भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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शत्रुकर्मविधिग्रन्थायः २९ ]

सूत्रस्थानम्

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परिलक्षित होता है, अतएव इस रक्तपाक को गम्भीरपाक कहा गया है। इसके लिए आप देखें—सू. सू. १७१ तथा अ. सं. सू. ३८८। ऐसे पक्व ब्रणों की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, उपेक्षा करने से ये असाध्य नाडीब्रण का रूप धारण कर लेते हैं, क्योंकि ऐसे पूषशल्य को बाहर निकलने का मार्ग ही नहीं मिलता। सामान्य रूप से इस ब्रण को 'गम्भीर' कहते भी हैं।

अल्पसत्त्वेऽबले बाले पाकाद्याऽत्यर्थमुद्वेते ॥ १० ॥

दारुणं मर्मसन्ध्यादिस्थिते चान्यत्र पाटनम्।

दारुण एवं पाटन लेप—यदि रोगी का सत्त्व (मानसिक बल) कम हो, दुर्बल हो अथवा रोगी बालक (असहनशील) हो तथा ब्रणपाक भलीभाँति हो गया हो, ब्रणशोथ मर्मस्थल में या मर्मसन्धि अथवा केवल सन्धिस्थान में हो तो इन स्थानों में दारुणलेपों का प्रयोग करना चाहिए। आवश्यक होने पर पाटनकर्म भी किया जा सकता है, यह अर्थ 'ब' के प्रयोग से लिया गया है। उक्त स्थितियों से अन्य स्थलों में पाटनकर्म करना चाहिए ॥ १० ॥

वक्तव्य—दारुण का प्रथम प्रस्ताव होने के कारण एवं सर्वथा निरापद होने के कारण इसका ब्रणशोथों में सादर प्रयोग किया जाता है। दारुणक्रिया जहाँ अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती वहाँ विवश होकर पाटनक्रिया का उपयोग होता है। अ. द्व. उ. २५।३७ में एक दारुणलेप दिया है, पहले इसका प्रयोग करें।

आमच्छेदे सिरास्तानुव्यापदोऽमुगतिमुतिः ॥ ११ ॥

रजोऽतिवृद्धिर्द्विरणं विसर्पो वा क्षतोद्वबः।

शत्रुकर्म का निषेध—आम-ब्रणशोथ का शस्त्र द्वारा पाटन कर देने पर सिरा एवं स्नायु में विकृति हो जाती है, अतएव अधिकाधिक रक्तस्त्राव होने लगता है। अनेक प्रकार की पीड़ाएँ होती हैं, उस स्थान की त्वचा का फटना अथवा क्षत के कारण विसर्प या विद्विघ नामक रोग हो सकता है ॥ ११ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने विसर्प न लिखकर केवल विद्विघ का उल्लेख किया है। देखें—सू. सू. १७१-१०। अतः आम-ब्रणशोथ में शत्रुकर्म नहीं करना चाहिए, ऐसे मूर्ख चिकित्सक की निन्दा की गयी है।

तिष्ठन्नन्तः पुनः पूयः सिरास्तान्व्यसुगमिषम् ॥ १२ ॥

विवृद्धो दहति क्षिप्रं तुणोलपमिवानलः।

शत्रुकर्म का विधान—ब्रणशोथ के भीतर पूय (मवाद) पड़ा रहने पर अर्थात् समय रहते हुए उसे न निकालने पर वह पूय सिरा, स्नायु, रक्त तथा मांस को उस प्रकार शीघ्र जला (सड़ा-गला) देता है, जैसे बड़ा हुआ अग्नि समीपस्थ घास-फूस को जला देता है ॥ १२ ॥

वक्तव्य—उक्त ११वें पद्य में आमच्छेद का निषेध करने के बाद कहे गये १२वें पद्य में यद्यपि शब्दतः शत्रुकर्म का विधान नहीं किया गया है तथापि अन्तःस्थित पूय क्या-क्या हानि करता है इसका वर्णन करने से यह आभास होता है कि ग्रन्थकार शत्रुकर्म द्वारा पूय को निकालने का निर्देश दे रहा है। इसके लिए ब्रणशोथ का पाटन कर उसके पूय को निकाल देना चाहिए। उक्त पद्य में 'दहति' प्रयोग के ग्रहण की प्रेरणा वाश्वट को सुश्रुतोक्त सू. १७।१६ से मिली है।

यश्चिन्नन्तस्याममज्जानाद् यश्च पक्वमुपेक्षते ॥ १३ ॥

श्वपचाविव विज्ञेयो तावनश्चित्तकारिणी।

अनिश्चित्तकारी वैद्य की निन्दा—जो ब्रणचिकित्सक अपने अज्ञान के कारण आमब्रणशोथ को काटता (चीर देता) है और जो बाहर या भीतर पके ब्रणशोथ का दारुण अथवा पाटन नहीं करता वे दोनों ही चिकित्सक रोगी को मार डालने के कारण श्वपच (चाण्डाल) के समान होते हैं। क्योंकि इस प्रकार के उन दोनों को ही अनिश्चित्तकारी कहा जाता है ॥ १३ ॥