अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः
अथातः शल्यहर्षणविधिमध्येषां व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से विविध प्रकार के शल्यों को निकालने की विधियों का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —सुश्रुत ने शल्य का परिचय इस प्रकार दिया है—‘त्र्व मनःशरीराऽऽबाधकराणि शल्यानि’। (सु.सू. ७।४) तथा ‘सर्वशरीराऽऽबाधकरं शल्यम्’। (सु.सू. २६।५) अर्थात् जो सम्पूर्ण शरीर तथा मन को पीड़ित करता है, उसे शल्य कहते हैं। आशुगमनार्थक शलू धातु से यत् प्रत्यय जोड़कर शल्य शब्द निष्पन्न होता है। इसके उपादान ये हैं—बर्छां, सींग, बाण, कांटा, हड्डी, दूषित रक्त, गर्भ, शोक, शत्रु, विषाद आदि। सिराबेध-विधि के बाद अब यहाँ से शल्यहर्षण-विधि का वर्णन प्रारम्भ किया जा रहा है, क्योंकि पहले अध्याय में सम्पूर्ण शरीरव्यापी दूषित रक्त रूप शल्य को निकालने का उपक्रम किया गया था। अब इस अध्याय में शरीर के प्रत्येक अवयव में प्रविष्ट लोह आदि शल्य के लक्षणों तथा उनको निकालने के उपायों का वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —सु.सू. २६-२७ तथा अ.सं.सू. ३७ में देखें। इस विषय का वर्णन चरकसंहिता में उनके सिद्धान्तानुसार नहीं है।
वक्रजूर्तिर्यगुर्धार्धः शल्यानां पञ्चधा गतिः ।
शल्य की गतियाँ—शरीरावयवों में प्रविष्ट होते समय शल्यों की गति पाँच प्रकार से होती है। यथा—१. वक्र ( टेढ़ी ), २. ऋजु ( सीधी ), ३. तिर्यक् ( तिरछी ), ४. ऊर्ध्व ( ऊपर की ओर ) तथा ५. अधः ( नीचे की ओर ) ।
वक्तव्य —उक्त पाठ के आधारस्थलों का अवलोकन करें—सु.सू. २६।८ तथा अ.सं.सू. ३७।३ पर। शल्यशास्त्र में शल्य शरीर एवं आगन्तुज भेद से दो प्रकार का माना जाता है। इनको निकालने की विधियों का इस अध्याय में वर्णन किया गया है।
ध्यामं शोफरुजावन्तं श्रवन्तं शोणितं मुहुः ॥ १ ॥
अभ्युद्गतं बुद्धवत्पिटिकोपचितं ब्रणम्। मुदुमांसं च जानीयादन्तःशल्यं समासतः ॥ २ ॥
अन्तःशल्य के लक्षण —संक्षेप से अन्तःशल्य ( भीतर गये हुए शल्य ) के ये लक्षण होते हैं—ध्याम ( काला या मलिन ) वर्ण वाला, उस स्थान पर शोथ तथा पीड़ा का होना, जिस स्थान से बार-बार रक्तस्राव हो रहा हो, जो स्थान बुलबुला की भाँति उभार युक्त हो, जिसके आस-पास में अनेक छोटी-छोटी पिडकाएँ हो गयी हों और जहाँ का मांस मुदु ( कोमल ) हो गया हो, ये अन्तःशल्य के लक्षण हैं ॥ १-२ ॥
विशेषात्स्वगते शल्ये विवर्णः कठिनायतः । शोफो भवति—
त्वचागत शल्य के लक्षण —विशेष करके यदि शल्य त्वचा में प्रविष्ट होता है, तो उस स्थान की त्वचा का रंग बदल जाता है। वह स्थान स्पर्श में कठोर तथा चौड़ा हो जाता है।
—मांसस्थे चोषः शोफो विवर्द्धते ॥ ३ ॥