भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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शस्त्रकर्मविधिरध्यायः २९ ]

सूत्रस्थानम्

३२३

सीव्येन दूरे नासन्ने गृह्णन्त्येन न वा बहु।

सीवनकर्म-विधि—टूट या फूट जाने पर अपने स्थान मे विचलित अस्थि को, सूखे हुए रक्त को, तृण तथा रोम ( लोम ) आदि किसी प्रकार के अवाच्छित द्रव्य को बीच में से निकाल कर सीवनकर्म करना चाहिए। जो मांस का टुकड़ा कटकर लटक रहा हो, उसे उसके स्थान पर रखकर तथा बैठकर और मन्धि की अस्थि को भी उसके अपने स्थान पर ठीक ढंग मे जोड़ से जोड़ को मिलाकर, रक्तस्राव के रुक जाने पर अन्य प्राणी के स्नायु से, रेशम के धागे से अथवा सन, अश्मन्तक आदि के वल्कल से निकाले गये डोरे से सीवनकर्म करे। सीवन के टोंके न बहुत दूर हों और न बहुत पास हों और सीवन कर्म में त्वचा का किनारा भी न बहुत अधिक लिया जाय, न बहुत कम किन्तु इस प्रकार सीवें जिससे त्वचा के दोनों किनारे मिल जायें ॥ ५२-५३ ॥

बक्तव्य—उक्त प्रसंगों को सुश्रुत में देखें—सू.गृ. २५।१६ से २६ तक। इन श्लोकों में विषयक्रम इस प्रकार है—१. सीने योग्य रोग, २. सीवनकर्म का निषेध, ३. संशोधन-निर्देश, ४. सीने की विधि, ५. चार प्रकार का सीवनकर्म तथा ६. मुइयों के विविध प्रकार। सीवन के चार भेदों का वर्णन वृद्धवामभट ने भी किया है। देखें—अ. सं. सू. ३८।३८। अन्तर केवल इतना है—सुश्रुत ने चतुर्थ सीवन प्रकार को 'क्रजुग्रन्थि' कहा है और वृद्धवामभट ने 'ग्रन्थिवन्धन'। बन्धनों के ये भेद ब्रण ( घाव ) की आकृति के आधार पर निर्धारित किये गये हैं। दर्जा फटे हुए वस्त्र को कहाँ कैसे सिलता है, ध्यान से देखें।

सान्त्यवित्वा तत्तश्चार्त ब्रणे मधुघृतदूतैः ॥ ५४ ॥

अज्जनक्षौमजमपीफलनीशल्लकीफलैः। सरोध्रमधुकैर्दिग्धे युज्य्यादृग्धादि पूर्ववत् ॥ ५५ ॥

सीवन का पश्चात्कर्म—सीवनकर्म कर लेने के बाद रोगों को सान्त्यना देकर ( अब किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा, ऐसा कहकर ) और उस घाव पर मधु-घृत में मिलाये गये सफेद या काला सुरमा, रेशम की भस्म, प्रियंगु, सलई के फल, लौह एवं मुलेठी—इन द्रव्यों के कपडछन चूर्णों का लेप लगाकर पाटनकर्म के समान बन्धन आदि कर्म करे ॥ ५४-५५ ॥

बक्तव्य—'शल्लकी फल'—इसे चिलगोजा कहते हैं। यह सूखा मेवा है। इसे पीसने पर तेल निकलता है, अतः इसे अकेले पीसकर उक्त मलहम में मिलायें। जिस ब्रण में सीवनकर्म न करना हो उसमें उक्त द्रव्य के चूर्णों का प्रतिसारण किया जाता है अर्थात् इनके चूर्ण को बुरक दिया जाता है। ये रोपण द्रव्य हैं।

ब्रणो निःशोणितोष्ठो यः किञ्चिदेवावल्लिख्य तम्। सज्जातरुधिरं सीव्येन्सन्धानं ह्यस्य शोणितम् ॥

सीवनकर्म का निर्देश—जिस ब्रण के होठों ( किनारों ) में रक्त न आ रहा हो, उन्हें थोड़ा-सा छील दें, जिससे उनमें रक्त निकलने लगे, तभी सीवनकर्म कर देना चाहिए। क्योंकि रक्त ही ब्रण ( ब्रण के दो छोरों ) को जोड़ने में प्रधान कारण होता है ॥ ५६ ॥

बन्धनानि तु देशादीन् वीक्ष्य युज्जीत तेषु च। आविकाजिनकोशेयमुष्णं, क्षौमं तु शीतलम् ॥

शीतोष्णं तूलसन्तानकार्पासस्यायुबल्कजम्। ताप्रायस्त्वपूसीसानि ब्रणे मेदः कफाग्निके ॥ ५८ ॥

भङ्गे च युज्य्यात्फलकं चर्मवल्ककुशदि च।

बन्धन द्रव्यों का वर्णन—शरीर के अवयवों तथा वात आदि दोषों का विचार करके निम्नलिखित विविध बन्धनों का प्रयोग करना चाहिए। आविक ( भेड़ के ऊन का ), अजिन ( मृगचर्म का ), कौशेय ( रेशमी वस्त्र का ) बन्धन ( पट्टी ) उष्णवीर्य होता है। क्षौम ( अलसी के रेशों से बना हुआ ) वस्त्र का बन्धन शीतवीर्य होता है। सेमल तथा कपास की रई से निर्मित वस्त्र का बन्धन, स्नायु तथा वृक्ष की छाल का बन्धन समशीतोष्ण ( मादिल ) होता है। मेदः-प्रधान एवं कफ-प्रधान ब्रणों पर तांबा, लौहा,