भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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शस्त्रकर्मविधिरध्यायः २९ ]

सूत्रस्थानम्

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स्थानों पर चौरा लगाना पड़ता है। पूय एक प्रकार का शल्य है, इसका भलीभाँति निर्हरण कर देना चाहिए। यदि पूय भीतर रह जाता है तो यह नाडीब्रण (नासूर) को पैदा कर देता है।

शौर्यमाशुक्रिया तीक्ष्णं शस्त्रमस्वेदवेपय॥ २१॥

असम्मोहश्च वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि शस्यते।

शल्यचिकित्सक के गुण—शौर्य (शस्त्रप्रयोग करने में निर्भय होना), आशुक्रिया (लघुहस्तता अर्थात् शीघ्र शस्त्रप्रयोग करने का अभ्यास), शस्त्र का तेज धारवाला होना, पसीना तथा कम्पन का न होना तथा मूर्च्छित न होना या न घबड़ाना—ये शल्यचिकित्सक के गुण कहे गये हैं। २१॥

वक्तव्य—यह पद्य अष्टांगसंग्रह में अविकल मूलभूत है। देखें—अ. सं. सू. ३८।२८।

तिर्यक्छिन्त्याल्ललाटश्रूदन्तवेष्टकजवृणि ॥ २२॥

कुशिकक्षाक्षिकूटीष्टकपोलगलबइक्षणे ।

तिर्यक्छेदन-विधि—तिरछे काटने योग्य स्थान हैं—ललाट, भौहों, मसूड़ों, जनुअस्थि, कुक्षि (उदर का भाग), कक्षा (काँख), अक्षिकूट, थोछ (होंठ), कपोल (गाल), गला तथा वंक्षण (पेड़ और जाँघ के बीच का भाग या ऊरुसंधि) ॥ २२॥

अन्यत्र छेदनातिर्यक् सिरास्तायुविपाटनम्॥ २३॥

तिर्यक्छेदन-निषेध—उक्त स्थानों के अतिरिक्त अवयवों में तिरछा चौरा नहीं लगाना चाहिए, ऐसा करने से सिरा अथवा स्नायु कट सकते हैं। २३॥

शस्त्रेऽवचारिते वाम्भिः शीताम्भोभिश्च रोगिणम्।

आभ्यास्य परितोऽङ्गुल्या परिपीड्य ब्रणं ततः॥ २४॥

शालयित्वा कपायेण प्लोतेनाम्भोऽपनीय च। गुगुल्बगुरुसिद्धार्थहिङ्गुसर्जरसान्वितैः॥ २५॥

धूपयेत्युषङ्गुल्यानिम्बपत्रैर्घृतप्लुतैः । तिलकल्काज्यमधुभिर्यथास्वं भेषजेन च॥ २६॥

दिग्धां वर्त्ति ततो दद्यात्तेरैवाच्छादयेच्च ताम्। घृतात्तैः सक्तुभिश्चोर्ध्वं घनां कवलिकां ततः,

निधाय युक्त्या बन्धीयात्यष्टेन सुसमाहितम्। पार्श्वे सन्ध्येऽपसन्धे वा नाधस्तास्त्रैव चोपरि॥ २८॥

पश्चात्कर्म-निर्देश—शस्त्रप्रयोग करने के तत्काल बाद मधुर वाणी से तथा मुख पर शीतल जल के छींटे देकर रोगी को आश्वसन देकर ब्रणस्थान को चारों ओर से अँगुली से दबाकर जिससे पूय भलीभाँति निकल जाय, तदनन्तर त्रिफला आदि के काढ़ा से ब्रणवास्तु को धोकर, साफ वस्त्र अथवा रुई से जल को पोछकर (सुखाकर) गुगुल्ब, अंगुर, सरसों, हींग, रात, नमक, बालवच तथा नीम के पत्ते—इन्हें कूटकर बनायी गयी धूप को घी में मिलाकर उस ब्रण में घूष देनी चाहिए। उसके बाद ब्रणदोषशामक औषधद्रव्यों से मिले हुए तिलकल्क, मधु तथा घी को मिलाकर उसे एक रुई की बत्ती में चुपड़े और उसे घाव के भीतर भर दें और फिर तिलकल्क आदि से निर्मित मलहम से उसे ढक दें। उसके ऊपर घी मिले हुए सत् की मोटी कवलिका (गद्दी) रखकर सावधानी से पट्टी से बाँध दें। इस ग्रन्थि को ब्रण के दायीं या बायीं ओर बाँधें, उसके नीचे-ऊपर न बाँधें। २४-२८॥

वक्तव्य—सुश्रुत-सूत्रस्थान का १८वाँ अध्याय इस विषय का पूरक है। इसका अवलोकन इस कार्य में प्रवृत्त होने से पहले अवश्य करें।

शुचिसूक्ष्मदुदाः पट्टाः कवलयः सविकेशिकाः । धूपिता मुदवः स्तक्षणा निर्वलौका ब्रणे हिताः॥

पट्टी आदि का निर्देश—ब्रणबन्धन के पट्ट (पट्टियाँ), कवलिकाएँ (गद्दियाँ) तथा विकेशिकाएँ (औषधलिप्त बत्तियाँ) शुचि (साफ-सुथरी), सूक्ष्म (पतले वस्त्र से निर्मित) किन्तु दृढ़ होनी चाहिए। इन्हें धूप दी जानी चाहिए और सीलन से बचाने के लिए धूप में भी रखना चाहिए। ये मुलायम तथा