८ ॥

पक्वलिङ्गं ततोऽस्पष्टं यत्र स्याच्छीतशोफता । त्वक्कावर्ण्यं रुजोऽल्पत्वं घनस्पर्शत्वमशमवत् ॥

रक्तपाकमिति ब्रूयात् प्राज्ञो मुक्तसंशयः ।

गम्भीरपाक का वर्णन—कफ-प्रधान व्रणशोथों में रक्तधातु का पाक गहरायी में होता है, इसलिए व्रणपाक के लक्षण भी ऊपर से स्पष्ट दिखलायी नहीं पड़ते। किन्तु कुछ दिन बीत जाने पर जिस व्रणशोथ में स्पर्श करने पर शीतता प्रतीत हो, त्वचा के ऊपर समानवर्णता दिखलायी दे, पीड़ा में कमी आ जाय, स्पर्श में वह स्थान पत्थर की भाँति कठोर लगे वहाँ बुद्धिमान् चिकित्सक निःसन्देह कह दे कि यहाँ रक्त का गम्भीर पाक हो चुका है ॥ ८-९ ॥

पक्त्व्य—यह परिस्थिति व्रणचिकित्सक की परीक्षा की घड़ी होती है। इसमें न तो श्लोक ५ में कहे गये पक्व-व्रणशोथ के लक्षण दिखलायी पड़ते हैं और न बात आदि दोषों के ही लक्षणों का प्रभाव