अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—पाटनकर्म करने के पहले आम अथवा पन्व का ज्ञान अवश्य कर लेना चाहिए, नहीं तो अपयश मिलता है। श्रीवामट ने उक्त पद्य को अविकल रूप से सुश्रुत से लिया है। देखें—सु.सू. १७१०। ब्रण के सात उपक्रम—१. विस्लापन, २. अवसेचन ( जलीकापातन अथवा रक्षमोक्षण ), ३. उपनाह ( पुलिस्त आदि का बन्धन ), ४. पाटन क्रिया, ५. शोधन ( पञ्चवत्कल आदि क्वाथों से ), ६. रोपण ( पूरण = घाव भरने के उपाय ) और ७. वैकुतापह ( ब्रणस्थान की विकृतियों को रोमसंजन तथा सवर्ण करना आदि क्रियाओं द्वारा दूर करना )। देखें—सु.सू. १७१८। विशेष देखें—सु. चि. अध्याय १ सम्पूर्ण।
प्राक् शस्त्रकर्मणश्चेष्टे भोजयेदन्नामात्रम् ॥ १४ ॥
पानपं पाययेन्मद्यं तीक्ष्णं यो वेदनाक्षमः । न मूच्छत्यन्नसंयोगान्मत्तः शस्त्रं न बुध्यते ॥ १५ ॥
शस्त्रकर्म के पूर्व कर्म—शस्त्रकर्म करने के पहले रोगी को उसकी इच्छा के अनुसार किन्तु जो रोगी के लिए हितकर हो, उसे खिलायें, मद्यपान करने वाले उस रोगी को तीक्ष्ण मद्य पिलायें, जो शस्त्रकर्म की वेदना न सह सकता हो, क्योंकि मद्यपान से वेदना को सहने की शक्ति मिलती है। भोजन करा देने पर रोगी मूच्छित नहीं हो पाता और मद्य के नशे से उन्मत्त होने के कारण उसे कब शस्त्रकर्म किया इसका ज्ञान नहीं रह पाता ॥ १४-१५ ॥
अन्यत्र मूढगर्भशममुखरोगोदरातुरात् ।
आहार एवं मद्यपान का निषेध—मूढगर्भ, अशमरी, मुखरोग तथा उदररोग इन रोगों में आहार खिलाकर एवं मद्यपान कराकर शस्त्रकर्म नहीं करना चाहिए।
बक्तव्य—आधुनिक सर्जरी में तो संज्ञाहरण ( बेहोश करने ) के अनेक उपादान सुलभ हैं।
अथाहूतोपकरणं वैद्यः प्राङ्मुखमात्रम् ॥ १६ ॥
सम्मुखो यन्त्रयित्वाऽसृ न्यस्येन्मर्दि वर्जयत् । अनुलोमं सुनिशितं शस्त्रमापूयदर्शनात् ॥ १७ ॥
सकृदेवाहरेत्तच्च—
शस्त्रप्रयोग-विधि—शस्त्रप्रयोग करने के पूर्व कर्मों को करने तथा शस्त्रकर्म के उपयोग में आने वाले उपकरणों को एकत्रित करा लेने के बाद शल्यचिकित्सक रोगी को पूरब की ओर मुख करके बैठायें और उसके अंगों को बांधकर चिकित्सक उसके सामने अथवा उन्निवृत्त स्थान में खड़ा होकर मर्म आदि स्थानों को बचाकर अत्यन्त तीक्ष्ण ( तेज ) शस्त्र से अनुलोम विधि से एक ही बार में उतना पाटनकर्म करें, जिससे पूय ( मवाद ) निकलने लगे और फिर शीघ्र शस्त्र को निकाल लेना चाहिए ॥ १६-१७ ॥
—पाके तु सुमहत्यपि । पाटयेत् द्रव्यङ्गुलं सम्प्यद्रव्यङ्गुल्यङ्गुलान्तरम् ॥ १८ ॥
एषित्वा सम्यगेपिण्या परितः सुनिरूपितम् । अङ्गुलीनालवालेर्वा यथादेशं यथाशयम् ॥ १९ ॥
यतो गतां गतिं विद्यादुत्सङ्गो यत्र यत्र च । तत्र तत्र ब्रणं कुर्यात्सुविभक्तं निराशयम् ॥ २० ॥
आयतं च विशालं च यथा दोषो न तिष्ठति ।
महान् ब्रणशोथ में कर्तव्य—विस्तृत आकार वाले ब्रणशोथ में दो अंगुल लम्बा चीरा लगाना चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो दो या तीन अंगुल की दूरी पर दूसरा चीरा लगायें और पूय को निकालने के बाद एषणी यन्त्र से, अँगुली से, कमलनाल से, बालों की वेणी से कहीं-कहीं पका है और कहीं-कहीं पूय रुका है, इस प्रकार भलीभाँति देखकर जहाँ-जहाँ पूय गया है और जहाँ उत्संग ( उभार ) दिखलायी देता हो वहाँ-वहाँ चीरा लगा देना चाहिए। वह चीरा लम्बा तथा चौड़े मुख वाला हो और ये सभी चीरे सुविभक्त ( आपस में मिले न ) हों, जिनके कारण दोष ( पूय ) भीतर न रह सके ॥ १८-२० ॥
बक्तव्य—कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि एक स्थान पर चीरा लगाने पर भीतर का सभी पूय नहीं निकल पाता। ऐसा तब होता है जब ब्रणपाक भीतर से टेढ़ा-मेढ़ा होता है, ऐसी स्थिति में एकाधिक