अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
अष्टाविंशोऽध्यायः
अथातः शल्यहर्षणविधिमध्येषां व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से विविध प्रकार के शल्यों को निकालने की विधियों का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —सुश्रुत ने शल्य का परिचय इस प्रकार दिया है—‘त्र्व मनःशरीराऽऽबाधकराणि शल्यानि’। (सु.सू. ७।४) तथा ‘सर्वशरीराऽऽबाधकरं शल्यम्’। (सु.सू. २६।५) अर्थात् जो सम्पूर्ण शरीर तथा मन को पीड़ित करता है, उसे शल्य कहते हैं। आशुगमनार्थक शलू धातु से यत् प्रत्यय जोड़कर शल्य शब्द निष्पन्न होता है। इसके उपादान ये हैं—बर्छां, सींग, बाण, कांटा, हड्डी, दूषित रक्त, गर्भ, शोक, शत्रु, विषाद आदि। सिराबेध-विधि के बाद अब यहाँ से शल्यहर्षण-विधि का वर्णन प्रारम्भ किया जा रहा है, क्योंकि पहले अध्याय में सम्पूर्ण शरीरव्यापी दूषित रक्त रूप शल्य को निकालने का उपक्रम किया गया था। अब इस अध्याय में शरीर के प्रत्येक अवयव में प्रविष्ट लोह आदि शल्य के लक्षणों तथा उनको निकालने के उपायों का वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —सु.सू. २६-२७ तथा अ.सं.सू. ३७ में देखें। इस विषय का वर्णन चरकसंहिता में उनके सिद्धान्तानुसार नहीं है।
वक्रजूर्तिर्यगुर्धार्धः शल्यानां पञ्चधा गतिः ।
शल्य की गतियाँ—शरीरावयवों में प्रविष्ट होते समय शल्यों की गति पाँच प्रकार से होती है। यथा—१. वक्र ( टेढ़ी ), २. ऋजु ( सीधी ), ३. तिर्यक् ( तिरछी ), ४. ऊर्ध्व ( ऊपर की ओर ) तथा ५. अधः ( नीचे की ओर ) ।
वक्तव्य —उक्त पाठ के आधारस्थलों का अवलोकन करें—सु.सू. २६।८ तथा अ.सं.सू. ३७।३ पर। शल्यशास्त्र में शल्य शरीर एवं आगन्तुज भेद से दो प्रकार का माना जाता है। इनको निकालने की विधियों का इस अध्याय में वर्णन किया गया है।
ध्यामं शोफरुजावन्तं श्रवन्तं शोणितं मुहुः ॥ १ ॥
अभ्युद्गतं बुद्धवत्पिटिकोपचितं ब्रणम्। मुदुमांसं च जानीयादन्तःशल्यं समासतः ॥ २ ॥
अन्तःशल्य के लक्षण —संक्षेप से अन्तःशल्य ( भीतर गये हुए शल्य ) के ये लक्षण होते हैं—ध्याम ( काला या मलिन ) वर्ण वाला, उस स्थान पर शोथ तथा पीड़ा का होना, जिस स्थान से बार-बार रक्तस्राव हो रहा हो, जो स्थान बुलबुला की भाँति उभार युक्त हो, जिसके आस-पास में अनेक छोटी-छोटी पिडकाएँ हो गयी हों और जहाँ का मांस मुदु ( कोमल ) हो गया हो, ये अन्तःशल्य के लक्षण हैं ॥ १-२ ॥
विशेषात्स्वगते शल्ये विवर्णः कठिनायतः । शोफो भवति—
त्वचागत शल्य के लक्षण —विशेष करके यदि शल्य त्वचा में प्रविष्ट होता है, तो उस स्थान की त्वचा का रंग बदल जाता है। वह स्थान स्पर्श में कठोर तथा चौड़ा हो जाता है।
—मांसस्थे चोषः शोफो विवर्द्धते ॥ ३ ॥
शल्याहरणविधिर्ध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०५
पीडनाक्षमता पाकः शल्यमार्गो न रोहति।
मांसगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मांसाधतु में प्रविष्ट होता है तो चोष ( चूसने की जैसी पीड़ा ) होता है, उस स्थान पर शोथ बहने लगता है, उस स्थान को छूने में कष्ट होता है, वह स्थान पक जाता है और चिकित्सा करने पर शल्यमार्ग ( जहाँ से शल्य भीतर घुसा वह ) शोष भरता नहीं है ॥ ३ ॥
पेश्यन्तरगते मांसप्राप्तवच्छ्रयं विना ॥४॥
पेशीगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मांसपेशियों ( मांसाधतु में ही प्रविष्ट होकर वायुपेशियों का विभाजन करता है ) के भीतर प्रविष्ट हो जाता है, तो इसमें भी मांसगत शल्य के उक्त सभी लक्षण हो जाते हैं, किन्तु इसमें सूजन नहीं होती ॥ ४ ॥
आक्षेपः स्नायुजालस्य संरम्भस्तम्भवेदनाः । स्नायुगे दुर्हरं चैतत्—
स्नायुगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य स्नायुओं में प्रविष्ट हो जाता है तो स्नायुजाल में आक्षेप ( विंचाव ), संरम्भ ( क्षोभ—हलचल ), स्तम्भ ( जड़ता ) तथा पीड़ा होती है और यह शल्य बड़े कष्ट से निकाला जा सकता है।
बक्तव्य—स्नायु-परिचय—इनसे शरीर में स्थित मांसपेशियाँ, अस्थियाँ, मेदोधातु तथा सन्धियाँ दृढ़ता से बँधी रहती हैं। ये शिराओं से अधिक मजबूत होती हैं। देखें—शा. सं. पू. खं. ५५५।
—सिराध्मानं सिराश्रिते ॥५॥
सिरागत शल्य के लक्षण—यदि शल्य सिराओं में प्रविष्ट हो जाता है तो सिराएँ आध्मान युक्त हो जाती हैं अर्थात् फूल जाती हैं ॥ ५ ॥
स्वकर्म्मगुणहानिः स्यात्स्रोतसां स्रोतसि स्थिते ।
स्रोतोगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य स्रोतों में प्रविष्ट हो जाता है तो स्रोतों के कर्मा तथा गुणों की हानि हो जाती है।
बक्तव्य—स्रोतसु-परिचय—सु.शा. ५६; सु.शा. ९१२ तथा च.शा. ७१२ में देखें। शरीर के भीतर मन, प्राण, अन्न, जल, दोष, धातु, उपधातु, धातुओं के मल तथा मूत्र आदि जिन मार्गों में से होकर संचार करते हैं, उन्हें स्रोतसु कहते हैं। इनका निर्माण—वायु ऊष्मा से युक्त होकर यथायोग्य इन स्रोतों का निर्माण करता है।
धमनीस्थेऽनिलो रक्तं फेनयुक्तमुदीरयेत् ॥६॥
नियर्याति शब्दवान् स्याच्च हृत्लासः साङ्ख्यवेदनः ।
धमनीगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य धमनी में प्रविष्ट हो तो वायु झागदार रक्त को बाहर की ओर निकालता है तथा शब्द करता हुआ वायु भी उसमें से निकलता है और सम्पूर्ण शरीर में वेदना होती है, जो मिचलता है ॥ ६ ॥
सङ्ख्यो बलवानस्थिसन्धिप्राप्तेऽस्थिपूर्णता ॥७॥
अस्थिसन्धिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य अस्थि की सन्धि में प्रविष्ट होता है तो उसमें जोरदार रगड़ लगती है और अस्थि का वह पोल्ला भाग उस शल्य से भर जैसा जाता है, यही उसकी पूर्णता है ॥ ७ ॥
बक्तव्य—यहाँ महर्षि वाग्भट पूर्णतया सुश्रुत से प्रभावित हैं। देखें—‘अस्थिविवरणतेऽस्थि-पूर्णताऽस्थिनित्तोदः संहर्यो बलवांश्च’ । ( सु.सू. २६१० ) वाग्भट ने जहाँ ‘अस्थिसन्धि’ कहा है, उसे सुश्रुत
२० अ० ह०
३०६
अष्टाङ्गहृदये
ने 'अस्थिविवर' कहा है। इस दृष्टि से सुश्रुतकोष पाठ अधिक समीचीन है, क्योंकि विवर की पूर्णता बाहरी शल्य से हुई है, यह स्थिति अस्थिसन्धि में नहीं होती। क्या यहाँ ऐसा पाठ तो नहीं रहा? 'सद्घर्षं बलवान्स्थिमध्यप्राप्ते'। विद्वान् विचार करें, क्योंकि आगे अस्थिसन्धि का वर्णन दिया है।
नैकरूपा रुजोऽस्थिस्थे शोफः—
अस्थिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य अस्थि में प्रविष्ट (धँसा) होता है तो अनेक प्रकार की (भ्रम, लूण, मुदित, पीडित, नीचे की ओर को झुकाना आदि) पीड़ाओं की उत्पत्ति होती है और उसके आसपास सूजन भी हो जाती है।
—तद्वच्च सन्धिगे।
चेष्टानिवृत्तिश्च भवेत्—
सन्धिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य सन्धियों में धँसा होता है तो अस्थिशल्य के समान लक्षण इसमें भी होते हैं और उस सन्धि में पहले की भाँति लोच नहीं रह जाती अर्थात् वह सन्धि ठीक से मुड़ नहीं सकती।
—आटोपः कोष्ठसन्धिते ॥ ८ ॥
आनाहोऽन्नशकृन्मूत्रदर्शनं च व्रणानने।
कोष्ठगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य कोष्ठ में प्रविष्ट हुआ हो तो व्रण के मुख में अन्न, मल तथा मूत्र का दिखलायी देना, पेट में हलचल तथा आनाह (अफरा) ये लक्षण दिखलायी पड़ते हैं ॥ ८ ॥
विद्यान्मर्मगतं शल्यं मर्मविद्रोपलक्षणैः ॥ ९ ॥
मर्मगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मर्मस्थान में धँसा हो तो उसमें मर्मविद्र के लक्षण दिखलायी देते हैं ॥ ९ ॥
वक्तव्य—देखें—सू. सू. २५।३५; सु. शा. ६।१९-२० तथा अ. हू. शा. ४।४७ में मर्मविद्र के लक्षण।
यथास्वं च परिस्रावैस्त्वगादिषु विभावयेत्।
सामान्य निर्देश—'यथास्वं' का अर्थ है लचा आदि के स्रावों को देखकर शल्य कहाँ धँसा है, उसका निर्णय इस दृष्टि से करें। यथा—त्वचा में लसीकास्राव को देखकर, सिरा में रक्तस्राव से, अस्थि में मज्जास्राव से, आमाशय में अन्न के निकलने से, मलाशय में मल के निकलने से और मूत्राशय में मूत्र के निकलने को देखकर शल्य का निर्णय कर लेना चाहिए।
रुह्यते शुद्धदेहानामनुलोमस्थितं तु तत् ॥ १० ॥
शल्यव्रण का रोपण—वमन तथा विरेचन आदि शोधन-क्रियाओं द्वारा शुद्ध शरीर वालों का वह शल्य के चुभने से हुआ व्रण शल्य के अनुलोम गति से भीतर स्थित रहने पर भी स्वयं ही भर गया है, ऐसा प्रतीत होता है ॥ १० ॥
दोषकोपाभिघातादिशोभाद्रयोऽपि ब्राधते।
पुनः पीडाकर्तृत्व—शल्य के निकल जाने पर ही व्रण को सम्यक् रुद्ध नहीं समझ लेना चाहिए, क्योंकि इस व्रणस्थान पर पुनः कभी दोषों का प्रकोप होने पर, चोट लगने पर या धक्का आदि के लगने पर भीतर स्थित शल्य फिर भी पीड़ा पहुँचा सकता है।
त्वङ्नष्टे यत्र तत्र स्युरभ्यङ्गस्वेदमर्दनैः ॥ ११ ॥
शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०७
रागरुढाहसंरम्भा यत्र चाज्यं विलीयते। आशु शूष्यति लेपो वा तत्स्थानं शल्यबद्धते॥ १२॥
शल्यज्ञान के उपाय—त्वचा आदि स्थानों में अदृश्य हुए शल्य को कैसे जानना चाहिए, इसके उपायों का क्रमशः वर्णन किया जा रहा है। त्वचागत शल्य—जहाँ त्वचा में शल्य प्रवेश कर अदृश्य हो गया हो, उसका पता लगाने के ये उपाय हैं—वहाँ अभ्यंग, स्वेदन तथा मर्दन करने से उस स्थान-विशेष पर लालिमा, पीड़ा, दाह तथा संरम्भ ( हलचल ) होता है; वहाँ घी सरलता से पिघल जाता है और लगाया हुआ लेप शीघ्र सूख जाता है। ऐसे स्थान को शल्य युक्त समझें॥ ११-१२॥
मांसप्रणष्टं संशुद्ध्या कर्शनाच्छूलयतां गतम्। क्षोभद्रागादिभिः शल्यं लक्षयेत्—
मांसगत शल्य—मांसपेशियों में खोये हुए शल्य को वमन-विरचन द्वारा शरीर-शोधन करने के कारण शरीर के शिथिल हो जाने पर, शरीर के हिलने-डुलने से, लालिमा दिखलायी देने से तथा पीड़ा आदि से यहाँ शल्य होना चाहिए, ऐसा समझना चाहिए।
—तद्वदेव च॥ १३॥
पेश्यस्यिसन्धिकोष्ठेषु नष्टम्—
पेशीगत आदि शल्य—इसी प्रकार मांसपेशियों के मध्य में, अस्थिसन्धियों में तथा कोष्ठप्रदेश के अन्तर्गत अदृश्य शल्य के प्रमुख स्थान को पहचान लेना चाहिए॥ १३॥
—अस्थिषु लक्षयेत्। अस्न्यामभ्यज्जनस्वेदबन्धपीडनमर्दनैः॥ १४॥
अस्थिगत शल्य—अस्थियों में अदृश्य हुए शल्य को अभ्यंग, स्वेदन, बन्धन, पीडन तथा मर्दन विधियों से उसका स्थान-निर्धारण कर लें॥ १४॥
प्रसारणाकुञ्चनतः सन्धिन्ष्टं तथाऽस्थिवत्।
सन्धिगत शल्य—सन्धिगत अदृश्य शल्य का ज्ञान अस्थिगत शल्य की भाँति करें। विशेष करके प्रसारण ( फैलाना ) तथा आकुंचन ( सिकोड़ना या बटोरना ) आदि क्रियाओं से समझें।
नष्टे स्नायुशिराघ्नोतोधमनीञ्चसमे पथि॥ १५॥
अधयुक्तं रथं खण्डचक्रमारोप्य रोगिणम्। शीघ्रं नयेतस्तस्य संरम्भाच्छल्यमादिशेत्॥ १६॥
स्नायु आदि गत शल्य—स्नायु, सिरा, घ्नोतसों तथा धमनियों में प्रविष्ट शल्य जब अदृश्य हो जाय तो उस रोगी को टूटे पहिये वाले रथ पर बैठाकर उसमें घोड़ा जोतकर शीघ्र ले जाय। उसके संरम्भ से जहाँ शल्य होगा-वह स्थान दुःखने लगेगा॥ १५-१६॥
मर्मनष्टं पृथङ्नोक्तं तेषां मांसादिसंश्रयात्।
मर्मगत शल्य—यहाँ मर्मगत शल्य को अलग से नहीं कहा गया है, क्योंकि मर्मस्थलों के आश्रयस्थल मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि तथा सन्धियाँ ही हैं।
सामान्येन सशल्यं तु क्षोभिण्या क्रियया सख्यु॥ १७॥
सामान्य निर्देश—सामान्य रूप से वहाँ शल्य समझना चाहिए, जहाँ हिलाने-डुलाने तथा दबाने से पीड़ा हो॥ १७॥
वृत्तं पृथु चतुष्कोणं त्रिपुटे च समासतः। अदृश्यशल्यसंस्थानं ब्रणाकृत्या विभावयेत्॥ १८॥
शल्य के स्वरूपों का अनुमान—अदृश्य ( जो देखा गया न हो ऐसे ) शल्य के स्वरूप का ज्ञान ब्रण ( घाव ) की आकृति से समझने का प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि प्रायः सभी शल्यों के अवयव नष्ट
३०८
अष्टाङ्गहृदये
से चार प्रकार के होते हैं—१. वृत्त (गोल), २. पुष्प (चौड़ा), ३. चतुष्कोण (चौकोर) तथा त्रिपुट (तिकोना) ॥ १८ ॥
बक्तव्य —इन आकृतियों के अनुसार उस-उस शल्य को निकालने का प्रयत्न करना चाहिए।
तेषामाहरणोपायाः प्रतिलोमानुलोमकौ।
शल्य-निर्हरण के उपाय —उन शल्यों को निकालने के उपाय दो प्रकार के हैं—१. प्रतिलोम (वह शल्य शरीर के भीतर जैसे ही घुसा उससे उल्टा अर्थात् उसी मार्ग से बाहर को निकालना; जैसे कोटा निकाला जाता है) और २. अनुलोम (जहाँ से निकालना सरल हो, उसे अनुलोम कहते हैं)।
अर्वाचीनपराचीने निहिरेतद्विपर्यायात् ॥ १९ ॥
अर्वाचीन आदि शल्य —अर्वाचीन शल्य को प्रतिलोम-विधि से निकालना चाहिए और पराचीन शल्य को अनुलोम-विधि से निकालना चाहिए ॥ १९ ॥
बक्तव्य —अर्वाचीन शल्य वह है, जो पास में उभार युक्त दिखलायी देता है और पराचीन शल्य वह है जो इस पार से दूसरी ओर को चला जाता है। अतएव कहा गया है कि अर्वाचीन शल्य को उसने जिधर से प्रवेश किया है, उधर से ही निकाल लें और पराचीन शल्य जहाँ तक पहुँच चुका है उसके आगे कुछ अवयव काटकर निकालें, वही उसके लिए अनुलोम होगा। इस प्रसंग में सुश्रुतको निम्न उद्धरणों को भी देखें—सु.सू. २७।६-७।
सुखाहार्थं यतश्चिच्छत्वा ततस्तिर्यगातं हरेत्।
तिर्यग्गत शल्य —तिर्यग्गत (तिरछे गये हुए) शल्य को उस ओर से काटकर निकाले, जहाँ से वह सुख से निकल सके।
बक्तव्य —तिर्यग्गत शल्य को निकालने के सम्बन्ध में वृद्धवाग्भट का भी यही मत है। देखें—अ.सं. सू. ३७।१४।
शल्यं न निर्घात्यमुरः कक्षावृद्धानुपाश्वगम् ॥ २० ॥
प्रतिलोममनुतुण्डं छेद्यं पुष्पमुखं च यत्।
निर्घातन के अयोग्य शल्य —उरस, कक्षा, वंशण तथा पाश्व (पशुकास्थियों) के भीतरी अवयवों में गये या बिधे हुए शल्यों का निर्घातन नहीं करना चाहिए। जो शल्य प्रतिलोम हो, जो अनुतुण्ड (जिस शल्य का मुख दूसरी ओर न निकला) हो, जो छेदन के योग्य हो तथा जो चौड़े मुखवाला हो—इन शल्यों का भी निर्घातन न करे ॥ २० ॥
बक्तव्य —निर्घातन नामक एक यन्त्रकर्म है, जिसका वर्णन अ. द्ब. सू. २५।४१ में है। इसी अध्याय के १५वें पद्य में 'शल्यनिर्घातनी नाडीयन्त्र' का भी उल्लेख है। इस सम्बन्ध में देखें—सु.सू. २७।८-९।
नैवाहरेद्विशल्यघ्नं नष्टं वा निरुपद्रवम् ॥ २१ ॥
विशल्यघ्न शल्यारुण-निषेध —विशल्यघ्न (शल्य को निकाल देने पर मार देने वाले) शल्य को, नष्ट शल्य ('णश्च अदक्षति' अर्थात् जो न दिखलायी दे रहा हो और जो पीड़ादायक भी न हो) को अथवा उपद्रव रहित शल्य को निकालने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए ॥ २१ ॥
बक्तव्य —उक्त विषय के स्पष्टीकरण के लिए सुश्रुतको निम्न सन्दर्भों का अवलोकन करें—'तान्येतानि पञ्चविकल्पानि भवन्ति; तद्यथा—सद्यः प्राणहराणि, कालन्तरप्राणहराणि, विशल्यघ्नानि, वैकल्पकराणि, रूजाहराणि चेति'। (सु.शा. ६।८) 'तस्मात् सशल्यो जीवत्युद्भूतशल्यो प्रियते (पाकात् पतितशल्यो वा जीवति)'। (सु.शा. ६।१६) तथा 'तत्र सशल्यो जीवति पाकात् पतितशल्यो वा नोद्भूतशल्यः'। (सु.शा. ६।२७) इस
शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०९
प्रकार एक ही विषय का दो स्थानों पर समान वर्णन करना यह प्रमाणित करता है कि विश्लयन्धन शल्य का आहरण नहीं करना चाहिए।
अथाहरेत्करप्राप्य करेणैव—
शल्यनिर्हरण-विधि —तदनन्तर हाथ से पकड़ने योग्य शल्य को हाथ से ही पकड़कर खींच लेना चाहिए। क्योंकि सुश्रुत ने हाथ को ही प्रधान यन्त्र माना है। देखें—सू.सू. ७३।
—इतरत्युतः। दृश्यं सिंहाहिमकरवर्मिककटकाननैः ॥ २२ ॥
दृश्य शल्य-निर्हरण —जो हाथ से न पकड़ा जा रहा हो किन्तु दिखलाई दे रहा हो, उसे सिंहमुख, अहि (सर्प) मुख, मकरमुख, वर्मि (मत्स्य-विशेष) मुख अथवा कर्कटमुख नामक यन्त्रों द्वारा पकड़कर निकालना चाहिए ॥ २२ ॥
अदृश्यं ब्रणसंस्थानादग्रहीतुं शक्यते यतः। कङ्कभृङ्गाह्नुकरशरारीवायसाननैः ॥ २३ ॥
अदृश्य शल्य-निर्हरण —अदृश्य शल्य का आहरण ब्रण (घाव) की आकृति को देखकर जिन यन्त्रों से पकड़ कर निकाला जा सकता है, वे यन्त्र हैं—कंकमुख, भृंगराजमुख, कुररमुख, शरारिमुख अथवा काकमुख। यहाँ मुख शब्द का अर्थ है—इन पक्षियों की चोंच की आकृति के यन्त्र ॥ २३ ॥
सन्दंशाभ्यां त्वगादित्यं—
सन्दंशयन्त्र-प्रयोग —त्वचा तथा मांस में घँसे हुए शल्य को संदंश (सँइसी) नामक यन्त्रों से पकड़कर निकालना चाहिए।
—तालाभ्यां सुषिरं हरेत्।
तालयन्त्र-प्रयोग —त्वचा आदि में स्थित सुषिर (भीतर से छिद्रवाले) शल्य को तालयन्त्रों की सहायता से निकालना चाहिए, न कि सन्दंशयन्त्रों से।
सुषिरस्यं तु नलकैः—
नाडीयन्त्र-प्रयोग —सुषिरस्य (भीतर से पोली अस्थि अथवा अस्थियों में चुभे हुए) शल्य को नाडीयन्त्रों से पकड़कर खींचना चाहिए।
शेषं शेषैर्यथायथम् ॥ २४ ॥
शेष यन्त्र-प्रयोग —शेष (ऊपरवर्णित शल्यों से अतिरिक्त) शल्यों को उन यन्त्रों से सोच-समझकर निकालना चाहिए, जिनका वर्णन ऊपर नहीं किया गया है तथा जो यन्त्र जिस शल्य को निकालने में समर्थ हों। २४ ॥
शस्त्रेण वा विशास्यादौ ततो निर्लोहितं ब्रणम्। कृत्वा घृतेन संस्वेद्य बद्ध्वाऽऽचारिकमादिशेत् ॥
निर्हित शल्य का पश्चात्कर्म —अथवा (जब शल्य चुभे हुए स्थान को बिना काटे यन्त्रों की सहायता से न निकल सके तो) पहले उस स्थान को जहाँ शल्य घँसा हो, काटकर शल्य को निकालकर उसमें बहते हुए रक्त को रोकने का उपाय कर तदनन्तर घाव में लगे हुए रक्त को धोकर अर्थात् साफ करके गुनगुने घी से उस ब्रणस्थान का स्वेदन करके उसमें ब्रणरोपण लेप (मलहम) लगाकर उसे ब्रणीपचार की विधि समझा देनी चाहिए ॥ २५ ॥
बक्तव्य —अष्टगृह्दय-सूत्रस्थान अध्याय १६।२६-२८ में इसके उपचारों का निर्देश किया गया है।
सिरास्तायुबिलस्यं तु चालयित्वा शलाकाया।
सिरा-स्तायुगत शल्य —सिरा तथा स्नायु में घँसे हुए शल्य को शलाकायन्त्र से हिला-डुला करके उसे ढीला करके निकालें।
३१०
अष्टाङ्गहृदये
हृदये संस्थितं शल्यं त्रासितस्य हिमाम्बुना ॥ २६ ॥
ततः स्थानान्तरं प्राप्तमाहरेत्तद्यथायथम् । यथामार्गं दुराकर्म्म—
हृदयगत शल्य—जिसके हृदय में शल्य चुभा हो उस व्यक्ति को शीतल जल के छींटों को डालकर उसे घबड़ा दें (यह विवासन जाड़े में ही हो सकता है), तब तत्काल उचित यन्त्र की सहायता से उसे निकाल डालें। यदि इसी प्रकार निकालना सम्भव न हो अथवा हानिकारक हो तो शल्य को इधर-उधर ले जाकर जैसे सम्भव हो, उसे निकाल दें। यदि जहाँ से शल्य घुसा है, उस मार्ग से निकालने में कठिनाई हो तो ॥ २६ ॥
—अन्यतोऽध्येवमाहरेत् ॥ २७ ॥
शल्याहरण की अन्य विधि—उसे खाँचकर के दूसरी ओर से ऐसे ही निकाल लें ॥ २७ ॥
अस्थिदण्डे नरं पद्म्यां पोडयित्वा विनिहरेत् ।
अस्थिगत शल्य—यदि शल्य अस्थि में चुभा हो तो उस पुरुष को पैरों से दबाकर शल्य को पकड़कर जोर से निकालें।
इत्यशक्ये सुबलिभिः सुगृहीतस्य किङ्कुरैः ॥ २८ ॥
दूसरी विधि—यदि अस्थिगत शल्य को अकेला चिकित्सक न निकाल सके तो बलवान् सेवकों द्वारा उसे पकड़वा कर शल्य को निकलवा दें ॥ २८ ॥
तथाऽप्यशक्ये वारङ्गं वक्रीकृत्य धनुर्ज्याया । सुबद्धं वक्त्रकटके बन्धीयात्सुसमाहितः ॥ २९ ॥
सुसंयतस्य पञ्चाङ्ग्या वाजिनः कशयाऽथ तम् । ताडयेदिति मूर्धानं वेगेनोन्नमयन् यथा ॥ ३० ॥
उद्धरेच्छल्यम्—
तीसरी विधि—यदि उक्त विधि से शल्य न निकल सके तो शल्य के पकड़ने योग्य ऊपरी भाग वारंग (मूठ) को टेढ़ा करके धनुष की डोरी से भलीभाँति बाँधकर उस डोरी के दूसरे छोर को सावधान होकर पंचांगी (चारों पैर तथा मुख) से बाँधे गये घोड़े के मुखकटक (लगाम) से बाँध दे और फिर उस घोड़े को कोई से इस प्रकार मारे जिससे घोड़ा अपने सिर को बैग (झटका) से उठाये और शल्य निकल जाय ॥ २९-३० ॥
—एवं वा शाखायां कल्पयेत्तरोः ।
चाँची विधि—अथवा इसी प्रकार वृक्ष की डाल को नीचे की ओर झुकाकर उस शल्य में बाँधी हुई डोरी का दूसरा छोर इस झुकाई हुई डाल में बाँधकर झटके से उस डाल को छोड़ दें, वह अपने बैग से शल्य को निकाल देगी। इन दोनों स्थितियों में शल्यविद्ध रोगी को आत्मीयजन सावधानी से पकड़े रहें।
बद्ध्वा दुर्बलवारङ्गं कुशाभिः शल्यमाहरेत् ॥ ३१ ॥
पाँचबीं विधि—जिस शल्य का वारंग (मूठ) कमजोर हो तो उसे कुश आदि की रस्सियों से कसकर तब शल्य का निर्हरण करना चाहिए ॥ ३१ ॥
श्वयथुग्रस्तवारङ्गं शोफमुत्पीड्य युक्तिः ।
छठी विधि—जिस शल्य का वारंग (मूठ) सूजन से ढक जाय तो उसके सूजन को दबाकर यन्त्र द्वारा युक्तिपूर्वक शल्य को निकालें।
मुद्गराहतया नाड्या निर्घात्योत्पिडतं हरेत् ॥ ३२ ॥
सातवीं विधि—यदि शल्य फफोले की भाँति सामने आ गया हो तो नाडीयन्त्र से उसे इधर-उधर से हिलाकर मुद्गर से उस शल्य का मुख टेढ़ा करके उसे निकालें ॥ ३२ ॥
शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३११
तैरेव चानयेन्मार्गममार्गोत्पिण्डतं तु यत्।
आठवीं विधि—जो शल्य दूसरे मार्ग से दूसरी ओर को निकल आया हो, उसे सही मार्ग (जहाँ से उसे निकालने में सरलता हो) में ले जाकर निकाल दें।
मृदित्वा कर्णिनां कर्णं नाड्यास्थेन निगृह्य वा ॥ ३३ ॥
नबीं बिधि—एक, दो अथवा तीन कर्णों (फरों) वाले शल्यों के कर्णों को रेतीयन्त्र से घिसकर और नाडीयन्त्र से दबाकर शल्य को निकाल दें। ॥ ३३ ॥
अयस्कात्तेन निष्कर्णं विवृतास्यमुजुस्थितम्।
दसवीं विधि—जो लौहनिर्मित शल्य सीधा शरीर के किसी भाग में स्थित हो, जिसमें कर्ण (फर) न हों और जिस ब्रण का मुख खुला हो उसे चुम्बक लगाकर खींच लेना चाहिए।
पक्वाशयगतं शल्यं विरेकेण विनिर्हरेत् ॥ ३४ ॥
पक्वाशयगत शल्य—यदि शल्य पक्वाशय में पहुँच गया हो तो उसे विरेचन करा कर निकाल लेना चाहिए। ॥ ३४ ॥
दुष्टवातविषस्तन्यरक्तोयादि चूषणेः ।
वात आदि शल्य—दूषित वात, दष्टस्थान का विष, दुष्टतन्य (इसी से स्त्रियों को धनेला रोग हो जाता है), दूषित रक्त तथा जल में डूबने से पानी का भर जाना आदि की चिकित्सा चूषणयन्त्रों (सिंगी, तुम्बी आदि) से करें।
कण्ठघ्रोतोगते शल्ये सूत्रं कण्ठे प्रवेशयेत् ॥ ३५ ॥
बिसेनासे ततः शल्ये बिसं सूत्रं समं हरेत्।
कण्ठघ्रोतगत शल्य—कण्ठ (गले) के घ्रोतस् में शल्य के फँस जाने पर बिस(कमल)नाल के साथ धागा का प्रवेश करें। धागा या बिसनाल में शल्य के फँस जाने पर उन दोनों को शल्य के साथ बाहर निकाल लें। ॥ ३५ ॥
नाड्याऽग्नितापितां क्षिप्त्वा शलाकामप्थिरीकृताम् ॥ ३६ ॥
आनयेज्जातुषं कण्ठात्—
जतुशल्य-निर्हरण—यदि कण्ठ (गले) के घ्रोतस् में जतु = लाख का टुकड़ा रूपी शल्य फँस गया हो तो आग में तपायी गयी लाख की सीक को नाडीयन्त्र के भीतर से उस जतुशल्य तक पहुँचाकर उससे सटा दें और वह शल्य उस सीक के साथ सट जायेगा। उसके बाद उस व्यक्ति को पानी पिला दें, जिससे सीक ठण्डी होकर शल्य को अपने साथ जोड़ लेगी। अब आप उस जतुशल्य को गले से बाहर नाडी के साथ निकाल लें। ॥ ३६ ॥
—जतुदिग्धामजातुषम्।
अन्य शल्य-निर्हरण—इसी प्रकार लाख से अतिरिक्त अन्य लकड़ी आदि शल्यों को भी लाख की गरम शलाका को नाडीयन्त्र के भीतर से डालकर कण्ठघ्रोतस् के भीतर धँसे हुए शल्य का भी निर्हरण कर सकते हैं।
केशोन्दुकेन पीतेन द्रवैः कण्टकमाक्षिपेत् ॥ ३७ ॥
सहसा सूत्रबद्धेन वमतः—
३१२
अष्टाङ्गहृदये
गले में फँसे हुए शल्य को निकालना—यदि अस्थि ( हड्डी या हड्डों का टुकड़ा ) अथवा कण्टक ( मछली का काँटा ) आदि शल्य गला के भीतर फँस गया हो तो बालों को सुदृढ़ धागा से बाँधकर दूध आदि के साथ निगला दें और फिर उसे उल्टी करा कर उसके साथ उक्त शल्य को खींचकर निकाल लें॥ ३७॥
—तेन चेतर्त् ।
यदि उक्त शल्य ऊपर कही गयी विधि से न निकल सके या न निकाला जा सके तो चिकित्सक अपनी बुद्धि से दूसरी विधि से निकालने का प्रयत्न करें।
अपानकं मुखनासाभ्यामहर्तु परतो नुदेत्॥ ३८॥
कभी-कभी इस प्रकार के प्रयत्नों के द्वारा छोटे शल्य वमन के साथ मुख अथवा नासिका के छिद्रों से निकल जाते हैं। यदि न निकल सकें तो कुछ पेय पदार्थ उसे पिलाकर आहारनलिका से उसे भीतर की ओर प्रेरित कर ( ढकेल ) दें॥ ३८॥
अपानस्कन्धघाताभ्यां ग्रासशल्यं प्रवेशयेत् ।
यदि आहारनलिका में ग्रास ( कौर ) नामक शल्य फँस गया हो तो उसे जल अथवा घी-तेल आदि पिलाकर स्कन्ध भाग में मुड़ी आदि द्वारा मार या ठोक कर ग्रास को भीतर की ओर जाने में सहायता करें।
वक्तव्य—प्रायः ऐसी परिस्थिति बालकों के भोजन काल में देखी जाती है। पास में बैठी हुई माता, दादी आदि इसी प्रकार के व्यवहार से 'ग्रासशल्य' को भीतर या बाहर की ओर करते-कराते देखी जाती है। यह वाग्भट की सूक्ष्म दृष्टि है।
सूक्ष्माक्षिन्नशल्यानि श्लोमवालजलैर्हरिर्त्॥ ३९॥
आँख एवं ब्रण में पड़े शल्य को निकालना—आँख में घुसे तथा घाव में पड़े हुए सूक्ष्म छोटे से छोटे शल्य ( बाल या बालू के कण ) को रेशमी वस्त्र के कोने से केश ( बाल ) की सहायता से निकाले अथवा पानी के छींटे डालकर निकालें ( इस प्रकार के लघु शल्यों को अनुभववी बूढ़े लोग सरलता से निकाल देते हैं )॥ ३९॥
अपां पूर्णं विघ्नयुयादवाक्षिरसमायतम् । वामयेच्चामुखं भस्मराशीं वा निखनेन्नरम्॥ ४०॥
उदरगत जल निकालने की विधि—तैरते समय डूब जाने से पेट में पानी भर जाता है। यह जल भी शल्य है, न कि भोजन के साथ पीया गया जल। उक्त जल को निकालने की विधि—जिसके पेट में पानी भर गया हो, उसे तत्काल उलटा करके झकझोरें, लटकायें; जब कुछ शान्त हो जाय तो उसे वमन कराये तथा मुख तक उसे भस्म के ढेर में गाड़ दें। इस विधि से बहुत-सा जल भस्म अपने में सुखा लेता है॥ ४०॥
कर्णोऽम्बुपूर्णं हस्तेन मथित्वा तैलवारिणी । क्षिपेदधोमुखं कर्णं हन्याद्वाऽऽचूषयेत् वा॥ ४१॥
कर्णगत जल एवं क्रिमि निकालने की विधि—कान के छिद्रों में जल भर जाने पर तेल और पानी को हाथ से मथकर जब वह घी जैसा हो जाता है तब उसे कान में डालें। उसके कान को उलटा करके हाथ से थपथपायें, ठोके अथवा कोई दूसरा व्यक्ति उसके कान में मुख लगाकर पानी को चूसकर थूक दें॥ ४१॥
कीटे द्रोतोगते कर्णं पूर्येल्लवणाम्बुना । सुक्तेन वा सुखोष्णेन मृते क्लेदहरो विधिः॥ ४२॥
शल्याहरणविधिर्ध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३१३
यदि कान के छेद में कोई कीड़ा या कनखरूरा चला जाय तो उसमें नमक मिला हुआ पानी डाल दें अथवा गुनगुना सिरका डाल दें। इससे कीड़ा स्वयं बाहर चला आता है या मर जाता है। मर जाने पर कान का मैल निकालने के लिए जो विधि निर्दिष्ट है, उसे करें ॥ ४२ ॥
जातुषं हेमरूपादिधातुजं च चिरस्थितम्। ऊष्मणा प्रायशः शल्यं देहजेन विलीयते ॥ ४३ ॥
शरीर में शल्य का विलयन—लाख, सोना, चाँदी आदि से सम्बन्धित शल्य यदि छोटे हों और बहुत समय तक शरीर में पड़े रह गये हों तो वे शरीर सम्बन्धी गर्मी से स्वयं ही पिघल जाते हैं ॥ ४३ ॥
मुद्रेणुदारुशुङ्गास्थितव्तालोपलानि न । विषाणवेण्वयस्तालदारुशल्यं चिरादपि ॥ ४४ ॥ प्रायो निर्भुज्यते तद्धि पचत्याशु पलासुजी।
विलीन न होने वाले शल्य—मिट्टी, वेणु ( बाँस ), लकड़ी, साँग, अस्थि ( हड्डी ), दांत, बाल, विषाण ( हाथीदांत ), वेणु ( ईख का छिलका ), लोह, ताड़ तथा दारु ( कच्चा लोहा या पीतल, देखें—वी. एस्. आर्प्टे-कोश ) इनके शल्य भले ही कुछ समय के बाद टेढ़े तो हो जाते हैं परन्तु विलीन नहीं होते। ये शल्य अपने द्वारा रक्त एवं मांस पका देते हैं ॥ ४४ ॥
बक्तव्य—'मुद्रेणु'...'पलासुजी'। यहाँ तक कुछ संस्करणों में ४ पंक्तियाँ हैं, वहाँ दूसरी पंक्ति इस प्रकार है—'शल्यानि न विशीर्यन्ते शरीरे मुन्मयानि'। यह पंक्ति अन्य संस्करणों में सम्भवतः इसलिए नहीं ली गयी कि इसका ग्रहण करने से 'मुद्' एवं 'मुन्मय' दोनों एकार्थवाची शब्दों का ग्रहण हो रहा था, किन्तु 'न विशीर्यन्ते' यह क्रिया इसके अभाव में दुर्लभ हो रही है। श्रीअरुणदत्त तथा श्रीहेमाद्रि टीका युक्त वाग्भट में जिन तीन पंक्तियों का ग्रहण किया है, उनमें 'विषाण, वेणु तथा दारु' इन तीन शब्दों की पुनरक्ति हो रही है। हमने महर्षि वाग्भट की सदाशयता को ध्यान में रखकर उनके दूसरे अर्थ दिये हैं। इस दृष्टि से अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान ३७।२७-२८ श्लोक निर्घन्त हैं। इसी प्रकार सु.सू. २६।२२ पद्य भी इस प्रसंग में अनुकरणीय है।
शल्ये मांसावगाढे चेत्स देशो न विदह्यते ॥ ४५ ॥
ततस्तं मर्दनस्वेदशुद्धिकर्षणबुंहणेः । तीक्ष्णोपनाहपानाश्रयनशस्त्रपदाङ्गनैः ॥ ४६ ॥ पाचयित्वा हरेच्छल्यं पाटनैषणभेदनैः।
शल्य-निर्हरणोपाय—जब शल्य मांसल प्रदेश में घँसा हो और घँसने के बाद भी उसमें विदाह आदि पाक के लक्षण न दिखायी दे रहे हों तो उस स्थान पर मसल्ला, स्वेदन, शोधनों ( वमन-विरंजन आदि ) द्वारा कर्षणकर्म, बुंहणकर्म, तीक्ष्ण उपनाह ( जिससे उसका शीघ्र पाक हो ), उचित पेय पदार्थों को पिलाना, आहारों को खिलाना तथा शस्त्र द्वारा सघन पदांकन ( पच्छ लगाना ) आदि विधियों से उसे पकाने का प्रयत्न करना चाहिए। पक जाने पर उस शल्य को निकालें। यदि इस प्रकार भी न निकले तो पाटन, एषण तथा भेदन क्रियाओं द्वारा शल्य को निकाल देना चाहिए ॥ ४५-४६ ॥
बक्तव्य—यहाँ 'पाटनैषणभेदनैः' ये क्रियाएँ उन आशुकारी शल्यों को निकालने के लिए हैं, जिनके शरीर में कुछ समय तक रह जाने से मृत्यु का भय होता है अथवा उस अवयव को काट देना पड़ता है। शेष के लिए तो पकाकर निकालने का शास्त्र ने आदेश दिया ही है। देखें—सू. सू. २७।२७।
शल्यप्रदेशयन्त्राणामवेक्ष्य बहुरुपताम् ॥ ४७ ॥
तैस्तैरुपायैर्मतिमान् शल्यं विद्यातथाऽऽहरेत्।
इति श्रीवेद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गद्वयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने शल्याहरणविधिर्नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
३१४
अष्टाङ्गहृदये
शल्यनिर्हरण-निर्देश—शल्यों की, शरीर के अवयवों की तथा शल्य निकालने वाले यन्त्रों की विविधरूपता का ध्यान रखकर उन-उन शल्य निकालने के उपायों का प्रयोग कर जो जैसा शल्य हो उसे उस प्रकार निकालना चाहिए ॥ ४७ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने मूलतः शल्यों का विभाजन दो प्रकार से किया है—१. अवबद्ध ( जो मांस-अस्थि आदि में फँसा हो और दूसरा ) २. अनवबद्ध ( जो प्रथम के विपरीत हो )। इनमें दूसरे प्रकार के शल्यों को निकालने के पन्द्रह उपायों का इस प्रकार उल्लेख किया है—१. स्वभाव, २. पाचन, ३. भेदन, ४. दारण, ५. पीडन, ६. प्रमार्जन, ७. निर्धमपन, ८. वमन, ९. विरेचन, १०. प्रक्षालन, ११. प्रतिमर्श ( यह नस्य वाला नहीं है, इसमें अँगुली आदि से घिसा जाता है ), १२. प्रवाहण ( गर्भशल्य में इसका उपयोग होता है ), १३. आनूषण ( पृथ्यशल्य को निकालने में ), १४. अयस्कात्त ( चुम्बक ) और १५. हर्ष ( शोकशल्य को दूर करने के लिए )। अष्टांगसंग्रह में शल्य रहित व्रण का लक्षण इस प्रकार दिया है—'व्रणस्थान स्वच्छ हो, उसके आसपास दबाने में कष्ट न हो, शोथ तथा सन्ताप घट रहा हो तो अब व्रणस्थान में शल्य नहीं है, ऐसा समझ लेना चाहिए। देखें—अ. सं. सू. ३७।३२।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में शल्याहरणविधि नामक अष्टाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २८ ॥
एकोनत्रिशोऽध्यायः
अथातः शस्त्रकर्मविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षेयः ।
अब हम यहाँ से शस्त्रकर्मविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—अब यहाँ से शस्त्रकर्मविधि नामक अध्याय की प्रस्तावना की जा रही है। क्योंकि इसके पहले २५वें अध्याय में वारभट ने 'शस्त्रेण वा विशस्यादौ' कहकर शस्त्रकर्म की उपादेयता का निर्देश किया है। अतएव इस अध्याय में शस्त्रकर्म का विधान प्रस्तुत है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सु.सू. ५, १७, १८, १९, २५; च.चि. २५।५५ से ६० तक तथा अ.सं.सू. ३८ में देखें।
ब्रणः सज्जायते प्रायः पाकाच्छ्रयथुपूर्वकात्। तमेवोपचरेत्समाद्रक्षन् पाकं प्रयलतः ॥ १ ॥ सुशीतलेपसेकाद्रमोक्षसंशोधनादिभिः ।
ब्रण के उपचार—प्रायः ब्रण की उत्पत्ति के पहले स्थान-विशेष पर शोथ होता है। सर्वप्रथम उस ब्रणोत्पादक शोथ की ही चिकित्सा करनी चाहिए, जिससे वह शोथ फोड़ा का रूप धारणकर पकने न पाये।
ब्रणशोथ-चिकित्सा—उस ब्रणशोथ को बैठाने के लिए शीतल लेप, शीतल सेचन, रक्तप्रावण तथा शोधन ( वमन-विरचन ) आदि उपायों का प्रयोग करें। यहाँ शीतल का अर्थ है—शीतवीर्य पदार्थ, जो स्पर्श में भी शीत हो ॥ १ ॥
वक्तव्य—ब्रण के सम्बन्ध में ऊपर जो सुश्रुत के अध्यायों का निर्देश किया है, उनके अतिरिक्त सु.सू. २१, २२, २८ अध्यायों का भी अवलोकन कर लें। शेष देखें—अ.हू.उ. २५ में। इसकी प्रस्तावना यहाँ केवल इस उद्देश्य से की है कि ब्रणशोथ के दर्शन होते ही उसकी शान्ति के उपाय करने चाहिए, क्योंकि ब्रणशोथ का पाक हो जाने पर अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है।
शोफोऽल्पोऽल्पोष्मरुक्सामः सवर्णः कठिनः स्थिरः ॥ २ ॥
आमशोथ के लक्षण—आमशोथ ( जो शोथ अभी पका नहीं ) उसे कहते हैं जिसमें थोड़ी-थोड़ी ऊष्मता ( गर्मी ) और पीड़ा होती हो, जिसका वर्ण त्वचा के समान हो, जो स्पर्श करने में कठिन ( कड़ा ) तथा स्थिर ( अचल ) हो ॥ २ ॥
वक्तव्य—इसी ब्रणशोथ को बैठाने ( न पकने ) के लिए विम्लापन, सुशीतल लेप, सेक, रक्तमोक्षण, संशोधन आदि का निर्देश ऊपर श्लोक १ में दिया गया है, न कि पच्यमान ब्रणशोथ में।
पच्यमानो विवर्णस्तु रागी बस्तिरिवाततः। स्फुटतीच सनिस्तोदः साङ्गमर्दविजृम्भिकः ॥ ३ ॥ संरम्भारुचिदाहोपातृइवरात्रिन्द्रतान्तिः। स्यान् विध्यन्द्यत्याज्यं ब्रणवत्स्पर्शनासहः ॥ ४ ॥
पच्यमान ब्रणशोथ के लक्षण—जब पच्यमान वह शोथ फोड़ा का रूप धारण करने लगता है तो वहाँ की त्वचा का वर्ण विशिष्ट वर्ण का हो जाता है। उसमें कुछ लालिमा दिखलायी देती है और वह बस्ति ( भरी हुई मशक ) की भाँति तन जाता है। उसमें ऐसी पीड़ा होती है मानो वह फूट रहा हो, उस समय अन्य सभी अंगों में पीड़ा होती है और जैभाइयों आने लगती हैं। और भी अनेक प्रकार की
३१६
अष्टाङ्गहृदये
पीड़ाएँ होती हैं, अरुचि, दाह, ऊषा ( भाप निकलने का-सा अनुभव ), प्यास, ज्वर तथा निद्रा का न आना, स्नान ( ढेर के रूप में संचित अर्थात् रखा या व्रण के ऊपर लगाया हुआ ) घी इधर-उधर फैल जाता है और उस स्थान पर व्रण के समान स्पर्श सहन नहीं हो पाता ॥ ३-४ ॥
पक्वेऽल्पवेगता स्त्रानिः पाण्डुता बलिसम्भवः । नामोऽन्तेपुत्रतिर्मध्ये कण्ठशोफादिमार्वम् ॥
स्पृष्टे पूयस्य सञ्चारो भवेद्वस्ताविवाभ्मसः ।
पक्वशोथ के लक्षण—व्रणशोथ के पक जाने पर वेदनाओं में कमी, शोथ के स्वरूप में मलिनता, पीलापन, झुर्रियों का पड़ जाना, सभी ओर से झुक जाना तथा बीच में ( मुखभाग ) में उभारयुक्त हो जाना, शोथ के आस-पास खुजली का होना, सूजन में कोमलता का आ जाना, हूने पर पूय का इधर-उधर जाना उस प्रकार का होता है, जैसे मशक को दबाने पर पानी ॥ ५ ॥
। पक्त्व्य—सुश्रुत ने पक्वव्रण के लक्षणों को इस प्रकार कहा है—'वेदोपशान्तिः... 'पक्वलिङ्गम्' । देखें—सु.सू. १७५। अवस्था-भेद से व्रणशोथ ( व्रणाय शोथः ) तीन प्रकार का होता है—१. आम व्रण, २. पच्यमान व्रण तथा ३. पक्व व्रण। इन स्थितियों को ठीक-ठीक जानने वाला ही योग्य चिकित्सक कहा जाता है।
शूलं नर्तेऽनिलाद्वाहः पिताच्छोफः कफोदयात् ॥ ६ ॥
रागो रक्ताच्च पाकः स्यादतो दोषैः सशोणिताः ।
व्रण में बात आदि के लक्षण—व्रणशोथ में वातदोष के बिना शूल ( वेदना ), पित्तदोष के बिना दाह, कफदोष के बिना शोथ तथा रक्त के बिना राग ( लालिमा ) नहीं होता, अतः रक्त युक्त तीनों दोषों से मिलकर व्रण का पाक होता है ॥ ६ ॥
पक्त्व्य—महर्षि वाग्भट ने 'रागो रक्ताच्च' यह सुश्रुत से अधिक कहा है, जिसका प्रसंगानुसार औचित्य है। यद्यपि रक्त और पित्त समान धर्म वाले हैं, फिर भी पाक रक्त का ही होता है, उस व्रणस्थान में स्थित मांस तथा वसा आदि का पाक नहीं होता; भले ही वे गल या सड़ जाते हैं। देखें—सु.सू. १७७।
पाकेऽतिवृत्ते सुषिरस्तनुत्वदोषभक्षितः ॥ ७ ॥
बलीभिराचितः श्यावः शीर्यमाणतनूरूहः ।
अतिपक्व व्रण के लक्षण—पाक का अतिक्रमण होने पर अर्थात् भीतर से व्रण के पक जाने पर ये लक्षण ऊपर से दिखलायी देते हैं—व्रण के भीतर से खोखला होना, व्रण के ऊपर की त्वचा का पतला पड़ जाना; ये लक्षण पूयदोष के खा जाने से हो जाते हैं, उसके ऊपर से झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, त्वचा का वर्ण काला हो जाता है और उसके ऊपर के रोयें गिरने या झड़ने लगते हैं ॥ ७ ॥
कफजेषु तु शोफेषु गम्भीरं पाकमेत्यसुक् ॥ ८ ॥
पक्वलिङ्गं ततोऽस्पष्टं यत्र स्याच्छीतशोफता । त्वक्कावर्ण्यं रुजोऽल्पत्वं घनस्पर्शत्वमशमवत् ॥
रक्तपाकमिति ब्रूयात् प्राज्ञो मुक्तसंशयः ।
गम्भीरपाक का वर्णन—कफ-प्रधान व्रणशोथों में रक्तधातु का पाक गहरायी में होता है, इसलिए व्रणपाक के लक्षण भी ऊपर से स्पष्ट दिखलायी नहीं पड़ते। किन्तु कुछ दिन बीत जाने पर जिस व्रणशोथ में स्पर्श करने पर शीतता प्रतीत हो, त्वचा के ऊपर समानवर्णता दिखलायी दे, पीड़ा में कमी आ जाय, स्पर्श में वह स्थान पत्थर की भाँति कठोर लगे वहाँ बुद्धिमान् चिकित्सक निःसन्देह कह दे कि यहाँ रक्त का गम्भीर पाक हो चुका है ॥ ८-९ ॥
पक्त्व्य—यह परिस्थिति व्रणचिकित्सक की परीक्षा की घड़ी होती है। इसमें न तो श्लोक ५ में कहे गये पक्व-व्रणशोथ के लक्षण दिखलायी पड़ते हैं और न बात आदि दोषों के ही लक्षणों का प्रभाव
शत्रुकर्मविधिग्रन्थायः २९ ]
सूत्रस्थानम्
३१७
परिलक्षित होता है, अतएव इस रक्तपाक को गम्भीरपाक कहा गया है। इसके लिए आप देखें—सू. सू. १७१ तथा अ. सं. सू. ३८८। ऐसे पक्व ब्रणों की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, उपेक्षा करने से ये असाध्य नाडीब्रण का रूप धारण कर लेते हैं, क्योंकि ऐसे पूषशल्य को बाहर निकलने का मार्ग ही नहीं मिलता। सामान्य रूप से इस ब्रण को 'गम्भीर' कहते भी हैं।
अल्पसत्त्वेऽबले बाले पाकाद्याऽत्यर्थमुद्वेते ॥ १० ॥
दारुणं मर्मसन्ध्यादिस्थिते चान्यत्र पाटनम्।
दारुण एवं पाटन लेप—यदि रोगी का सत्त्व (मानसिक बल) कम हो, दुर्बल हो अथवा रोगी बालक (असहनशील) हो तथा ब्रणपाक भलीभाँति हो गया हो, ब्रणशोथ मर्मस्थल में या मर्मसन्धि अथवा केवल सन्धिस्थान में हो तो इन स्थानों में दारुणलेपों का प्रयोग करना चाहिए। आवश्यक होने पर पाटनकर्म भी किया जा सकता है, यह अर्थ 'ब' के प्रयोग से लिया गया है। उक्त स्थितियों से अन्य स्थलों में पाटनकर्म करना चाहिए ॥ १० ॥
वक्तव्य—दारुण का प्रथम प्रस्ताव होने के कारण एवं सर्वथा निरापद होने के कारण इसका ब्रणशोथों में सादर प्रयोग किया जाता है। दारुणक्रिया जहाँ अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती वहाँ विवश होकर पाटनक्रिया का उपयोग होता है। अ. द्व. उ. २५।३७ में एक दारुणलेप दिया है, पहले इसका प्रयोग करें।
आमच्छेदे सिरास्तानुव्यापदोऽमुगतिमुतिः ॥ ११ ॥
रजोऽतिवृद्धिर्द्विरणं विसर्पो वा क्षतोद्वबः।
शत्रुकर्म का निषेध—आम-ब्रणशोथ का शस्त्र द्वारा पाटन कर देने पर सिरा एवं स्नायु में विकृति हो जाती है, अतएव अधिकाधिक रक्तस्त्राव होने लगता है। अनेक प्रकार की पीड़ाएँ होती हैं, उस स्थान की त्वचा का फटना अथवा क्षत के कारण विसर्प या विद्विघ नामक रोग हो सकता है ॥ ११ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने विसर्प न लिखकर केवल विद्विघ का उल्लेख किया है। देखें—सू. सू. १७१-१०। अतः आम-ब्रणशोथ में शत्रुकर्म नहीं करना चाहिए, ऐसे मूर्ख चिकित्सक की निन्दा की गयी है।
तिष्ठन्नन्तः पुनः पूयः सिरास्तान्व्यसुगमिषम् ॥ १२ ॥
विवृद्धो दहति क्षिप्रं तुणोलपमिवानलः।
शत्रुकर्म का विधान—ब्रणशोथ के भीतर पूय (मवाद) पड़ा रहने पर अर्थात् समय रहते हुए उसे न निकालने पर वह पूय सिरा, स्नायु, रक्त तथा मांस को उस प्रकार शीघ्र जला (सड़ा-गला) देता है, जैसे बड़ा हुआ अग्नि समीपस्थ घास-फूस को जला देता है ॥ १२ ॥
वक्तव्य—उक्त ११वें पद्य में आमच्छेद का निषेध करने के बाद कहे गये १२वें पद्य में यद्यपि शब्दतः शत्रुकर्म का विधान नहीं किया गया है तथापि अन्तःस्थित पूय क्या-क्या हानि करता है इसका वर्णन करने से यह आभास होता है कि ग्रन्थकार शत्रुकर्म द्वारा पूय को निकालने का निर्देश दे रहा है। इसके लिए ब्रणशोथ का पाटन कर उसके पूय को निकाल देना चाहिए। उक्त पद्य में 'दहति' प्रयोग के ग्रहण की प्रेरणा वाश्वट को सुश्रुतोक्त सू. १७।१६ से मिली है।
यश्चिन्नन्तस्याममज्जानाद् यश्च पक्वमुपेक्षते ॥ १३ ॥
श्वपचाविव विज्ञेयो तावनश्चित्तकारिणी।
अनिश्चित्तकारी वैद्य की निन्दा—जो ब्रणचिकित्सक अपने अज्ञान के कारण आमब्रणशोथ को काटता (चीर देता) है और जो बाहर या भीतर पके ब्रणशोथ का दारुण अथवा पाटन नहीं करता वे दोनों ही चिकित्सक रोगी को मार डालने के कारण श्वपच (चाण्डाल) के समान होते हैं। क्योंकि इस प्रकार के उन दोनों को ही अनिश्चित्तकारी कहा जाता है ॥ १३ ॥
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य—पाटनकर्म करने के पहले आम अथवा पन्व का ज्ञान अवश्य कर लेना चाहिए, नहीं तो अपयश मिलता है। श्रीवामट ने उक्त पद्य को अविकल रूप से सुश्रुत से लिया है। देखें—सु.सू. १७१०। ब्रण के सात उपक्रम—१. विस्लापन, २. अवसेचन ( जलीकापातन अथवा रक्षमोक्षण ), ३. उपनाह ( पुलिस्त आदि का बन्धन ), ४. पाटन क्रिया, ५. शोधन ( पञ्चवत्कल आदि क्वाथों से ), ६. रोपण ( पूरण = घाव भरने के उपाय ) और ७. वैकुतापह ( ब्रणस्थान की विकृतियों को रोमसंजन तथा सवर्ण करना आदि क्रियाओं द्वारा दूर करना )। देखें—सु.सू. १७१८। विशेष देखें—सु. चि. अध्याय १ सम्पूर्ण।
प्राक् शस्त्रकर्मणश्चेष्टे भोजयेदन्नामात्रम् ॥ १४ ॥
पानपं पाययेन्मद्यं तीक्ष्णं यो वेदनाक्षमः । न मूच्छत्यन्नसंयोगान्मत्तः शस्त्रं न बुध्यते ॥ १५ ॥
शस्त्रकर्म के पूर्व कर्म—शस्त्रकर्म करने के पहले रोगी को उसकी इच्छा के अनुसार किन्तु जो रोगी के लिए हितकर हो, उसे खिलायें, मद्यपान करने वाले उस रोगी को तीक्ष्ण मद्य पिलायें, जो शस्त्रकर्म की वेदना न सह सकता हो, क्योंकि मद्यपान से वेदना को सहने की शक्ति मिलती है। भोजन करा देने पर रोगी मूच्छित नहीं हो पाता और मद्य के नशे से उन्मत्त होने के कारण उसे कब शस्त्रकर्म किया इसका ज्ञान नहीं रह पाता ॥ १४-१५ ॥
अन्यत्र मूढगर्भशममुखरोगोदरातुरात् ।
आहार एवं मद्यपान का निषेध—मूढगर्भ, अशमरी, मुखरोग तथा उदररोग इन रोगों में आहार खिलाकर एवं मद्यपान कराकर शस्त्रकर्म नहीं करना चाहिए।
बक्तव्य—आधुनिक सर्जरी में तो संज्ञाहरण ( बेहोश करने ) के अनेक उपादान सुलभ हैं।
अथाहूतोपकरणं वैद्यः प्राङ्मुखमात्रम् ॥ १६ ॥
सम्मुखो यन्त्रयित्वाऽसृ न्यस्येन्मर्दि वर्जयत् । अनुलोमं सुनिशितं शस्त्रमापूयदर्शनात् ॥ १७ ॥
सकृदेवाहरेत्तच्च—
शस्त्रप्रयोग-विधि—शस्त्रप्रयोग करने के पूर्व कर्मों को करने तथा शस्त्रकर्म के उपयोग में आने वाले उपकरणों को एकत्रित करा लेने के बाद शल्यचिकित्सक रोगी को पूरब की ओर मुख करके बैठायें और उसके अंगों को बांधकर चिकित्सक उसके सामने अथवा उन्निवृत्त स्थान में खड़ा होकर मर्म आदि स्थानों को बचाकर अत्यन्त तीक्ष्ण ( तेज ) शस्त्र से अनुलोम विधि से एक ही बार में उतना पाटनकर्म करें, जिससे पूय ( मवाद ) निकलने लगे और फिर शीघ्र शस्त्र को निकाल लेना चाहिए ॥ १६-१७ ॥
—पाके तु सुमहत्यपि । पाटयेत् द्रव्यङ्गुलं सम्प्यद्रव्यङ्गुल्यङ्गुलान्तरम् ॥ १८ ॥
एषित्वा सम्यगेपिण्या परितः सुनिरूपितम् । अङ्गुलीनालवालेर्वा यथादेशं यथाशयम् ॥ १९ ॥
यतो गतां गतिं विद्यादुत्सङ्गो यत्र यत्र च । तत्र तत्र ब्रणं कुर्यात्सुविभक्तं निराशयम् ॥ २० ॥
आयतं च विशालं च यथा दोषो न तिष्ठति ।
महान् ब्रणशोथ में कर्तव्य—विस्तृत आकार वाले ब्रणशोथ में दो अंगुल लम्बा चीरा लगाना चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो दो या तीन अंगुल की दूरी पर दूसरा चीरा लगायें और पूय को निकालने के बाद एषणी यन्त्र से, अँगुली से, कमलनाल से, बालों की वेणी से कहीं-कहीं पका है और कहीं-कहीं पूय रुका है, इस प्रकार भलीभाँति देखकर जहाँ-जहाँ पूय गया है और जहाँ उत्संग ( उभार ) दिखलायी देता हो वहाँ-वहाँ चीरा लगा देना चाहिए। वह चीरा लम्बा तथा चौड़े मुख वाला हो और ये सभी चीरे सुविभक्त ( आपस में मिले न ) हों, जिनके कारण दोष ( पूय ) भीतर न रह सके ॥ १८-२० ॥
बक्तव्य—कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि एक स्थान पर चीरा लगाने पर भीतर का सभी पूय नहीं निकल पाता। ऐसा तब होता है जब ब्रणपाक भीतर से टेढ़ा-मेढ़ा होता है, ऐसी स्थिति में एकाधिक
शस्त्रकर्मविधिरध्यायः २९ ]
सूत्रस्थानम्
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स्थानों पर चौरा लगाना पड़ता है। पूय एक प्रकार का शल्य है, इसका भलीभाँति निर्हरण कर देना चाहिए। यदि पूय भीतर रह जाता है तो यह नाडीब्रण (नासूर) को पैदा कर देता है।
शौर्यमाशुक्रिया तीक्ष्णं शस्त्रमस्वेदवेपय॥ २१॥
असम्मोहश्च वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि शस्यते।
शल्यचिकित्सक के गुण—शौर्य (शस्त्रप्रयोग करने में निर्भय होना), आशुक्रिया (लघुहस्तता अर्थात् शीघ्र शस्त्रप्रयोग करने का अभ्यास), शस्त्र का तेज धारवाला होना, पसीना तथा कम्पन का न होना तथा मूर्च्छित न होना या न घबड़ाना—ये शल्यचिकित्सक के गुण कहे गये हैं। २१॥
वक्तव्य—यह पद्य अष्टांगसंग्रह में अविकल मूलभूत है। देखें—अ. सं. सू. ३८।२८।
तिर्यक्छिन्त्याल्ललाटश्रूदन्तवेष्टकजवृणि ॥ २२॥
कुशिकक्षाक्षिकूटीष्टकपोलगलबइक्षणे ।
तिर्यक्छेदन-विधि—तिरछे काटने योग्य स्थान हैं—ललाट, भौहों, मसूड़ों, जनुअस्थि, कुक्षि (उदर का भाग), कक्षा (काँख), अक्षिकूट, थोछ (होंठ), कपोल (गाल), गला तथा वंक्षण (पेड़ और जाँघ के बीच का भाग या ऊरुसंधि) ॥ २२॥
अन्यत्र छेदनातिर्यक् सिरास्तायुविपाटनम्॥ २३॥
तिर्यक्छेदन-निषेध—उक्त स्थानों के अतिरिक्त अवयवों में तिरछा चौरा नहीं लगाना चाहिए, ऐसा करने से सिरा अथवा स्नायु कट सकते हैं। २३॥
शस्त्रेऽवचारिते वाम्भिः शीताम्भोभिश्च रोगिणम्।
आभ्यास्य परितोऽङ्गुल्या परिपीड्य ब्रणं ततः॥ २४॥
शालयित्वा कपायेण प्लोतेनाम्भोऽपनीय च। गुगुल्बगुरुसिद्धार्थहिङ्गुसर्जरसान्वितैः॥ २५॥
धूपयेत्युषङ्गुल्यानिम्बपत्रैर्घृतप्लुतैः । तिलकल्काज्यमधुभिर्यथास्वं भेषजेन च॥ २६॥
दिग्धां वर्त्ति ततो दद्यात्तेरैवाच्छादयेच्च ताम्। घृतात्तैः सक्तुभिश्चोर्ध्वं घनां कवलिकां ततः,
निधाय युक्त्या बन्धीयात्यष्टेन सुसमाहितम्। पार्श्वे सन्ध्येऽपसन्धे वा नाधस्तास्त्रैव चोपरि॥ २८॥
पश्चात्कर्म-निर्देश—शस्त्रप्रयोग करने के तत्काल बाद मधुर वाणी से तथा मुख पर शीतल जल के छींटे देकर रोगी को आश्वसन देकर ब्रणस्थान को चारों ओर से अँगुली से दबाकर जिससे पूय भलीभाँति निकल जाय, तदनन्तर त्रिफला आदि के काढ़ा से ब्रणवास्तु को धोकर, साफ वस्त्र अथवा रुई से जल को पोछकर (सुखाकर) गुगुल्ब, अंगुर, सरसों, हींग, रात, नमक, बालवच तथा नीम के पत्ते—इन्हें कूटकर बनायी गयी धूप को घी में मिलाकर उस ब्रण में घूष देनी चाहिए। उसके बाद ब्रणदोषशामक औषधद्रव्यों से मिले हुए तिलकल्क, मधु तथा घी को मिलाकर उसे एक रुई की बत्ती में चुपड़े और उसे घाव के भीतर भर दें और फिर तिलकल्क आदि से निर्मित मलहम से उसे ढक दें। उसके ऊपर घी मिले हुए सत् की मोटी कवलिका (गद्दी) रखकर सावधानी से पट्टी से बाँध दें। इस ग्रन्थि को ब्रण के दायीं या बायीं ओर बाँधें, उसके नीचे-ऊपर न बाँधें। २४-२८॥
वक्तव्य—सुश्रुत-सूत्रस्थान का १८वाँ अध्याय इस विषय का पूरक है। इसका अवलोकन इस कार्य में प्रवृत्त होने से पहले अवश्य करें।
शुचिसूक्ष्मदुदाः पट्टाः कवलयः सविकेशिकाः । धूपिता मुदवः स्तक्षणा निर्वलौका ब्रणे हिताः॥
पट्टी आदि का निर्देश—ब्रणबन्धन के पट्ट (पट्टियाँ), कवलिकाएँ (गद्दियाँ) तथा विकेशिकाएँ (औषधलिप्त बत्तियाँ) शुचि (साफ-सुथरी), सूक्ष्म (पतले वस्त्र से निर्मित) किन्तु दृढ़ होनी चाहिए। इन्हें धूप दी जानी चाहिए और सीलन से बचाने के लिए धूप में भी रखना चाहिए। ये मुलायम तथा
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अष्टाङ्गहृदये
स्पर्श में चिकनी, सिकुड़न (सलवट) रहित हों, तभी ये ब्रण को बाँधने के उपयोग में लायी जा सकती हैं ॥ २९ ॥
कूर्वीतानन्तरं तस्य रक्षां रक्षोनिषिद्धये । बलिं चोपहरेतेभ्यः—
ब्रणरक्षा-विधान—ब्रण के ऊपर उचित प्रकार की पट्टी बाँधने के बाद राक्षसों आदि की निवृत्ति के लिए रक्षाकर्म तथा बलिदान भी करें। क्योंकि राक्षस मांसभक्षी होते हैं, वे इस प्रकार अक्रमण न करें, अतएव रक्षा एवं बलि का यहाँ निर्देश किया गया है।
वक्तव्य—रक्षाविधान की विधि देखें—सू. ५।२०-३३ तक। रक्षाकर्म के लिए धूपन आदि भी किया जाता है, इसके बाह्य क्रिमियों का प्रकोप भी नहीं होता। आर्षग्रन्थों में जहाँ राक्षस आदि के निवारण की चर्चा है, उसे आधुनिक विद्वान् क्रिमि (Germ) कहते हैं। राक्षसों तथा क्रिमियों का कार्य आदि समान है। इसी से Sterilization अथवा Aseptic को आधुनिक विद्वान् रक्षाकर्म कहते हैं।
—सदा मूर्ध्नां च धारयेत् ॥ ३० ॥
लक्ष्मीं गृहामतिगृहं जटिलां ब्रह्मचारिणीम् । वचां छत्रामतिच्छत्रां दूर्वां सिद्धार्थकानपि ॥ ३१ ॥
औषधधारण-निर्देश—निम्नलिखित औषधद्रव्यों को शिरोधार्य करें—लक्ष्मी (पद्मचारिणी), गृहा (पुष्पिपर्णी), अतिगृहा (शालपर्णी), जटिला (मांसी), ब्रह्मचारिणी (ब्रह्मयष्टिका), वचा (बालवच), छत्रा (शतपुष्पा), अतिच्छत्रा (विषाणिका), दूब तथा सरसों ॥ ३०-३१ ॥
ततः स्नेहदिनेहोत्कं तस्याचारं समादिशेत् ।
आचार-निर्देश—तदनन्तर उस ब्रणरोगी को स्नेहविधि नामक अध्याय में निर्दिष्ट आहार-विहार का निर्देश करें और रोगी को उनका आचरण करना चाहिए।
वक्तव्य—अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान का स्नेहविधि नामक १६वाँ अध्याय है। देखें—श्लोक २६-२८।
दिवार्वन्धो ब्रणे कण्डुरागकशोफप्यकृत ॥ ३२ ॥
दिन में सोने का निषेध—दिन में सोने से ब्रण (घाव) में खुजली, लालिमा, पीड़ा, सूजन तथा पूय हो जाता है ॥ ३२ ॥
स्त्रोणां तु स्मृतिंसंस्पर्शदर्शनेश्चलितघृते । शुके व्यायोजान् दोषानसंसर्गेऽप्यवान्पुयात् ॥ ३३ ॥
(ब्रणे भयचुरायासात् स च रागश्च जागरात् । तौ च हक् च दिवास्वापाताश्च मृत्युश्च मैथुनात् । ११ )
अन्य निषिद्ध कर्म—सहवास करने योग्य स्त्रियों का स्मरण, स्पर्श (आलिंगन, चुम्बन आदि), दर्शन आदि से शुक्र का स्खलन तथा घाव होने पर मैथुन क्रिया न करने पर भी मैथुनकर्म करने के बराबर दोषों की प्राप्ति हो जाती है ॥ ३३ ॥ (परिश्रम करने से ब्रणस्थान में सूजन हो जाती है, रात्रि में जागने से शोथ तथा लालिमा, दिन में सोने से शोथ, लालिमा तथा पीड़ा होने लगती है और स्त्री-सहवास (मैथुन) करने से शोथ, राग, वेदना तथा मृत्यु हो जाती है ॥ ११ )
वक्तव्य—उक्त ३३वें तथा ३३वें श्लोकों का समर्थन सू. १९।१० एवं १५ वें श्लोकों में देखें। उक्त कोष्ठगत पद्य वाग्भट के अन्य संस्करणों में प्रायः नहीं देखा जाता है। वास्तव में यह पद्य अविकल रूप से सू. १९।३६ में हैं, देखें।
भोजनं च यथासात्तयं यवगोधूमपष्टिकाः । मसूरमुद्गुतुरीजीवन्तीसुनिषण्णकाः ॥ ३४ ॥
बालमूलकवार्ताकतण्डुलौयकवास्तुकम् । कारवेत्तलककर्कटपटोलकटुकफालम् ॥ ३५ ॥
सैन्धवं दाडिमं घात्री घृतं तसहिमं जलम् । जीर्णशाल्योदनं स्निग्धमल्पमुष्णोदकोत्तरम् ॥ ३६ ॥
भुज्जानो जाङ्ग्लैर्मसैः शीघ्रं ब्रणसपोहित ।
शस्त्रकर्मविधिरध्यायः २९ ]
सूत्रस्थानम्
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ब्रणरोगी का आहार—ब्रणरोगी इस काल में अपनी प्रकृति के अनुकूल भोजन करे। जैसे—जौ, गेहूँ की रोटी, साठी के चावलों का भात, मसूर, मूंग, अरहर की दालें, जीवन्ती, सुनिष्णणक (चौपतिया), कच्ची मूली, बैगन, चौड़ाई, बथुआ, करेला, खेखसा, परवल, कुटकी के फलों का शाक, संधानमक, दाड़िम तथा आँवला के फल, घी, तपाकर शीतल किया गया जल, पुराने शालिचाबलों का गरम-गरम भात—जिसमें घी मिलाया गया हो—मात्रा में थोड़ा, बाद में गरम (गुनगुना) जल पीये और इनके साथ जांगल देश के प्राणियों के मांस अथवा मांसरस का भी सेवन करें। इस प्रकार के भोजनों का सेवन करने वाले ब्रणरोगी के घाव शीघ्र भर जाते हैं॥ ३४-३६॥
अशितं मात्रया काले पथ्यं याति जरां सुखम्॥ ३७॥
अजीर्णात्त्विनलिदादीनां विघ्नमो बलवान् भवेत्। ततः शोफरुजापाकदाहानाहानवान्पुयात्॥
लाभ एवं हानि—समय पर (भोजन काल में) मात्रा के अनुसार खाया हुआ हितकर आहार सुखपूर्वक पच जाना है। यदि भोजन ठीक प्रकार से पच नहीं पाता अर्थात् अजीर्ण हो जाता है, तो बात आदि दोषों का महान् प्रकोप हो जाता है। जिसके कारण ब्रणस्थान में शोथ, पीड़ा, पाक, दाह तथा आनाह (अफरा) आदि विकारों की उत्पत्ति हो जाती है॥ ३७-३८॥
नवं धान्यं तिलान् माषान् मद्यं मांसमजाङ्गलम्। क्षीरक्षुविकृतीरस्त्वं लवणं कटुकं त्यजेत्॥ ३९॥
यच्चान्यदपि विष्टम्भि विदाहि गुरु शीतलम्। वर्गादयं नवधान्यादिर्ब्रिगिनः सर्वदोषकृतम्॥ ४०॥
मद्यं तीक्ष्णोष्णरूक्षाम्लमाशु व्यापादेवद्व्रणम्।
त्याज्य आहार—नये धान्य, तिल, उड़द, मद्य, अनुपदेशीय प्राणियों (मुग एवं पक्षियों) के मांस, दूध से बना हुआ खोया आदि, ईब से बने हुए गुड़ आदि पदार्थ, आम, इमली आदि खट्टे पदार्थ तथा नमक, सौठ, मरिच, पीपल आदि पदार्थों का त्याग करें। और भी जो विष्टम्भकारक, विदाहकारक, पचने में देर करने वाले पदार्थ तथा शीतल हों उन सबका परित्याग करें। उक्त नवधान्यवर्ग ब्रणरोगियों के सभी दोषों को प्रकृपित कर देता है। जो मद्य तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष तथा अम्ल रसयुक्त होता है, वह पाक आदि उत्पन्न कर ब्रण को विकृत कर देता है॥ ३९-४०॥
बालोशिरैश्च वीज्येत न चैनं परिघट्टयेत्॥ ४१॥
न तुदेन्न च कट्टूयेच्छेष्टमानश्च पालयेत्। स्निग्धवृद्धिज्जातीनां कथाः शृण्वन्मनःप्रियाः॥ ४२॥
आशावान् व्याधिमोक्षाय क्षिप्रं ब्रणमपोहति।
ब्रणोपचारार्थ उपदेश—मक्खियाँ आदि उस ब्रण पर न बैठें इसलिए बालों से बने हुए चैवर या पंखे से ब्रण के ऊपर हवा करता रहे, ब्रण के ऊपर किसी प्रकार का दवान न दें, न उसे सूई आदि से खोदें, न खजुरालें, चलते-फिरते, उठते-बैठते उसकी रक्षा करें। प्रियजनों, महापुरुषों तथा ब्राह्मणों से मनोनुकूल कथाएँ सुना करें। रोग ठीक हो जायेगा—इस विषय में आशा रखे, निराश न हो। ऐसे व्यक्ति का शीघ्र ही ब्रण भर जाता है॥ ४१-४२॥
तृतीयेऽह्नि पुनः कुर्याद् ब्रणकर्म च पूर्ववत्॥ ४३॥
प्रक्षालनादि, दिवसे द्वितीये नाचरेत्तथा। तीव्रव्ययो विद्यथितश्चिरात्संरोहति ब्रणः॥ ४४॥
पुनः प्रक्षालन आदि कर्म—फिर तीसरे दिन ब्रणप्रक्षालन आदि कर्म पहले की भाँति करें। दूसरे ही दिन इसलिए न करें क्योंकि ब्रणस्थान अभी कमजोर ही रहता है, अतः उसमें अत्यन्त कष्ट होगा। इस प्रकार जल्दी-जल्दी प्रक्षालन आदि कर्म करने से ब्रणरोपण देर में हो सकेगा॥ ४३-४४॥
वत्कव्य—देखें—सू. ५।३५। वास्तव में वाग्भट के ये पद्य सुश्रुतोंक मद्य के ही पद्यानुवाद हैं।
स्निग्धां रूक्षां श्लथो गाढां दुर्नस्तां च विकेशिकाम्। ब्रणे न दद्यात्कल्कं वा—
२१ अ० ६०
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अष्टाङ्गहृदये
विकेशिका-वर्णन—ब्रण के भीतर अत्यन्त स्निग्ध ( चिकनी ), अत्यन्त रूखी, अधिक ढीली, अधिक कठोर तथा अनुचित ढंग से विकेशिका को नहीं रखना चाहिए और इस प्रकार के कल्क को भी न रखे।
—स्नेहात्कलेदो विबर्द्धते ॥ ४५ ॥
मांसच्छेदोऽतिरुध्योऽध्यादूरणं शोणितामगः । श्लयातिगाददुन्यसिर्ब्रणवत्सर्वविघर्षणम् ॥ ४६ ॥
इनके दुष्परिणाम—अतिस्नेह से ब्रण में गोलापन की वृद्धि, रुक्ष विकेशिका से मांस कटने लगता है, वेदना बढ़ती है, ब्रणभूमि फटने लगती है, रक्त बहने लगता है, ढीली, कठोर तथा अनुचित ढंग से रूखी हुई विकेशिका के कारण ब्रणमार्ग घिसने लगता है ॥ ४५-४६ ॥
वक्तव्य—देखें—सू. सू. १८।२१। यह भी सर्वथा सुश्रुत का ही प्रतिबिम्ब है।
सपूतिमांसं सोत्सङ्गं सगतिं पूयगर्भिणम् । ब्रणं विशोधयेच्छीघ्रं स्थिता ह्यन्तर्विकेशिका ॥ ४७ ॥
विकेशिका का सदुपयोग—दोषरहित विकेशिका ( बत्ती ) को ब्रण के भीतर रखने से उसका सद्गुण हुआ मांस बत्ती के साथ बाहर निकल जाता है, ब्रण के भीतर के खोखले भाग तथा नाड़ियाँ पूयरहित होकर शुद्ध हो जाती हैं और भीतर की ओर से सम्पूर्ण ब्रण शुद्ध हो जाता है ॥ ४७ ॥
व्यम्लं तु पाटितं शोफं पाचनैः समुपाचरेत् । भोजनैरुपनाहैश्च नातिब्रणविरोधिभिः ॥ ४८ ॥
विदग्ध ब्रण का उपचार—यदि व्यम्ल अर्थात् विदग्ध ( अद्यपका ) ब्रण का कभी शस्त्र द्वारा पाटन कर दिया जाता है अर्थात् अद्यपके ब्रण को चौर दिया जाता है तो उस ब्रणशोथ का उपचार पाचन आहार तथा पेशों और उपनाहों से करना चाहिए, किन्तु वे उपचार अधिक ब्रणविरोधी ( ब्रण को विकृत करने वाले ) नहीं होने चाहिए ॥ ४८ ॥
सद्यः सद्योब्रणान् सीव्येद्विवृतानभिघातजान् ।
मेदोजालिलिखितान् ग्रन्थीन् ह्रस्वाः पालीश्च कर्णयोः ॥ ४९ ॥
शिरोऽक्षिकूटनासोष्णगण्डकर्णोरुबाहुषु । ग्रीवाललाटमुष्कस्फिङ्गमेदूपायूदरादिषु ॥ ५० ॥
गम्भीरेषु प्रवेशेषु मांसलेख्यचलेषु च ।
सद्योब्रण के उपचार—सद्योब्रणों ( जो घाव तलवार आदि के प्रहार से तत्काल हुए हों ) को, जिनके मुखभाग खुल गये हों, तत्काल उन्हें साफ करके सीवन-विधि से सी दें अर्थात् उन पर टॉके लगा दें। मेदोज अण्डवृद्धि तथा ग्रन्थियों का लेखन कर्म करने के बाद उनमें टॉके लगा देने चाहिए। कान की छोटी पालियों पर लेखन कर्म करने के बाद सीवन कर्म करें। सिर, नेत्रकूट, नासिका, ओष्ठ, गण्डस्थल ( दोनों गालों ), कानों, ऊरुओं, बाँहों, ग्रीवा ( गरदन ), ललाट ( माथा ), अण्डकोष, स्फिङ्ग ( चूतड़ ), मेदू ( लिंग ), पायू ( गुद ) तथा उदरप्रदेश में हुए सद्योब्रणों एवं गम्भीर ( गहरे ) ब्रणों, मांसलप्रदेश के और अचलप्रदेशों के सद्योब्रणों में भी शीघ्र सीवनकर्म करना चाहिए ॥ ४९-५० ॥
न तु वङ्गणकक्षादावलपमांसे चले ब्रणान् ॥ ५१ ॥
वायुनिर्वाहिणः शल्यगर्भान् क्षारविषाग्रिजान् ।
सीवनकर्म का निषेध—बंक्षण ( कूल्हा ) एवं कक्षा ( काँख ) के अल्पमांसवाले शरीरावयवों तथा चल-अवयवों के सद्योब्रणों का सीवनकर्म नहीं करना चाहिए। फुफ्फुस आदि, जिनके ब्रणों में से वायु निकल रहा हो और जिनके भीतर अभी शल्य है तथा जो ब्रण क्षार, विष एवं अग्नि के कारण हुए हों, इस प्रकार के उन सद्योब्रणों का सीवनकर्म नहीं करना चाहिए ॥ ५१ ॥
सीव्येच्चलस्थिशुष्काघ्रतृणरोमापनीय तु ॥ ५२ ॥
प्रलम्बि मांसं विच्छिन्नं निवेश्य स्वनिवेशने । सन्ध्यस्थि च स्थिते रक्ते स्नाय्वा सूत्रेण वलकैः ॥
शस्त्रकर्मविधिरध्यायः २९ ]
सूत्रस्थानम्
३२३
सीव्येन दूरे नासन्ने गृह्णन्त्येन न वा बहु।
सीवनकर्म-विधि—टूट या फूट जाने पर अपने स्थान मे विचलित अस्थि को, सूखे हुए रक्त को, तृण तथा रोम ( लोम ) आदि किसी प्रकार के अवाच्छित द्रव्य को बीच में से निकाल कर सीवनकर्म करना चाहिए। जो मांस का टुकड़ा कटकर लटक रहा हो, उसे उसके स्थान पर रखकर तथा बैठकर और मन्धि की अस्थि को भी उसके अपने स्थान पर ठीक ढंग मे जोड़ से जोड़ को मिलाकर, रक्तस्राव के रुक जाने पर अन्य प्राणी के स्नायु से, रेशम के धागे से अथवा सन, अश्मन्तक आदि के वल्कल से निकाले गये डोरे से सीवनकर्म करे। सीवन के टोंके न बहुत दूर हों और न बहुत पास हों और सीवन कर्म में त्वचा का किनारा भी न बहुत अधिक लिया जाय, न बहुत कम किन्तु इस प्रकार सीवें जिससे त्वचा के दोनों किनारे मिल जायें ॥ ५२-५३ ॥
बक्तव्य—उक्त प्रसंगों को सुश्रुत में देखें—सू.गृ. २५।१६ से २६ तक। इन श्लोकों में विषयक्रम इस प्रकार है—१. सीने योग्य रोग, २. सीवनकर्म का निषेध, ३. संशोधन-निर्देश, ४. सीने की विधि, ५. चार प्रकार का सीवनकर्म तथा ६. मुइयों के विविध प्रकार। सीवन के चार भेदों का वर्णन वृद्धवामभट ने भी किया है। देखें—अ. सं. सू. ३८।३८। अन्तर केवल इतना है—सुश्रुत ने चतुर्थ सीवन प्रकार को 'क्रजुग्रन्थि' कहा है और वृद्धवामभट ने 'ग्रन्थिवन्धन'। बन्धनों के ये भेद ब्रण ( घाव ) की आकृति के आधार पर निर्धारित किये गये हैं। दर्जा फटे हुए वस्त्र को कहाँ कैसे सिलता है, ध्यान से देखें।
सान्त्यवित्वा तत्तश्चार्त ब्रणे मधुघृतदूतैः ॥ ५४ ॥
अज्जनक्षौमजमपीफलनीशल्लकीफलैः। सरोध्रमधुकैर्दिग्धे युज्य्यादृग्धादि पूर्ववत् ॥ ५५ ॥
सीवन का पश्चात्कर्म—सीवनकर्म कर लेने के बाद रोगों को सान्त्यना देकर ( अब किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा, ऐसा कहकर ) और उस घाव पर मधु-घृत में मिलाये गये सफेद या काला सुरमा, रेशम की भस्म, प्रियंगु, सलई के फल, लौह एवं मुलेठी—इन द्रव्यों के कपडछन चूर्णों का लेप लगाकर पाटनकर्म के समान बन्धन आदि कर्म करे ॥ ५४-५५ ॥
बक्तव्य—'शल्लकी फल'—इसे चिलगोजा कहते हैं। यह सूखा मेवा है। इसे पीसने पर तेल निकलता है, अतः इसे अकेले पीसकर उक्त मलहम में मिलायें। जिस ब्रण में सीवनकर्म न करना हो उसमें उक्त द्रव्य के चूर्णों का प्रतिसारण किया जाता है अर्थात् इनके चूर्ण को बुरक दिया जाता है। ये रोपण द्रव्य हैं।
ब्रणो निःशोणितोष्ठो यः किञ्चिदेवावल्लिख्य तम्। सज्जातरुधिरं सीव्येन्सन्धानं ह्यस्य शोणितम् ॥
सीवनकर्म का निर्देश—जिस ब्रण के होठों ( किनारों ) में रक्त न आ रहा हो, उन्हें थोड़ा-सा छील दें, जिससे उनमें रक्त निकलने लगे, तभी सीवनकर्म कर देना चाहिए। क्योंकि रक्त ही ब्रण ( ब्रण के दो छोरों ) को जोड़ने में प्रधान कारण होता है ॥ ५६ ॥
बन्धनानि तु देशादीन् वीक्ष्य युज्जीत तेषु च। आविकाजिनकोशेयमुष्णं, क्षौमं तु शीतलम् ॥
शीतोष्णं तूलसन्तानकार्पासस्यायुबल्कजम्। ताप्रायस्त्वपूसीसानि ब्रणे मेदः कफाग्निके ॥ ५८ ॥
भङ्गे च युज्य्यात्फलकं चर्मवल्ककुशदि च।
बन्धन द्रव्यों का वर्णन—शरीर के अवयवों तथा वात आदि दोषों का विचार करके निम्नलिखित विविध बन्धनों का प्रयोग करना चाहिए। आविक ( भेड़ के ऊन का ), अजिन ( मृगचर्म का ), कौशेय ( रेशमी वस्त्र का ) बन्धन ( पट्टी ) उष्णवीर्य होता है। क्षौम ( अलसी के रेशों से बना हुआ ) वस्त्र का बन्धन शीतवीर्य होता है। सेमल तथा कपास की रई से निर्मित वस्त्र का बन्धन, स्नायु तथा वृक्ष की छाल का बन्धन समशीतोष्ण ( मादिल ) होता है। मेदः-प्रधान एवं कफ-प्रधान ब्रणों पर तांबा, लौहा,